शुक्रवार, 29 मई 2026

चारों ओर कुहासा है- रघुवीर शर्मा

चारों ओर कुहासा है श्री रघुवीर शर्मा के ५३ गीतों का संग्रह है। वे ऐसे कवि हैं, जिनकी चेतना गहरे अनुभवों को पकड़ने में सक्षम है।  इसका प्रमाण है उनके गीत-संग्रह “चारों ओर कुहासा है” के जीवन-ऊष्मा से स्पंदित गीत। उदाहरण के लिए, एक ही छंद में अतीत और वर्तमान की बदली हुई संस्कृति का साक्षात्कार कराती हुई ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं— ‘अब सूरज को अर्घ्य चढ़ाते / बूढ़े हाथ नहीं हैं / आँगन की तुलसी मुरझाई / इतनी धूप सही है / भूल गये वे पावन स्वर / गीत ऋचाओं वाले.../’

अब हमारे हाथों में जो पोथियाँ हैं, वे हमें ज्ञान नहीं देतीं, संस्कार नहीं देतीं, हमें सिर्फ संताप से ही भरती हैं। ये नई पोथियाँ क्या हैं? यदि इस शब्दबंध के भीतर का अनुनाद हम सुन सकें, तो यह हमारी वर्तमान संस्कार-रहित शिक्षा व्यवस्था की ओर संकेत करती हुई भी सुनाई एवं दिखाई देगी— ‘कौन दे गया अपने हाथों में / यह पोथी नई-नई / बाँच रहे जिसमें हम / अपने दिन संतापों वाले / बीत गये वे उत्सव के दिन / हल्दी छापों वाले।‘

कवि ने इन बदले हुए हालात के लिए किन्हीं दूसरे लोगों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है, बल्कि आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित किया है। सच्चाई भी यही है कि मनुष्य अपनी ही गलतियों की सज़ा पा रहा है। वह वास्तविकता के धरातल पर अपनी मनुष्य जाति से संवाद करता है— ‘हमने अपने आस-पास बस / बेर-बबूल ही पाले / जो बोया था, उसे काटते, डर लगता है / घर अपना क्या / भूत-प्रेत का घर लगता है / इधर-उधर भटके पर / अब थक, हार गये हैं।/’

यहाँ भी 'बेर-बबूल' शब्द एक गहरे सत्य का प्रतीक है, जिसका प्राण ‘बेर‘ शब्द में समाहित है। काव्य-सत्य अपने जिन बिंबों में सफलतापूर्वक अभिव्यक्त होता है, उन बिंबों की एक समृद्ध सृष्टि रचने में रघुवीर शर्मा ने अपूर्व कौशल का परिचय दिया है। उदाहरण के लिए, ऐसे बिंबों की एक झलक देख लेना भी ज़रूरी है— 'चुपके-चुपके / पूजा घर से / गंगा-झारी चली गयी / पीठ पर लादे / गठरी सरीखे दिन / इकहरी-सी छाँव / जमींदार की बाखल / भीतर वाली साँकल / मन मारीच / मुखर कौवे / बेर-बबूल / कागज-पत्तर का सपना / आश्वासन की जलकुंभी / जंग लगी खिड़की / बाहर हँसता विज्ञापन / गिद्धराज के वंशज / रक्तिम बलिदानी फर्ज / रोटी का सपना बुनते वह धागा टूटा है / परियों वाले मन / गूँगी भाषा / धूप के उजले श्रृंगार / शातिर मछेरे / कागज की नाव / गमलों में बरगद / पीहर की आशा’

यह फेहरिस्त काफी बड़ी हो सकती है, किंतु यहाँ केवल कुछ उदाहरण ही दिए जा सकते हैं, जिनके माध्यम से हम रघुवीर शर्मा के चमत्कृत कर देने वाले समृद्ध बिंब-विधान की एक झलक भर दिखला सकें। इस फेहरिस्त में 'धूप के उजले श्रृंगार' जैसा मूल्यवान और अछूता बिंब यदि क्वार के मीठे दिनों में हमारी ग्राम्य श्रम-संस्कृति से आया है, तो वे 'जमींदार की बाखल' और 'भीतर की साँकल' जैसे बिंबों में निर्धन और मेहनतकश लोगों के अंतहीन शोषण-केंद्र को ही सांकेतिक किंतु सुस्पष्ट तरीके से उजागर करने में सफल हुए हैं। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात, जो वे रेखांकित करना नहीं भूलते, वह है इस निर्धन जनता का स्वाभिमान— ‘हम रात-रात भर / जाग-जाग कर / अपने अँधियारों से लड़ते हैं / दुःख पाँवों में बाँधे / नाच-नाच कर / अपनी नई सुबह गढ़ते हैं'

