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शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

जिंदा हैं अभी संभावनाएँ - जय चक्रवर्ती

हमारे समय के जो लोग पूरी ईमानदारी और निर्भीकता से ‘सच को सच और झूठ को झूठ’ कहने–लिखने के साहस के साथ अपनी साहित्यिक यात्रा में निरंतर गतिमान हैं, उनमें देवेन्द्र आर्य, डॉ.डी.एम. मिश्र जैसे थोड़े-से रचनाकारों के साथ जय चक्रवर्ती को आप बेहिचक रख सकते हैं। आप समझ रहे होंगे कि आम जन की पैरोकारी उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य है, जिसके लिए वे सिस्टम की किसी भी मनमानी के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।

व्यवस्था के प्रति सजग चेतना और संवेदना की धार, जो उनके सृजन के सरोकारों में आरंभ से ही उपस्थित थी, समय और जीवनानुभवों के साथ और भी प्रखर और मुखर होकर हमारे सामने आती है। अपनी इसी प्रखर और मुखर सृजनात्मकता के चलते जय चक्रवर्ती आज हिन्दी के कविता प्रेमी पाठकों के विशाल वर्ग के चहेते कवि बन गए हैं। एक नवगीतकार के रूप में, एक दोहाकार के रूप में और समकालीन हिन्दी गजलकार के रूप में वे एक तरह-से पूरे देश में रायबरेली का प्रतिनिधित्व करते हैं। छांदस कविता की विविध विधाओं में उनके अब तक दो नवगीत संग्रह (थोड़ा लिखा समझना ज़्यादा तथा ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ), दो दोहा संग्रह (संदर्भों की आग तथा ज़िंदा हैं आँखें अभी), एक गजल संग्रह (आख़िर कब तक चुप बैठूँ) और एक मुक्तक संग्रह (हमारे शब्द बोलेंगे) प्रकाशित हो चुके हैं, जो पाठकों के मध्य भरपूर चर्चित हुए हैं। इसके अलावा एक नवगीत, एक दोहा और एक गजल संग्रह प्रकाशनाधीन हैं।

फिलहाल, उनके हाल ही में प्रकाशित नवगीत संग्रह ‘ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ’ से गुज़र रहा हूँ । इस कृति में कवि के ५७ नवगीत संग्रहीत हैं, जिन्हें पढ़ते हुए कोई भी सजग–संवेदनशील पाठक जय चक्रवर्ती के सृजनात्मक– सरोकारों को बखूबी समझ सकता है। इन नवगीतों का फ़लक बहुत व्यापक है और यह भी कि कवि की अभिव्यक्ति का निर्भीक, निडर, बेलौस अंदाज़ न न सिर्फ ध्यान आकर्षित करता है, अपितु अपने रचनाकर्म के प्रति ईमानदार रचनाकार से भी परिचय कराता है। उनकी वैचारिक पक्षधरता की बात करें तो, जितना मैं समझ पाया हूँ, कह सकता हूँ कि वे जनसरोकारों के स्वाभाविक, स्वाभिमानी, अपनी शर्तों जीने और खुद की बनाई राह पर चलने वाले कवि हैं। शायद इसीलिए प्रतिष्ठित नवगीतकार यश मालवीय उन्हें ‘कबीर की लुकाठी हाथ में लेकर चलने वाला गीतकार’ (संग्रह की भूमिका, पृ.९) बताते हैं। अपने लेखकीय सरोकारों के बारे में वे स्वयं कहते हैं-

नहीं/ तुम्हारी शर्तों पर/ मैं गा न सकूँगा।
मैं पंछी हूँ / बादशाह हूँ अपने मन का।  
डर न किसी का / और न भूखा हूँ कंचन का।
मैं दर्पन हूँ/ सच को/ मैं झुठला न सकूँगा      (गा न सकूँगा)

अपनी शर्तों के साथ चलने वाले इस कवि के मन में कहीं कोई भटकाव या भ्रम नहीं है। उसकी दिशा और लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट है। कहाँ और किस ओर जाना है, यह उसे बहुत अच्छे से मालूम है। तभी वह कहता है : पथ मेरा रोको मत भाई/ मुझको बहुत दूर जाना है। एक अन्य गीत की ये ध्रुव पंक्तियाँ कवि के रास्ते के एक एक पड़ाव की पहचान करा देतीं हैं-:

तुम दरबारों के गीत लिखो / मैं जन की पीड़ा गाऊँगा
तुम सोने-मढ़ा अतीत गुनों/ मैं अपना समय सुनाऊँगा
तुम सुख-सुविधा को मीत चुनो/ मैं दुख का जश्न मनाऊँगा
तुम किरन किरन को कैद रखो/ मैं सूरज नया उगाऊँगा   (मैं दुख का जश्न मनाऊँगा)

 जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ कि जय चक्रवर्ती अपनी साफ़गोई और हक़बयानी के चलते भीड़ में रहते हुए भी भीड़ से अलग दिखाई देते हैं। वे जो कुछ देखते और सोचते हैं , उसे बिना लाग लपेट के कहना बखूबी जानते हैं। ‘अन्दर कुछ–बाहर कुछ’ वाला स्वभाव उन्हें कभी रास नहीं आया। ‘हम तो सीधी बात लिखेंगे’-शीर्षक गीत में वे कहते हैं :

हम क्या जाने मंदिर-मस्जिद / वेद-पुराण, कथा, व्रत-पूजन
श्रम की चादर बुनते हैं हम/ ओढ़े भूख-प्यास की कतरन
घूँघट, बिंदिया, पायल लिखकर/ तुम चाहे जैसे कवि बनना
जन-संघर्षों की भट्टी में / शब्द-शब्द हम सदा सिंकेंगे          (हम तो सीधी बात लिखेँगे)

जन-संघर्षों की भट्टी में अपना शब्द-शब्द सेंकने वाला यह गीतकार जब सिस्टम की सड़ान्ध को देखता-महसूसता है तो भीतर तक काँप जाता है । सत्ता और सियासत की ऊँची-ऊँची कुर्सियों बैठे लोगों का  विद्रूप चरित्र उसे झकझोरता है। उन्हें लगता है कि कपट से, छल से, मक्कारी से येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना ही आज के राजनेताओं का चरित्र रह गया है । टोपियाँ और झंडे भले ही अलग हों , पर सोच और कर्म सबके एक जैसे ही हैं। ‘ये सियासत के दुपट्टे’ शीर्षक नवगीत मेँ वे कहते हैं-    

‘हों ये गाँधी छाप या फिर / रामनामी हों
संघ, परिषद, फ्रंट, दल / या मध्यगामी हों
भेष-भाषा भिन्न हों या / हों अलग झंडे
फाँसने को जाल में हों अलग / हथकंडे
एक थैली के / मगर हैं सभी चट्टे और बट्टे’        

शहर हों या गाँव , हमारी सामाजिकता अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और संप्रदाय हम पर हावी हो रहा है । पाखंड, नफरत और अंधविश्वास का ज़हर पूरे समाज पर इस कदर हावी है कि इंसान और इंसानियत का पक्ष लेने वाला व्यक्ति अब ‘देशद्रोही और गद्दार’ घोषित किया जाने लगा है । इस विषाक्त वातावारण में गीतकार कबीर को याद करता है :

 आओ पुनः कबीर! पुनः आओ इस जग में
 धूर्त, छली , कपटी / बतलाते / खुद को ईश्वर
 बिना किए कुछ/ बैठे हैं / श्रम की छाती पर
 बचा नहीं है अंतर / अब साधू में-ठग में       (आओ पुनः कबीर)

जय चक्रवर्ती अपने हिस्से के समय का सम्पूर्ण लेखा-जोखा अपने नवगीतों में समाहित कर लेना चाहते हैं। ऐसा करते हुए जीवंत प्रश्नों पर प्रबुद्ध वर्ग की उदासीनता से वे दुखी भी होते हैं और भीतर से आंदोलित भी होते हैं। समझौतावादी मूल्यों और समझौतावादी लोगों के साथ वे कभी सामंजस्य नहीं बैठा पाते। एक ईमानदार लेखक की यही प्रतिबद्धता है कि वह अपनी लेखकीय जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटता, परिणाम जो भी हो। कविता को वे ‘कला’ की सीमाओं से बाहर निकालकर  ‘भोगे हुए यथार्थ’ तक ले जाते हैं :

‘तुम्हें तुम्हारा सुख है कविता / शब्द तुम्हारे लिए कला है
हम क्या जानें कविता-अविता / जो भोगा है वह निकला है
घूँघट,बिंदिया, पायल लिखकर/ तुम चाहे जैसे कवि बनना
जन संघर्षों की भट्टी में / शब्द-शब्द हम सदा सिंकेंगे’       (हम तो सीधी बात लिखेंगे )

समय की तमाम विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद कवि ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। मौसम बदलेगा और आशाओं का सवेरा उषा की नव किरणों के साथ एक दिन धरती पर दस्तक ज़रूर देगा। रात चाहे जितनी भी लंबी हो, सुबह का आगमन कोई रोक नहीं सकता :

  ‘बदलेगा साथी ! ये मौसम भी / बदलेगा
  फिर लौटेंगी मुस्कानें/ रूखे-चिटके / उदास चेहरों पर
  फिर धरती से आसमान तक / गूँजेंगे संवेदन के स्वर’     (ये मौसम भी बदलेगा )   

 ‘ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ’ के माध्यम से जय भाई यही संदेश देना चाहते हैं। जय चक्रवर्ती के नवगीत गेय भी हैं और पेय भी हैं- यहाँ पेय का आशय सारगर्भित होने से है। गीत सरल हैं, प्रवाहपूर्ण हैं , साथ ही दूरंदेशी भी हैं। गति, लय, छंद के निकष पर एक-एक शब्द अपनी जगह स्थाई रूप से प्रतिष्ठित है। किसी शब्द को इधर से उधर स्थानांतरित करने गुंजाइश इन गीतों में न के बराबर दिखाई देती है। संग्रह के तमाम नवगीत अलग से विशद व्याख्या और टिप्पणियों की माँग करते हैं। यही इस संग्रह और संग्रह के रचनाकार का वैशिष्ट्य है। जय भाई को ठीक से पहचानना हो , तो आप इनकी रचनधर्मिता से जुड़कर देखें। यकीन मानिए वर्तमान के नवगीत-कवियों की बेशुमार भीड़ में यह नवगीतकार आपको दूर से पहचान में आ जाएगा।

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नवगीत संग्रह- जिंदा हैं अभी संभावनाएँ, रचनाकार- जय चक्रवर्ती, 
प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, २३२ बी-१, लोकनायक पुरम, बक्करवाला, नयी दिल्ली-११००४१, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य- रु, १९९ सजिल्द, पृष्ठ-१३५  , परिचय- रविशंकर शुक्ल, ISBN-978-93-92617-81-2

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

गाँठों की करधनी- शीला पांडे

‘गाँठों की करधनी ‘उनका दूसरा नवगीत-संग्रह है जिसमें कुल छियालिस (46) नवगीत हैं। प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई से प्रकाशित है। शीला पांडे अपने प्राक्कथन में लिखती हैं कि शहर रूप में जीवन को सबसे पहले कविता ही बचाती है। उसे दुष्वारियों से निकालती है, जीवन को पोषती है और उसका मनोरंजन कर उसे सींचती भी है।” शीला इन्हीं तमााम अनुगूँजों की कवयित्री हैं। इसलिये उनके गीतों में विविध रंग हैं।

लोक चेतना नवगीत का विशिष्ट पहलू है। लोकजीवन में प्रकृति की गहरी संशक्ति है। उसका वैविध्य लोक जीवन में प्रेरणा, साहचर्य और सौंदर्य की सृष्टि करता है। यहां वह पारंपरिक रमणीय रूपों में नहीं। अपनी अलग सौंदर्य सत्ता स्थापित करता है। मानवी अनुराग,त्रासद संबंधों और बिंबों के रूप में उपस्थित होता है ----

“घर की दुआर तक/ आ गई है धूप/ छोटा सा बिरवा/ करेर हुआ बप्पा/ फल-फूल ठाँव-ठाँव/ लटका है झप्पा/ साफ-साफ पानी ने/ भर दिया है कूप/ चिड़िया के चूजे/ हुए सब सयाने/ द्वारे पर लाए हैं/ फसलों के दाने/ मह-मह महकते/ जब झरते हैं सूप”

लोक पर्वों की लोक जीवन में अटूट परंपरा है। होली, दिवाली, दशहरा ऐसे ही पर्व हैं । लेखिका लोक पर्व की परंपरा का इतिहास उभार देती है। फागुनी प्रकृति और होली पर्व का एक चित्र-

 “गुड़ की गुझिया/ पिघल गई है/ फूटी रस की धार/ इनकी गुझिया उनकी गुझिया/ फागुनाया मन सब की गुझिया/ चारा कल की/ लगे गड़ासा/ चुन्नट जैसी धार/ नयाअन्न बौराया फूला/ बेपर्दा मन पर्दा भूला/ रंग अंग में ताप अनूठा/ पुरवा की भी मार”

लोक विश्वास प्रारंभ से लोक जीवन के साथ जुड़ा है। कहीं-कहीं तो यह लोक विश्वास मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिएटोना-टुटका जैसे अंधविश्वास भी बन गया है ------

“जादू-टोने का चक्कर है/ ओझा-सोखा नित घिरते हैं।”

पिता का व्यक्तित्व नदी के दो किनारों कर्म और आदर्श के बीच अनुशासित बहता है। पिता चट्टानों से टकराकर संघर्ष की प्रेरणा देते हैं। नदी के बीच रेता पड़ जाता है तो वह दो धाराओं में विभक्त हो जाती है। कवयित्री इस दर्द को अनुभूत करती हैं। उनका आदर्श और कर्म की जिजीविशा याद करती है-

 “आसमान की सीढ़ी पक्के/ डंडो वाली ही बनवाना/ कीली काँटी स्वयं बाँधना विश्वकर्मा भी तुम बन जाना/... अंगुल भर में पाँव पसारा/ धरी जमीनें सब की खातिर/ इच्छाएँ हर बार मुल्तवी/ करती जीवनधारा शातिर/ सबके हिस्से की खुशियों में/ बहते रहे पिता”

गृहस्थ जीवन स्त्री-पुरुष के बीच निष्ठा पूर्वक उत्तरदायित्व का निर्वाह है। इसमें प्रेम के प्रयास की आवश्यकता नहीं। यह साहचर्य की अनवरत प्रक्रिया है। चिंता, समाधान, तकरार के साथ यह सुष्ठ और मधुर है । अमृत पराग भरा सपना। जीने में निष्ठा से स्वयं को खाली करना पड़ता है। रीतना और संभरित होना, यही जीवन है। बिना रीते संभरण नहीं होता। इस नौका की पतवार नारी होती है। लेखिका बेरुखी महसूस करती है ------

