गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

न बहुरे लोक के दिन- अनामिका सिंह

गीत आदिकाल से ही हमारी चेतना में साँस लेता रहा है। हमारे सम्पूर्ण जीवन में कदम-कदम पर गीत उपस्थित है। आदमी को आदमी बनाए रखने के लिए गीत ने हर युग में कठिन संघर्ष किया है। आदमी होने के इन्हीं मूल्यों को बचाए रखने की गीत की यह ज़िद आज भी बरकरार है। हाँ, समय के परिवर्तनों के साथ जैसे-जैसे हम बदले, हमारे जीने के तौर-तरीके बदले, गीत भी बदला। गीत की इस समूची यात्रा मे जो सबसे खास बात हुई, वह यह कि गीत ने अपने आप को तरोताज़ा बनाए रखने की प्रक्रिया मे कहीं ठहराव नहीं आने दिया। या यूँ कहें कि गीत समय के साथ कदम से कदम मिला कर चलने मे कभी कमजोर नहीं पड़ा। जिन लोगों ने अपने किन्हीं पूर्वाग्रहों के चलते ‘गीत की मौत’ की भविष्यवाणी की थी, आज वे भी गीत की जिजीविषा के प्रति नतमस्तक हैं।  

बदलते वक़्त के तेवरों के साथ गीत को “अगीत, प्रगीत, अनुगीत, जनगीत , नवगीत, समकालीन गीत” .....आदि अनेक नाम भी मिले, जिनमे ‘नवगीत’ या ‘जनगीत’ जैसे एक-दो नाम छोड़ दें, तो कुछ नाम कुछ दूर चलकर, कुछ थोड़ी और दूर चलकर लुप्तप्राय हो गए। हाँ, पिछले कुछ दशकों मे नवगीत ज़रूर गीत का सच्चा प्रतिनिधि बनकर गीत की यात्रा को आगे बढ़ा  रहा है। लोकधर्मी चेतना, युगीन यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति, लिजलिजी भावुकता का परित्याग और जीवन के प्रत्येक संदर्भ को सर्वथा नए ढंग से उकेरता हुआ गीत/नवगीत अपने पारंपरिक खोल से निकलकर समय के साथ संवाद कर रहा है।  

हाल के कुछ वर्षों में हिन्दी नवगीत-लेखन को लेकर जो जागरूकता और सक्रियता युवा रचनाकारों में देखने को मिली है, वह अभूतपूर्व है। कोई एक दर्जन से अधिक युवा कवि इस दिशा में अपनी शानदार उपस्थिति से नवगीत और प्रकारांतर से हिन्दी की छांदस कविता को न केवल साहित्य की मुख्य धारा में ले जाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, अपितु हमारे समय को अपनी युवा आँखों से देख-परख रहे हैं और उस पर अपनी बेबाक राय समाज के सामने रख रहे हैं। यह और भी सुखद है कि गीत-कवियों की इस युवा जमात में महिला-रचनाकारों की भी शानदार हिस्सेदारी है। 

अनामिका सिंह ऐसी ही नवगीत–कवयित्री का नाम है, जिन्होंने अपने रचनाकर्म से हिन्दी कविता के बड़े पाठक वर्ग के अलावा आलोचकों और बौद्धिकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। हाल ही में उनका नवगीत संग्रह  ‘न बहुरे लोक के दिन’ बोधि प्रकाशन से छपकर आया है । इस संग्रह के नवगीतों के वारे में वरिष्ठ नवगीतकार यश मालवीय कहते हैं-‘नवगीत के नाम पर उन्होंने गीत के पारंपरिक शिल्प से कोई समझौता नहीं किया है, बल्कि उसे कथ्य का भरापूरा आसमान देकर और धारदार और चमकदार बना दिया है। यह सारी नवगीत नव लय ताल छंद से सजी छांदसिक अभिव्यक्ति नवगीत के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है।‘  

इस नवगीत संग्रह से गुजरते हुए जहां एक ओर कवयित्री का अपने ‘लोक’ के प्रति गहरा जुड़ाव महसूस किया जा सकता है, वही उसके संवेदनशील मन की परतें भी बेहद मार्मिक ढंग से खुलती दिखाई देती हैं। हमारे समय और समाज की अनेकानेक सुख-दुखात्मक अनुभूतियाँ इन नवगीतों में उपस्थित हैं। 

विविध संदर्भों के सत्तर नवगीतों से सुसज्जित यह संग्रह  हमारे समय की तमाम विसंगतियों–विद्रूपताओं का पता तो देता ही है, साथ ही उनके प्रति कवयित्री की चिंताओं को भी स्वाभाविक अभिव्यक्ति प्रदान करता है, और इन परिस्थितियों से उबरने का रास्ता भी तलाश तलाश करता है। प्रेम, करुणा, दया जैसे शाश्वत जीवन–मूल्यों के क्षरण के इस दौर मे जहाँ एक संवेदनशील कवि-मन की पीड़ा इन नवगीतों मे सहज रूप से महसूस की जा सकती है, वहीं सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा आम आदमी के शोषण और लूट की धारवाहिक घटनाओं से उत्पन्न जन-आक्रोश के स्वर भी आसानी से सुने जा सकते हैं। उनके गीतों में ‘समय’ का गहरा अन्वेषण व्याप्त है । जिस समय में हम जी रहे हैं , उसे उन्होने पूरी ईमानदारी और निर्भीकता के साथ अपनी लेखनी में उतारने का प्रयास किया है। व्यंजना और लक्षणा शक्ति से भाव गांभीर्य बनाए रखने की उनकी कोशिश भी बहुत हद तक सफल हुई है। एक नवगीत का अंश देखें –

