चक्रव्यूह में, फँसे हुए सब / हुआ अँधेरा है / हाथ साँप के दे बंदूकें / गया सपेरा है। ..
कहना न होगा, आज जगत की परिस्थितियाँ कितनी दुरूह हो गयी हैं, जहाँ किसी मत या वाद से प्रभावित वर्ग अपनी मान्यताओं के कारण जघन्य हिंसा को अपनाने से गुरेज नहीं करता। या फिर,
निकले सूरज लेकर हरदिन / लाठी डंडे हाथ / वक्त जरूरत रखे चंद्रिका / एक तमंचा साथ / ... / आत्म सुरक्षा की खातिर अब / करे नहीं फरियाद..
अशोक रक्ताले सामाजिक, आर्थिक, पारिस्थिक रूप से ऊहापोह और निरुपायता में किंकर्तव्यविमूढ़ हुए समाज की खौंझ को बूझ लेने का हंगामा नहीं करते, उसे यथाशक्ति प्रस्तुत कर उत्तरदायी व्यवस्था और प्रणाली को सचेत करते हुए दायित्वबोध से भरे दीखते हैं। इस क्रम में कुछ और पद्यांश उदाहरण के तौर पर देखा जाना उचित होगा। इन प्रस्तुतियों के अन्वर्थ किसी सत्ता को, कहीं की सत्ता को, झकझोर कर पूछने में विश्वास रखते हैं।
उच्च शिखर से निचले तल तक / आते-आते खोये / ... / टूटे सपने जब आँखों में / पलकें रहे भिगोये। / ... / उतरे एक न तल भी थे जब / जहर हवा में घोला / लगा झाँकने था कुछ तब तक / भीतर वाला चोला / उठी रोज ही जलती-बुझती / क्षण-क्षण पर चिंगारी / और शोर था जैसे कोई / चलती खच-खच आरी / भावुकता के कीट घिनौने / फफक-फफक सब रोये
या फिर,
तितली के पंखों पर देखा / ढेरों क्विंटल भार / ... / होंठ सिली पंखुड़ियों ने था / खूब मचाया शोर / नयी हवा के संग उछलते / काँटे निपट कठोर / ... / शातिर नभ ने आँख फेर की / बातें लच्छेदार..
इन्हें भी देखा जाना उचित होगा -
झुण्ड-झुण्ड हो गये टूटकर / हर दल में / खदबद दाल की / महिमा देखो काल की / ... / खून-खून का रंग मिलाकर / क्यों खुद को बीमार करो / सच्चाई का गला दबाकर / क्यों झूठा व्यवहार करो / खरबूजे-सी हँसी होंठ पर / श्वासों में है चिंगारी / गले लगाकर छुरा घोंपना / लगती है उनकी यारी..
बिम्बों के हिसाब से ताजा तथा अभिव्यक्ति के हिसाब से परिष्कृत रचना ही लोक-मनस ही नहीं, साहित्य में भी स्थान बना पाती है। पारम्परिक गीतों से गीतों के इस नए स्वरूप की पहचान आज के वातावरण को साधने के क्रम में हुई है। कहना न होगा, आज गीत हर उस प्रतिवाद का प्रत्युत्तर बन कर सामने आये है, जिसके अंतर्गत गीत की विधा को ही धता बताना साहित्यकर्म समझ लिया गया था। गीतों की विशिष्टता को उसकी सीमा समझने के कारण, उनको न साध पाने की संकीर्णता के कारण, जो टिप्पणियाँ की जाती रही थीं, यथा गीत भावाभिव्यक्ति के मृत स्वरूप हैं आदि-आदि, का आज के गीत ने करारा प्रतिकार किया है। ऐसे ही गीत नवगीत की संज्ञा के साथ प्रतिष्ठित हुए हैं और जटिल जीवनानुभूतियों को समग्रता में कहीं अधिक सम्प्रेषणीयता के साथ अभिव्यक्त करते हुए दिखते हैं।