“समाधान जीते-जीते/ मैंने तुमसे तकरार किया बस/ तुमको प्रेम पता था केवल/ मैंने जब पतवार जिया बस”

शीला के नवगीतों में जगह-जगह मिट्टी की खुशबू मौजूद है। ग्रामीण परिदृश्य उनके गीतों की संरचना में परिपक्वता के साथ उभरकर सामने आते हैं। समकालीन जीवन भौतिकता से भरा है। अर्थसाध्य। अर्थाभाव में जीवन के किसी क्षेत्र में कदम रखना मुश्किल है। लोक परिवेश को जीने वाला मनुष्य इस वातावरण में कितना मजबूर है। नवगीत में इस यथार्थ की करुण अनुभूति दिखती है। अपनी दिन भर की मेहनत के बाद इस सीधे-साधे किसान को शाम का भोजन आसानी से नसीब नहीं होता। कवयित्री ने तीखे और धारदार स्वर में इसकी अनुभूति की है ---

“नून तेल लकड़ी की चिंता/ आधि-व्याधि/ सिर पर फिरते हैं/ जोड़-गाँठ कर 

श्रम से लाया/ दाना-दाना महंग पड़ा है/शीश जुआठा/नाधे-नाधे/नस गर्दन कंधा अकड़ा है/ तीस दिनों की कड़ी कमाई/ एक तिहाई दिन सिरते हैं”

जिस तरह बैल के गले में जुआठ डाल दी जाती है । रस्सी से उसे बांधकर मनचाहा श्रम लिया जाता है। किसान इसी श्रम की जुआठ और नाधे में अबद्ध रत है। किंतु ---

“खुशबू की चाहत में उड़ते/ घर की खुशबू रूस गई है/ मीठे ईखों की मिठास को/ ललही कीड़ी चूस गई है”

शीत की ठिठुरन, ग्रीष्म की धूप, गन्ने की अनेक बार निराई- गुड़ाई, सिंचाई। इस हाड़ तोड़ मेहनत के बाद फसल में लाल रंग की छोटी-छोटी कीड़ियाँ लग कर उसका सारा रस चूस जाती हैं। किसान की जिंदगी भी ऐसी ही है। प्रकृति, दबंग और व्यवस्था उसे इसी ललही कीड़ी की तरह चूस रही है। कवयित्री ने पल्ले में दबी हुई उंगली सा यथार्थ प्रस्तुत किया है। इस तरह कवयित्री ने लोक जीवन की दर्दनाक आर्थिक स्थिति और जीवन संघर्ष का चित्रण किया है।

वहीं शहरी जीवन की विसंगतियों का भी चित्रणवे बडी गहराई में डूबकर करती हैं-

“सड़क नापते सेहत ढूढ़े/खान-पान खुशहाली/ डिस्को उत्सव रिश्ते खोजे/ मंदिर शेरावाली/... रंग-बिरंगे फल तरकारी/ उम्दा खान व्यवस्था/ सभी उपकरण टनाटन्न हैं/कोई उमर अवस्था/ भाँति-भाँति के चैराहों पर/ स्वाद और कव्वाली”

राजनीति ने आज के जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। धर्म, दर्शन, विज्ञान कोई भी उस की मार से अछूता नहीं। इस प्रभाव के कारण जीवन के मानदंड बदल रहे हैं। नवगीत ने राजनीतिक प्रभाव के अंकन में अपनी भंगिमा इमानदारी से प्रस्तुत की है। कवयित्री ने ऐसे प्रसंगों का बेबाकी से चित्रण किया है। सामाजिकता के परिप्रेक्ष्य में राजनीति हादसा बन गई है। कवयित्री इसे अपने गीतों में समेटने का प्रयास करती दिखाई पड़ती है। इसके लिए वह अखबारी कतरनों के कूड़े नहीं बटोरती। समस्त विसंगतियों को अपने संवेदन में आत्मसात करती है। अपने हृदय की करुणा को उड़ेल देती है। व्यंग्य की तीक्ष्णता को धारदार हथियार बनाती है। राजनीति के सामाजिक परिणाम प्रस्तुत करते हुए कहती है---

“फाँक-फाँक कर लिया संतरा/ देश सभी ने मिलकर चूसा/ ...गेहूं को ले गई व्यवस्था/ थेसर से तन मन कर भूसा। ...छप्पर-छानी अम्बर देकर/ चुरा ले गए सूरज- तारे/ टुकड़े-टुकड़े स्वप्न हुए सब/ हजम कर गए मामा प्यारे/ छीन लिया जनता की कुर्सी/ दिया नाक पर लातों--घूँसा।”

प्रायः अर्थहीनता के इस समय में जहाँ पूरा विश्व समुदाय अर्थ के पीछे भाग रहा है वहाँ कवि शीला पांडे की वागर्थ सजगता उनके इस नवगीत संग्रह को विशेष रुप से अर्थवान बना देती है । प्रस्तुत संग्रह का शीर्षक ‘गाँठों की करधनी’ भी अपने व्यापक अर्थ में कम दिलचस्प नहीं है। इस शीर्षक से संबंधित संग्रह का एक नवगीत मजदूरों के संदर्भ में है। गाँठें तो गाँठें ही हैं जो अंततः बंधन और बाधा का ही एहसास दिलाती हैं। प्रत्येक औसत आदमी, निर्बल वर्ग एवं मजदूरों और स्त्रियों का जीवन गाँठों का ढोने का पर्याय है। मानों जीवन की तमाम गाँठों को सुसज्जित आभूषण के रूप में स्थापित कर दिया गया हो। जिसके भीतर उनके दर्द और दुश्वारियों को करीने से छुपाकर तहखाने में डाल दिया गया है --

“भीत ढहाकर नींव खोदते/ईंट बिछाते हैं/ नये मसीहा देष जोत/मजदूर उगाते हैं ।.../गाँठों की करधनी चीर से/ पेट छुपाकर तन के ऊपर/ गिरहस्थी 

का कलश शीश पर/पैर थिरकते मन के ऊपर/ निर्धन किलो हजारों मीटर/ पाँव भगाते हैं“

हमारी आर्थिक नीति और शिक्षा प्रणाली पर गहरी चोट भी है और चिंतन के नए द्वार खोलने की क्षमता भी है ....हमारी राजनीति के मसीहा हमें सिर्फ और सिर्फ मजदूर बना रहे हैं। सियासत हमें मजदूर बनाकर शासन कर रही है। मजदूर सोच विचार से दूर रहता है वो सिर्फ कल के भोजन की ही सोच पाता है जबकि विश्व में ऊंचा उठने के लिए भविष्य के चिंतन की आवश्यकता है मगर जब हम सिर्फ कल तक ही सोचेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे। इसीलिए वह कहती हैं ‘‘दूर तक मैं सोचती हूँ....हर ह्रदय में प्यार चुन दूँ।’’

हर हृदय में प्यार भरना यानी सबको खुशहाल देखने की भावना विश्व कल्याण की भावना से जोड़ती है जो शीला के नवगीतों की आधारभूत परिकल्पना है। कहते हैं कि सकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक चिंतन से ही पैदा होती है साहित्य सृजन के लिए अवश्यम्भावी है सकारात्मक चिंतन। चेतना के जब नए द्वार खुलते हैं तो व्यक्ति एक नहीं रहता है उसके एकत्व में विराटता जन्म लेती है और उसका चिंतन वृहद हो जाता है जो समाज की, स्वयं की और देश काल की उन्नति की जमानत बनता है। 

समकालीन जीवन में विखंडन, छलना-प्रपंच, ( ेंपउनसंबतमे ) सिमुलाक्रेस हाबी है। जीवन आज वास्तविक दुनिया की प्रक्रिया या प्रणाली की नकल बन गया है। यह एक ऐसी प्रति है जो या तो मूल नहीं है या अब उसके पास मूल है ही नहीं। समाज अपनी पूर्ववर्ती धारणाओं से इतना संतृप्त हो चुका है कि अब इस तरह के समाज निर्माण की आवश्यकता नहीं। इस संतृप्तता के परिणाम स्वरूप असीम परिवर्तन ने सभी अर्थों को अर्थहीन कर दिया है। कवयित्री इस मूल्य हीनता के प्रति चिंतित है -------

“आँधियों के संग/ अँधेरों ने/ करीं कुछ मंत्रणाएँ/ हम उजाले बेंच आए/... धूप की छाया दिखाकर/ सूर्य बनने के हुनर सब/ कंकड़ों की हलचलों को/ व्हेल गिनने के हुनर सब/ सर्दियों संग कोहरों ने/ जा निभाईं मित्रताएँ/हम दुशाले बेंच आए”

ैंपउनसंबतमे और ेंपउनसंजपवद को प्रतीकों, संकेतों की चर्चा के लिए जाना जाता है । इनका अस्तित्व समकालीनता से एक साथ संबद्ध है । बॉडरिलार्ड का कथन है---‘हमारे वर्तमान समाज ने सभी वास्तविकता और अर्थ को प्रतीकों और संकेतों से बदल दिया है।’ मानव अनुभव वास्तविकता का अनुकरण है। कवयित्री की उक्त पंक्तियां इसी अनुभव को स्पष्ट करती हैं। 

आलोचक नवगीत को निराशावाद का विलाप कहते हैं। शीला के गीत निराशा का रोना नहीं रोते। दुखवाद का बीजारोपण नहीं करते। वे प्रेरणा और आशा का संचार करते हैं। वस्तुतः शीला गीत की नवता के प्रति एक निष्ठ हैं। उनमें संभावना है। वे तरह-तरह के प्रयोग करती रहती हैं। इनके गीतों में जीवन का हर पहलू समाहित है। कवयित्री की दृष्टि में जीवन की संपूर्णता है। इसलिए वे अपनी रचना में जीवन को खाँचों में बांटकर नहीं देखतीं। उनके गीतों में आधुनिकता और 

समकालीनता बोध की गहरी संशक्ति है। नए राजनीतिक मूल्यों, सामाजिक विसंगतियों की स्थिति का चित्रण है। भारतीय चेतना और भारतीय संस्कृति की संपृक्ति है। जन सरोकारों और जनपक्ष की अभिव्यक्ति है। मानवता की प्रतिष्ठा है। लोक जीवन की अनुभूतियों की अभिव्यंजना है। लोक परिवेश और लोक संस्कृति का अनलंकृत प्रस्तुतीकरण है। ग्राम जीवन की विसंगतियों और दर्दनाक आर्थिक स्थिति का बेबाक रूपायन है। 

कवयित्री के गीतों का बिम्ब विधान और प्रतीकात्मकता आकर्षक है। अर्थगुह्य भी। शीला ने प्रायः प्रतीकात्मक, सांकेतिक और प्रातिभ बिम्बों का प्रयोग किया है। पश्यंतीवाक के स्तर से अभिव्यक्त होने के कारण ये सर्वथा नवीन, अछूते और अकल्पनीय हैं। लेखिका ने वैज्ञानिक एवं औद्योगिक क्षेत्र के जीवंत बिंब। महानगरों के त्रासद और नाटकी बिंब, ठेठ ग्रामीण अंचलों, वन-पर्वतों के आदिम तथा मिथकी बिंब। भोगी हुई जीवनानुभूतियों के संश्लिष्ट बिंब आदि का सुंदर प्रयोग किया है---

“पार समंदर/ हलचल भारी/ उल्लू बना नरेश/ बाज को तमगा नया दिया/...दानव सँग/ काँधे चढ़ नोचे/इनके- उनके/ माँस कलेजे/ जंगल पर अब/ राज हमारा/ पंजों में है/ साँस, मजे ले .../नया मसीहा/खरा हितैशी/ आँख मूंद रकबा ठगवाया/ कागज नया दिया”

प्रतीकों के संश्लिष्ट बिंब में ही नारी की व्यथा का एक प्रेरणास्पद चित्र -----

“सरकंडों सी देह तुम्हारी/ छीली जाती है हर बार”

“सड़क खड़े जामुन की तरु सी/ सब के ढेले क्यों सहती हो/ वृक्षारोही किसी छिछोरे को/क्यों कर थामे रहती हो ?”

यद्यपि इस प्रश्नवाचकता में छायावादी अवरोध है। किंतु बिंबो की सहजता आकर्षक है।

कवयित्री की भाषा में यथार्थ जीवन की स्वानुभूतिपरकता है। दर्द, बेचारगी, पीड़ा, संत्रास, आक्रोश आदि का अनुभव सहज, सरल एवं सुरुचिपूर्ण भाषा में वर्णित हुआ है। खुरदरी भाषा की तल्ख अनुभूति लोक शब्दावली में अभिव्यक्त हुई है । यथा---- लगे गड़ासा, चुन्नट जैसी, शीश जुआठा, नाधे-नाधे, मीठे ईखों की। मिठास का। ललही कीड़ी चूस गई। आदि। लेखिका के गीतों में मुहावरेदानी गहरी व्यंजना को अभिव्यंजित करती है। यथा---हम उजाले बेंच आए। हम दुशाले बेंच आए। तेरह तिकड़म हरियाए। ईश अली से तुर्रेबाजी। सांकल खटकाए, कत्ल मेरा मैं ही मुजरिम,कर कटोरा टीन देती, भरदुल्ली चिड़िया, छिल-छिल जाते चूजे तन-मन, जकड़े जाते रसरी मूँजें आदि। कवयित्री मुहावरों का प्रयोग ही नहीं करती । मुहावरे गढ़ती भी है। 

छंद की आंतरिक लयवत्ता का निर्माण कवि की सूक्ष्म चेतना द्वारा होता है। प्रयुक्त छंद की अपनी अलग पहचान होती है। शीला ने जिन छंदों को प्रयोग में लिया है उनकी वाह्य अन्विति की सुरक्षा की है। व्यक्तिनिष्ठ आंतरिक प्रवाह प्रदान किया है । नया व्यक्तित्व एवं गरिमा दी है। टेक और अंतरे के बीच की रूढ़ समता को तोड़ा गया है। मूलवर्ती लय को सुरक्षित रखते हुए 

पंक्तियों को छोटा बड़ा किया है। कवयित्री ने छंद को तोड़ा नहीं है। पारंपरिक छंद पर लगे लांछन का परिहार किया है। शीला पांडे के नवगीतों में लयों की विविधता, आंतरिक गठन,सहज प्रवाह, निर्दोषता, परंपरामुक्तता, औदात्य, आदि छंद विधान की विशिष्टताएँ समाहित हैं। कुल मिलाकर गीत को नया बनाने में उनकी संलग्नता नई आशाएं बँधाती है ।

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नवगीत संग्रह- गाँठों की करधनी, नवगीतकार- शीला पांडे, समीक्षक- डॉ. इंदीवर, प्रकाशक- प्रलेक  प्रकाशन, जे/५०, फ्लैट नं. ७०२, ग्लोबल सिटी, विरार (पश्चिम), ठाणे, महाराष्ट्र, मुंबई, कवर- हार्डबाउन्ड, मूल्य- ३९५ रु. पैपर बैक मूल्य- २०० रु., पृष्ठ- १०६,   ISBN- 978-9355001856

