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रविवार, 1 मार्च 2026

बार बार उग ही आएँगे- गरिमा सक्सेना

बार बार उग ही आएँगे गरिमा सक्सेना के पचास गीतों का तीसरा संग्रह है।अतीत की स्वस्थ परम्परा का संबल लेकर वर्तमान को साहस के साथ स्वीकारते एक काँटों भरी राह पर चलकर गरिमा सक्सेना की चाहत उस उज्जवल भविष्य को मुट्ठी में कसने की है जिसके लिए प्रगतिशीलता, अपराजेय आस्था और सृजन का संकल्प अपरिहार्य है। उनकी सर्जना में शिकायती स्वर तो दिखते हैं किंतु पराजयबोध नहीं। अपने कथन की पुष्टि हेतु ‘बार-बार उग ही आएँगे’ रचना का अंश प्रस्तुत है-
“चाहे धूप कड़ी हो तन पर
या भीषण वर्षा का हो डर
हमने हर मौसम स्वीकारा
जीवित रक्खा साँसों का स्वर
अपनी जड़ पर हमें भरोसा
हाथ नहीं हम फैलाएँगे
हम पीपल हैं/वनतुलसी है
बार-बार उग ही आएँगे।”

इस प्रकार जीवन के प्रति कवयित्री की यह अखंड आशा तथा आस्था अंतत: सम्पूर्ण मानव-भविष्य के प्रति उनके आस्थावादी-जीवन का पर्याय बनकर उपस्थित हुई है जो उसकी सर्जना का एक उज्जवल पक्ष है।

वस्तुत: किसी भी उत्तम काव्य का सृजन तब तक नहीं हो सकता जब तक उसके रचयिता की दृष्टि इतनी व्यापक न हो कि वह तात्कालिक वात्याचक्र में ही धुँधली न होकर एक ही प्रयास में समूचे राष्ट्रीय जीवन की अनंत प्रेरणाओं को अपने में समाहित कर उसके प्रकाश में अतीत, वर्तमान तथा भविष्य तीनों को देख सकने की क्षमता रख सके। इस प्रकार की व्यापक अंतर्दृष्टि से समन्वित रचनाकार के रूप में श्रीमती गरिमा सक्सेना का नाम लिया जा सकता है जो एक दिन दूसरी महादेवी अथवा शांति सुमन बनकर अग्रधन्वा नवगीतकार का व्यक्तित्व ग्रहण कर सकती हैं। उनका यथार्थ चित्रण इन्हीं अर्थों में प्रेरित करता है। मानवता को जीवित रखने के लिए जब वे लिखती हैं- “दूर-दूर तक छाँव नहीं है/तपती सड़कों पर/इमारतों ने छीन लिए हैं/टेसू, गुलमोहर/बीत रहे हैं कड़ी धूप में/आफत वाले दिन।”

इसी क्रम में वे दूसरे नवगीत में लिखती हैं-“मजबूरी की सड़कों पर हम/गड़े मील के पत्थर जैसे/हर मौसम में हमको रहना/उसी ठिये पर जैसे-तैसे/तपकर ही तो निखरे हैं हम/क्या कर लेगा जेठ महीना।”

यह जिजीविषा का भरपूर प्रयास मानव अस्मिता के साथ प्रत्येक चुनौती को स्वीकार कर उसे ललकारने का एक उपक्रम है। चुनौतियों के सम्मुख गरिमा जी रिरियाती नहीं बल्कि उनका साहस के साथ सामना करने का संदेश देती हैं और स्वयं भी एक दिन चुनौती को भूमिसात कर देती हैं तब लिखती हैं- “इक अरसे से/धूल भरे थे चित्र सभी/दिखे नहीं थे/बहुत दिनों से मित्र सभी/... शीतलता के/जागे छन्द हवाओं में/नयी ताज़गी/लौटी पुन: शिराओं में/मैले वसन उतारे/मन की थकन मिटी।”

कवयित्री श्रीमती गरिमा की यह विराट तथा गहन दृष्टि ही उनमें ऐसी सांस्कृतिक चेतना फूँक सकी है जिसमें नये-नये पथों पर प्रवाहमान होने के बावज़ूद कवयित्री का रचना संसार किसी भारतीय साहित्यिक तथा  सांस्कृतिक परम्परा के एक अंग के रूप में प्रतिष्ठित है। उसकी सांस्कृतिक परम्परा की पीठिका यदि इतनी पुष्ट न होती, परम्परा के स्वस्थ तत्वों का अनिवार्य सम्पर्क यदि गरिमा जी को न प्राप्त होता तो कदाचित् उनके सृजन का महत्व इस ऊँचाई तक न पहुँच पाता जैसा कि वह वर्तमान में है।

अपनी अब तक की काव्य-सर्जना में उन्होंने जितने भी नये प्रयोग किये हैं उनके मूल में उसी सृष्टा तथा क्रांतदर्शी रचनाकार की छाप दिखायी पड़ती है। और इसी संदर्भ में वे लिखती हैं- “आज अहिंसा के पथ पर क्यों/इतने-इतने युद्ध खड़े हैं/ठहर गया बुद्धत्व, पूछता/आख़िर हम कब तक ठहरेंगे/पहन उँगलियों की मालाएँ/शरण बताओ किसकी लेंगे/ अंगुलिमालों की बस्ती में/मौन तथागत बुद्ध खड़े हैं।”

हिंसा के आँगन में अहिंसा का संदेश देते-देते तथागत भी थककर मौन हो गये हैं। विस्तारवादी, मानवताविरोधी विचारधारा जो केवल स्वयं जीना चाहती है किन्तु अन्य को जीने का अधिकार नहीं देना चाहती क्या यही प्रगति है।

परम्परा कोई मरी हुई चीज़ या मृत वस्तु अथवा अतीत की वस्तु न होकर एक ऐसा बोध है जो समय खंडों का अतिक्रमण करता हुआ हमारे वर्तमान में निजी संस्कारों में घुलमिलकर परोक्ष रूप से हमारे विचारों को संचालित करता है। निर्मल वर्मा के अनुसार परम्परा कोई मृत वस्तु नहीं है, उसमें जड़त्व नहीं है, वे स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं- “परम्परा एक जड़ित समय की धरोहर नहीं बल्कि वह समय है जो अतीत से बहता हुआ हमारे वर्तमान की धमनियों में प्रवाहित होता है।” डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी परम्परा को रूढ़ि का पर्याय नहीं माना है- “परम्परा अतीत का समानार्थी नहीं है, परम्परा में समूचा अतीत हमें प्राप्त नहीं होता, उसका कटा-छँटा निखरा रूप प्राप्त होता है और इस प्रकार परम्परा और आधुनिकता में सहज सम्बन्ध है। उसका सहज अर्थ है एक का दूसरे को, दूसरे का तीसरे को दिया जाने वाला क्रम।" वे द्रष्टांत देते हैं- मनुष्य दोनों पैरों से चलता है, एक पैर धरती पर रोपता है, दूसरा पैर आगे बढ़ाता है। खड़ा पैर परम्परा है और आगे बढ़ने वाला पैर आधुनिकता है। परम्परा इस प्रकार आधुनिकता को आधार देती है। अज्ञेय ने भी वर्तमान के साथ अतीत की सम्बद्धता और तारतम्यता को परम्परा स्वीकार किया है। श्रीमती गरिमा सक्सेना के नवगीत भी अतीतबोध के साथ वर्तमान में प्रवेश करते हैं तथा इन तथ्यों की पुष्टि ही करते व्यक्त होते हैं। यथा- “जो कुछ परदे में रहना था, सब है परदे पर/घोल रहा जो नित्य रगों में मीठा एक ज़हर/नयी सदी की ख़ातिर ये कैसी सौगातें हैं/जिसमें सबका हित था, ग़ायब वह साहित्य हुआ/बाज़ारों ने इसे बनाया बिगड़ा हुआ सुआ/नैतिकता को बेच दिया है बंद लिफ़ाफ़ों में/अटका हुआ ध्यान बस सबका बड़े मुनाफ़ों में/बढ़ता देख ट्रेंड कौओं का आज मीडिया पर/कोयल ने भी सीख लिया है काँव-काँव का स्वर/सूर्य बुझा, बल्बों से रौशन दिन औ’ रातें हैं।”

