रविवार, 1 जनवरी 2023

बनजारे गीतों के गाँव- डॉ. ओमप्रकाश सिंह

डॉ ओमप्रकाश सिंह के  नवगीत संग्रह ‘बनजारे गीतों के गाँव’ का प्रथम संस्करण वर्ष २०१२ में उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुआ । कुल ५८ गीतों को समाहित किए इस हार्ड कवर पुस्तक में ११२ पृष्ठ हैं, जिसका मूल्य मात्र २०० रुपये है। पुस्तक की भूमिका में डॉ ओमप्रकाश सिंह  नवगीत के बदलते स्वरों के विषय में अपने विचार प्रकट करते हैं जिससे उनके  रचनात्मक भाव-बोध का कुछ अनुमान लग जाता है। वे तर्कयुक्त विचारपूर्ण कविता के स्थान पर भावपूर्ण, लोक-संवेदनायुक्त कविता को महत्त्व देते हैं। वे कहते हैं, ‘जब किसी रचनाकार की तर्क बुद्धि अपने कौशल के साथ एक सैद्धान्तिक वृत्त में चक्कर काटती है तो वह विचार-प्रधान कविता को जन्म देती है किन्तु जब कोई नवगीतकार भावना के खुले आकाश में स्वनियंत्रित होकर लोक-संवेदना को आत्मसात करता है तो वह नवगीत की नई अभिव्यंजना से जुड़कर कुछ विशिष्ट एवं सहज हो जाता है।’  इस संकलन में नवगीतकार डॉ ओमप्रकाश सिंह जी ने विभिन्न विषयों पर सफलतापूर्वक अपनी कलम चलाई है। समीक्षा की सुविधा हेतु मैंने इन्हें सात विषयों में वर्गीकृत किया है। 

१. बनजारे गीतों के गाँव : -  पुस्तक की सबसे पहली और अंतिम दोनों ही नवगीत ‘गीतों के गाँव’ शीर्षक के अंतर्गत लिखे गए  हैं, किन्तु दोनों की विषयवस्तु में स्पष्ट अंतर दृष्टिगोचर होता है । प्रारम्भिक गीत के द्वारा वे पाठक अपने नवगीतों के गाँव में साथ चलाने का आमंत्रण देते हैं जहाँ- 
‘संवेदन की 
लहरें
उठतीं अनमोल 
गूंगी अभिव्यक्ति 
वहाँ बोले कुछ बोल 
स्नेहा के दुआरे पर सपनों की छाँव  है।  

वहीं अंतिम नवगीत का स्वर कुछ निराशा का सा स्वर लिए दिखता है। वे कहते हैं – 
‘मौनता मुखर होती 
कुम्हलाए चेहरों पर 
गीत मुसकुराते हैं 
आँसुओं कपोलों पर 
जनपथ पर कोई ठहराव कहाँ 
        भाव के प्रवाह में 
        सिर्फ नए अर्थ का प्रभाव है‘ 

इसी शीर्षक के अंतर्गत ही एक गीत पुस्तक के मध्य  में रखा गया है। यह गीत नवगीतों में विषयों की व्यापकता को दर्शाता है, जिसमें आशा है, निराशा है, खुशी है, दर्द  भी है। ‘अंधकार की मौनता को तोड़ते उजाले’ भी हैं और ‘धूप के दुआरे पर मिलती छाँव’ भी है।  वे लिखते हैं – 
‘मर्यादा की कच्ची 
टूटती दीवारें 
खोल रही पर्वत से 
सागर तक बाँहें ‘। 