  चौराहों पर / नित नुचें/ गौरैया के पंख 

  बजा रहे हैं/ पहरुए/ छद्म धर्म के शंख 

  आह! शक्ति संग शक्ति के/ होने लगे अकाज।  (व्यथा मुनादी कर रही, पृ.103 )

नवगीत की उपरोक्त पंक्तियों में आप मौजूदा वक़्त की समूची तस्वीर देख सकते हैं। पाठक के समक्ष समाज में आए दिन हो रही बलात्कार की घटनाएँ और उन पर सत्ता –प्रतिष्ठानों की संवेदनहीनता अपने नग्न स्वरूप में सहज ही उपस्थित हो जाती है। एक कुशल रचनाकार का यह गुण भी है कि वह कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा बात कह दे । मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि अनामिका ने शब्दों की फिजूलखर्ची को रोकने का यह हुनर बहुत हद तक सीख लिया है। इस संदर्भ में  संग्रह का एक और नवगीत जो हमारे नीति नियंताओं की बेशर्मी, लफ़्फ़ाज़ी और जनता के प्रति उनके दायित्वों की अनदेखी को परत-दर-परत उधेड़ कर रख देता है, उसका एक अंश देखा जा सकता है : 

    रेहन पर हैं सत्ताधारी / कुटिल नीतियाँ हैं दोधारी 

    भाषण लच्छेदार सुनाएँ/ हर अवसर पर विष टपकाएँ 

    विध्वंसों की भू उर्वर है / सद्भावी / चिंतन बंजर है।    (एक कलम पर सौ खंजर हैं, पृ. 60) 

कवयित्री यहीं नहीं रुकती, वह इस परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार सिस्टम को ललकारती, धिक्कारती और चेताती भी है : 

  ओढ़कर बैठे रहेंगे मौन/ यह न होगा / 

  हम करेंगे जुल्म का प्रतिरोध      (यह न होगा, पृ. 75 )

आज के सर्वग्रासी समय पर इतनी सटीक टिप्पणी और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति कोई सिद्धहस्त और निर्भीक रचनाकार ही कर सकता है। नवगीत का यही वैशिष्ट्य है कि उसकी प्रभावान्विति इतनी तीव्र होती है कि पाठक या श्रोता को अंदर तक झकझोर कर रख देती है। लानत रख लो, रोटी का भूगोल, नाखून सत्ता के, सत्ता की मेहराब, रंगमंच पर सभी जमूरे जैसे नवगीत सत्ता ,समय और समाज की इन्हीं विकृतियों और विद्रूपताओं को उजागर करते हैं। 

इस संग्रह के गीतों में अनामिका का एक रंग और उभर कर हमारे सामने आता है, वह है ‘लोक रंग’। ‘लोक’ उनके संस्कारों में बसता है। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जनपद के जिस कस्बानुमा गाँव में वे पैदा हुईं, पढ़ीं और बढ़ीं, वह क्षेत्र पिछली सदी के अंत तक प्रदेश के अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता था। किसी भी तरफ की बस पकड़ने के लिए कम से कम पंद्रह किलोमीटर कच्चे रास्ते से पैदल चलना होता था।(हालांकि अब तो आवागमन के ज़रूरी साधन यहाँ भी उपलब्ध हो गए हैं)। संयोग है कि इन पंक्तियों का लेखक भी उसी क्षेत्र से आता है और यह भी सुखद संयोग है कि अनामिका जिन श्रीकृष्ण यादव जी की बेटी हैं, वे इस लेखक के कॉलेज के दिनों के सबसे आदर्श गुरू रहे हैं, जिन्होंने पढ़ाई के साथ सामाजिक कुरीतियों और पाखंड के खिलाफ लड़ने-संघर्ष करने के संस्कार दिये। कहना न होगा कि ये संस्कार अनामिका में भी कूट-कूटकर भरे हैं, जिसकी झलक आप उनके गीतों में जगह-जगह देख सकते हैं। मैं बात उस क्षेत्र की कर रहा था, जहां से कवयित्री का जीवन-निर्माण प्रारम्भ हुआ। यहाँ के लोक जीवन को उन्होंने बहुत करीब से देखा, जिया और भोगा है। यहाँ के रीति-रिवाज , तीज-त्योहार, 

पारिवारिक रिश्ते, गरीबी, शोषण, अंधविश्वास, पृथाएँ–कुपृथाएँ सब कुछ उन्होने बड़ी शिद्दत से महसूसा। उन्होने इस पीड़ा को भी महसूस किया कि आज़ादी के इतने दिन बीत जाने के बावजूद समाज के बहुत बड़े हिस्से को बदलाव और खुशहाली का एक भी कतरा नहीं मिल सका। इस दर्द की छाप उनके तमाम गीतों साफ दिखाई देती है। एक गीत की कुछ पंक्तियाँ देखें-