इस बदले हुए परिवेश में वह क्या है जो छीज गया है और उसकी अनुपस्थिति हमें ऐसी नैतिकता, मानवता, आस्थाविहीन क्षरित दशा का बोध करा रही है। संभवत: वह परम्परा ही है जो समाज को नियंत्रित व संयमित रखती है। अतीत की छाया में प्रस्तुत ‘हौसला मत हार’ शीर्षक नवगीत में भी हमें उक्त विचार के दर्शन होते हैं- “है समय का ग्राफ माना/कुछ ढलानों पर/ये मगर फिर से नया/उत्थान चुन लेगा/है नहीं ऋजु रेख जीवन/मार्ग सुन ले तू/क्षीण करता यदि समय/तो शक्ति भी देगा/यह समय उल्लास के/फिर गीत गायेगा।”

श्रीमती गरिमा जी के नवगीतों के संदर्भ अतीत में छिपे हैं और उन्हें समझे बिना अर्थ अधूरे रह जाते हैं। प्रत्येक नवगीत का एक इतिहास है जो प्रक्षिप्त है। सहज-सरल शब्दों में वे बेहद गूढ़ बात कह जाती हैं। जिनकी व्याख्या शब्दार्थ से नहीं की जा सकती है। अपने समय को सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करने में वे बेजोड़ हैं। ‘प्रायोजित गलफाँसें’ शीर्षक नवगीत में वर्तमान का विरूपित चेहरा दिखाती हुई वे लिखती हैं- “सुविधाओं के पैरों में/फट गयी बिवाई है/रोशनदानों जैसी/खिड़की की सच्चाई है/.../कई हज़ारों में मिलती हैं/घंटे भर की साँसें/राहत के हिस्से में आयीं/प्रायोजित गलफाँसें।”

प्रायोजित गलफाँसें पूरी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करती है। व्यवस्था के जितने क्षेत्र हैं, सबमें क्षरण सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है जिसकी जकड़न में साँसें ऊभचूभ हो रही हैं।

भारत का साहित्य लोकमूलक है और यहाँ की परम्पराओं और अपनी संस्कृति से ही ऊर्जस्वित होता है। ब्रज, अवधी, भोजपुरी, खड़ी बोली, मैथिली, बघेली, बुन्देली आदि लोकभाषाओं से हिन्दी का वर्तमान स्वरूप निर्मित हुआ है। इसीलिए साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। विश्व भाषाओं में एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करने का इतिहास है जिसका नाम भाषा विज्ञान है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है जो नवगीत में भी देखा जा सकता है। नवगीत में लिपटी संस्कृति कथ्य और शिल्प दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है जिसके अभाव में नवगीत, नवगीत नहीं रह जाता। नवगीत की वैचारिकता का विश्लेषण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि लोकजागरण, लोकमंगल ही नवगीत का उद्देश्य रहा है। गरिमा सक्सेना की भी विचारधारा इससे इतर प्रतीत नहीं होती है। वे कथ्य की व्यंजना से समाज में व्याप्त विद्रूपताओं को व्यक्त करने में सर्वथा सफल हुई हैं- “अब शहर वाली सियासत/जंगलों तक आ गयी/हर तरफ़ मृगछाल का/आया चलन/.../शावकों को/आग में झौंका गया/हो रहा है/हर तरफ़ कैसा हवन/हरे वृक्षों के अचानक/पात पीले हो गये/भेड़, बकरी, मेमनों के/नख नुकीले हो गये/इस तरह नफ़रत/हवाओं में घुली/भेड़िये जैसा हुआ/खरगोश-मन।”

बाँटो और राज करो वाली विदेशी सियासत अब भारत में भी आ गयी है। और पक्ष तथा विपक्ष एक-दूसरे से घमासान कर रहे हैं। विपक्ष अलगाववादियों के हाथों में खेल रहा है। परस्पर सामंजस्य का समाज में लोप हो गया है। अविश्वास और असुरक्षा के इस वातावरण में खरगोश मन भेड़िये-सा आचरण करने लगा है। कवयित्री पूरे समाज, सियासत को संदेश दे रही है कि माबलिंचिंग, महिलाओं के साथ दुराचरण और समाज में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को रोका जाये अन्यथा विकास और विनाश में अंतर ही क्या? नवगीत प्रवाचक या उपदेशक की भूमिका से पृथक है। संदेश कथ्य में छिपा रहता है क्योंकि नवगीत अभिधात्मक न होकर व्यंजनात्मक होता है। इसीलिए गरिमा जी को कहना पड़ा- “बूँदों की ताज़गी नहीं है/मेघों में हैं सिर्फ़ छलावे/सिर्फ़ गरजने वाले बादल/बाँच रहे केवल बहकावे/साँकल खुली अगर जो मन की/आँधी पा जाएगी अवसर/बदल गये जीवन के अक्षर/आँधी बहुत तेज़ है बाहर।”

गरिमा जी की वेदना पूरे समाज की वेदना है। जो सम्वेदी अंतरमन का प्रतिफल है। रचनाकार के नेत्र कैमरे के लेंस की भाँति होते हैं जो संज्ञान में घटित प्रत्येक घटना-दुर्घटना के चित्र अवचेतन में भेजते रहते हैं। इसमें से कुछ चित्र तो अचेतन में चले जाते हैं और कभी लौटकर नहीं आते किन्तु जो अवचेतन में एकत्र रहते हैं उनमें कभी-कभी अनजाने उच्छलन होता है जो एक पंक्ति के रूप में उतरता है जिसके आधार पर रचनाकार गीत का सृजन अपनी प्रवृत्ति-प्रकृति के अनुसार कर लेता है। जिस पर राजनीति, धर्म, संस्कृति, परम्परा एवं देशकाल का भी प्रभाव पड़ता है। कैमरे का लेंस जितना तीव्र, स्पष्ट और दोषरहित होता है, उतना उत्तम कथ्य, शिल्प, संवेदना का रचाव होता है। नवगीत लयाश्रित होता है क्योंकि कोई भी कवि-कवयित्री छन्द को आधार बनाकर गीत नहीं लिख सकता। लय की शुद्धता होने पर छन्द स्वत: रचना में आ जाता है।

गरिमा जी के नवगीत छंद की कसौटियों पर खरे उतरते हैं। ‘बरी हो गये गिद्ध’ शीर्षक नवगीत का एक अंश यहाँ उल्लेखनीय है-“फिर सलीब पर/ टँगी हुई है लाश/उम्मीदें पर/किसकी करें तलाश/.../सूखे मन की/रोज़ परीक्षा/लेता है आकाश/सत्याग्रह के गर्म तवे पर/हुईं रोटियाँ सिद्ध/फिर लाशों पर दोष डालकर/बरी हो गये गिद्ध/पता नहीं/कबतक सपनों को/जीना है अवकाश।” इस प्रकार गरिमा जी नवगीत की सिद्ध कवयित्री हैं कहना अतिरेक नहीं होगा।