इसी शीर्षक के अंतर्गत जिन नवगीतों को रखा जा सकता है उनमें ‘गीत मेरे’ ‘शब्द नहीं मरते’ ‘मैंने वही कहा’ ‘नए संदर्भ’ नवगीतों के रखा जा सकता है । इन सभी गीतों के द्वारा वे अपनी रचनाधर्मिता को स्पष्ट करते हैं। वे नवगीतों में नए बिंबों, संदर्भों, उपमानों के प्रयोग पर बल देते हैं। भावों को शब्दों में ढाल उनकी अमरता सुनिश्चित करते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि भावों की सच्ची  अभिव्यक्ति छंदमुक्त कविता ही कर सकती है उन्हें संबोधित करते हुए वे कहते हैं –
‘झूठे भावों के 
कंठों की 
हम आवाज़ नहीं
छ्ंदमुक्त 
कविता की दुनिया के 
मोहताज नहीं ‘ 

नवगीतों के विषय में वे भूमिका में भी लिखते हैं – ‘ नवगीत के दरवाजे पर युगीन संवेदना के न जाने कितने स्वर दस्तक देते हैं। वे अपनी अस्मिता की तलाश में भीतरी छटपटाहट लेकर सर्जना की उजली परतें उकेरने के लिए बेताब हैं। ऐसी स्थिति में नवगीतकार के लिए सामाजिक सतह पर साँस लेना और उनके सच को खंगालकर मूल्यों की तलाश करना ज़रूरी है।” 

२. प्रेम व विरह–  इस शीर्षक के अंतर्गत लिखे गए नवगीत व्यक्तिगत अनुभव से प्रतीत होते हैं जहाँ नायक नायिका के रूप से मंत्रमुग्ध हो कह उठता है –
‘जैसे चाँद 
उठा बादल को 
देता उजियाली 
वैसे रूपबद्ध 
आँखों ने 
खोली मधु प्याली ‘ (रूप तुम्हारा) 
कभी वह प्रेमिका से ‘आकाश की बातें’ करना चाहता है जो प्रेमिल विचारों से लबालब हों जो अजाने नए सपनों की दस्तक देती हैं। किन्तु रिश्तों के अंजाम यदि सुखद ही होते तो फिर साहित्य की, प्रेम-काव्य की दुनिया का क्या होता? विरह गीत कैसे रचे जाते? यहाँ भी नायक को जल्दी ही अहसास होता है कि – 

‘न जाने क्यों
ये रिश्ते खुल रहे
अंधी सुरंगों में 
ये सपनों के बतासे 
फूटते हैं 
लघु प्रबंधों में 
भला अब कौन समझेगा 
मधुर मधुमास की बातें। ‘ 
रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी एक दोहे में नायक-नायिका द्वारा भरे भवन में आँखों ही आँखों में बातचीत का विहंगम दृश्य प्रस्तुत कराते हैं और डॉ। ओमप्रकाश सिंह की नायिका की आँखें बिन बोले ही सब भावों को प्रेषित कर जाती हैं। वे कभी मुसकाती हैं, कभी पिय के हिय का हार बन जाती हैं और कभी परछाइयों के द्वार पर आँसू बो देती हैं। 
प्रेम व विरह के विषय पर ‘फिर स्वर मिलता है’ ‘चाँदनी के गाँव’ ‘चाँद तुम’’तुम नहीं आए’ गीतों द्वारा अपने प्रेम व विह्वलता का प्रकटीकरण किया गया है । नए बिंबों व उपमानों का प्रयोग दृष्टिगोचर होता है। एक बानगी देखिए – 
‘झाँकता था चाँद 
खिड़की से 
तुम्हारे रूप को 
मुट्ठियों में 
बांधती हो 
प्यास जैसे धूप को’      

३. प्रकृति – प्रकृति सदा ही कवियों, गीतकारों, कथाकारों आदि के लिए प्रिय विषय रही है और हो भी क्यों न! मानव मन के सभी सुंदर-असुंदर, प्रेम-विरह, कष्ट-पीड़ा, हर्ष-शोक, उल्लास-विलास को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम जो है ये। डॉ. ओमप्रकाश जी  भी इसके जादू से बच नहीं पाते किन्तु वे प्रकृति द्वारा अपने भावों की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त मनुष्य  द्वारा प्रकृति के दोहन और क्रूरता पर अपनी चिंता प्रकृति के माध्यम से प्रकट करते हैं। बसंत दादा कहते हैं –