जहाँ अनुभूति-संप्रेषण में प्रयुक्त छन्द, लय, तान, शैली, तथा संवेदना-संप्रेषण में नव्यता हो, नवगीत संभव हो जाता है। गीत के कलेवर में सोच को प्रस्तुत करने में अपनायी गयी शिल्पगत नव्यता को समझने तथा निखारने के लिए जिस अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है, वही नवगीतकारों को विशिष्ट रूप से श्रेणीबद्ध करती है। ऐसा विशिष्ट संप्रेषण ही नवगीतकारों को सामान्य गीतकारों से अलग करता है। गीत में गेयता उसकी प्रमुख शर्त होती है। यह शर्त नवगीतों के संदर्भ में भी एक मान्य बिन्दु की तरह सामने आती है। हालाँकि कई बार शब्द-चातुर्य, क्लिष्ट भाव-अभिव्यंजनाओं तथा गहन वैचारिकता के कारण यही गेयता प्रभावित भी होती रही है। किन्तु, ऐसा कोई समझौता मुख्य रूप से रचनाकारों की अक्षमता के कारण ही हुआ करता है। नवगीतों का मुख्य स्वर जटिल भावों की सहज अभिव्यक्ति होता है। नवगीत अभिव्यक्ति के तरीके से ही विशिष्ट बन कर स्वयं को सामान्य गीतों से अलग करता है। मैं संग्रह के एक गीत से इस तथ्य को सामने रखना चाहूँगा, जहाँ जटिल बिम्ब के निर्वहन का प्रयास हुआ है किन्तु गेयता से किसी तरह का समझौता मान्य नहीं है -
गौरैया क्यूँ हुई अभागी / बोलो रे भाई / ... / सावन फागुन सूना-सूना / ताप बढ़ा सूरज का दूना / नदिया सूखी फिर से खोजे / अपनी तरुणाई / ... / तेंदू महुआ चार बहेड़ा / पगडंडी-पथ टेढ़ा-मेढ़ा / लुप्त हो गए कहो कहाँ सब / किसने फूँकी राई?
इस क्रम में इस तथ्य को विशेष रूप से कहना है कि नवगीत की बुनावट कई स्थापित बिन्दुओं पर निर्भर करती है। जिसमें वैयक्तिक भावनाओं या गलदश्रु भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। जबकि कवि कोई हो, कहीं का हो, अपने अर्जित अनुभव को ही अभिव्यक्त कर उसे व्यापक बनाता है। इस हिसाब से ऐसी कोई मान्यता क्या सेल्फ-कण्ट्राडिक्टरी नहीं? इस ऊहापोह से अशोक रक्ताले कहीं निर्लिप्त हैं –
शान्त है जमीन और / शान्त आसमान / ... / पल-पल पर टूट रहा / धैर्य का मकान / तीव्र हुआ दृष्टि का / और कदमताल / ... / साँझ हुई लटक गये / फूलों के गाल / आँगन की देह हुई / लाल लाल लाल।
या फिर,
दिल की हर धड़कन पर छाया / कुदरत ने जो जाल बिछाया / सिमट गया है हर एक लम्हा / ... / याद दिलाता अनगढ़ बंधन / पगडण्डी का यह सूनापन
नवगीत ही क्या कविता की किसी भी विधा में कथ्य विशेष का निषेध नहीं होना चाहिए। सदियों से भारतीय समाज में उत्सवधर्मिता ने जनमानस को दैन्य अस्वस्था में भी सुकून के पल दिये हैं, मिलबैठ कर सुख-दुख बतियाने, बाँटने के अवसर प्रदान किए हैं। यह उत्सवधर्मिता ही है, जिसने स्वदेशी-विदेशी दमन, शोषण, दैनिक जीवन में अभाव और दैन्यावस्था के बावजूद अपने-परायों की खून की नदियाँ बहाने से रोके रखा। त्यौहारों का क्रेज आज भी विशिष्ट के बरअक्स आम जन में अधिक है। तब गीति-प्रस्तुतियों में यह मुखर क्यों नहीं होनी चाहिए ? इससे किसी परिवार का सम्मिलित न होना विषाद के पल प्रस्तुत करेगा ही –
दीप-दीवाली खील-बतासे / क्या जाने लक्ष्मी पूजन / बिन फूलझड़ी के रूठ गया / नन्हा-सा प्यारा बचपन / ... / बीच द्वार के आ बैठा है / मार रहा सर चौखट पर / कौन सुने जब दीप नहीं है / बिन बाती भी दीवट पर / ... / कोई कंघी तेल नहीं है / क्या जाने टिकसा उबटन?