साहित्य तब तक ही ग्राह्य है जब तक समाज के लिए उपयोगी है। साहित्य की उपादेयता में ही उसकी प्रासंगिकता है। साहित्यकार युगदृष्टि सम्पन्न होता है। जिसके अंतस में युगचेतना स्वत: स्फुरित होती है और यही युगचेतना उत्तम नवगीत का आधार बनती है जो व्यक्ति और समाज को संस्कारित करती है और युगचेतना का विस्तार भी होता है। नवगीतकार के समाजोन्मुखी होने के कारण ही उसकी व्यक्तिगत वेदना भी पूरे समाज की वेदना के रूप में प्रकट होती है। और यही है कवि की संवेदना का सामाजीकरण। साहित्य, संगीत, कला की हज़ारों वर्ष प्राचीन विरासत को सहेजने तथा समृद्धशाली बनाने में नवगीतकारों का योगदान अविस्मरणीय है जिसमें निम्नवत् तत्वों का योगदान है- (1) संस्कृति से जुड़ाव, (2) समाज की चिन्ता, (3) वर्तमान को सुंदर बनाने के लिए संदेश, (4) देशप्रेम,

(5) स्वाभिमान, (6) भाषा की उद्दात्तता। गरिमा जी के नवगीतों में इन तत्वों का अभाव नहीं दिखायी पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है- कीरति भमति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।

श्रीमती गरिमा सक्सेना का कथन है कि- नवता और उक्त गुणों से सम्पन्न नवगीतों का रचाव इतना भी सरल नहीं है जितना कह देना। इसकी यात्रा में अनेक कठिनाइयों के साथ आत्मबलि भी आवश्यक है तभी गंतव्य तक पहुँचा जा सकता है। ‘बादल होना’ शीर्षक नवगीत से उनकी इस उक्ति को सहज ही समझा जा सकता है- “इतना भी आसान नहीं है/बादल होना/आसमान को छोड़/धरा में ख़ुद को खोना/ऊँच-नीच को भूल/सभी को गले लगाना/ऊसर, पेड़, नदी, पर्वत/सबका हो जाना/क्या है जीवन-अर्थ/हमें समझाने आये/बादल आये/तपता मन हर्षाने आये।”

नवगीतकार साहित्य और समाज के लिए जब बादल बन जाता तब उसका स्व समाप्त हो जाता है, यही है उसकी सिद्धि और गंतव्य। गरिमा जी में हम ऐसे ही नवगीतकार का दर्शन करते हैं।

वर्षा सम्पूर्ण संसृति को हर्षित कर देती है और बादल से उत्तम प्रतीक कोई अन्य नहीं है। वर्षा प्रकृति ही नहीं प्रत्येक जीवन के लिए अनिवार्य है जिसके अभाव में जीवन ही संभव नहीं है। इसीलिए गरिमा जी बार-बार बादल की प्रशंसा कर उसकी करुणा का वर्णन करती हैं। यथा- “ज्यों प्यासे के पास कुआँ/चलकर आया है /जैसे कोई स्नेह-छत्र/बनकर छाया है/तपते मन पर/ज्यों ख़ुशियों के/पल बरसे हैं/मुझे पता है/किन प्रश्नों के/हल बरसे हैं।”

मनुष्य की सत्ता में अनुभूति लोक ही वह रहस्य लोक है जहाँ बाहर के रूप जगत का संपूर्ण वेग अंतर का आवेग बन जाता है। और यह अंतर का आवेग बाहर रूप ग्रहण करने को उत्सुक हो जाता है इसलिए काव्य का होना आवश्यक होता है। वह अपने अर्थ से तो बाहरी घटनाओं को व्यक्त करता है किन्तु गति के द्वारा आंतरिक वेग को भी प्रकाशित करता है जो किसी भी रचना का मूल अर्थ होता है। ‘मौन रहना बेहतर है’ शीर्षक नवगीत की कुछ पंक्तियाँ उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं- “जब शब्दों के अर्थ/बदलकर रूप खड़े हों/वहाँ मौन रहना बेहतर है/प्रश्नों के बदले मिलती हैं प्रश्नावलियाँ/उत्तर केवल गिना रहे/कमियाँ ही कमियाँ/जहाँ गड़े मुरदे/संवादों में उखड़े हों/वहाँ मौन रहना बेहतर है।”

वाक्य जब सीधा खड़ा रहता है तब केवल अर्थ को प्रकट करता है। परन्तु जब वह तिरछी भंगिमा खड़ा होकर, गतिशील होकर साधारण अर्थ के अतिरिक्त और भी अनेक तथ्य प्रकाशित करता है वह अतिरिक्त वस्तु क्या है यह कहना कठिन है क्योंकि वह वचन के अतीत है और इसीलिए अनिर्वचनीय है। हम जो कुछ देखते हैं, सुनते हैं, जानते हैं उसके साथ जब अनिर्वचनीय का योग होता है उसे ‘रस’ कहा जाता है। अर्थात् वह वस्तु जिसे हम अनुभव करते हैं पर उसकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं होती है। यह गूँगे का गुड़ है जिसकी मिठास का आनंद प्राप्त करने पर भी गूँगा व्यक्त नहीं कर सकता। ‘रस’ ही पठनीयता में अभिवृद्धि करता है। गरिमा जी के गीतों की रसाद्रता अथवा सरसता उस आनंद की सृष्टि करती है जिसे ‘रस:वै स:’ के रूप में कहा गया है जिससे ‘अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः’ की संज्ञा दी गयी है। उदाहरणस्वरूप निम्नांकित पंक्तियाँ ‘मतभेद’ शीर्षक से प्रस्तुत हैं- “तेल और बाती/दोनों ही अलग खड़े हैं/अँधियारे ने यह कैसा/मतभेद भर दिया/अलग हो गयी जीवन से/उन्नति की भाषा/‘जैसा है चलने दो’ में/खोई अभिलाषा/मुट्ठी भर ही रहे केन्द्र में/केवल शामिल/बाक़ी के हिस्से में आया/सिर्फ़ हाशिया।”

वस्तुत: गरिमा सक्सेना जी अंतर्जगत की दृष्टा हैं और बहिर्जगत को भी वह सीधा नहीं देखतीं, अंतर्जगत में उतार कर अपनी अनुभूति के माध्यम से देखती हैं। बाहरी संसार यदि सबको उजला दिखता है तो दिखता रहे किंतु गरिमा जी जब इस उजलेपन को अंतर्जगत में उतार कर देखती हैं तो उजाले में छिपी वह कालिमा भी दिख जाती है जो बाहर-बाहर देखने वालों के लिए अदृश्य है। इस अंतर्दृष्टि के कारण ही गरिमा जी मन के भावों और भाव-संवेदनाओं का चित्रण करती हैं। उक्त संदर्भ में निम्नांकित पंक्तियाँ दर्शनीय हैं- “मंदिरों में, घाट पर/पूजाघरों में/प्रार्थनाओं से अधिक/अब सेल्फियाँ हैं/हो गये हैं तीर्थ/शापिंग मॉल जैसे/पिकनिकों का /एक अड्डा हो गये हैं/भाव के भूखे रहे/भगवान लेकिन/ है दिखावा/भाव ही ज्यों खो गये हैं/अब नहीं/श्रद्धा कहीं देती दिखायी/रील्स इंस्टा पर बना लो/मूर्तियाँ हैं।”