रविवार, 1 दिसंबर 2024

मौन भी अपराध है- राहुल शिवाय


 दिनकर जी ने कहा — “जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उसका भी अपराध।” शिवाय का मौन भी इसी तटस्थता जनित मौन का वह उबाऊ और सर्वस्वीकार्य रूप है जो पौरुष के सामने अभेद्य दीवार खड़ी कर देता है, जिसकी छाया में पनपा-पला पुरुषार्थ क्लीव हो जाता है। स्वत्व के अपहरण पर आक्रोश का उत्सर्ग करने वाला अस्वीकार्य है — अपराध है।

स्थिति, परिस्थिति, परिवेश, आवश्यकता और स्वभाव किसी भी भाव के औचित्य का निर्धारण करते हैं। देश की सीमा पर संघर्ष करने वाले सैनिकों की गर्जना में सिंह की दहाड़ अपेक्षित है; अन्यथा अरि उसे बिना बताए लीलने को तैयार बैठा है। और यदि ऐसी स्थिति में गर्जना या आक्रमण का अपेक्षित तीव्रता से प्रतिकार नहीं किया जाता तो सामने वाले को साहस का लाभ अनायास ही उपलब्ध हो जाता है, और इसे ऐसी स्वीकृति मानी जाएगी जिसका कुफल भोगना ही पड़ेगा। क्योंकि मौन प्रायः स्वीकारोक्ति ही है। सामने से मेरा अंश छीनने वाले तमाम तिकड़मों से हमें हानि पहुँचाने की कोशिश में हैं और हम उन्हें समझ-बूझकर भी टालने की प्रवृत्ति पाले हुए हैं। समाज में अपराध, अनीति और अत्याचार दिनानुदिन बढ़ रहा है तो इसका एक मात्र कारण यह मौन है — जनसामान्य का, या कहें आम आदमी का।

चूँकि यह युवा कवि केवल समस्याएँ गिनाकर समाज को रिझाना और वाहवाही नहीं लूटना चाहता; इसके विचार दक्षिण-वाम के व्यूह नहीं रचते, बल्कि आम होकर आमजन की पीड़ा देखकर समाधान तलाशने का विश्वास रखते हैं। अतः कहा जा सकता है कि समाधान की परिकल्पना, विकल्प की तलाश और कोशिशों के गीतों का संकलन है — “मौन भी अपराध है”। हाँ, अपराध और भी हैं।

राहुल जी मँजे हुए, उम्र से बड़े, सुलझे और सिद्धान्तों से अधिक सामाजिकता के गीतकार हैं। इनकी नज़र समाज में रोज-रोज हो रही घटनाओं का सूक्ष्म निरीक्षण करती है, इनका कोमल मन परिस्थिति में प्रवेश करता है, बुद्धि उसका तार्किक विश्लेषण करती है और फिर प्रौढ़ विवेक समाधान तलाशता है जिसे इनका गीतकार निष्कर्ष रूप में प्रकट करता है। इसीलिए इन्हें “सर्वमान्य निष्कर्ष का गीतकार” कहना मुझे अधिक सटीक लगता रहा है।

जैसा कि होता है — मन में पीड़ा का बीज अंकुआकर गीत का पौधा विकसित करता है। यह पीड़ा आदमी स्वयं के क्रियाकलापों, परिस्थितियों, घटनाओं और परिघटनाओं से पाता है, या भावुक मन पर-मन प्रवेश कर कभी-कभी अर्जित भी करता है। हाँ, दिल में जितनी तीव्र अनुभूति होगी अनुभव उतना वेगवान होगा। जरूरी नहीं कि सांसारिक आकर्षण के खण्डित नेह में ही ऐसा हो, फिर भी उसका योगदान तो है ही। इस गीत-संकलन से गुजरते हुए भाँति-भाँति के अनुभवों से गुजरना हुआ।

संकलन का पहला गीत — गीत का परिचय है। स्वर की धरती पर बीज उगाने वाली जिजीविषा या अन्तर्मन कहकर भले ही इसके वैयक्तिक होने का गुण दर्शाया गया है; वर्षों से अज्ञातवास की चर्चा कर भले ही गीत की उपेक्षा जन्य पीड़ा हो, लेकिन हर विपरीत परिस्थिति में खुद को संयत रखने वाले गीतकार जानते हैं कि “वे हर परिस्थिति को झेलकर आगे अभय बढ़ते रहे हैं, क्योंकि वसंत है यह — नील गगन का विस्तार है इनमें।”
ठीक दूसरा ही गीत शीर्षक गीत है “मौन भी अपराध है।”

हिंस्र पशु का स्वभाव है — हिंसा। सामाजिक पशुओं के स्वभाविक प्रवृत्ति-हिंसा का यथोचित उपचार आवश्यक है। इतिहास साक्षी है कि तन का संग्राम तन से ही तनकर लड़ा जा सकता है — झुककर नहीं। सारी सूक्तियाँ, नीतियाँ धरी की धरी रह जाती हैं जब सामने कोई हिंसक जीव आ जाता है। इसीलिए समय की माँग है कि गलत का प्रतिकार किया जाए। अन्याय करने वाला तो अपराधी है ही, उससे कम अपराधी वह भी नहीं जो इसे सहता है, स्वीकार करता है, मौन रहता है। इसी की तार्किक स्थापना है —
मौन होकर जब सहा है
बल बढ़ा है शोषकों का
कर रहे हो स्वयं पोषण
यातना के पोषकों का।
और ऐसा करते हुए हम स्वभावत: “हार को स्वीकार करती यातनाएँ” भोगते हैं। इसीलिए “मौन भी अपराध है” — यह मानना पड़ता है।

कहना उचित होगा कि कवि जागरण-कर्म कर रहा है। वह हमें, आपको, समाज को — सबको आवाज लगा रहा है। क्योंकि जिस परिवर्तन की कामना से हम प्रश्न करते हैं उसी कामना की माँग है कि हम हल भी तलाशें। लेकिन आजकल ऐसा होता नहीं है। सामाजिक तानेबाने में स्वघोषित वैचारिक नेतृत्व के बुद्धजीवियों के पास कोई सम्पूर्ण विचारधारा या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है; जिसे छिपाकर खुद को दिखाने के क्रम में नकारात्मक प्रयासों पर सकारात्मक ऊर्जा का क्षय अनवरत किया जा रहा है। इससे कवि परिचित है और मानता है —
छल ही छल है, हल की चिंता पर संघर्षों से कतराते
सुई चुभाए बिन सिल जाए — मन में बैठे ख्वाब सजाते।

लेकिन कवि की चिंता यहीं तक नहीं है। प्रतीकों के सहारे वे स्पष्ट कर देते हैं कि चाहे सिंहासन हो या शिक्षा, नीति-नियंता हों या प्रशासक — हर कोई अपने आप को ठग रहा है, स्वयं को समय पर छोड़ कर दर्शक बना हुआ है। सच भी यही है कि भीष्म, द्रोण, कृप — चुप बैठे हैं। आखिर कुछ भला हो भी तो कैसे हो भला! अपना जीवन व्यक्ति को स्वयं जीना होता है, साँसें खुद की होती हैं। यह मूल है। लेकिन हमारा मन सुविधाओं की चाह में पराश्रयी बना हुआ है। “जो बौरा डूबन डरा” कहते-कहते पूर्वज चले गए और हम किनारे बैठे-बैठे माणिक्य लोभ में दिवास्वप्न देख रहे हैं। स्वप्न से निकलकर संघर्ष में स्वयं को झोंकना ही होगा। सामाजिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों तो भी हम चाहें तो संघर्ष से अनुकूल बना सकते हैं — और यह बात हर दैनंदिनी, हर मोर्चे पर लागू होती है।

यदि गौर करें तो समाज में नारी की स्थिति और उस पर हो रहे अपराधों के लिए भी सूक्ष्म रूप से हम ही दोषी हैं। हमने अपराध और अपराधी को — उसके शक्तिशाली होने के आधार पर — मौन समर्थन दिया है, विश्वास दिया है।

गीतकार राहुल शिवाय जब नारी-विमर्श करते हैं तो वहाँ भयावहता भर नहीं देखते, बल्कि उस भयावह परिस्थिति से भिड़ने-लड़ने की जुगत भी बताते हैं। ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए ही तो कहते हैं —

“ओ चिड़िया, आँखों में रखना तू अंगारा…”
जब ऐसी परिस्थिति हो कि “धूप से ज्यादा आँखें गोरे तन को स्याह बनाती हों,” “धक्का-मुक्की ताक चाहती बातें मन की माप बताती हों” — आखेट का अवसर तलाशती, सताती हों — तो आँखों में अंगारा कहना आवश्यक हो जाता है। परिस्थितियों से ससम्मान उबरने का समाधान यही है।

एक और गीत समाधान की कोशिश करता है। जब प्रचलन के हिसाब से बेटी जन्म से ही पराई मान ली जाती है और उसके हिस्से — “क्या बोलेगा दुल्हा” — के तर्क के साथ चूल्हा थमा दिया जाता है और बेटे को भविष्य की उम्मीद में सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, तब स्नेह और वात्सल्य के असंतुलन को देखकर पल-कर बेटे का व्यवहार भी असंतुलित हो जाता है। इसी असंतुलित पालन-पोषण का कुफल है — घरेलू हिंसा। कहना उपयुक्त होगा कि इसका पहला शिकार घर के लोग ही होते हैं और इस पीड़ा से उबारने वाली फिर बेटी ही बनती है — चाहे दवाई मलकर, चाहे आँसू पोंछकर। फलित कुफल को भोगकर ही परम्परा की प्रतीक दादी समाधान स्वरूप कहती हैं —“बेटी, तू अब पढ़ना।”

अपने संग्रह में राहुल जी ने समय की नब्ज परखकर — परीक्षण कर — दवा तजबीज की है। यदि विचार करें तो साहित्य का युग-बोध जो कवि-साहित्यकार की परख के अनुसार पाठकों के सामने आता है, उसमें इन गीतों की अनुभूति तीव्र है। नई कविता की तरह प्रश्न तो आज के उठे हैं लेकिन आज की नकारात्मकता नहीं है। नवगीत की सकारात्मकता और सहजता — जिसकी पहली शर्त है — संग्रह के गीतों ने उसका पालन किया है। विम्ब और प्रतीक कहीं अबूझ और जटिल नहीं हुए हैं। कवि में अनुभव की प्रौढ़ता है। अपने कथन को स्पष्ट करने के लिए प्रचलित मुहावरों को भी गीतात्मक बाना पहनाकर प्रस्तुत किया गया है।

मिट्टी के शेर शीर्षक गीत का यह प्रश्न — “हमने सत्ताएँ बदलीं, हम कब बदले?” — हमें आत्मावलोकन को प्रेरित करता है। सारी बुराइयों के लिए दूसरों को दोष देकर स्वयं को दोषमुक्त घोषित करने वालों की भीड़ में ऐसा प्रश्न कवि-कर्म की ईमानदारी का प्रमाण है। यह इस बात का संकेत भी है कि हम संघर्ष से पलायन के इतने आदी हो चुके हैं कि सब कुछ सामने देख-पाकर भी मौन रहने में ही खुद को सुरक्षित मानते हैं। मौन को अपराध मानने वाले कवि हमें उलाहना दे ही डालते हैं —
हम मिट्टी के शेर
सिर्फ मिट्टी ही निकले।

कहना जरूरी है कि बिगड़ी वास्तविकता को स्वीकार कर उसको उपयोगी बनाने की राह तलाशते राहुल जी के गीतों में आँसू की कसक है तो आशा की मुस्कान भी है। अन्दर की उबलती-खौलती भावना पर समाधान की पतीली चढ़ाकर — उठती भाप का संघनन कर गीत का तानाबाना बुनने वाले गीतकार ने प्रांजल प्रवाह में अपनी बातें कही हैं। शब्दों का अर्थों से होते संघर्ष से उपजी धीमी आवाज से गीत का जो धुन और सुर मिला है — वही इसे उत्कृष्ट नवगीत की पंक्ति में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। आशा नहीं — विश्वास है मुझे कि राहुल जी के गीतों का साहित्य-समाज में पुरजोर स्वागत होगा, प्यार मिलेगा और पाठकों को इनके गीत पढ़कर आत्मिक संतोष प्राप्त होगा।

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नवगीत संग्रह- मौन भी अपराध है, नवगीतकार- राहुल शिवाय, समीक्षक- अनिल प्रकाश झा, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा, कवर- पेपर बैक, पृष्ठ- १४४, मूल्य- रु. १६०, ISBN- 978-93-90135-16-5

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

टोटी वाला नल - शिवानंद सिंह सहयोगी


श्री शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' का वर्ष २०२२ में प्रकाशित नवीनतम नवगीत संग्रह है। यों तो सहयोगी जी हमारे समय के वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं, किन्तु वे नवगीत के सिद्ध साधक हैं। जैसे कोई कुशल संगीतज्ञ अपनी साधना में राग रागनियों का नित्य रियाज़ अथवा अभ्यास करता है, उन्हें ओढ़ता-बिछाता है, सहयोगी जी नवगीतों को नये-नये अर्थपूर्ण बिंबों और प्रतीकों के साथ अलंकृत कर शब्दबद्ध करते हैं। दुष्यंत कुमार कहा करते थे - "मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ। तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।"

आज नवगीत हिन्दी साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जो समकालीन जीवन के परिदृश्यों और स्पंदनों को भावपूर्ण ढंग से पकड़ने और व्यक्त करने का एक सशक्त लयात्मक माध्यम है। वस्तुत: मेरे हिसाब से नवगीत नयी अतुकांत कविता और परंपरागत छंदबद्ध गीतों के मध्य एक सेतु का कार्य करने का आधुनिक कवियों का स्तुत्य प्रयास है। परंतु नवगीत अपनी रचना प्रक्रिया में किसी नट के जटिल करतब से कम नहीं। इन्हें साधना हर किसी के वश की बात नहीं। दोहा, चौपायी, सवैया, गीत, ग़ज़ल आदि तो एक निश्चित व्याकरण और मात्रात्मक संविधान की मर्यादा में होने के कारण कविहृदय व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत सहज होते हैं, किन्तु नवगीत में अभिव्यक्ति हर किसी रचनाकार के वश की बात नहीं। क्योंकि इसका कोई निश्चित विधान नहीं। यहाँ कवि को अपना विधान और अनुसंधान स्वयं बुनना-करना पड़ता है। शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' जी के नवगीत उनकी मौलिक उद्भावनाओं के परिचायक ही नहीं, उन्हें नवगीत के एक अनूठे हस्ताक्षर भी सिद्ध करते हैं।