शोषक की अंतहीन शृंखला को उजागर करने के लिए वे 'गिद्धराज के वंशज' जैसा अचूक बिंब लाते हैं, तो मनुष्यता की खंडित प्रतिमाओं की खोई हुई सुंदरता का शोक भी करते हैं। वे आज़ादी के बाद आई देश की पीढ़ी को सचेत करते हैं कि— 'कसी हुई मुट्ठी से फिसले संकल्प / सूख गये स्वप्नों के प्यासे विकल्प /’ वे आगाह भी करते हैं कि— 
'पथ है जहरीले / नाग भरे / हम हैं भीतर तक आग भरे।'

रघुवीर शर्मा के गीतों में जो अपनी परंपरा से कटने और अपने इतिहास से विच्छिन्न होने की मार्मिक पीड़ा है, वह उनके गीतों को मूल्यवान बनाती है। सच तो यह है कि हमारे विकास की कीमत जो लोग चुकाते हैं, बहुधा वही अलक्षित रह जाते हैं। नर्मदा के विराट बाँध से आने वाले विकास ने हरसूद जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उस नगर को डूब के आगोश में समो लिया था, जो रघुवीर शर्मा और उनकी तरह हज़ारों लोगों के सपनों का नगर था। इस डूब की विभीषिका से कंपित हृदय से कवि ने जीवन के अनेक मार्मिक सत्यों का साक्षात्कार किया है, जो उनके गीतों में हमेशा के लिए अंकित इतिहास का सच बन गया है।

अपने इतिहास से विच्छिन्न होने की पीड़ा क्या होती है, इसे इन पंक्तियों में महसूस किया जा सकता है— ‘डूब गयी पुरखों की माटी / बचपन की पहचान / हँसी-ठिठोली चौराहों की / अधरों की मुस्कान / संबंधों में गर्माहट का जरिया डूब गया / क्या बतलायें भैया अपना / क्या-क्या डूब गया / त्योहारों की गहमा-गहमी / अपनेपन की भाषा / डूब गए सावन के झूले / और पीहर की आशा / सुख के साथी मिले किन्तु / दुःख का हरिया डूब गया।‘

औद्योगिक क्रांति से आरंभ हुआ गाँवों का उजड़ना और बढ़ते हुए शहरीकरण का प्रभाव आज भी थमा नहीं है। गाँव की खाटी माटी से जिनकी जड़ें भीतर तक धँसी हुई हैं, ऐसे कवि के लिए इस सच का साक्षात्कार करना स्वाभाविक ही है— ‘एक दर्द रिसता है पाँव में / रोज शहर आता है गाँव में / हरिया के खेत में उगे कारखाने / अपने ही अपनों को / तुले हैं मिटाने'

कवि की यह पीड़ा भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि आज़ादी से पूर्व तो विदेशी शक्तियों ने इन गाँवों को पददलित किया था, परंतु आज़ादी मिलने के बाद भी हालात नहीं बदले। पहले तो गैरों ने लूटा था, अब अपने ही हमें मिटाने पर आमादा हैं— ‘अपने ही अपनों को तुले हैं मिटाने / भूल गये रिश्ते सभी कौवों की काँव में / एक दर्द रिसता है पाँव में / रोज शहर आता है गाँव में'। कवि की चिंता है कि— ‘जिसको छू हवा / गंध से आँगन भर देती / जिससे छन-छन धूप चाँदनी का सुख देती / क्या अब भी झरते फूलों का / वही असर होगा।‘

यह चिंता है हवाओं में निरंतर बढ़ते हुए विषैले प्रदूषण की। प्रदूषित हवाओं ने हमारे गुलमोहर, हमारी धूप, हमारी चाँदनी—किसी को वैसा नहीं रहने दिया, जैसा जीवन में कभी था। अब एक बीहड़ भटकाव है; हर आदमी भटकते-भटकते बंजारा हो गया है। अब तो इतना भी याद नहीं कि रोटी और रोज़गार के पीछे भटकते हुए इस बंजारे का कभी कोई कहीं घर भी था या नहीं— ‘जाने कौन घड़ी में / उसका संग छूटा है / रोटी का सपना बुनते / वह धागा टूटा है / याद नहीं बंजारे का भी कोई घर होगा / पता नहीं किस हाल में / अब गुलमोहर होगा।'