गरिमा सक्सेना जी के नवगीत काल और समाज का यथार्थ चित्रण करके सकारात्मकता का पथ प्रशस्त करते हैं तथा समाज को समुचित प्रगतिशीलता का मर्म समझाने का प्रयास करते हुए मानव-उत्थान का संदेश देते हैं। गरिमा जी सहज-सरस-सरल भाषा के प्रवाह को शिल्प में नियंत्रित कर नवगीत में नये आयाम जोड़ती हैं, जो जन-जन को ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय’ की ओर प्रवृत्त कर संवेदना का विस्तार कर रही हैं। प्रसाद गुण सम्पन्न उत्तम नवगीत-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई देते हुए मुझे विश्वास है कि नवगीत जगत में इसका भव्य स्वागत होगा।

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नवगीत संग्रह- बार बार उग ही आएँगे, नवगीतकार-गरिमा सक्सेना, परिचय- अवनीश त्रिपाठी- प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा,  कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- १२०, मूल्य- रु. २४९,
 ISBN : 978-81-983152-7-4

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

कोशिशों के पुल- गरिमा सक्सेना

छंद कविता के रूप में हिंदी ग़ज़ल से अपने जुड़ाव के बीच मेरी दृष्टि जिन कुछ पुराने और समकालीन नवगीतकारों पर जाती रही है उनमें अवध बिहारी श्रीवास्तव, मयंक श्रीवास्तव, माहेश्वर तिवारी, विजय किशोर मानव, वीरेंद्र आस्तिक, यश मालवीय, देवेन्द्र आर्य, ओम निश्चल, राम नारायण रमण, जगदीश व्योम, रमेश गौतम, जगदीश पंकज जैसे कुछ नाम प्रमुख हैं। ठाकुर प्रसाद सिंह के साथ कितनी ही बार बैठने का सुयोग तो विद्यार्थी जीवन में प्राप्त होता रहा था। इसी प्रकार बाद की पीढ़ी बल्कि नई पीढ़ी के जिन लोगों पर मेरी नज़र टिकती रही है, उनमें अवनीश त्रिपाठी, राहुल शिवाय, शुभम श्रीवास्तव 'ओम' के साथ-साथ एक नाम गरिमा सक्सेना का भी है।

गरिमा सक्सेना बहुआयामी और बहुस्तरीय रचनाकार हैं। उनके नवगीतों में सरोकारों के इतने स्तर मिलते हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। उनमें वे जो कुछ कहना चाहती हैं उसे ठीक उसी प्रकार अभिव्यक्त भी कर ले जाती हैं। वे अपनी रचनाओं में भावों का ऐसा कोई गुंजलक नहीं बनातीं, पाठक जिसमें फँसकर उलझा हुआ महसूस करे। उनकी निरंतर सक्रियता बताती है कि वे कविता को लेकर कितनी गंभीर और सचेष्ट हैं। यही कारण है कि मात्र तैंतीस वर्ष की उम्र में ही उनके चार संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं और इतने ही संपादन उनके नाम जुड़ गए हैं। उनकी रचनाओं को सुधीजनों और पाठकों द्वारा ख़ूब सराहा भी गया है। ऐसी गरिमा सक्सेना अपने नए नवगीत संग्रह 'कोशिशों के पुल' के माध्यम से एक बार फिर पाठकों से रूबरू होने जा रही हैं तो उनका उत्साह देखते ही बनता है।

गरिमा सक्सेना अपने उस लखनऊ को अपनी रचनाओं में करीने से सहेज कर जीती और प्रस्तुत करती दिखाई देती हैं, जो उनका पैतृक शहर है। उनके एक प्रेमगीत में अवध और लखनऊ की संस्कृति तरह-तरह से रची-बसी दिखाई देती है-

प्यारे लगते हो तुम जैसे/एक अवध की शाम
आँखें लगतीं भूलभुलैयाँ/बोल दशहरी आम

प्रेम जीवन की अनमोल निधि है। हर रचनाकार उसे अपने ढंग से जीता और अभिव्यक्त करता है। प्रेम गरिमा सक्सेना के नवगीतों का एक प्रमुख स्वर है। उनका प्रेम एकनिष्ठ प्रेम है जो नदी की उस ठंडी जलधारा जैसा है, जिसमें गति है, लहरें हैं, चंचलता है तथा और भी बहुत कुछ है जो मन को भिगोता और आनंदित करता है। गरिमा ने बहुत टटके अंदाज़ और टटकी भाषा में अपने प्रेम को अभिव्यक्ति दी है, जो मन को बाँध लेती है-

बातों में/अक्सर परोसना/मीठे सँग नमकीन
कितनी ख़ुशियाँ/भर देते हैं/फ्लैश बैक के सीन
मुस्कानों का/तुम बन जाते/हो अक्सर पर्याय
सारे दिन की/थकन मिटाते/तुम ज्यों मेरी चाय

सबसे नज़र बचा कर/कुल्हड़ की अदला-बदली
मगर होंठ की लाली ने भी/कर दी थी चुगली
और ताकना अगल-बगल/प्यारी चोरी के बाद
हाथों में फिर से कुल्हड़ है/और तुम्हारी याद

प्रेम में विछोह और वियोग स्वाभाविक प्रक्रिया है। वियोग प्रेम की अनुभूतियों को तीव्रता और तीक्ष्णता से आप्लावित करने का काम करता है। ऐसे वियोग को भी गरिमा ने अपने गीतों में जगह दी है-

बिना नमक की सब्जी-सा था/फीका-फीका दिन
मीत तुम्हारे बिन

मन का मानसरोवर गुमसुम/चुप-चुप था ठहरा
लहरों की आवाजाही पर/नींदों का पहरा
नहीं चली पुरवाई कोई/पेड़ नहीं झूमा
बिना तुम्हारे मुस्कानों ने/ज्यों पारा चूमा
घड़ियों की भी चाल हुई थी/किसी दुल्हन जैसी
बढ़ती सुइयाँ आगे हौले-हौले/पग गिन-गिन
मीत तुम्हारे बिन

गरिमा के नवगीत उस समकालीन यथार्थ पर अपनी नज़र गड़ा कर रखते हैं, जो हिंदी कविता का प्रमुख स्वर ही नहीं, उसकी पहचान भी है। कहना न होगा कि यथार्थ गरिमा सक्सेना के नवगीतों का सबसे प्रबल, प्रमुख और गहरा स्वर है। यथार्थ पर उनकी पैनी दृष्टि उनके सरोकारों को भी बयान करने वाली है-

रच रहे हैं आग का संसार हम/दे रहे गृहयुद्ध को विस्तार हम
सीरिया, ईराक या अफ़गान बन/जी रहे हैं एक हाहाकार हम
फैलती ही जा रही हैं आग बन/हर तरफ़ जलतीं सियासी तीलियाँ
शांति का पथ अब अकेला पड़ गया/जी रहे हैं आज कैसी संधियाँ