‘ बोले –‘पहले जैसा मौसम 
अब तो नहीं रहा 
बारूदी धरती के गोले 
हमने बहुत सहा’ 
कहते रहे 
विषाद भरे से 
फिर बसंत दादा’  

जिस बसंत को सदा मदन, काम, प्रियतम आदि के रूप में अक्सर दिखाया जाता रहा है उनका घर के अपने उस बुजुर्ग के रूप में देखना जो आज की स्थिति से बच्चों के भविष्य की चिंता में दुखित है, अपनेपन का सा भाव उत्पन्न करता है।   
बसंत की ही विवशता दिखाती एक और नवगीत ‘बसंत कैसे बोले’ में समाज के पतन और स्त्री की असुरक्षा की  इंगित करते हुए कहते हैं –

‘अप-संस्कृति के 
राग-रंग हैं 
शांतिपरक गलियारों में 
अहंकार के स्वर उठते हैं
अब स्नेहिल बाज़ारों में 
शाखाओं पर कलियाँ बैठीं 
बंद द्वार कैसे खोलें। 

किन्तु केवल दुख व निराशा ही नहीं है उनके नवगीतों में । वे हर्ष, उल्लास और उत्साह से भरे भी हैं। वे हवा से प्रिय का पता पूछते हैं ( ओ री हवा)।  वे प्रकृति द्वारा अपने ही अनोखे रूप में होली खेलने के दृश्य का आनंद लेते  हैं --- 

‘ पीले वस्त्र पहन कर आई 
वैरागिन सरसों 
आम और महुआ बौराए 
लगते हैं बरसों 
रंग-बिरंगे 
दृश्य उभरते 
 झांक रहा है ताल’
  
शब्द सीमा से न बंधी होती तो कुछ अन्य  उदाहरण भी प्रस्तुत करती। 

४. सामाजिक सरोकार व सत्ता पर रोष – ‘सहित से उपजा साहित्य जब तक सबके हित के लिए न हो वह सफल नहीं कहा जा सकता। डॉ। ओमप्रकाश सिंह जी के अधिकांश नवगीतों को इसी श्रेणी में  रखा जा सकता है जहाँ वे सामाजिक सरोकारों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। आमजन की पीड़ा व तकलीफ़ों तथा छद्म-नेताओं के दोगले चरित्र को उजागर करते हैं । साथ ही जन-मानस को अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने को इन शब्दों द्वारा प्रेरित भी करते हैं—

अहंकार की 
चिड़िया के हैं 
आज टूटते पंख 
गलियारों से 
राजपथों तक 
चले बजाने शंख 
जो हलके हैं 
गहरे पानी में 
उतराएँगे । 

धर्म के नाम पर जितनी नफरत फैलाई गई है उतनी शायद किसी और कारण से नहीं फैली। और इस नफरत का शिकार होता है गरीब व कमजोर इंसान या फिर स्त्रियाँ । स्त्रियाँ जिन्हें इस माहौल में डर-डर कर जीना है है क्योंकि –

फुटपाथों पर 
खड़े बाज हैं 
चौराहों पर गिद्ध खड़े 
मंदिर-मस्जिद के दरवाजे 
भ्रष्टाचारी सिद्ध पड़े 
लगी हुई हैं 
खूनी आँखें 
 स्वर्ण मृगों की खाल पर।  
समाज का ढाँचा बिखर रहा है । संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों के टूटने –बँटने की पीड़ा वे ईसा प्रकार व्यक्त करते हैं – 

टुकड़ों-टुकड़ों में 
करने की 
भीतर मंशा पाले 
चिड़ियों के भी 
नए घोंसले के 
चिथड़े कर डाले । 