सहयोगी जी के नवगीतों के समुद्र से गुज़रना हमारे समय-जीवन की तरंगों के बीच से गुज़रने के समान है। वे अतीत और वर्तमान के मध्य दोलन करते हुए लिखते हैं --
"भूली बिसरी यादों की छत ईंट सुहानी है,
शब्दों के संवादों की लघु नई कहानी है,
हर सामाजिक घटनाक्रम की
छाया संप्रति है।"

कवि के शब्दों में जाड़े के एक दृश्यमान दिन का चित्रात्मक वर्णन --
"सूरज कुहरे की चादर में दुबका अब भी दोपहरी तक,
गाँव अलावों का डेरा है हीटर पर है हर शहरी तक,
हिलती डाली छिप नीड़ों में खग सोए हैं,
तुलसी झुलसी
पत्ते पड़े हुए पीले हैं।"
प्रस्तुत नवगीत संग्रह के सभी गीत सहयोगी जी ने विगत वर्ष २०२१ में लिखे हैं। एक तरह से इसे कवि के मनोभावों की डायरी भी कहा जा सकता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के नीचे रचना की तिथि भी अंकित की है। उदाहरण के लिए चिल्ले जाड़े का उपरोक्त नवगीतांश १२ जनवरी २०२१ का लिखा हुआ है।

कवि बदलते हुए समय के प्रति सजग और खुश भी है, किंतु साथ ही चिंतित भी। संपर्क के परंपरागत माध्यमों का स्थान अब इंटरनेट, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप आदि ने ले लिया है। कवि अपने 'विकसित नया निबंध' शीर्षक नवगीत में लिखता है --
"लगता है सब पास खड़े हैं परिचित, पर्वत, गाँव,
पड़े हुए हैं ठीक सामने हर परिजन के पाँव,
डाकघरों का पोस्टकार्ड तू सगुन, हथौटी और तार तू,
प्रतन-प्रथा ने मोड़ दिया है
आचारिक प्रतिबंध।"

कवि भविष्य की चिंता करता है। करनी भी चाहिए। सहयोगी जी इस नवगीत संग्रह के शीर्षक-नवगीत 'टोंटी वाला नल' में पर्यावरण की चिंता में लिखते हैं --
" सूरज की नज़रों से अब वर्षा का जल रोकें,
छोटा वर्षा-काल हुआ है, ऋतुओं को टोकें,
हुआ, जो हुआ, अब तो लेकिन
करें सुरक्षित कल।"

छोटे छोटे वाक्यों में क्लिष्टता से बचते हुए लयात्मक शब्दावली में सहज अभिव्यक्ति सहयोगी जी के नवगीतों का गुण भी है और उनकी शैलीगत मौलिकता भी। इतना ही नहीं, जहाँ कहीं भी देशज अथवा तत्सम शब्द स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हो आए हैं, उन्होंने उनका अर्थ भी रचना के अंत में स्पष्ट कर दिया है।

वर्ष २०२०-२१ में सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी के संकट से बुरी तरह जूझा है। प्रवासी कामगार लोग बीमारी, बेकारी, भुखमरी के आसन्न संकट में २०२० में शहर छोड़कर गांवों की ओर भागे, सैंकड़ों मील बिना किसी साधन सवारी के पदयात्रा कर अपने गाँव पहुँचे। २०२१ में चारों ओर मृत्यु का और भी भयावह तांडव। अनेकानेक मुसीबतें। ऐसे में कवि हृदय की चीत्कार भी भला कविता-कथाओं में क्यों न ढलती? शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' के कई नवगीत कोरोना-काल पर भी आधारित हैं। एक बानगी --
"परम पुरुष की किस आज्ञा की यहाँ रसाई है,
सांसों के जंगल में कैसी आग लगाई है,
व्यस्त हुए वैज्ञानिक, माध्यम,
खबरें आतीं दुनियाभर से।"

कोरोना लाखों आम और ख़ास आदमियों को लील गया। हर व्यक्ति ने किसी न किसी अपने को खोया। सहयोगी जी कोरोना में कालकवलित हुए सुप्रसिद्ध हिन्दी ग़ज़लकार कुंवर बेचैन जी को अपने एक नवगीत में भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए लिखते हैं - "उतर गए हैं साँस-मार्ग से प्राणवायु के वैन,
चले गए हैं 'कुँअर बहादुर सक्सेना',
'कुँअर बेचैन'।"
यह पूरा गीत अत्यंत मार्मिक है।
भाई सहयोगी जी को इस श्रेष्ठ सामयिक काव्यकृति के प्रणयन के लिए बधाई एवं साधुवाद।
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नवगीत संग्रह- टोटी वाला नल, नवगीतकार-शिवानंद सिंह सहयोगी, परिचय- सुधाकर अदीब, प्रकाशक- रचनाकार प्रकाशन, बहलना, जनपद-मुजफ्फरनगर-251003, उ.प्र., कवर- हार्ड बाउंड, पृष्ठ- १३२, मूल्य- रु. ३००, 
ISBN-978-93-85564-20-8·

बुधवार, 1 नवंबर 2023

मगर कब तक- वीरेन्द्र आस्तिक

मगर कब तक वीरेन्द्र आस्तिक का सातवाँ नवगीत संग्रह है। ५१ गीतों के इस संग्रह में सामंतशाही व्यवस्था का प्रतिरोध, समय बोध, सामयिक सन्दर्भ व वंचितवर्ग की पीड़ाओं की संलग्नता व्यक्त हुई है। सहज कहन लिए नवगीतों का कथ्य पूरी तटस्थता व चेतना के साथ पाठक को प्रभावित करता है। इस संग्रह में वर्तमान परिवेश के हर पहलू की सार्थक व समर्थ अभिव्यक्ति हुई है चाहे राजनीतिक विद्रूपता हो, व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत हो या आम जनमानस की आर्थिक व सामाजिक विषमताएँ व पीड़ाएँ, प्रत्येक विषय पर आपकी क़लम समान रूप से चली है। वैसे तो आप को प्रेम का कवि कहा जाता है किन्तु आपके गीतों से गुजरते हुये पाया कि - वस्तुत: आप प्रेम और जन सरोकारों के कवि हैं। 

आप मानते हैं कि "नवगीत मूलत: ऋग्वेद से विरासत में मिले गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है और इसीलिये आज गीत अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर नवगीत के रूप में समकालीन लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है।" उपरोक्त कथन के निकष पर देखें तो उनके नवगीतों में लोक जीवन की संवेदना व जन सरोकारों की संलग्नता प्रबलता के साथ उपस्थित है, जिसमें आम आदमी की दुरूह स्थितियों पर बेबाक बात हुई है इतना ही नहीं वर्तमान समय में पूँजीवाद के विकराल विस्तार पर वह वाज़िब चिंता और संवेदना व्यक्त करते हैं ..

इस धरा का दोष ही क्या 
है शिकायत आदमी से

यह बड़ा बाजार ठगने में निपुण है वाकपटु 
धैर्य उसका जादुई कर दे नरम हर शब्द कटु
दैत्य उसकी भूख लेकिन किस कमी से ? ( आदमी हारा -पृष्ठ -३४)

सामयिक परिस्थितियों के सच को उजागर करते उनके नवगीत इस हताश समय में आशा का संचार भी करते हैं-'फिलहाल गाएँ' व 'रोज तमाशा 'नवगीत इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं ..

एक छलिया मोहिनी के भेष में कब तक छलेगा
जीत सच की है बहुत नजदीक फिर उत्सव मने गा
गुम हुए इस आदमी को कुछ हँसाएँ
गुदगुदाएँ। ......(फिलहाल गाएँ -पृष्ठ २८ )

लघु जन हों या हों भारी भरकम पद वाले
संघर्ष सभी का जीवन को ही मथ डाले
घोर तिमिर में भी कोई सूरज की भाषा जीता है ......( रोज़ तमाशा -पृष्ठ ४६)

पीढ़ी दर पीढ़ी सामंतवाद की दासता से आजिज़ आ चुका कविमन समय के जरिए अपने उद्वेलन को दर्ज़ करता है और समय के जरिए ही पूँजीवादी व्यवस्था में बदलाव का आह्वान कहिए या अनुरोध करता है-
दासता करते कुबेरों की थका मैं समय हूँ 
अब बदल डालो मुझे …

वक्ष पर मैं काल-पुरुषों की कथा टंकित किए
शीश कितने ही, युगों ने सृष्टि के खण्डित किए
मेरे आसन पर जमा क्यों झूठ है इस प्रथा से
ऐ सच उबारो मुझे। ( मैं समय हूँ - पृष्ठ ५२)

राजनीति को फिलवक्त साम्प्रदायिकता का पर्यायवाची कहा जाए तो असहमति बनती नहीं दिखती, कुछ अपवाद छोड़ कर। ऐसी विस्फोटक स्थिति में वे कुछ वाज़िब सवाल करते हैं।
सिर पर संकट पर रहते तुम बहके-बहके

क्यों टुकड़े -टुकड़े राजनीति
क्यों नहीं किसी की नई रीति
अलग -अलग क्यों सम्प्रदाय में
दहके-दहके। ( सिर पर संकट - पृष्ठ -६२)

शीर्षक गीत 'मगर कब तक' में आप छद्म प्रगति की कलई खोलते होते हुए पूँजीवादी व्यवस्था के परिणाम-संवेदनहीनता से उपजे खालीपन पर विचलित होते हैं -
प्रगति के देश में अब
दिन नहीं कटते सहजता से

ठिकाना प्यार का था जो वही अब लापता है
नई तकनीक के सामान से ये घर लदा है
बढ़ी पूँजी मगर दूरी
बढ़ी है क्यों मनुजता से। ( मगर कब तक - पृष्ठ -४८)

कितना दुखद है कि ' दृष्य देखकर' शीर्षक नवगीत में उन्हें कहना पड़ा -
सेक्स उतर आया हिंसा पर
बालाओं का करता मर्डर।

दुराचार की ख़बरों से है पेपर लथपथ
महिलाओं का सड़कों पर है आंदोलन-रथ
कोमल -कोमल हाथों में है
गैंगरेप का खूनी बैनर ! ( दृष्य़ देखकर -पृष्ठ-४० )

घात-अपघात और प्रतिभा मूल्यांकन में काट-छाँट कर कमतर को सर्वोत्कृष्ट का प्रमाण पत्र दे, कंधों पर पालकी ढोने वालों की समाज और विशेषकर साहित्यिक समाज में कमी नहीं - शायद ऐसी ही परिस्थितियों पर हुआ होगा गीत 'शिल्पी हैं वे' 

शिल्पी हैं वे लम्बे कद को 
छोटा करने के

शब्द -यज्ञ की चौखट-चौखट चाकरी बजाते हैं
नीलम के सम्मुख पाथर को बहुमूल्य बताते हैं
ख्यातिलब्ध हैं इतिहासों के 
क्षेपक गढ़ने में। (शिल्पी हैं वे-पृष्ठ-६०)

नवगीत समीक्षा, समालोचना परिदृश्य पर अक्सर सजग और चिंतित रहने वाले आस्तिक जी जब लिखते हैं -
खून-पसीने से सींचा था
गीत -वृक्ष ये बड़े हुए

जड़ें जमा ली थीं आँधी में -
छंदों ने इतिहास रचा
क्रूर समय के प्रति विरोध में
जन-जन का संत्रास रचा

जटिल प्रश्न के सहज-सरल -से 
उत्तर लेकर खड़े हुए
गीत -वृक्ष ये बड़े हुए। ( गीत वृक्ष ये-पृष्ठ -९० )

तब उनकी गीत निष्ठा पर बरबस स्नेह एवम् सम्मान उमड़ आता है। 'मगर कब तक' संग्रह से गुजरना हुआ हो, परस्पर साहित्यिक संवाद रहा हो या अब तक का उनका सृजन या समीक्षाएँ -समालोचना, हमने कभी उन्हें हड़बड़ी या उग्रता में नहीं पाया। बेहद धैर्यवान रहकर बड़ी सहूलियत से सृजन और समालोचना के क्षेत्र में आपने मजबूत और स्थाई क़़दम रखे हैं। 

संग्रह के लगभग अंत में ’माँ! तुझे बुलाऊँ’ एक बेहद भावप्रवण गीत है। यह गीत माँ के वात्सल्य का और कवि के समाधि भाव का गीत है जो मुझे बहुत पसंद है, प्रस्तुत करना चाहूँगी-
माँ रह-रह मैं, तुझे बुलाऊँ
यहीं कहीं तूहै फिर भी क्यों 
देख न पाऊँ

खोज-खोज कर हार गया मैं
इस माया में बहुत थक गया, 
प्राण न जैसे इस काया में
नींद लगे जो चौंक पड़ूँ मैं
उठ-उठ जाऊँ

बढ़ता जाता भार बहुत मन में चिंतन का
व्यर्थ लगे सब भाव न उसमें तेरे मन का
फेंक सभी, बस तेरी छवि में
ध्यान लगाऊँ

सकल सृष्टि में ब्रह्म सरीखी तेरी गोदी
मधुर-मधुर वह मन्द पवन -सी तेरी लोरी
शब्द-निशब्द सभी सुन-सुन 
शिशुवत सो जाऊँ

कविता, गीत और नवगीत सृजन के सम्बंध में आपका कहना है कि कथ्यात्मक स्तर पर कविता और गीत में कोई भेद नहीं है, भेद है तो रचना प्रक्रिया का और उसके एहसास का। हमें सपाट अर्थों वाले नवगीत न रच कर ऐसे नवगीत रचने चाहिए जिनमें रस-निष्पत्ति हो। नवगीत की यथार्थ-भाषा भी सुन्दर, सुष्ठु हो। वरिष्ठ कवि और आलोचक अजीत कुमार राय के शब्दों का सहारा लेते हुए कहूँ तो गहरी भाव संपदा वाले आप के गीत गहरे विचारों की कोख से जन्मते हैं। 

यों तो आस्तिक जी के गीतों की भाषा बोलचाल की भाषा होती है जिसमें वे अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों के प्रयोग भी खूब करते देखे गए हैं। रचना प्रक्रिया के अंतर्गत वे ध्वन्यात्मक तुकांतों को भी महत्व देते हैं। उनका कहना है कि अत्यधिक जड़ताओं और पूर्वाग्रहों से नवगीत का बहुत भला होने वाला नहीं, मायने यह रखता है कि कहा क्या जा रहा है और जो कहा जा रहा है वह सहज संप्रेषणीय है कि नहीं, और इस सबसे ऊपर यह कि जो कहा जा रहा है वह सामयिक मुद्दों, जनसरोकारों से जुड़ भी रहा है या नहीं। 

भाषा के स्तर पर वह इतना सहज है कि नहीं कि अर्थ खोलने को मानसिक मशक्कत तो नहीं करनी पड़ रही। यह समय ज़रा-ज़रा सी बात को लेकर बहुत आग्रही होने का नहीं वरन सामाजिक, मानसिक, पारिवारिक सन्दर्भों से जुड़ने का है, निःसंदेह वीरेन्द्र आस्तिक जी के गीतों में इन सबकी संवेदनशील उपस्थिति है। 