विडंबनाओं और अंतर्विरोधों की अभिव्यक्ति के माध्यम से भी गरिमा  यथार्थ को पकड़ने और समझने का निरंतर उद्यम अपनी रचनाओं में करती दिखाई देती हैं। वे अपने रचनाकर्म में यथार्थ को छिटककर दूर नहीं जाने देतीं, बल्कि उसे निरंतर गूँथती-माड़ती रहती हैं। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है-

आरोहों के पथ आरक्षित/मानक हैं उत्कोची
जूते सिलने के बदले में/पैर काटते मोची
सिर के बल आख़िर कैसे हम/सोपानों पर चढ़ते
पढ़े हुए अख़बारों को हम/बार-बार हैं पढ़ते

           •

पत्तों पर जल के फव्वारे/मगर जड़ें हैं प्यासी
दीमक जैसी चाट रही है/मन को एक उदासी
बिना जड़ों तक पोषण पहुँचे/होगा कहाँ विकास

'सोजे-वतन' देखकर रोता/आज देश की हालत
पूँजी है जन की अधिनायक/करती कलम वकालत
छुई-मुई सब हो जाते हैं/सत्य-मर्म को छूते
आज तलक भी फटे हुए हैं/प्रेमचंद के जूते

यथार्थ की बहुस्तरीयता, सघनता और व्यापकता तथा उसका विस्तार किसी भी रचनाकार के लिए चुनौती की तरह होता है। प्रत्येक रचनाकार इस चुनौती को अपनी तरह स्वीकार करके आगे बढ़ता है। गरिमा भी इस चुनौती को अपनी तरह से स्वीकार करती हैं-

राजघाट पर चढ़ा रहे हैं/हम श्रद्धा के फूल
पर बापू को हम जीवन में/कब कर सके क़ुबूल
बापू के आगे नत हो बस/फोटो खिंचवाते
बापू के चश्मे से हमसब/देख नहीं पाते
बापू ऐसा ब्रांड बने जो/बापू के प्रतिकूल

गरिमा विद्रूपों के माध्यम से भी अपने यथार्थ को और धार ही नहीं देतीं बल्कि समाज को आईना दिखाकर उसे झिंझोड़ने का भी उपक्रम करती दिखाई देती हैं-

काग़ज़ों औ' फाइलों ने/मूँद ली हैं आँख अपनी
कलम गूँगी, प्रश्न गूँगे/उत्तरों की मौन कथनी
जो दिखाता है निदेशक/देख लो वैसा सनीमा
देश में चलता यही है/काग़ज़ों पर सब सही है

          •

संदर्भों का पता नहीं पर/अर्थों का विस्तार खोजते
अपने ही ख़ूनी पंजों से/ख़ुद ही अपनी देह नोंचते
आग लगाकर चाह रहे हैं/जमा रहे हिमखंड न पिघले
घर के अंदर कलह मचाकर/शांतिपाठ सिखलाने निकले

गरिमा का कवि-मन केवल अपने देश- समाज के यथार्थ से ही नहीं टकराता, अपितु देश की सीमाओं के बाहर भी जाकर विस्तार पाता और आकार ग्रहण करता है-
थोड़ी ही तो सुधर सकी थी/काबुल की तस्वीर
तालिबान तब तक ले आया/वही पुरानी पीर
भग्न हुईं मूर्तियाँ बुद्ध की/धम्म रह गया मूक
मौन तथागत देख रहे हैं/काँधे पर बंदूक
शांति, न्याय, सद्भाव सभी को/जकड़े है जंज़ीर

वस्तुतः जीवन और संघर्ष का अंतर्सम्बन्ध बहुत जटिल और पेंचीदा है। रचनाकार इस जटिल रिश्ते के भीतर तक पहुँचना चाहता है जो उसके रचनाकर्म को भी संघर्ष से जोड़ देता है। इस क्रम में ही गरिमा जीवन की आपाधापी को भी शब्दों में बाँधने की कोशिश करती दिखाई देती हैं-

दौड़ रही हैं सड़कें/सपनों से आगे
कितना तेज़ चले/कोई कितना भागे
भ्रमित करें चौराहे/सिग्नल बंद कहीं
चलती रहतीं सड़कें/इनका अंत नहीं
जीवन की राहें जितनी/टेड़ी-मेड़ी
उतनी ही सड़कों पर/घिसते हम एड़ी
चौबिस घंटे भी/जैसे कम लगते हैं
दौड़ रहे आधे सोये/आधे-जागे

कोई भी रचनाकार अपने आसपास की ही चीज़ों को देखता है। फिर उन्हें अपने मन-मस्तिष्क में पकाकर समाज को वापस करता है। लेकिन एक रचनाकार का देखना किसी सामान्य व्यक्ति के देखने से बिल्कुल अलग होता है।  वह जिस तरह और जहाँ  तक देखता है, वही उसमें काव्य-शक्ति का संचार कर देती है। 'कोशिशों के पुल' में 'ऑब्ज़र्वेशन' के भी कई उदाहरण हैं।

नई पीढ़ी जो गरिमा की भी पीढ़ी है, उसकी मुश्किलें और चुनौतियाँ उन्हें ख़ासा परेशान और बेचैन करती हैं। यहाँ वे युवा-विमर्श के मोड में नज़र आती हैं, जिसकी इस समय बहुत ज़रूरत है। क्योंकि जिस युवा में आत्मविश्वास और भविष्य के सपनों का पूरा संसार होना चाहिए, वह आत्मघात की शरण में जा रहा है। वह  तब वे अपनी कचोट और छटपटाहट को शब्दों में कुछ यूँ बाँधती हैं-
उम्मीदों की ज़ंजीरों का/बढ़ता रोज़ दबाव
डरकर साँसें छोड़ रही हैं/अब जीने का ख़्वाब
नये परिंदों की ख़ातिर अब/ऊँचे मानक तय हैं
मानक से कम उड़ पाने पर/उपहासों के भय हैं
घायल मन ले दौड़ रहे हैं/अनचाही सी दौड़ें
वापस मुड़ना भी कब संभव/कैसे रस्ता छोड़ें
छूट रहे हैं कोरे पन्ने/लेकर काला अंत
रोज़ हो रही है साँसों की/असमय बंद किताब

इस दारुण स्थिति में वे जिजीविषा और जीवट के संबल से ओतप्रोत नवगीत लेकर उपस्थित होती हैं। ये नवगीत निराशा से उबारकर जीने का उत्साह तो देते ही हैं, जीवन में सकारात्मकता की आवश्यकता भी प्रतिपादित करते हैं। यह सकारात्मकता गरिमा के यहाँ एक मूल्य की तरह आती है और उनकी रचनाओं को भी मूल्यवान बना देती है-

रास्ते बेशक कठिन हैं/पर असंभव हैं नहीं
सूर्य स्वर्णिम-सी सफलता/का उगेगा हाँ यहीं
कल हमारे साथ होंगीं/गूँजतीं उपलब्धियाँ

जंगल हो या/कंकरीट वन
उपवन या फिर/कोई निर्जन
कोई पाँव/उखाड़े चाहें
जिजीविषा से/हम जाते तन
बिना खाद/पानी के उगकर/जीवटता से लहरायेंगे
हम पीपल हैं/वनतुलसी है/बार-बार उग ही आयेंगे

है कमी माना मगर हैं/हिम्मतें भी कम नहीं
हार को मानें नियति जो/वो पराजित हम नहीं
कौन है जिसमें नहीं हैं/कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ

पार करनी है हमें/विद्रूपताओं की नदी
हम नए बदलाव का/संकल्प ले/आगे बढें
कोशिशों के पुल गढ़ें