मानव न केवल स्वार्थी है पर इससे अधिक दोगला प्राणी भी कोई न मिलेगा। इसने पहले तो धरती को अलग-अलग देशों में बाँटा और जब इतने पर भी संतोष न हुआ तो दूसरों की ज़मीन पर आँखें गड़ाने लगे। अब वे खुद की बनाई सीमाओं को भी नहीं मानते और अक्सर उनका अतिक्रमण करने की फिराक में रहते हैं --- 
देश –देश की 
कटुताएँ 
हिंसा बोती हैं 
बारूदी मुस्काने
ज़्यादा ही होती हैं 
रेखांकित सीमाएँ 
कागज पर और 
               मन में कुछ और। 
कहते हैं कि इतिहास स्वयं को दोहराता है । इसकी पुष्टि वे अपने नवगीत ‘साजिशें रचने लगे’ द्वारा करते हैं।  यहाँ वे महाभारत का संदर्भ लेकर कहते हैं कि आज भी एक नया महाहारत दिन-प्रतिदिन रचा जा रहा है, जहाँ सशक्त, विकसित लोग निर्बल, निर्धन लोगों का शोषण करते हैं और उनके सामने किसी की नहीं चलती। न भीष्म की, न कृपाचार्य की और न द्रोण या विदुर की ही। वे लिखते हैं – 

मोहवादी द्रोपदी की 
आग अंतर में सभी के
धर्मक्षेत्री चेतना के 
पट कभी खुलते नहीं   

यूँ तो नशा किसी भी प्रकार का हो, हानिकारक ही होता है किन्तु कुर्सी का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है तो इंसान को अपने स्वार्थ के सिवा कुछ नहीं दिखता। सब रिश्ते-नाते बेमानी हो जाते हैं। इसी कठोर सत्य को बयान करते हुए वे दुखित हो कह उठते हैं ---

आज महाशय 
कुर्सी पाकर  
मुझसे दूर हुए । 

इसी प्रकार वे अन्य नवगीतों में समाज की गिरावट व उसके पतन  को अलग-अलग प्रकार से दिखाते हैं । मनुष्य ने अपने चारों ओर खुद ही काँटे उगा लिए हैं। इन काँटों की खेती से मनुष्य के असली चरित्र का भान हो रहा है। मनुष्य स्वयं मनुष्य की दुष्टता को समझ पा रहा है।   

५. प्रेरणा व आशा : - किन्तु ऐसा भी नहीं कि वे पूरी तरह निराश ही हैं। वेदनाओं के गुब्बारे स्वप्न गगन की उड़ान भरते हैं , इच्छाएँ हिलकोरे लेती हैं, मानव स्वयं अपने साहस को साधता है और काँटों के जंगल के बीचों-बीच आशा के फूल खिलने लगते हैं। कलियाँ मुसकुराने लगती हैं और कवि गा उठते हैं – 
लहरों ने
यात्राएँ कर लीं 
इस तट से उस तट 
प्यास गई 
व्याकुलता ढोने 
इस घट से उस घट 
शिखरों के 
मंसूबे उतरे 
फूलों के आसन। 

उन्हें आशा ही नहीं विश्वास है कि अंधेरा सदा नहीं रहने वाला। सूरज फिर से उगेगा और उस की रोशनी में नया पथ दृष्टिगोचर होगा । 
एक बार बंधु और 
सूरज उग आने दो 
रोशनियाँ झांकेंगी 
पथ भी दिख जाएगा । 
व्यष्टि का दुख जब समष्टि में समा जाता है तब जन्म होता है परोपकार, अपनत्व और भाईचारे की भावना का । इस भावना को डॉ सिंह इन शब्दों द्वारा प्रकट करते हैं –
 
आँखों का पानी पीते हैं 
रूप-दर्द के प्यासे 
आओ 
भूखे-नंगों के
हाथों पर रोटी बोएं।   