किंतु, इसी संदर्भ में ऎक अभिव्यक्ति से झाँकता व्यंग्य कैसे अलोत हो सकता है? - आगे अब ये और न होगा, कहकर इतना ख़ुशी मनाओ / नया वर्ष है नाचो गाओ / ... / निर्धन को अनुदान मिलेगा / वृद्धों को सम्मान मिलेगा / नहीं आज तो कल ये होगा / होगा, होगा रटते जाओ / नया वर्ष है नाचो गाओ
इसका अर्थ यही हुआ, कि अशोक रक्ताले के गीत/ नवगीत व्यक्तिपरक भावबोध को सम्मान देते हुए भी वस्तुपरक और सामाजिक भावबोध से अधिक जुडे हैं। नवगीत की वर्तमान यात्रा में कुंठा व निराशा को सकारात्मक व आशावादिता की ओर अग्रसर रहने की ललक है। इसकी भाषा में दुरूहता के स्थानपर जनसामान्य की लयात्मक, रागात्मक भावोद्रेकता है। तात्पर्य यही है कि जन की सोच और उसकी अभिव्यक्ति चीत्कार मात्र तक ही सीमित नहीं है। यथार्थ के नग्नचित्रण के साथ निराकरण के संदेश भी देने में अशोक रक्ताले के गीत, नवगीत सक्षम हैं। अन्यथा, ऐसे में यह प्रश्न नितांत प्रासंगिक लगता है, कि यदि नवगीत में केवल और केवल आभाव, पीड़ा और दर्द हो तो क्या वह शोकगीत ही न होगा? अशोक रक्ताले निर्द्वंद्व कह उठते हैं –
शेष पवन में नमी बची है / अभी न खोना धीर / ... / दूषित होते इस परिमल से / कम्पित करती उथल-पुथल से / निकल भावनाओं के जल से / सम्मुख है अब तीर..
वस्तुतः, जहाँ मतभिन्नता की अभिव्यक्ति कर्कश हो, विवाद की संभावना वहीं बनती है। ऐसे में, गीत संभव हो ही नहीं सकते। गीत, जो कि नवगीतों के शिल्प का मूलाधार हैं, सनातन सरस माध्यम हैं। नवगीतों में बौद्धिक अभिसार ही नहीं, मन की साधना भी दृष्टिगत होती है। अनुभूतिजन्य भावनाएँ सरस निवेदन के साथ शाब्दिक होती हैं तो वह गीत का रूप अपना लेती हैं। नवगीत तो विद्रूपताओं को भी सरसता के साथ प्रस्तुत करने के माध्यम की तरह सामने आते हैं –
नंगे पैरों के छाले भी / इनकी पीर बढ़ाएँगे / और विषैला नाग डँसा तो / सारे मारे जाएँगे / समझ-बूझ खतरों पर सारे / देखो हुआ सवार गया..
या फिर,
सिन्धोरे का मान गया / संतानों ने सहा कहर / दग्ध चिताओं की चिनगी / छत पर आयी ठहर-ठहर / दैनंदिन सब हो गयीं / खुशियाँ नष्ट समूल ..
चूँकि, गीत मानवीय भावनाओं का सस्वर प्रस्फुटीकरण हैं, इसी गुण को यथावत नवगीत ने भी अपनाया है। उपर्युक्त तथ्य को समझने के लिए अशोक रक्ताले के इस नजरिये को देखना समीचीन होगा –
मिली किसी को नौकरी / गई किसी की छीन / शिक्षक की भी बिक गई / रातों-रात जमीन / महँगाई बीमारियाँ / बजा रहीं हैं बीन / अच्छे-अच्छे हो गये,समय बदलते दीन / ... / पढ़ा-लिखा भी बैठकर, बजा रहा है गाल..