गरिमा सक्सेना की रचनाएँ संवेदना और अभिव्यक्ति के परिपक्व धरातल पर अपनी ताकत से खड़ी दिखाई देती हैं। कदाचित इसीलिए गाँव की वे मुश्किलें भी गरिमा देख पाती हैं, जिनमें महिला रचनाकारों की रुचि अपेक्षाकृत कम होती है-

लाडो की बारात इसी में/बेटे का एडमीशन है
गिरवी गहनों की लागत है/इसमें कर्ज, कमीशन है
सोच रहा है/खड़ा मेड़ पर/इसमें कितना अपना है
केवल फ़सल नहीं खेतों में/यह रामू का सपना है

गरिमा स्वाभिमान और आत्मसम्मान के जीवन-मूल्यों को भी अपने नवगीतों में पूरी सजगता और उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से सहेजती हैं, जो पाठक को भी जागृत और प्रकाशमान करते चलते हैं-

अभिनंदन के लंबे-चौड़े/छंद न हम गा पाये
इसीलिये आँखों में हम/तिनके-सा खलते आये

इतना ही नहीं, गरिमा सकारात्मकता के मूल्यों को बार-बार अपनी रचनाओं के केन्द्र में लेकर आती हैं और एक रचनाकार-सुलभ दृष्टि-गांभीर्य का परिचय देती हैं। वे दुख के अहर्निश रोदन की अपेक्षा उस सुख के गायन का आह्वान करती हैं, जो अंततः मनुष्य में आनंद का संचार करता है-

हरपल बस पीड़ा गायन से/जीवन में अवसाद बढ़ेगा
आँसू की बहती नदिया में/सुख का तिनका कहाँ बचेगा
गीतों को मरहम-सा कर दो/ज़ख्मों की जो बनें दवाई
जीवन में क्या दुख ही दुख है/सुख को भी तो गाओ भाई

समकालीन कविता में माँ को लेकर बेहद गहरी संवेदनशीलता रचनाकारों में देखने को मिलती है। जो स्वाभाविक भी है। क्योंकि एक बच्चे को आकार देने में माँ का जो योगदान है, वह अप्रतिम है। लेकिन परिवार में पिता की भूमिका की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। एक पिता माँ तो नहीं बन सकता है लेकिन वह माँ से बहुत कमतर भी नहीं होता। ऐसे पिता पर एक बहुत महत्वपूर्ण नवगीत गरिमा ने अपने इस संग्रह में शामिल किया है-

जुड़-जुड़ कई इकाई नित वे/मुझे सैकड़ा करते आये
मेरा दृढ़ विश्वास पिता हैं/मुझमें संबल भरते आये
प्रथम स्लेट पर आड़ी-तिरछी/मैंने जो खींची रेखायें
हाथ पकड़ उन रेखाओं में/स्वर्णिम अक्षर गढ़ते आये
मेरे तो ब्रह्माण्ड पिता हैं/अंश उन्हीं का, मैं सविता हूँ
अडिग हिमालय सदृश पिता हैं/मैं उनसे निकली सरिता हूँ
जिसे यत्न से लिखा उन्होंने/मैं उनकी पहली कविता हूँ

यह स्वाभाविक है कि गरिमा की रचनाओं में स्त्री - विमर्श भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप में मौजूद हो। क्योंकि एक स्त्री के सुख-दुख को स्त्री से ज़्यादा और कोई नहीं समझ सकता है। समझने को तो पुरुष भी समझ सकता है, समझता ही है, परन्तु दूर से। वह स्त्री होकर स्त्री के अंतर्मन तक नहीं पहुँच बना सकता। स्त्री अपने दुःख स्वयं भोगती, सहन करती और फिर भी आगे बढ़ती रहती है-

कई उलझनें खोंप रखी हैं/जूड़े में पिन से
कब उजियारा आयेगा/वह पूछ रही दिन से
तेज़ आँच पर रोज़/उफनते भाव पतीले से
रस्सी पर अरमान पड़े हैं/गीले-सीले से
जली रोटियाँ भारी पड़तीं/जलते जख्मों पर
घर तो रखा सँजोकर/लेकिन मन बिखरा भीतर
काजल, बिंदी, लाली, पल्लू/घाव छिपाते हैं
अभिनय करते होंठ/बिना मतलब मुस्काते हैं
कई झूठ बोले जाते हैं/सखी पड़ोसिन से

पर्यावरण की चिंता आज की प्रमुख वैश्विक चिंता है। विडंबना यह कि ऐसी चिंता के बावजूद उसका निरंतर क्षरण ज़ारी है। यह देखकर अच्छा लगता है और आश्वस्ति भी मिलती है कि गरिमा के नवगीतों में पर्यावरण की चिंताएँ भी अनुस्यूत हैं-

जंगल के ऊँचे पेड़ों में/थे हरियाली के ही मानक
जंगल ने देखा था कब यह/ऊँचाई का रूप भयानक
उसको डर है/कहीं पाँव तक/बढ़ कर आ जाए न मरुस्थल
'कंकरीट हम/तक बढ़ आये'/आज बहुत चिल्लाए जंगल

कैसे/चीख़ों में/तब्दील हुई हैं तानें
कैसे आग बनीं/धरती की/सफल उड़ानें
इस विकास का/वह अंधापन दिखलाएगी
जिसके अंधकार में मानव/हुआ लापता
नदी बची तो/कल सबको यह बतलाएगी
हर दिन यहाँ असभ्य हुई/किस तरह सभ्यता

व्यर्थ इनसे ज़िंदगी की/आस अब रखना
ये हवाएँ आस की/हर श्वास छीनेंगी

भाषा किसी रचनाकार की सबसे बड़ी ताकत होती है। ऐसी ताकत के लिए अंग्रेजी के  ऐसे शब्दों का जो हमारी बोलचाल की भाषा के अंग बन चुके हैं, उनका  गरिमा ने भरपूर उपयोग किया है अपने नवगीतों में। वे इन शब्दों का अपनी भाषा में निवेश करती देखी जा सकती हैं। 'नाम तुम्हारे ही आरक्षित/दिल की विंडो सीट सदा से'(यादों की ट्रेन), 'जितनी देर खींचते सेल्फ़ी/बस उतना ही मुस्काते हैं' (लेमिनेटेड मन), 'हम अपने कंफ़र्ट ज़ोन को/त्यागें कैसे' ( डर लगता है), 'कब हुआ माइक सहारा/सिर्फ़ ब्रेकिंग न्यूज़ की/चाहत रही है/फ़ेम का है गेम सारा' ( शोकगायन पर बधाई), 'फ़ोर लेन पर घायल सपने/

खोजें कहाँ पड़ाव' (सच कितना विद्रूप) जैसे कितने ही पद-बंध इस संग्रह में कवयित्री की भाषा की ताक़त बने हैं।

कहने का आशय यह कि गरिमा सक्सेना के नवगीतों के इस संग्रह में अभिव्यक्ति और सरोकार और काव्यात्मकता तथा रचनात्मकता के इतने सारे पक्ष समाहित हैं कि उन सब पर एक साथ बात इस भूमिका में किया जाना संभव नहीं है। कहना न होगा कि अपने इस दूसरे संग्रह के माध्यम से गरिमा सक्सेना एक महत्वपूर्ण नवगीतकार के रूप में विकसित होती दिखाई देती हैं। 