आपकी साहित्यिक यात्रा पर बात करें तो परछाईं के पाँव (१९८२) इसके पहले आनन्द ! तेरी हार है (१९८७), तारीखों के हस्ताक्षर (१९९२), आकाश तो जीने नहीं देता (२००२), दिन क्या बुरे थे (२०१२), गीत अपने ही सुने (२०१७) प्रकाशित हो चुके हैं। आपका कौशल न सिर्फ़ स्वयं के सृजन भर तक ही सीमित रहा, अपितु आपके कुशल सम्पादन में धार पर हम (१९९८), धार पर हम -दो (२०१०) जैसे महत्वपूर्ण समवेत संकलन भी आए। इसके अतिरिक्त आलोचना के क्षेत्र में नवगीत समीक्षा के नये आयाम (२०१९) पुस्तकों पर किया गया काम नवगीत के इतिहास व विकास में अंकित है। आपके कृतित्व पर आधारित पुस्तक 'समकालीन गीत और वीरेन्द्र आस्तिक ' डॉ कृष्ण गोपाल मिश्र जी के सम्पादन में प्रकाशित हुई है। इस सबके अतिरिक्त उम्र के इस पड़ाव पर आप आलोचना, समीक्षा आलेख व भूमिका आदि पर सतत क्रियाशील हैं।
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नवगीत संग्रह-मगर कब तक, रचनाकार- वीरेन्द्र आस्तिक, प्रकाशक- कल्पना प्रकाशन, बी – १७७०, जहाँगीर पुरी, दिल्ली – ११००३३, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य- ३९५ रु. , पृष्ठ-१२६  , परिचय- अनामिका सिंह, आय.एस. बी.एन. : 978-93-91709-33-4

रविवार, 1 अक्टूबर 2023

समय निरुत्तर- डॉ. मंजु लता श्रीवास्तव

 

समय निरुत्तर वरिष्ठ नवगीत कार और दोहाकार मंजु श्रीवास्तव जी का दूसरा नवगीत संग्रह है। ५१ नवगीतों के इस संग्रह में समय की आधुनिक और जटिल संचेतना शीर्षक से ही उद्भभाषित हो रही है, मंजु जी की अनुभूतियों में पर्याप्त ताजग़ी है, संवेदनात्मकता है, बहुश्रुत प्रतीकों के माध्यम से कथ्य का निर्वहरण है, शैल्पिक सौष्ठव हैं, प्रयोग धर्मिता है, मौलिकता है, और है गहरे उच्छवास से अंतरतम की पीड़ा से अधिक विश्व पीड़ा को रोकने का उपक्रम, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है।

उनकी बेतरह करुणा का हक़दार है- हर वह व्यक्ति जो हाशिये पर है। प्रकृति भी मंजु जी का  प्रिय विषय है, मंजु जी के गीतों में व्यवस्था के प्रति विद्रोह के भी स्वर हैं, विसंगतियों के उच्छ्वास हैं और है शिल्प भाव का मणिकांचन संयोग, उनके बहुत से गीत गेयता की शर्तें पूरी करते हैं, उनमें भाव और रस निष्पत्ति का मध्यांतर भी है, करोना का काल और उससे उपजी मानव जाति का त्रासद वर्णन एक गीत में— ‘मन में पीड़ा के संवेदन /दया भाव के हो स्पंदन / विषम समय की धारा में पतवारों संग कर्म समर्पण /जीवन पर संकट गहराया / तन मन बोझिल दुख का साया / घूम रहा चहुँ और जगत में /जन जन को निज ग्रास बनाया/‘

इस जगत में लगभग सभी के जीवन में दुःख की छाया अवश्य आई है,वह निर्मम समय हमारी चेतना को स्तब्ध कर देता है, मनुष्य अधिक दुःख में निष्प्रभ और हताश हो उठता है, हर बीतता लम्हा सदियों की यात्रा हो जाता है— ‘पाषाणों को दर्द हुआ तो/बन सरिता आँसू उतरे हैं / विकल क्षणों के कण रेती बन कर बिखरे हैं /ताप हृदय का पाकर भी हम कब बिसरे हैं/ हरियाली रूठी रहती है पेड़ों से दुश्मनी निभाई /नहीं जंगली पशु पक्षी ने नीड़ आशियाँ माँद बनाई /जीवन ढूँढ हुए जड़वत हम कभी कभी बदले ठहरे हैं’।

जीवन में बहुत सी समस्याएँ हमारी स्वयं की बनाई हुई है, इतनी इच्छाओं का जख़ीरा हम ढो रहें है, अपने कंधों पर, कि एक जीवन में उनको पूर्ण करना, असंभव है। मोह, शोक, भोग, लालसा और स्वार्थ के नये नये शिगूफे, बाकी जीवन की सुख शांति को समाप्त करने के लिए काफी हैं— ‘एक अनजाने सफर में रोज भागे जा रहें हैं / और कितने बाँध हमको तोड़ने होंगे /साथ अपनों के सहज ही छोड़ने होंगे /कुंडली मारे अंधेरी रात है बैठी / विष भी फन और कितने तोड़ने होंगे / हैं खुली आँखें मगर अंधे कुएँ में जा रहें हैं /कामनाएँ उम्र भर जीने नहीं देती /धार नये नित रूप हमको ये रिझाती हैं /और जब पूरी न होती रूठ जाती हैं / ये विवशता लाद काँधे व्यर्थ ढोये जा रहे हैं/

आज का राजनीतिक परिदृश्य हो या तीस साल, चालीस साल पहले की स्थितियाँ, बहुत अधिक जनपक्षधरता कभी नहीं थीं, अमीर सदा और अमीर होता रहा ग़रीब आज भी ग़रीब ही है, बस वोटों के लिए कुछ भी वायदा करके, हाशिये के सबसे आख़िरी आदमी तक को भरमाया जाता रहा है— ‘कागज की कश्ती से कैसे नदिया पार करें / जलते बुझते दीपों से हम क्या मनुहार करें /सबसे उजला उसका चेहरा कीच सने हैं, जिसके पाँव /वही इमारत सबसे ऊँची जिसने लूटा पूरा गाँव / भुला जगत सम्भाले सत्ता जग उद्धार करें / भूख बिकी वोटों की ख़ातिर /प्यास बादलों ने छीनी / चार निवाले मिले मगर राहत की चादर है झीनी / जन्म मृत्यु के बीच बेबसी किस किस से दरकार करें/

विसंगतियाँ और प्रतिकूलताएँ जिंदगी का हिस्सा हैं, शायद ही कोई मनुष्य होगा जो, इन तकलीफों से न गुजरा हो, कवि का हृदय इतना भावुक होता है, कि चुभती बैचैनियों को शब्द दे ही देता है, अन्तर की उठती हूक कभी चैन से नहीं बैठने देती मन को, मंजु जी ने इन स्थितियों को बहुत गहराई से अपनी पुष्ट भाषा में बाँधा है — ‘खिन्न होकर चुप्पियों ने भींच ली जब मुट्ठियाँ / तब का दरिया निरंतर देह के भीतर बहा है / क्षीण आँचल विवशता का अश्रुजल कैसे समेटे /मृत्यु शैय्या पर पड़ी संवेदना देखे मुखौटे / एक दावानल सदा हृदय के भीतर दहा है / सत्य जो बीता उसे इतिहास में रचते रहें हैं /पर समय की बेड़ियों को मूक बन सहते रहें हैं / बघनखों का भय निरंतर गेह के भीतर सहा है /‘

नवगीत का शिल्प विधान, विविध और बहु आयामी है अत:नवगीत के माध्यम से मन की विभिन्न स्थितियाँ और असमंजस को, वर्जनाओं को, दैन्य और करुणा को, बहुत विशेष और प्रभावी ढंग से इस विधा में रखा जा सकता है, मंजु जी एक कुशल कोमल और भावुक गीतकार हैं अत:उनके नवगीतों में यह शिल्प वैभिन्य भी है— ‘हाथी, घोड़ा, ऊँट, चाल से हम सब शह -मातें खाते हैं / जिसकी जितनी बुद्धि प्रखर हो वो उतने ऊँचे जाते है / दंद फंद के साथ चलें जो, उनकी सब मुश्किल छोटी है /ऊँचे सिंहासन पर बैठे बादशाह सीना तानें हैं /पैदल के पैरों में छाले कब सिर पर छप्पर छाने है / संघर्षों से जूझ रहे जो मान रहें किस्मत खोटीं है ‘

बिंबों में मन की बात और मन की पीड़ा को व्यक्त करना बहुत आसान है, किसी प्रखर लेखनी के लिए, प्रकृति का मानवीकरण करते हुए अपनी व्यथा को प्रकृति के विधानों और उपकरणों द्वारा प्रस्तुत करना मंजु जी का विशेष कौशल है— ‘साँझ होते ही सुनहरी वो नदी / स्याह वल्कल ओढ़ कर, थम सी गई है /नाव घबरा कर किनारा ढूँढती है /जल समाधि ले रही है किरण रूठी /सृष्टि भी मुँह मोड़ कर थम सी गई है’
करोना काल की मर्मान्तक पीड़ा अभी अभी पूरे विश्व ने झेली है। 

एक एक घर में कई कई मौतों ने इंसान को सदमे से, पत्थर सा कर दिया था, सरकारें कर्फ्यू लगाने को बाध्य थीं, मानवता पर ऐसा गंभीर संकट जिससे त्राण का कोई उपाय न सूझ रहा हो, शायद पहली बार आया। स्तब्ध मनुष्यता विवश थीं, और काल अपना विकराल तांडव लगातार दो वर्षों तक करता रहा — ‘एक डर बस्ती में देता /गश्त है अब रात दिन शहर में कर्फ्यू लगा है दृष्टियाँ बाधित हुईं है /अर्थ खोये शब्द में इच्छाएँ अनुशासित हुईं हैं / चूक गये संवाद मानव पस्त है दिन रात’

भीड़ अब हमारी आबादी का हिस्सा है, लेकिन इसके दुष्परिणामों से सभी अच्छी तरह परिचित हैं, भीड़ का वास्तव में कोई धर्म नहीं होता जैसा कि मंजु जी की लेखनी ने भी चित्रित किया- ‘भीड़ का कब धर्म कोई और कब पहचान है / रैलियाँ, हथियार, चीखें, शोर का हिस्सा बनीं /जिधर की आँधी चली उस ओर ही बढ़ती चलीं / बिन बिचारे बुद्धि हीना, खो चुकी सब शान है ‘

जीवन क्रूर समय के हाथों में आज तड़प रहा है, रक्त डूबी सारी कथाएँ है, सभी देश लगभग एक दूसरे की जमीन हड़पने, उनकीं धरती पर अपने कचरे को निस्तारित करने, और दूसरे की जमीन पर अवैध कब्जे करने की कूटनीति में व्यस्त हैं, प्रकृति का दोहन इस तरह विकसित देशों ने किया, कि धरती का भौगोलिक समीकरण, दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण की आज धज्जियाँ उड़ रहीं है, विकास नहीं विनाश है ये, हम सबका समस्त मानव जाति और समस्त जीव सम्पदा का ! 

आज धरती से जल का इतना दोहन हुआ है, हमारी धरती अस्सी सेंटीमीटर तक एक ओर झुक गई है— ‘समय के प्रस्तर पटल पर छप रहा अभिलेख कैसा /रक्त की स्याही में डूबे कथ्य न्यारे खो गये /प्रश्नों के हल औ तथ्य सारे /चीख क्रंदन की भयानक पंक्तियाँ है /मूक सब संवेदनाएँ पथ्य हारे / काल का विकराल पन्ना लिख रहा आलेख ऐसा’

कभी-कभी उल्लास मन को किसी बच्चे की तरह आंदोलित कर देता है, ऐसा लगता है कि ख़ुशियाँ फिर से लौट आईं हैं घर अपने — ‘बंजारा मन फिर लौटा है उत्सव वाले नदी किनारे / बाइस्कोप अभी जिंदा है, अंतर आँखें चमक उठी हैं / एक अठ्ठनी चार चवन्नी मन के भीतर लहर उठी है /

आज के समाज की सबसे कड़वी सच्चाई यही है, कि लगभग पचास या साठ प्रतिशत, मध्यम वर्गीय या उच्च मध्यम वर्गीय घरों से, बच्चे पढ़ लिख कर विदेश जा चुके हैं, बहुत दर्द होता है, अपनी संतान को अच्छे भविष्य के लिए विदेश भेजते समय, सभी माँ बाप को ! पर क्या करें, उन्हें जिस तरह की नौकरियाँ और कार्यशैली बाहर के देशों में मिलती है भारत में अभी लगभग उसका अभाव ही है, कुछ मजबूरी में, कुछ शौक से बच्चे विदेश जा रहें है ! ममता हाथ मलती रह जाती हैं, उसकी आँखों में पानी जैसे सदा के लिए ठहर गया है ! इसी सत्य को मार्मिक गीत के माध्यम से मंजु जी ने उकेरा है—  बूढ़ी चिड़िया बाँट जोहती, परदेशी बच्चे कब आते / बीता समय घोंसला छूटा है सूने कोटर के द्वारे /भेज उन्हें बैठी अंतर में स्मृतियों को रोज सँवारे /बहा नीर संतोष हृदय में / देहरी बीच दीप संझवारें ‘

मंजु जी ने जीवन के विविध आयामों को, अपने नवगीतों में संजोने की भरसक कोशिश की है, वास्तव में पीड़ा और दर्द वह स्याही है, जिससे श्रेष्ठतम काव्य का निर्माण होता है, रसात्मकता भी काव्य की एक अनिवार्य शर्त है, ये रसात्मकता भी मंजु जी के नवगीतों में सहज उपलब्ध है— ‘हमने पीड़ा बोध जिया है /उम्मीदों के हवामहल थे काली आँधी वाले साये /मन की पकी फसल के ऊपर उमड़ घुमड़ बादल मँडरायें / छप्पर छानी बहुत लगाई कब किस्मत ने साथ दिया है /स्वाभिमान को कुचल कुचल कर दूजे का अभियान सहा है / संघर्षों के पर्वत लाँघे अश्रु नदी डूबे उतराये /महल बनाते रहे रेत के /पल भर भी विश्राम न पाए / जीवन को निस्तारा इतना जगह जगह पैबन्द सिया है’