और, भौंक रहे हैं श्वान गली में / नर ख़ामोश खड़े / खुले नयन से देख रहे हैं / चिकने सभी घड़े / कैसी कटुताई है / ... / चुभते सन्नाटे में / हर आवाज समायी है / कितनी तन्हाई है..
आश्चर्य नहीं, यदि कोई यह सोच बैठे कि इन पंक्तियों का रचनाकार प्रगति का विरोधी है ! किन्तु बात ऐसी नहीं है। परम्परा निर्वहन की सार्थकता और विकास के नाम पर जड़ से कटते चले जाने की दुर्दशा दोनों के बीच सामंजस्य बिठाने को इंगित करती हुई भावाभिव्यक्तियाँ हैं ये ! ऐसे ही विमर्शों के लिए तो नवगीत वातावरण उपलब्ध कराते हैं। अशोक रक्ताले इसी तथ्य को उभारते हुए कहते भी हैं - छान रहे इस घर की माटी / उसके घर की धूप में / .. / खुद से ही टकराव हुआ तो / आयी उसकी याद है / इस जीवन में सबसे उत्तम / आस्था की ही खाद है / यही भरोसा सदा गिराता / ले जा अन्धे-कूप में..
या फिर,
है नहीं कुछ शेष / इस बेजान तन में / व्यर्थ है अब देर करना भी दफन में / जब्त कर गम रात दिन,खुद को छलोगे / ... / बुझ गया वह दीप / जिससे रौशनी थी / आस की जगमग दमकती चाँदनी थी / तम घिरा है अब, कहाँ तक तुम जलोगे?
ऐसा नहीं है कि रचनाकर्म में नएपन का ऐसा कोई आह्वान साहित्य-जगत में कोई अद्वितीय घटना है। हर काल में हर रचनाकार अपनी रचनाओं में बिम्बात्मक प्रयोग करता रहा है। या प्रस्तुतीकरण के हिसाब से नए तत्त्वों का समावेश करता रहा है। हर रचनाकार के लिए उसकी सर्जन-यात्रा को गतिमान रखने हेतु नवीनता आवश्यक हुआ करती है। कवि-कर्म सदा से इस नवता का विशेष आग्रही हुआ करता है। प्रत्येक युग में, ’नव’ उपसर्ग शब्द भले न लगाया जाता हो, प्रस्तुतियों को कोई उपयुक्त शीर्षक अवश्य दिया जाता रहा है। अलबत्ता, इस बार गीतों के साथ ’नव’ शब्द वैधानिक रूप से जुड़ा है। सुखद परिणाम यह हुआ है कि आगे यही नवगीत समग्र जीवनानुभूतियों को अभिव्यक्त करने में सक्षम साबित हुये। क्यों कि इनका फलक विस्तृत हो चुका है। अशोक रक्ताले ने इस तथ्य को सहज ही स्वीकार किया है –
निकल झोपडी के झक्कड़ से / चूम गगन लहराते / सिरे बाँध चन्दा के अपनी ग्रीवा में लटकाते / हम भी कुछ सुख पाते / ... / देता जगमग धवल चाँदनी / दर रोशन हो जाता / क्यों भग्गू का बूढ़ा बापू / पग-पग ठोकर खाता / ... / लिख दी तूने उबड़-खाबड़ / किस्मत उपरवाले / ... / हाथ तपाती नित्य अँगीठी / पैरों में हैं छाले
अशोक रक्ताले नवगीत को अपने आप में संपृक्त विधा न मान कर गीतात्मक अभिव्यक्ति का ही आज के संदर्भ में एक प्रासंगिक माध्यम मानते हैं। वर्तमान के बिम्बों का सहज प्रयोग तथा भाषायी विन्यास में आधुनिक व्यंजनाएँ इन्हें नयापन अवश्य देती हैं। किन्तु, इन्हें मात्रिक या लय के अनुसार सधा होना उतना ही आवश्यक है। इसके लगातार सधे होने तथा उसी अनुरूप स्वस्थ सर्जन हेतु विचार-विमर्श आवश्यक है –