अपने विकराल समकाल की विभीषिकाओं से जूझते हुए स्वाभाविक है कि मनुष्य की हिम्मत टूटने लगे, किंतु कवि की दृष्टि की विशेषता यह है कि वह हर कहीं अपनी जीवन-आस्था के अनुरूप कोई न कोई दृश्य देख ही लेता है, जो उसकी आस्था को मरने नहीं देता। वह घोंसला बुनती हुई एक चिड़िया को भी देखता है, तो उसमें भी सृजन के नैरंतर्य (निरंतरता) का रहस्य ढूँढ़ लेता है कि हर हाल में सर्जना जारी रहती है; कोई तूफान कभी किसी सृजन को रोक नहीं सकता— ‘तूफानों से निकल चिरैया / तिनके बीन रही है।' ऐसे समय एक ईमानदार और जीवन-आस्था से लबरेज़ कवि यही सलाह देता है कि— ‘अपनी पीड़ा / अपने आँसू / अपने अंगारे / अपना फलक उड़ाने अपनी / अपने चाँद-सितारे / लाल तूस में कहीं बाँध कर / इनको रख दो भोले'

रूपक का एक बहुत अच्छा उदाहरण रघुवीर शर्मा प्रस्तुत करते हैं, जिसके माध्यम से वे कहना चाहते हैं कि सच के जो नातेदार हैं, वे जन्मजात अंधे-गूँगे या बहरे नहीं हो सकते, भले ही परिस्थितिवश ऐसा प्रतीत होता हो। इनको अंधा, बहरा या गूँगा बनाने का एक बड़ा षड्यंत्र समाज और राज-व्यवस्था के पर्दों के पीछे रचा जाता है। यहाँ सच की हर आहट पर पहरे हैं— ‘हर आहट पर पहरे / सच के रिश्तेदार अंधे, गूँगे, बहरे / या फिर - खंजर ले कर निकला दिन / पीछा करती रात / इस भगदड़ में छूट गया उजियारे का हाथ'

'हर आहट पर पहरे हैं' शीर्षक का यह गीत अपने आप में ही नवगीत में रचा हुआ एक ऐसा ही काव्य-रूपक है, जिसे शायद नवगीत के संसार का एक मूल्यवान उदाहरण भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

कवि की चेतना का यह सुग्राही रडार कितना सक्रिय और कितना जाग्रत है, यह देखने के लिए उनके द्वारा पकड़े गए कतिपय बिंबों का अवलोकन किया जाना चाहिए, जो छोटी-छोटी माइक्रो-फ़िल्म जैसे हैं—जिसमें एक दृश्यबंध है कि 'कस्तूरी महक खोती जा रही है / जहरीला धुँआ है छाया हुआ; जिसमें धीरे-धीरे हवाओं की गंध बदल गयी है।' ऐसे में वे हमें एक गुमसुम बरगद दिखाते हैं, जिस पर एक चिड़िया चुपचाप बैठी है और कौवे बकबक कर रहे हैं। यह पूरा दृश्य एक लघु फ़िल्म की तरह गढ़ा गया है, जिसमें आप किसी षड्यंत्र को सूँघ सकते हैं, नियति को घटित होते हुए देख सकते हैं। इसमें आप पेड़ों, पक्षियों, जंगल, हवाओं और फूलों के ही नहीं, बल्कि पूरी कुदरत के भी बदलते हुए मूड्स महसूस कर सकते हैं कि वह खुश है या गुमसुम... नियति के रूप में संभावित खतरों का भी यहाँ आप अनुमान कर लेते हैं, जो अभी परिदृश्य में आए तक नहीं हैं— ‘गुमसुम बरगद, मौन चिरैया / कौवे मुखर हुए / इस मधुवन में कुटिल हादसे / क्या-क्या गुजर गये/' (धीरे-धीरे बदल गई है गंध हवाओं की)

इस गीत में पूरी तरह से सिनेमैटोग्राफी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें कलम को एक मोशन कैमरे की तरह उपयोग किया गया है। एक लघु फ़िल्म की तरह इसमें भी रंग और प्रकाश के माध्यम से एक दृश्य में ही पूरी कहानी कह दी गयी है। कहना न होगा कि रघुवीर शर्मा बिंब-विधान के मामले में संभावनाओं से भरे हुए गीतकार हैं।

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नवगीत संग्रह- चारों ओर कुहासा है, नवगीतकार- रघुवीर शर्मा, परिचय- गोविन्द गुंजन- प्रकाशक- शिवना प्रकाशन पी. सी. लैब सम्राट काॅम्पलैक्स बेसमेंट बस स्टैंड सीहोर म.प्र.466001,  कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- ७६, मूल्य- रु. १५०,
 ISBN--978-93-87310-32-2