राज भवन या संसद की दीवारों में कठोर संविधान की इबारतें होती है, करुणा नहीं होती है।, उन्हें जन जीवन की परवाह तो है, पर वोट के लिए वे जन समूह को संबोधित तो करते हैं, पर चुनाव के समय, उन्हें देश हित में भी जो कानून बनाने हैं, वह भी जनता से पूछ कर नहीं, कौन सा कानून है उनके पक्ष में है या नहीं, ये देखना उनका काम अधिक नहीं है, वरना जी एस टी आदि व्यापारियों पर जिस भाँति थोपे गए, उसने व्यापारियों को बैकफुट पर ला दिया, जब तब मनमाने तरीके से बिजली का बिल बढ़ाना, ब्याज दर, महँगाई आदि संसद में जनसेवक के रूप में बैठे, नेताओं की ग़लत नीतियों का ही परिणाम हैं—  ‘चलो आज हम राजभवन की ईंटों से पूछे / कितने अश्रु स्वेद कणिकायें कितनी पीड़ाएँ / अंतर बीच छिपाए बैठी /करुणा से अभिभूत खड़ी फिर भी ये दीवारें/ बनी मूक दर्शक साक्ष्यों की ठहरी सीमाएँ / नींव दबी यातना छिपी उन चीख़ों से पूछे /

स्त्री जीवन नाना विपदाओं में सृष्टि के प्रारंभ से ही घिरा रहा, आज कल (?) स्त्री मात्र देह है, वैसे सदा ही ऐसी स्थिति रही पर, पर आज स्त्री जितनी प्रगति कर रही है, उतना ही या उससे कहीं अधिक वह दैहिक क्रूरता की शिकार भी है, आज उसका जीवन दुरूह भी है, और उसकी देह ख़तरे में भी, पहले स्त्रियाँ घरों में कैद रहती थीं, अब उनका कार्यक्षेत्र घर और बाहर दोनों है, और दरिंदे हर मोड़ पर उन्हें और उनके जिस्म को नोचने बैठे हैं, इसी भय का संकेत करते हुए मंजु जी व्यंजना से कहती है- ‘मैना तुम मत शोर मचाना /चारों ओर शिकारी बैठे / गाँव शहर बस्ती बस्ती में /चापलूस ही चाप लूस हैं/बाहर से दिखते बलशाली / भीतर ख़ाली कारतूस हैं / अर्जी दे निश्चिंत न होना / घूसखोर अधिकारी बैठे /दिल से निकली पीर तुम्हारी उनके लिए मनोरंजन है / गिद्ध निगाहों से बच रहना पग पग काम पुजारी बैठे’

बारिश किसानों के लिए विशेष रूप से अमृत है, अन्न के लिए जल कितना आवश्यक है, यह किसान से अधिक कौन समझ सकता है? बादल जीवन है, धरती का, अकुलाये पशु, पक्षी, पेड़, पौधे जन जीवन सभी की प्यासा बुझाता, जब बादल आता तो मन भी भीग जाता है—
‘घिर घिर काले मेघा आये /आस बंधी हल बैल चल दिये, कजरी गीत मल्हार संग लिए /खिलने लगे कृषक के चेहरे /प्यासी चिड़िया प्यासे हिरना /खेत पियासे सूखे झरना ‘

माँ अपने उम्र के आख़िरी पड़ाव पर कितनी उलझ जाती है, अपने विश्वासों से, जीवन भर की तपस्या भी किसी काम नहीं आती, सभी अपने पराये हो जाते है, एक दिन यही कड़वा सच है बुढ़ापे का ! कौन समय देता है, अपने घर के बूढ़े व्यक्ति को, किसके पास समय है, और है भी तो कार्यक्षेत्र, भोग और मनोरंजन के लिए, अपनी संतानों के लिए, बूढ़ी माँ को तो जैसे अकेले पन में रहने की आदत ही हो गई है— ‘कितना भी आग्रह कर लो / पर रोज निवाले गिन कर खाती / जीवन के धुधंले पन्नों को बिन ऐनक ही पढ़ती है / घर के लोग व्यस्त सब किस्से अपने मन की बात कहे /एक किताब सहेजे बैठी / जीवन भर की उसकी थाती’

गीत, नवगीत अभिधा नहीं है, या कहिए कोई भी काव्य विधा अभिधा नहीं है, मंजु जी का यह नवगीत शीर्षक गीत है, और मेरी दृष्टि में शायद सबसे उत्कृष्ट गीत भी है, इस संग्रह का, समय स्तब्ध है, आज कितना कठिन और नृशंस है, आज का सच ! कितनी पीड़ाएँ हैं, इस समय के चेतन और अचेतन मन में, फिर भी चुप है, कोई उत्तर नहीं दे पाता — ‘समय निरुत्तर / व्यक्ति निरुत्तर / उत्तर नहीं किसी के पास / जीवन की अनबूझ पहेली डिगा रही मन का विश्वास / कटे पंख फिर उड़ना कैसा बँधे पाँव कैसा चलना /मन के घोड़े हार मन कर देखें / सूरज का ढलना /पीड़ाओं की पृष्ठभूमि पर लिखा जा रहा है आकाश /तपा हृदय अब धूल उड़ाता छोड़ रहा / केवल उच्छ्वास’

इस संग्रह में विविध विषयों के नवगीत हैं, करोना काल पर कई नवगीत हैं, जो एक तरह का विषय का दोहराव ही है। बहुत से गीत साधारण भी लगे मुझे, पर जीवन के गहरे गंभीर रंगों के प्रति मंजु जी की आश्वस्ति संतोषपूर्ण है, वे रचती रहें, आगे भी, नवगीत के उनके और भी संग्रह आयेंगे, ऐसी हम लोगों को अपेक्षा भी है, उनके पास सुंदर बिम्बो को रचने का कौशल है, कल्पना की सघन उचाइयाँ हैं, वे अपनो समृद्ध कलम से गीत नवगीत और काव्य की अन्य विधाओं को पूर्ण मनोज्ञयता से रचती रहें, उनकी काव्यात्मक प्रतिभा उत्तरोत्तर समृद्धि की संजीवनी से अभिसिंचित रहे, इसी शुभकामना के साथ मैं उन्हें इस नवगीत संग्रह हेतु हार्दिक बधाई देती हूँ !

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नवगीत संग्रह-समय निरुत्तर, रचनाकार- डॉ. मंजु लता श्रीवास्तव, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य- १९९ रु. , पृष्ठ-१२८  , परिचय- डॉ. रंजना गुप्ता

शनिवार, 1 जुलाई 2023

फटी हुई बनियान- मुकेश कुमार मिश्र

वर्तमान समाज में विसंगतियों और बिडंबनाओं से उपजी कुंठाओं एवं संत्रासो को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यंजित करते हुए मानवीय मूल्यों की पक्षधरता को प्राणवान करना नवगीत का एक प्रमुख तत्व माना गया है। जिसे लोक-धर्मिता या जन-धर्मिता की संवेदनशीलता का प्रतिरोधात्मक रूप भी कह सकते हैं, जो नवगीत विधा का प्राणवान और ऊर्जावान कथ्य का प्रमुख अंग होता है। 

इस संग्रह में हम देखते हैं कि नवोदित नवगीतकार मुकेश कुमार मिश्र ने अपने समकालीन नवगीतकारों से प्रभावित होकर ही ’फटी बनियान’ नवगीत संग्रह को प्रकाशित कराया है। प्रथम दृष्टया यह संग्रह समाज के समानांतर उपयोग में आने वाली दैनिक वस्तुओं/यंत्रों से संबंधित नए–नए विषयों को चिह्नित करके रचा गया है। जिनके शीर्षक अपनी उपयोगिता के आधार पर बहुत ही आकर्षक और प्रभावशाली हैं। जैसे– पुरानी पैंट का झोला, बर्गर–चाउमीन, आग उगलते नल, कम्बल, भ्रष्टाचार, दादा की पेंशन, सिसक रहा लोटा, पंखे से संवाद, टायर, बल्ब, ज़ुकाम, अलमारी, छोटा सा चम्मच, चौकी का दीवान, ए सी का व्यवहार, वृक्ष, गर्मा गर्म डिबेट, कूड़े की गाड़ी, धरती की दुर्गति और सबसे आकर्षक तो इस संग्रह का शीर्षक ’फटी बनियान’ ही है, जिसने अपने इतिहास से लेकर आधुनिक समय तक की सभी अवस्थाओं को बड़ी संवेदना के साथ क्रूर व्यवस्थाओं को प्रमाणित कर दिया है। इस नवगीत की कुछ पंक्तियाँ देखें –

”ऐसे पोछा नहीं बनी है
फटी हुई बनियान
अलग तरह का ही जलवा था
जब थी नई नई
मंहगें कपड़ों से भी पहले
पहनी वही गई
सदा बुलंदी पर रहती क्या?
किसी व्यक्ति की शान।
युवा अवस्था में हाथों को
माना काम नहीं
जीवन के अन्तिम क्षण में भी
आराम नहीं
थके हुए बूढ़े लोगों का
बचा कहाँ सम्मान!” (पृष्ठ–१२)

आज का लोकतंत्र बस नुमाइश की चीज बनकर रह गई है। रचनाकर खुद लोकतांत्रिक व्यवस्था से किस प्रकार आहत है, आप स्वयं इस नवगीत का अवलोकन करिए..

”लोकतंत्र आ जाने से 
सब काम हुआ आसान
जब चाहें तब कर सकते हैं
सड़क रेल सब जाम
किसी जीभ पर नहीं दिखाई
देती कहीं लगाम
यत्र तत्र सर्वत्र थूकना
खा कर गुटखा–पान।” पृष्ठ–१५

आज भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का लोक तंत्र अपनी  दिशा से भटक गया है, जिसे नई दिशा देने के लिए इस बिम्ब के माध्यम से आलोकित किया गया है–

”सज्जन को तो दिया नहीं है
कभी आपने वोट
फिर क्यों चिल्लाते फिरते जब
मिलती उनसे चोट
ऐसे मन–बढ़ नहीं हुए हैं
बिगड़े नेतागण।
वर्तमान बीते पल का
माँग रहा विवरण।।” पृष्ठ–१६

युवा, वय और बुजुर्गों के साथ ही साथ आज का नवनिहाल भी प्रगतिवादी विसंगतियों से दुःखी और चिंतित दिखाई देता है। प्राइमरी स्कूल के बच्चों का दर्द और अभिभावकों की किंकर्तव्य विमूढ़ता का स्वर इस गीत के माध्यम से मुखरित हुआ है। 

"जिन कंधों पर  शोभा देते हैं
केवल बस्ते
नहीं पता था हो सकते वे
इतने भी सस्ते

इन कांधों पर लाद लाद कर 
बचपन ढोया है
क्या क्या पाया है जीवन में
क्या क्या खोया है” पृष्ठ–१४

इन नवगीतों में जहाँ एक ओर सामाजिक विसंगतियाँ हैं, हास्य–व्यंग्य हैं। वहीं दूसरी ओर प्रकृति और पर्यावरण का अतिशय दोहन से उपजे जीवन की विकृतियाँ और संक्रमण रोग सकल विश्व के समाज को पंगु और लाचार बनाते जा रहे हैं–

”हर दिन हर पल साथ समय के
बदला पैमाना
आज सुपर हिट हो जाता है
गूंगे का गाना

वही बड़ा कहलाता जिस पर
लाखों लाख उधार
पता नहीं है कैसे सबका
बदल गया व्यवहार।।” पृष्ठ–३५

आज के समाज की विद्रूप, विसंगतियाँ और दुश्वारियाँ मुकेश के नवगीतों में जीवन्त देखने को मिल जाती हैं। झूठ, चोरी, भ्रष्टाचार और बेईमानी ने इस समाज को बिना संवेदना और प्राण के बीथियों में भटकने को छोड़ दिया है। समाज की यह कुरूपता शासन, प्रशासन और इसके जिम्मेदारों को नहीं दिखती है किन्तु यह विषमता आपकी पैनी दृष्टि से नहीं बच नहीं पाती है और समाज को धिक्कारते हुए जन–जागरण करते दिखाई देते हैं। 

”काम निकलते ही बल्बों को
बुझा दिया जाता

किसी पथिक को अंधियारे में
लगे न किंचित डर
इसीलिए जलते रहते हैं
ये उनके पथ पर
राह दिखाने वाला किसको
इस युग में भाता।” पृष्ठ–५४

संग्रह की रचनाओं में कथ्य की सपाट बयानबाजी प्रभावी होने के कारण व्यंजनाओं की मारक शक्ति उतनी नहीं दिखाई देती, परंतु रचनाकार की दृष्टि भावनाओं से पुष्ट, रोचकता से भरपूर और सराहनीय हैं।

आपके नवगीतों में प्रवाहमय छंद की प्रचुरता तो है किंतु किसी किसी नवगीत में कथ्य और संदेश की प्रतिपूर्ति में संशय होने के कारण नवगीत समाप्त हो जाने के बाद भी पाठक/श्रोताओं को कुछ अधिक पाने की उत्सुकता बनी रहती है, इसे नवगीत की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। 

आपने नवगीतों की लय, प्रभावोत्पादकता, रोचकता और प्रवाहमयता को बनाए रखने के लिए कठिन शब्दों के स्थान पर देशज/बोलचाल के शब्दों का प्रयोग बहुत ही कोमलता से किया है जो इसे हिन्दी भाषा की मूल संस्कृति से जोड़े रखने में सफल भी है। आपकी भाषा को सरल, सुबोध, व्याख्यात्मक और चेतना जाग्रत करने वाले आग्रह के रूप में देखा जा सकता है। कुल मिलाकर मुकेश कुमार मिश्र का यह प्रथम नवगीत संग्रह “फटी हुई बनियान” बहुत ही रोचक, आशान्वित करने वाला और पठनीय है। इस सुंदर और सफल प्रयास पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित बहुत बहुत आशीर्वाद।

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नवगीत संग्रह-फटी हुई बनिया, रचनाकार- मुकेश कुमार मिश्र, प्रकाशक- अभिराम प्रकाशन,  जानकीपुरम कालोनी लखनऊ, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य-२०० रु. , पृष्ठ-८० , परिचय- केवल प्रसाद सत्यम