  रिक्त उदर में जले अँगीठी/ आँत करे उत्पात 

  आश्वासन पर आश्वासन है / देख रहा गणतन्त्र 

  हाकिम फूँके लालकिले से / विफल हुए सब मंत्र 

  वादों की नंगी तकली पर/ सूत रहे हैं कात    (आंत करे उत्पात , पृ. 43) 

इसी संदर्भ का एक और गीत, जो कि शीर्षक गीत भी है, इस संग्रह में है -‘न बहुरे लोक के दिन’। इस गीत में कवयित्री ने समूचे भारतीय समाज के उस वर्ग की पीड़ा को शब्द-दर –शब्द उघार कर दिया है, जिसे कभी भी किसी युग में न भर पेट रोटी मिली, न तन ढकने के लिए ज़रूरत-भर कपड़े और न सर पर छत। यह वह वर्ग है, जो खेतों में-खलिहानों में, सड़कों पर, कल-कारखानों में दिन-रात हाड़ तोड़ श्रम करता है, इसके बावजूद सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा  उसे ‘एक अदद वोट’ के अलावा कभी कुछ समझा ही नहीं गया। परिणाम यह है कि विकास के तमाम दावों और घोषणाओं के बाद भी उसकी हालत ज्यों की त्यों दयनीय बनी हुई है –

   मूँद कर आँखें / भरोसा था किया/ न बहुर लोक के दिन

   खेत चलकर आ गए/ चकरोड़ पर/ और फसलों ने रखा/ व्रत निर्जला 

   रेंगती मुंसिफ़ के/ जूँ न कान पर / दांव बदले/ चाँद ज्यों षोडश कला

   न्याय पैंताने डुलाता / है चँवर/ न टरते शोक के दिन।     (पृ. 47)

संग्रह के अनेक गीतों में लोक की यह पीड़ा कवयित्री की संवेदनाओं में देखी जा सकती है। इसके अलावा अनेक गीत ऐसे भी हैं, जिनके माध्यम से कवयित्री अपने अंतर्जगत से पाठक को गहरे भाव बोध तक ले जाती है ‘अनुसंधान चरित पर तेरे / होंगे विकट गहन/ सधी चाल से तय राहों पर / चलता जा रे मन’, ‘तनी डोर पर चले जिंदगी / साध संतुलन मन का / बदल रही भूगोल चूक भी / टूटे हुए बदन का’, ‘ समय-समय पर समय दे रहा सबको यह संकेत / भुवन अटन में भटक न जाये / चेत जीव अब चेत’ जैसे गीत बनावट और बुनावट में बेहद सरल-सहज होने का बावजूद गहन अर्थबोध से सम्पन्न हैं। अनेक गीतों में कवयित्री ने अपने प्रेम का भी बड़ी बाबाकी से इज़हार किया है, जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि जीवन को तमाम संघर्षों, दुखों, तकलीफ़ों और विद्रूपताओं के साथ जीते हुए भी प्रेम के अमर श्रोत को अक्षुण्ण और सतत प्रवाहमान रखा जा सकता है। एक अंश देखें- 

 सरस परस पा दो अधरों का / हुए नयन जब बंद / सजन ने रचे प्रीत के छंद 

  एक छुअन ने श्वास-श्वास में/ घोल दिया मकरंद 

  बाजूबंद गिरे खुल-खुल जब / कसे बाँह के फंद (सजन ने रचे प्रीत के छंद, पृ. 84)

भाषा के स्तर पर ये गीत अत्यंत सरल-सहज और बोधगम्य हैं। भाषा का आडंबर उनके यहाँ बिलकुल दिखाई नहीं देता। इन गीतों को रचते हुए अनामिका जी ने एक काम और बड़ी खूबसूरती से किया है, वह है आम जनमानस के बीच बोली जाने वाली  कन्नौजी बोली के प्राय: विलुप्त हो रहे शब्दों का प्रयोग। बाखर, अफरे , कुलुफ, माहुर, मचवे, सबूरी आदि शब्द  हमें लोक के करीब ले जाते हुए आम जन की भावनाओं से गहरे तक जोड़ते हैं और इन गीतों का अतिरिक्त सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। 

कवयित्री का यह पहला नवगीत संग्रह है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में उनके लेखन की धार और अधिक प्रखर तथा अभिव्यक्ति और अधिक मुखर होकर आएगी। इस कृति के आत्मीय स्वागत के साथ उन्हें आकाश-भर बधाई।

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नवगीत संग्रह- न बहुरे लोक के दिन, रचनाकार- अनामिका सिंह, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, एफ-७७, सेक्टर- ९, रोड न. -११, करतारपुरा इंडसट्रिअल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-३०२००६,  प्रथम संस्करण-२०२१, मूल्य-२०० रु. , पृष्ठ- , परिचय- जय चक्रवर्ती, ए.एस.आई.एन- B09PH9B7M6