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नवगीत संग्रह- कोशिशों के पुल, नवगीतकार- गरिमा सक्सेना, समीक्षक- कमलेश भट्ट कमल, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, श्वेतवर्णा प्रकाशन, २१२-ए, सुपर एम आई जी, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट, सेक्टर १९, नोयडा, उत्तर प्रदेश, कवर- हार्डबाउन्ड, पृष्ठ- १४४, मूल्य- रु. २४९, ISBN- 978-81-970289-9-1

बुधवार, 1 जनवरी 2020

है छिपा सूरज कहाँ पर- गरिमा सक्सेना

गीतकार का मन भी एक वृक्ष की तरह होता है, उस पर भी भावनाओं-अनुभूतियों और उनकी शब्दाभिव्यक्तियों के नए-नए रूप जैसे प्रतीकों की नवीनता, बिम्बों की नवीनता और गीतों के आकार का स्वरूप आदि बदलते जाते हैं। यह नव्यता ही गीत को नवगीत की ओर ले जाती है।" नवगीत के उद्भव से अब तक नवगीतकारों के कथ्य और शिल्प में यह बदलाव सहज दृष्टव्य है। गरिमा के नवगीत इस बदलाव के साक्षी हैं। गरिमा के व्यक्तित्व में भाव पक्ष और बुद्धि पक्ष के सहल-सार्थक तालमेल की उपज हैं ये नवगीत। गरिमा के शब्दों में "गीत वही है जो किसी एक ह्रदय से उपजकर हर ह्रदय का स्वर स्वत्: ही बन जाये। अधिक निजी पैन लिए गीत या अत्यधिक क्लिष्ट गीत आमजन के मन तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि उनका संबंध लोक से स्थापित नहीं हो पता है, न ही वे आम जन के लिए उपयोगी हो पते हैं। गीत का विस्तार तभी हो पायेगा जब गीत समाज में वर्तमान की व्याप्तियों को अभिव्यक्त कर पाएंगे और सबकी पीड़ा का आभास कर सकेंगे और गीत का प्रयोजन तब पूर्ण होगा जब न केवल घाव को इंगित करें बल्कि उन घावों पर समाधान का मरहम भी लगाने का प्रयत्न करें। ऐसे में गीत को सामाजिक यथार्थ को समझना होगा, वह भी गीत के शिल्प, लय, गेयता, भाव आदि विशिष्टताओं को बचाते हुए।"

'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत तिमिर से भयाक्रांत नहीं हैं। वे तमस की भयावहता का चित्रण कर रुकते भी नहीं, वे अँधेरे में भटकते भी नहीं अपितु उजास देने या राह तलाशने की कोशिश करते हैं। समाज में व्याप्त असंगति का संकेत संकलन के आरम्भ में ही है-
है बदलता आस में पन्ने कलेंडर
पर छला जाता है बस प्रस्ताव से

ताख पर सिद्धांत
धन की चाह भारी
हो गया है आज
आँगन भी जुआरी

रोज ही गंदला रहा है आँख का जल
स्वार्थ-ईर्ष्या के हुए ठहराव से
प्रतिबद्ध रचनाकारों के नवगीत इस ठहराव के आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि उनकी यह मान्यता है की नवगीत वैषम्य धर्मा है, दिशा दर्शन या पीर-हरण से नवगीत को कुछ लेना-देना नहीं है।

मैं देख पाता हूँ कि मुखपोथी (फेसबुक) पर उदित हो रही नई कलमें ही नहीं नवगीतकारों की प्रतिष्ठित हो रही नई पीढ़ी जिसमें संध्या सिंह, अशोक गीते, मधु प्रधान, मधु प्रसाद, पूर्णिमा वर्मन, जयप्रकाश श्रीवास्तव, बृजमोहन श्रीवास्तव, डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', रामशंकर वर्मा, डॉ. प्रदीप शुक्ल, शीला पाण्डे, डॉ. रंजना गुप्ता, बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार, रविशंकर मिश्र, धीरज श्रीवास्तव, कृष्ण 'शलभ', छाया सक्सेना आदि भी अपने नवगीतों में सांत्वना, सहानुभूति और सामाजिक सरोकारों को सुदृढ़ करने के स्वर घोल रहे हैं। गरिमा के नवगीत 'समाधान के गीत' लिखकर इस पीढ़ी का प्रतिनिधि स्वर बन पाती है-
हरे-भरे जीवन के पत्ते हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें समाधान के गीत
अँधियारे पर कलम चलाकर सूरज नया उगायें
उम्मीदों के पंखों को विस्तृत आकाश थमायें
चलो हाय-तौबा की, डर की आज गिरायें भीत

इन गीतों में सामाजिक वैषम्य को विविध बिम्बों, रूपकों और उपमाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है-
'गाँवों के भी मन-मन अब उग आये हैं शूल /
देख चकित हो रहा बबूल',

बने बिजूके हम सब / वर्षों से चुपचाप ख़डे
रेत हो रही नदियाँ / खोया कल-कल का उल्लास
क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से,
इस सूखे में बीज न पनपे / फिर जीवन से ठना युद्ध है
सुर्ख लावा हो गए हैं / पाँव तपती रेत में
वृद्धाश्रम में माँ बेटे की / राह देखती
हम अधीन हो गए / सफल हो गया नियोजन
धन अर्जित कर सहे जा रहे / निज मूल्यों की मंदी हम
राजमार्ग पर सपने सजते / पगडंडी का घाव हरा है
ओझल मुद्दों को करना है / हंगामा इसलिए जरूरी
राजनीति ने छला हमेशा / नदियों का विश्वास
क्षरित हुई ओज़ोन / बनी भू गरम कड़ाही है
नख से शिख तक है भ्रष्ट तंत्र / रो-रोकर कहते बाबूजी
सदा सियासत करते रहती / समझौंतों की ता-ता-थैया, आदि आदि पंक्तियों में देश-काल को विविध दृष्टियों से निरख-परख कर यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप गयी विसंगतियों का लेखा-जोखा इन नवगीतों के सर्जक की सजगता शब्द-शब्द में निहित है।

गीतों में अंतर्व्याप्त दूसरा तत्व है इन विसंगतियों के प्रति चेतना जागना। प्रथम चरण में विसंगतियों का आकलन तो हो गया यदि उस आकलन पर चिंतन न हो तो आकलन करना उद्देश्यहीन हो जायेगा। ' ढल रहा जो वक़्त / उसकी चाल का स्वर / कह रहा है आगमन का / वक़्त बदतर', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ / मौत का माहौल हैँ', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', कब तलक हम बरगदों की / छाँव में पलते रहेंगे', 'कोहरे की बढ़ गयी हैं टहनियाँ / मौत का माहौल है', 'पोखर-नाले भी करते हैं / अब उसका उपहास', 'जीवन के सच बतलाते हैं दाग पड़े गहरे / मगर बने प्रोफ़ाइल पिक्चर / दाग मुक्त चेहरे', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से', 'धन की कमी कहीं अच्छी थी / मन को मिले अभावों से', 'घायल कंधे, मन है व्याकुल / स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है', 'मैं ही क्यूँ? मेरे हिस्से क्यूँ? / सोचूँ लिखा मुश्किल ढोना', 'नैन मूंदकर बोलबो कब तक / पूजोगे तुम पाहुन को', 'सोच रहे है सुता -भाग्य में / क्यों लिक्खी है सिर्फ रसोई' आदि अभिव्यक्तियाँ केवल विसंगति का शब्दांकन नहीं करतीं उनके प्रति असंतोष को मुखर कर परिवर्तन की चेतना जगाती हैं। गरिमा सक्सेना के नवगीत जिस तीसरे तत्व को मुखर करते हैं वह है विसगंतियों के आकलन से उपजी चेतना को बदलाव में बदलने का आव्हान या विसंगतियों की प्रतिक्रियावत उपजे प्रश्न। इस अंतर्वस्तु को उद्घाटित करती कुछ पंक्तियाँ देखें - 'हरे-भरे जीवन के पत्ते / हुए जा रहे पीत / आओ हम सब मिलकर गायें / समाधान के गीत', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ?', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', 'कैसे मानें सत्य, ट्रेंड में जब / जुमला है', 'आओ मिलकर आज लगायें / खुशियों की दो-चार फसल', 'कौन लड़ा है किसकी खातिर / खुद ही लड़ना है', चूक गया सूरज गगन का / अब उजाला कौन देगा?' आदि पंक्तियों से पाठक की मन:स्थिति परिवर्तन हेतु तत्पर होने की बनती है।