बुधवार, 1 मार्च 2023

जो कुछ हूँ बस गीत गीत हूँ- विनोद निगम

विनोद निगम की गीत पुस्तक ‘जो कुछ हूँ बस गीत गीत हूँ’ सत्य, शिव और सुंदर का उद्घोष करती है। जीवन के बीहड़ से भी वह रस तत्व को खोज कर लाने में समर्थ है, जहाँ कठोर जमीन से भी प्रेम की रस धार फूटती हों, ऐसी पीड़ा का मधुर गान करती, गीत गंगा निरंतर बहती रहती है। वे एक साधक हैं, गीत के, एक गायक हैं, गीत के, और एक योगी हैं, जिसने वास्तव में गीत को जिया है। गीत को मन की तपोभूमि में साधा है। ऐसे सातवें दशक के नवगीतकार जिनके गीत समकालीन गीतों की तरह ही, आज भी पूर्ण प्रासंगिक हैं। काव्य में आत्माभिव्यक्ति जब पाठक या भावक की आत्माभिव्यक्ति बन जाते हैं, तब यहाँ पर काव्य का रसात्मक पक्ष उद्भूत होता है, निगम जी के काव्य की यही विशेषता है, कि वे अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से उस काल का, उस मनोवृत्ति का, सम्पूर्ण आकलन करता है, जिस काल में भावोद्रेक के समय ये गीत रचे गये। आत्माभिव्यक्ति के, चरम संवेदना के, भावुकता के ये गीत आत्म विज्ञप्ति कदापि नहीं कहे जाएँगे। सहृदय पाठक जब इनसे तादात्म्य स्थापित करके, इनकी रसात्मकता में डूब जाता है, तभी ये गीत सिद्ध हो जाते हैं, और ऐसा कई दशकों से हो रहा है, वह दौर था, किशन सरोज का, नीरज का, नेपाली का, गीत पुरुष देवेंद्र शर्मा का, शिव कुमार भदौरिया का, और विनोद निगम का भी इसी पंक्ति में विशिष्ट स्थान है। शम्भु नाथ सिंह जी ने नवगीत तीन—में इनका उल्लेख किया है, कुमार रवींद्र जी ने लिखा था—

विनोद निगम जी ने, मानवीय मूल्यों को सहेजते हुए, अपनी विशिष्ट शैली के नवगीत लिखे, इन्होंने बहुत कोमल और बहुत भावना परक नवगीत लिखे, पर बहुत अधिक नवगीत नहीं लिखे, अपने विषय में इन्होंने स्वयं भी लिखा है, कि

दर्द जब इंतिहा से सहता हूँ 
तब कहीं एक शेर कहता हूँ

अपने नवगीतों में विनोद निगम जी कई बार कुछ भ्रमित से दिखते हैं—
अधेरें के चरण पक़डूँ, उजाले का तिलक कर दूँ, 
क्या दूँ शीश या फिर पाप के आगे नमन कर दूँ
बहुत चकरा गया हूँ मैं
जहाँ है बस यही दो पथ वहाँ पर आ गया हूँ मैं’

वे भौचक्के से राज पथ पर देख रहें हैं, और अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त करते हुए भावुक मन से कहते हैं कि —
बस्ती बड़ी अजीब यहाँ की 
न्यारी है तहजीब यहाँ की 
जिनके सारे काम गलत हैं सुबह गलत है शाम गलत है 
उनको लोग नमन करते है।'

उन्होंने बहुत पहले ही दुनिया की चाल समझ ली थी, उनकी निराशा भी हद दर्जे की है, उम्र के सभी पड़ाव उनके लिए संघर्ष और रोजी रोटी के लिए अपने बचपन का घर छोड़ कर विवश होकर पराये शहरों में अजीब रहते रहे, बहुत बैचेन और निराश होकर ही उन्होंने कहा होगा—
‘कुछ भी नहीं बदलने वाला है
वही तमाशा चलने वाला है
वही पात्र संवाद वही अभिनय
वही दृश्य फिर खुलने वाला है
देश धँसेगा सबके यत्नों से 
कीचड़ सिर्फ़ उछलने वाला है।'

विनोद जी की गीत शैली मंत्र मुग्ध करती है। वे अपने समय के कुशल चितेरे है। नवगीत कार अपने समय को कितनी तीव्रता से, और भावुक शब्दावली से राष्ट्रीय, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक चेतना का मोहक चित्र खींचता है! यह बहुत महत्वपूर्ण भी होता है। किसी भी रचनाकार को अमरत्व प्रदान करने वाला भी होता है। विनोद जी के नवगीतों में संवेदना की तीव्रता के साथ ही लोकजीवन भी अपने मूर्त रूप में उपस्थित है। और पारिवारिक संघर्ष, मनुष्य के अमानुष बनने की भी कथा है—

बाहरी आवाजों के घेरे ध्वनियों के छोड़ कर अधेरे
गीतों के गैंग चले आये, हम नंगे पाँव चले आये
भीतर इक सूखती नदी है बाहर यह रोगिणी सदी है
साँसों की मोम मछलियों को यह जलती रेत ही बदी है 
अनवरत धुएँ की यात्रायें छोड़ सभ्यता की कक्षाएँ 
छंदों के द्वार चले आये हम बेघरबार चले आये’

विनोद निगम जी ने अपनी पीड़ा की पर्तों को बारंबार अपने नवगीत में उधेड़ा है, और समष्टि के दर्द से तादात्म्य स्थापित किया है—-
‘याद तुम्हारी ऐसी बसी हुई, एक अकेला गाँव पहाड़ों में
दृष्टि तुम्हारी हो बंदी ग्रह में जैसे दो सूराख दीवारों में
पथरीले पर्तों के भीतर भी बूँद बूँद तुम बहते रहते हो
बियाबान घाटी की चुप्पी में कुछ मनभावन कहते रहते हो‘

गाँवों को छोड़ कर मनुष्य के अपना नया ठिकाना शहरों को बनाया, पर गाँव मन से कभी नहीं गया। मन में गाँव बसा कर शहर में, आजीवन रहने की यह व्यथा एक कवि ही समझ सकता है, या फिर एक कवि ही उसे शब्दों में दर्ज कर सकता है—
अपनी पगडंडी को छोड़ जाने मैं कहाँ चला आया, 
वे फसलें खेत वे सिवान, महुओं के तन छुई हवा 
खुले हुए जूड़े गंधों के शिराओं में तैरता नशा 
बूढ़े बरगद की मेहमान चंदन क्षण भोगती थकान 
नीम तले जमुँहाती धूप गन्नों के रस पीते कोल्हू 
अँधियारा फाँकते मकान छूटा सब छूटा वह गाँव 
बचपन मैं जहाँ गला आया
यहाँ सर्फ धुआँ सिर्फ़ धुआँ दौड़ती व्यस्तता 
मंदिर का दीपक था यौवन सिगरेट की तरह जला पाया’

पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी सोच बदलती है, संस्कार बदलते हैं, और जीवन शैली भी बदल जाती है, समय के संघर्ष और विसंगतियाँ भी अलग आकार प्रकार ग्रहण कर लेती हैं, लेकिन विनोद निगम जी की रचनात्मकता अभी तक प्रासंगिक है, वे वरिष्ठ नवगीत कार हैं, उनके नवगीतों में पीड़ा का एक हाहाकार छुपा है, वह दर्द, वह दुःख उनके बोलते नवगीतों में बार बार चुगली करता नजर आता है—-

‘मुट्ठी भर धूप दालान भर अंधेरे 
यह ही कुल पास बचा मेरे 
पत्थर सा वर्तमान पाँवों में बाँध कर, 
मोड़ो पर छोड़ गईं लाकर घटनाएँ
अधरों पर सिटकनी चढ़ा गईं हवाएँ 
आँखों में ख़ालीपन भर गये उजेरे’

जीवन का अनंत विस्तार अब कष्ट देने लगा है, क्या मनुष्य में ही मात्र जीवन है ? इस जटिल प्रश्न की त्रासदी ने, अबोले सभी प्राणियों का हक़ छीना है, हर जगह, हर नगर, हर गाँव, मानव दल टिड्डियों की मानिंद पसर गया है। न जंगल बचे, न हरियाली, न पशु पक्षी, न ताल तलैया, न नदी की सुकुमारिता ! 
सुबह शाम और दोपहर , चलता है भीड़ में शहर
थकी हुई सड़कों पर लोग सिर्फ़ एक संक्रामक रोग
चेहरों पर समय के कटाव जीवन से दूर तक हटाव
जीते हैं केवल संयोग 
सिर्फ़ मक़बरें हैं ये भवन सात मंजिलें ये बँगले ये घर 
रहता है भीड़ में शहर’

आज हर घर में दीवार खड़ी है, रिश्ते नाजुकियत के मोड़ पर भौचक्के से खड़े हैं। अब पैसा ही भगवान है भाई, बहन, माँ, बाप, चाचा, ताऊ सब रिश्ते समय के कूड़े दान में डाले जा रहें हैं। हम मनुष्य नहीं है, मात्र व्यवसायी हैं। स्वार्थ की पराकाष्ठा में, आज हम सब कुछ भूल चुके हैं। शर्म और तमीज भी, शिक्षा और संस्कार भी , करुणा भी प्रेम भी—
असर नहीं करती अब लम्बी चौड़ी बड़ी दलीलें
दीवारें बन गईं दरों पर चस्पा हुईं अपीलें
जख्मों के बयान चेहरों में नजरों में मत पढ़िए
दिखती भले नहीं हों गहरी गड़ती तो है ये कीलें’

बहुत करुणा होती है, किसी कवि के मन में, तभी वह तवारीख़ों पर जिंदगी के गीत लिख पाता हैं, कवि की दृष्टि से देखने के लिए बहुत बहुत बड़ा ह्रदय चाहिए। विनोद निगम जी ने अपनी सुकुमार दृष्टि को जी भर विस्तार दिया, और ख़ूबसूरत गीत, नवगीत लिखते गये। अधिक नहीं पर जो भी लिखा बेनजीर है—
‘खून फिर हवाओं में छलका है 
मौसम दुष्यंत की गजल का है 
रोटी की बात भी करेंगे हम 
अभी तो हर हाथ में मुचलका है 
हिंसक अधियारों से निकले पर
दृश्य यहाँ पर भी जंगल का है ‘

विनोद निगम जी की उच्च कोटि की संवेदनात्मकता उनके हर गीत में लक्षित होती है, मन की निराशा और आशा दोनों संवेगों का धारदार वर्णन कवि की रचनाओं में मिलता है, ज्यों ज्यों मनुष्य की आयु बढ़ती है त्यों त्यों उसकी मनोवृत्ति बदलती है, जीवन की क्षणभंगुरता की अनुभूति प्रबल होती है, भौतिक आकर्षण विकर्षण में बदलने लगता है। जीवन व्यर्थ लगने लगता है, निष्प्रह मन कह उठता है—
‘जा रहा हूँ लौट कर आऊँ न आऊँ 
सूर्य की पहली किरण संग याद रखना
तुम अभी स्वर सुन रहे हो बाँसुरी के 
और कोलाहल बँधा है साथ मेरे
जो तुम्हारे लिए ढोती है सुरभि को 
वह हवा अब बाँधती है हाथ मेरे
आज सुन लो फिर कभी गाऊँ न गाऊँ 
क की पहली तपन संग याद रखना’
 और 
‘खिड़की के भीतर मन मेरा अविराम
बाहर फिर डूब रही एक और शाम
सिंदूरी हुए स्वर्ण किरणों के पाँव 
संकरे हो गये उजेरे के आयाम’

मन वियोगी मथ रहा है, प्राण अब छटपटा रहा है विपन्न ह्रदय अब कितनी आस बँधाये ? जीवन थक चला है , बसेरे उजड़ने को हैं। नीर नदियों का भी थमने लगा है ऐसे में मनुष्य वीतरागी वीणा के तार झंकृत करते हुए एक मौन रुदन करने लगता है—-
‘हो गये गुनाह पुण्य है इस सरस धुँधलके में
रूप से लिखी भाषा पाठ यह पढ़ाती है 
 और 
‘सिमटे आकृतियों के घेरे 
और घने हो गये अंधेरे
अधरों को छू रहे निमंत्रण 
बाँहों को कस रही हवाएँ
क्षितिजों तक टूट सा रहा सब 
गतियों में डूब गये बंधन ‘

गीत पुरुष माहेश्वर तिवारी जी ने भी इस संग्रह के फ़्लैप पर लिखा है कि—‘विनोद निगम के गीतों में कविता भी है और संगीत भी, जो उन्हें अपने कई समकालीन कवियों से अलग खड़ा करता है, मौसम की मोहकता में भी उन्हें रोटी की धार, उसकी दरकार नहीं भूलती—
‘मौसम है खूब ख़ुशनुमा 
मौसम के रंग तो खिले हजार हैं
छोड़ गई मौसम से काट कर हमें
रोटी में भी कितनी तेज धार है

विनोद निगम, समकालीन गीत को समझने के लिए पढ़े जाने वाले एक जरूरी कवि हैं, उनके गीतों को पढ़ते हुए अपना अनुभव यदि लिखूँ, तो उनके पास गीतों की आमद होती है, उतरते हैं , लिखे नहीं जाते। भाषा का वह तेवर और कहन का वह सलीक़ा कितनों के पास है, विनोद निगम के प्रतिनिधि गीतों से गुजरना, आत्मीय जीवन प्रसंगों से जुड़ा एक सुखद अनुभव तो होगा ही, विगत पाँच दशकों का देश और समाज भी हमारे सामने होगा।’ प्रौढ़ आयु सपने बुनने की नहीं, अनुभव बाँटने की होती है, एक लंबी उम्र गुजार कर भी कवि मन निराश है, वह अपने आसपास एक हाहाकार देखता है, और विवशता में उसी को निहारने के सिवा और कुछ नहीं कर पाता—
‘अँधियारा आँखों में भरे हुए शाम
आँगन दालानों में उतर रही राम
बिखरे ज्यों नावों के पाल
मुड़ मुड़ कर देख रही धूप
---
अधरों पर टाँक दिये अनचाहे नाम’

कवि कहना चाहता है, कि अब दिये का नन्हा उजियारा तम की सघनता कम करने के लिए पर्याप्त नहीं है, इसे लाक्षणिक रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है, कि दुनिया की जटिलताएँ, वैषम्य अब मामूली प्रयासों से नहीं घटने वाले, एक क्रांति चाहिए, जो सब कुछ, ऊबड़ खाबड़ जो भी है, बराबर कर दे, और जमीन की सोंधी नमी को फिर से हरे भरे वन में तब्दील कर दें, ताकि ख़ुशियों के मंगल गीत पुनः सबके अधरों पर मचलने लगे, 
‘दीप का अपमान होता है सरासर 
वक्ष पर तम के जलाओ अब मशालें
हाथ होते जा रहे लम्बे तिमिर के
किंतु हैं चुपचाप फिर भी लोग घर के
चोर को अपनी हवेली में छुपाये
कह रहें है किस तरफ़ उँगली उठाएँ’

विनोद निगम की ने अपनी मानवीयता के चरम से, आज को आवाज लगाई है, पर कोई भी प्रतिध्वनि नहीं आती, थके हुए पाँव फिर भी उम्मीद की ओर लौट जाना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई की कठोर जमीन से टकरा कर हर बार लहुलुहान हो जाते हैं—
‘सारी मुस्कराहटें गायब कंठ सूखते आँख नम है
रंग बिरंगे इश्तिहार हैं फिर भी जाने कैसा गम है
निकले थे सपनों की बस्ती पहुँचे बंद अंधेरी गलियों 
गयी चाकरी दाना पानी ठण्डे चूल्हे आग खतम है’