परिवर्तन की क्रान्ति होगी और उसे लाने वाला होगा हमेशा की तरह कलमकार क्योंकि – 

लेखनी भी शब्द 
बोने लग गई संघर्ष के 
तोड़ती ही रही पर्वत 
रूढ़िगत आदर्श के 
हर नई ऊंचाइयों को मेघ-सा 
छूते रहे हम । 

६. देश-प्रेम :- हज़ार परेशानियाँ हों , गम हो, भ्रटाचार हो या फिर धोखेबाज स्वार्थी नेता ही क्यों न हों यहाँ, फिर भी जन्मभूमि से नाता कैसे तोड़े कोई? शरीर से उपस्थित न होते हुए भी मन और आत्मा तो वहीं रहती है। हमारी समृद्ध संस्कृति का गुणगान करते हुए वे कहते हैं – 
       संस्कृतियाँ 
       हज़ार हाथों से 
       प्यार बाँटती हैं 
       इसीलिए यह देश 
      विश्व का 
      स्वर्ण मुकुट लगता है। 

यूं तो उपरोक्त सभी विषयों के अंतर्गत आने वाले नवगीत देश व इसके प्रति प्रेम को उजागर कराते ही हैं किन्तु स्वर्ण-मुकुट नामक यह कविता तो पूरी तरह देश को ही समर्पित है । 

७. अध्यात्म /स्वप्न-लोक/ आत्मावलोकन :- ज़िंदगी की भाग-दौड़, उथल-पुथल और उतार-चढ़ाव से थका व्यक्ति जब शांति की खोज में निकलता है तो उसे भान होता है कि सब दुख तो मोह-माया के कारण था। इन बंधनों से मुक्ति पाकर ही व्यथित हृदय को चैन आता है—

बंधन सब छूट रहे 
टूट रही डोर 
लगता इस जीवन में 
पुन: हुई भोर। 

अब वह स्वनिर्मित संसार के सपनों में खो जाता है। सपने जो – 

कामनाओं की
 क्षितिज पर 
इंद्रधनु लगते 
शून्यता को 
स्नेह के 
शृंगार से भरते 
सपने 
कभी अनुभूतियों में 
उतर आते हैं । 

मानव अपने कर्मों से खुद को बनाता और बिगाड़ता है। एक ही मानव के भीतर अनेक मानव अनेक छायाओं के रूप में रहते हैं । -- 

वह छाया 
जो मर्यादाएँ 
तोड़ रही अंतरमन से 
वह छाया 
जो संस्कृतियों को 
जोड़ रही साँचेपैन से 

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि डॉ ओमप्रकाश सिंह ने अपने इस नवगीत संकलन में मानव के भाव-पक्ष के सभी पहलुओं को उजागर करते हुए नवगीतों की श्रेणी में एक अनुपम नगीना प्रस्तुत किया है, जिसकी चमक न केवल मन को आलोकित करती है बल्कि अपने भीतर झाँक कर आत्मावलोकन करने को भी प्रेरित करती है। नए-नए बिंबों में बंधे गीत मुक्त छंद की गंभीरता की अपेक्षा एक मीठी सी गेयता लिए हैं। जनमानस की भाषा का प्रयोग इन नवगीतों को सहज बनाकर आम-जन से जोड़ता है। यह संग्रह पाठक को एक ऐसी यात्रा पर साथ लिए चलता है जहाँ वह कभी प्रकृति के सौन्दर्य पर मुग्ध होता है और कभी समाज की कठोरता और भ्रष्टाचार उसे निराशा के गर्त में धकेलती है। अनेक भावों के सागर में डूबता-उतराता वह आत्मशांति का रास्ता भी खोज ही लेता है। 
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नवगीत संग्रह- बनजारे गीतों के गाँव, रचनाकार- डॉ. ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशक- उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ,  प्रथम संस्करण-२०१२, मूल्य-२०० रु. , पृष्ठ-११२ , परिचय- डॉ. मंजु सिंह