ये नवगीत आव्हान मात्र को भी पर्याप्त नहीं मानते। वे उपचार और समाधान भी सुझाते हैं- 'जी रहा जो वृहनला का / रूप धरकर / यदि जगे उस पार्थ के / गांडीव का स्वर / तो सुरक्षित हो सकेगा देश अपना / स्वयं पर ही हो रहे पथराव से', 'अँधियारे पर कलम चलकर / सूरज नया उगायें / उम्मीदों के पंखों को / विस्तृत आकाश थमायें / चलो हाय-तौबा की, डर की / आज गिरायें भीत', 'आग खोजें, कँपकँपाती हड्डियाँ', 'ढूँढ़ते हैं / है छिपा सूरज कहाँ पर .... चेतते हैं जड़ों की जकड़न छुड़ाकर ... चीखते हैं / आइए संयम भुलाकर। ... तोड़ते हैं स्वयं पर हावी हुआ डर ...', 'कुहरे का गुब्बारा / छेड़ गयी पिन / चीर निकल आई हैं / किरणें कमसिन ... साहस ने काट लिए पतझड़ के दिन', 'कूकने है लगी कोयल / देख ऋतु मधुमास की', 'हमें हमारी चिंता खुद ही / करनी होगी / कब तक मन का क्रोध रहेगा / सुविधा भोगी', नए वर्ष में जारी रक्खें / उम्मीदों की चहल-पहल', कब तक हम दीपक बालेंगे / हमको सूर्य उगाना होगा' आदि पंक्तियों में गरिमा परिवर्तन की अभिलाष को संकल्प तक ले जाती हैं।

नवगीतकारों की नयी पीढ़ी नवगीतों को 'अरण्य रोदन' मात्र न बनाकर उन्हें मांगलिक परिवर्तन और शुभत्व से जोड़ रहे है। यह स्वर १९८० से २०१० के मध्य जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण' के नवगीतों में था। अब नवगीतकारों की नई पीढ़ी नवगीत का सीमा विस्तार कर उसे विसंगति, विसंगति की प्रतीति, प्रतीति से उपजा आक्रोश और आक्रोश से परिवर्तन के संकल्प तक ले जा रही है। गरिमा सक्सेना के शब्दों में - हवा आज आई है लाल किले से होकर बोल रही है नव विकास का द्वार खुला है यही नहीं गरिमा एक कदम और आगे बढ़कर परिवर्तन असफल न रह जाए, इसके प्रति भी चेताती हैं। संपूर्ण क्रांति और अन्ना आंदोलन की परिणति को देखते हुए गरिमा का यह चिंतन यथार्थवादी ही कहा जायेगा। देखना फिर उग न आएँ नागफनियाँ खेत में इस कृति में वैचारिक दृष्टि से एक और नवाचार है। अन्न का मोल रुपये से नहीं चुकाया जा सकता। वास्तव में रूपया ममता, शिक्षा, स्नेह, श्रम, त्याग, समर्पण किसी का मोल नहीं चुका सकता। नहीं अन्न का मोल रुपैया अन्न बड़ी मेहनत से उगता इसे उगाने की खातिर ही कोई धूप, शीत सब सहता कथ्य में नवता के साथ इस संकलन के नवगीत भाषिक दृष्टी से सटीक शब्दों का चयन कर रचे गए हैं।

गरिमा की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा उन्हें प्रचुरशब्द संपदा और सांस्कारिक भाषा संपन्न बनाती है , यह समृद्धि नवगीतों में झलकती है। 'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत छंद वैविध्य की दृष्टि से प्रयोगधर्मिता कम है। पारंपरिक छंदों का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। सामान्यत: चार पंक्तियों के तीन अंतरों का प्रयोग कर गीत रचे गए हैं। मुखड़े में २ से ५ पंक्तियों का प्रयोग है। मात्रिक छंदों पर आधृत इन गीतों में लयबढ़ता और गेयता चारुत्व वृद्धि करती है। छंद वैविध्य ने इन नवगीतों की सरसता वृद्धि की है। कुछ उदाहरण देखें- सरसी छंद हरे-भरे जीवन के पत्ते, हुए जा रहे पीत आओ हम सब मिलकर गायें समाधान के गीत पादाकुलक छंद अम्मा आँखों के स्याही से नया नहीं कुछ लिख पाती हैं विष्णुपद छंद जहाँ कभी थीं हरसिंगार की टेसू की बातें चम्पा, बेली के संग कटतीं थीं प्यारी रातें अवतारी जातीय छंद सदियों तक जो शक्ति रही है जन जीवन की तट को सींचा, प्यास बुझाई जिसने तन की चौपाई छंद सुता किसी की ब्याह योग्य है कहीं बीज का कर्जा भरी जुआ किसानी हुआ गाँव में मदद नहीं कोई सरकारी सर्व विदित है कि चन्द्रमा में भी दाग होते हैं। ''है छिपा सूरज कहीं पर'' में क्रिया रूपों में समरूपता नहीं है। यथा - गायें पृष्ठ ३३, वर्जनाएँ पृष्ठ ४६, आई पृष्ठ ४७ , आयी पृष्ठ ७५, भायी पृष्ठ ४९, हुए पृष्ठ ५५ , गए पृष्ठ ५९, नई पृष्ठ ५१, तुरपाई पृष्ठ ६८, बुझायी पृष्ठ ७० आदि। अशुद्ध शब्द प्रयोग दुक्ख पृष्ठ ८२, रक्खें ८५। लिंग दोष - ऊपर से शिक्षा ऋण का / युवकों को गड़ती पिन।

दोहा संग्रह 'दिखते नहीं निशान' के पश्चात् यह गरिमा सक्सेना की दूसरी प्रकाशित कृति है। 'है छिपा सूरज कहीं पर' के नवगीत उनकी कारयित्री प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। यह कृति नवगीत में नवाचार की दृष्टी से महत्वपूर्ण है और नवगीत के नव आयामों में ले जाने में सक्षम है। गरिमा के अगले नवगीत संग्रह की प्रतीक्षा की जाएगी।
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गीत नवगीत संग्रह- है छिपा सूरज कहाँ पर- गरिमा सक्सेना, प्रकाशक-बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा। लि. नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, मूल्य- रु. २००, पृष्ठ- १३६ , समीक्षा- आचार्य संजीव वर्मा सलिल, आईएसबीएन क्रमांक-९७८९३८८९४६१७९