फूलों ने कुछ गीत सुनाए / कलियों ने आभार किया / ... / मेरे मन की सोन चिरैया / तुमने जब शृंगार किया / ... / लगीं नाचने तेज हवाएँ / काले बादल घिर आए।
अशोक रक्ताले उन गीतकारों की तरह नहीं हैं, जो शैल्पिक चातुर्य से सर्जनकर्म में प्रवृत रहते हैं। एक विन्दु जो सर्वमान्य है वह यह है, कि नवगीतों में बिम्ब या प्रतीक ठूँसे नहीं जाने चाहिए। इसकी हामी अशोक रक्ताले मुखर हो कर भरते हैं। भिन्न भावभूमि, भिन्न परिवेश, भिन्न पारिवेशिक संस्कार तथा भिन्न शिल्पगत विशेषताएँ, ये सब मिल कर ही नवगीतों के व्यवहार का कारण बनती हैं। कोई रचना या आधुनिक गीत तभी ग्राह्य नवगीत बन पाता है, जब उसकी भावाभिव्यक्ति में अनुभूतिजन्य नवीनता हो –
हुई रौशनी दूर-दूर तक / रातें फिर भी काली हैं / कुछ दीपों में तेल भरा है / कई अभी तक खाली हैं / ... / कितनी कोशिश करके देखी / कितने जाल हटाए हैं।
कुल मिला कर अशोक रक्ताले के शब्दों से समझा जाये तो नवगीत में एक ओर उत्सवधर्मिता का विस्तृत संसार है, तो दूसरी ओर जनमानस की पीड़ा का गहरा संवेदन है। साथ ही धैर्य और विरक्ति की ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को हर मुश्किल से निकाल ले जाती है। नवगीत में आशावादिता की वह सुनहरी किरण भी है जो भारतीय दर्शन का मूल सूत्र है।
खरगोशों के तेवर देखो / टूट पड़े बन बाज / ... / कुंठित मन पर पुतवा आये / सारे पक्के रंग / मंदिर के खम्भों पर लिपट / लाखों लाख भुजंग / ... / छलनी है, पर नहीं टपकता / देख गिराऊ छाज
प्रस्तुत संग्रह ’चल रही गूंगी हवाएँ’ अशोक रक्ताले के तेवर नहीं, उनके दायित्वबोध के लिए जाना जाना चाहिए। शिल्प के निर्वहन के प्रति सदा आग्रही रहे अशोक रक्ताले की भावाभिव्यक्ति और उनके कथ्य कई तथ्यों को समेटे चलते हैं, जहाँ वैचारिकता राजनैतिक सोच में ढुलमुलपन के कारण प्रभावित होती भी है, तो नहीं होती। कारण कि, रचनाओं में सामाजिक आक्रोश की ओट के चलते ये बिन्दु विशिष्ट बन कर उभर पाते हैं। इन बिन्दुओं के सापेक्ष ही संग्रह की रचनाओं का पाठ उचित भी होगा। मैं अशोक रक्ताले की रचनात्मक दृष्टि के प्रति आश्वस्त हूँ तथा इस संग्रह ’चल रही गूंगी हवाएँ’ की सफलता की हृदयतल से कामना करता हूँ।
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नवगीत संग्रह- चल रही गूँगी हवाएँ, नवगीतकार- अशोक रक्ताले रवीन्द्र, परिचय- सौरभ पाण्डेय, प्रकाशक- अक्षर विन्यास, एफ-6/3, ऋषि नगर, उज्जैन, मध्य प्रदेश, पिन- 456010, कवर- सजिल्द, पृष्ठ- , मूल्य- रु. ४००,
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