कवि की संवेदना की धार कहीं भी भोथरी नहीं होने पाती, वह चाय को, तख़्त को, मौसम को, अपने क़स्बे को, पगडंडी, आँगन, कमरे और दालनों को अपनी रचना का कथ्य बनाता है, मुड़ मुड़ के देखने की आदत न होने पर भी विवश मन अतीत जीवी होने लगता है, क्योंकि अति संवेदना ही व्यक्ति को अतीत जीवी बनाती है, परिवर्तन की कठोरता उससे सहन नहीं होती, मनुष्यता की दिनों दिन गिरती गरिमा, उससे उसकी कोमलता नहीं छीन पाती, पाँच दशकों की यह रचना धर्मिता विनोद निगम जी को बहुत कड़े संघर्षों के बाद ही मिली है, अनुभूत और अनुभूतियों से गुँथा हुआ, ये बहुरंगी जीवन उनका विनोद प्रियता को भी प्रश्रय देता है, वे लिखते हैं—

‘बहुत फ़जीहत झेल चुके जग की नौटंकी में 
चलो रहें कुछ दिन सुकून से बाराबंकी में ‘
और 
‘मूल्य है रसा तल में दाम है कंगूरों पर
समझदार चुप हैं सब भार है लंगूरों पर
यक्ष प्रश्न कैसे यह बड़ी उमर जी जाये
छोड़ो उलझन सारी चलो चाय पी जाये’
कविता संगीत कला सृजन से हुए व्यापार 
कीर्ति यश अलंकरण बने सिर्फ़ धनाधार
तेल बेचते बच्चन सचिन बाँटते कोला 
भरमाते विज्ञापन बुद्धि हुई तार तार 
मीडिया बिकाऊ है सिनेमा उबाऊ है 
खाद्यों में मिक्सिंग है मैचों में फ़िक्सिंग है
समाधान क्या हो किससे सलाह ली जाये 
छोड़ो भ्रम भटकावे चलो चाय पी जाय’
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नवगीत संग्रह- जो कुछ हूँ बस गीत गीत हूँ, रचनाकार- विनोद निगम, प्रकाशक- पहले पहल प्रकाशन, २५ ए प्रेस काम्पलेक्स, एम. पी. नगर, भोपाल,  प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य-४०० रु. , पृष्ठ-२२६ , परिचय- डॉ. रंजना गुप्ता


बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

प्यास की पगडंडियों पर - जगदीश पंकज

‘प्यास की पगडंडियों पर’ नवगीतकार जगदीश पंकज का सातवाँ नवगीत संग्रह है जिसमें उनके ६० नवगीतों को स्थान दिया गया है। प्रकृति जीवन का अजस्र स्रोत है, प्रकृति और रचनाकार का प्रकृति-प्रेम, मानव-प्रेम का ही एक रूप है। एक कवि अपने अभ्यंतर में बंधुत्व, सौहार्द, मैत्री, प्रेम, करुणा के साथ प्राकृतिक रूप में पर्यावरणीय संतुलन की प्यास लिए कहाँ-कहाँ नहीं भटकता है - 

चल रहा है
प्यास की पगडंडियों पर
खोजता मन बावड़ी सौहार्द जल की
...

रोज प्रस्तावित/सुबह की आस में सब
टकटकी नभ में/लगाये देखते हैं
सूर्य के आलेख भी/आधे-अधूरे
चिट्ठियों पर आज भी/ कल के पते हैं  (शीर्षक रचना-प्यास की पगडंडियों पर)

नवगीत संग्रह के बाहरी आवरण में दिखाई दे रहे प्रमुख हरे रंग को रंगो के दर्शन एवं हिन्दी साहित्य सहित अन्य भाषाओं के साहित्य में जीवन से ओत-प्रोत भावों और आशाओं का प्रतीक माना गया है। रचनाकार जीवन में उन्नति के पथ पर अग्रसरता की आस में पीढ़ियों के लिए सन्देश देते हुए कहता है-

उँगलियों से तितलियों के पंख पकड़े
एक दिन बच्चे उड़ायेंगे हवा में
खोजने को प्यार की रंगीन दुनिया         (एक दिन बच्चे उड़ायेंगे हवा में)

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पीढियाँ - भावी/सुरक्षित फलें-फूलें
बो रहा हूँ /मैं स्वयं को क्यारियों में          (बो रहा हूँ मैं स्वयं को)

कवि हृदय जब आम जनमानस के रोजमर्रा की जिन्दगी में प्रदूषित हवा, पानी, शहर और कलुषित विचारों से दो-चार होता है तो वह चीत्कार कर उठता है

सुबह भी मिलती/जहाँ पर हो सिसकती
और दूषित जल जहाँ हो स्रोत पर ही 
नागरिक भी/नियम को ठेंगा दिखाते
उस शहर का सोच कितना हुआ सतही 
गन्दगी से/बजबजाते हुए नाले 
फेंकते बदबू निरंतर छोड़ते मद          (यह शहर, मेरा शहर)

आरियों को छूट है अब/काट दें जड़ /
डालियों के साथ/हरियल वृक्ष की भी
फेफड़ों को दंड दें अब
माँगते ताजा हवाएँ / इस सदी में 
शुल्क निर्धारित करें मिल 
पाँव रखने के लिए/सूखी नदी में          (आरियों को छूट है अब) 

हिंदी साहित्य के विकास में यों तो गीतों का प्रमुख स्थान रहा है परन्तु छायावाद के पश्चात गीत का विकसित रूप और वर्तमान काल में हिंदी साहित्य की एक प्रमुख विधा नवगीत है। नवगीत के प्रमुख तत्वों में से एक व्यक्तित्व-बोध अर्थात सामूहिक सापेक्षता में आम आदमी के बोध को पैमाना माना जाये तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वरिष्ठ नवगीतकार जगदीश पंकज जी उन रचनाकारों में से एक हैं जो अपनी रचनाओं के माध्यम से आम आदमी के बोध रूपी तत्व का अपने पाठकों तक बखूबी सम्प्रेषण करते हैं। प्रगतिवादी, जनवादी नवगीतकार जगदीश पंकज की विद्रोही कलम ने अपने सद्य प्रकाशित नवगीत संग्रह ‘प्यास की पगडंडियों पर’ की अधिकतर कृतियों में सदियों की उपेक्षा से हाशिए पर पहुँचे तबके के लोगों,वंचितों, शोषितों, उत्पीड़ितों, तिरस्कृत और सर्वहारा समाज का स्वर मुखर किया है। 

झूठे आत्मदंभ के कारण
वर्ण-जाति का छल बाकी है
...

अभिनन्दन करती सत्ता ने 
निर्बल पर ही वार किया है          (अपनेपन के सब संबोधन)

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बैठी हुई व्हीलचेयर पर 
स्वाभिमान की विवश चेतना 
खोज रही विकलांग समय में 
सपनों की आदिम इच्छाएँ          (सपनों की आदम इच्छाएँ) 

इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक,आर्थिक, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया एवं महामारी काल की परिस्थितियों से उत्पन्न विद्रूप विषमताओं के कारण आम जनमानस के मनो-मस्तिष्क में उठ रहे प्रतिरोध, लताड़, चुनौती, विरोध को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है-

लकड़ियाँ, उपले / रखे हैं पास में
नहीं चूल्हे में/ तनिक भी आग है,
आत्मनिर्भरता / कहाँ पर छिप गयी 
चल रहा इस मंत्र का / बस राग है          (जब विकट संकेत घर के)

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आग की चिंगारियाँ/बिखरी पे हों 
तब घृणा या द्वेष का / क्या आकलन है 
तर्जनी अपनी उठाकर / किसे कह दें
हाँ यही है, बस यही / दोषी सघन है
रोज संचित हो रहा आक्रोश मन में
कब युवा कर जाय / सीमा का उल्लंघन!      (छल भरी आश्वस्तियों से दग्ध होकर)

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दौड़ती-सी, भागती-सी/फिर रही है मौत
सड़कों, अस्पतालों/और गलियों में मचलकर (दौड़ती-सीफिर रही है मौत)

अख़बारों के मुख पृष्ठों पर/छपे हुए उजले विज्ञापन
शब्दहीन भाषा में मुखरित/अहंकार के अग्रलेख हैं  (अख़बारों के मुख पृष्ठों पर)    

संग्रह में गत वर्ष अमेरिका में श्वेत पुलिसिया कहर में अश्वेत फ्लायड की मृत्यु हो जाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रंग-भेद को लेकर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुये, रंगभेद को लेकर एक नवगीत पुरजोर तरीके से अपनी बात पाठक के समक्ष रखता है तो वहीं अन्य नवगीत में अपने ही देश में हुये बहुचर्चित आंदोलनों के साथ-साथ किसान आन्दोलन की झलक भी देखने को मिलती है। 

काला क्रोध/सड़क पर आकर
चीख-चीखकर पूंछ रहा है/रंग-नस्ल के अहंकार से
काला दर्द / प्रश्न करता है / अहंकार की श्वेत सदी से
नस्लभेद या / रंगभेद की / ठहरी सड़ती हुई नदी से  (काला क्रोध)
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आकाश ओढ़कर लेटे, रख / जाड़े की गठरी सिरहाने
धरती की नंगी काया पर / हैं बैठे हुए न्याय पाने 
......   

जो चला हथेली रखे जान   
जय-जय जवान, जय-जय किसान         (जय-जय जवान, जय-जय किसान)
इस नवगीत संग्रह की सबसे अंतिम रचना जो बेटियों और उनकी सुरक्षा को लेकर है, पाठक का ध्यान बरबस आकर्षित करती है 

अब उदासी के/क्षणों को भूलकर/बेटियां लिखतीं समय की डायरी... 
इस पूरे संग्रह में नवगीतकार का अभिधात्मक, व्यंजनात्मक कौशल देखते ही बनता है। चाक्षुस-अचाक्षुस बिम्बों, प्रतीकों के साथ मुहावरों-लोकोक्तियों संग कुछ अनूठे प्रयोगों के उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं, यथा -  

रस्सी जली हुई है लेकिन/अभी तलक भी बल बाकी है 
जहां विवशता खोद रही है / घास खेत में / प्रसव वेदना से कराहती / बैठ अकेली
आग को गाने लगी हैं आंधियाँ अब / बादलो! कुछ देर / बरसो अब नगर में
नींद उड़ गयी सिंहासन की / शासन को आ रहा पसीना
अंशतः / स्वीकार मिल पाया नहीं, पर / हम घृणित दुत्कार पाकर भी तने हैं / हमीं हैं वंशज बबूलों के
डर है, मद में जला न दें वे / लंका छोड़, अयोध्या सगरी
कुछ सजे मुखड़े बचाने हैं / नीचता की / कींच को धोकर / ढीठता ललकारती खुद ही / नागफनियों की फसल बोकर
कुछ गूंगे, बहरे, अंधे से / खड़े हुए / चौखट पर दिन
चंदन वन हो गया विषैला / भौचक हैं विषधर / कौन आ गया इधर, यहाँ / यह किसका हुआ असर
कितनी विवश चांदनी बैठी / मावस के घर में / तेल चमेली मला / छंछूदर के किसने सर में...कुलवधुओं के घूंघट में / सिसके मौसम के स्वर 

गणितीय प्रतीकों के माध्यम से अनेकों रचनाओं में कथ्य को विस्तार दिया गया है- 
सहमतियों और असहमतियों की गणना भी / कर रहा समय का लेखाकार / निरन्तर ही
आप बस रेखीय गणना में लगे हैं....संतुलन में गुणनफल का जब दखल हो / भागफल अपनी फसल / लहरा चुके हैं
नहीं रख सके अंक सुरक्षित / कभी किसी भी समीकरण के
बारहखड़ी बदल डाली / संकेतों की

प्रगति की परियोजना में / नाम मेरा भी / लिखा है / पर नहीं अनुपात के अनुसार रचनाकार ने अनेकों नवगीतों में रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों के दृष्टान्तों और भारतीय दर्शन का भली-भांति उपयोग किया है, कुछ उदाहरण देखें-

यक्ष प्रश्नों के सभी उत्तर / अधूरे
चकित हैं कैसे जलाशय / जल रहित हैं
पांडवों के हित विवादों में / घिरे हैं
द्रोपदी का आचरण करता / भ्रमित है (मुँह चिढाने लग गयी रात)

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कुरु-कुल में कितने कौरव हैं
जो-जो वंशज कहे जा सकें
और पांडवों के विवाह में
जाकर मंगल गा सकें
सत्यवती के वंशधरों पर 

चिपका हुआ अमिट संशय है  (संबंधों के दृश्य-पटल पर)
डर है, मद में जला न दें वे / लंका छोड़, अयोध्या सगरी   (भरी हुई गागर संयत है)
कूटनीतिक सूत्र भी / चाणक्य के....नीति के उपदेश तब / किसने कहे   (जब विकट संकेत घर के)
नव-सृजन को लेकर कवि-मन की एक बानगी –
हमने भाषा के बीहड़ में / खोजी हैं / उन्मुक्त हवाएँ 
....

लय से चली / प्रलय तक आयी
कहां पहुंच कर विलय हो गयी
उदगम पर तो / है विमर्श, पर
नदी सृजन की कहाँ खो गयी...
विकृत और प्रदूषित होती / भाषा के संवाद बचायें!   (हमने भाषा के बीहड़ में)

‘प्यास की पगडंडियों पर’ संग्रह में आपको तत्सम और देशज शब्दों के साथ-साथ विदेशी शब्दों का प्रयोग भी देखने को मिल जाता है - पन्नियां, बेतहाशा, जिन्दगी , पच्छिम, अरगनी, वायदों, ठेलकर, पालागन, चदरिया, रजधानी, बदन, शोहदे फब्ती कसते, औलिया, कवायद, रोशनाई, स्मार्ट, पेंसिल, स्लेट, व्हीलचेयर, इजलास आदि

मूलतः उत्तर प्रदेश के जनपद गाजियाबाद के पिलखुआ में जन्में वरिष्ठ नवगीतकार जगदीश पंकज के इस नवगीत संग्रह से पूर्व ‘सुनो मुझे भी', 'निषिद्धों की गली का नागरिक', 'समय है सम्भावना का', 'आग में डूबा कथानक', 'मूक संवाद के स्वर' एवं 'अवशेषों की विस्मृत गाथा' प्रकाशित हो चुके हैं। आपको कई रचनाओं के लिये अनेकों बार पुरुस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अंत में इस नवगीत संग्रह के लिए मेरी तरफ से नवगीतकार जगदीश पंकज को हार्दिक बधाई और भविष्य में पाठकों के लिए आने वाले (द्रोह असहमत इच्छाओं का) सहित अन्य सभी नवगीत / काव्य संग्रहों के लिये हार्दिक शुभकामनाएँ। 

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नवगीत संग्रह- प्यास की पगडंडियों पर, रचनाकार- जगदीश पंकज, प्रकाशक- ए. आर. पब्लिशिंग कम्पनी, १/११८२९ पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली- ११००३२,  प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य-२९५ रु. , पृष्ठ-१२७ , परिचय- ब्रजेश सिंह