रविवार, 1 मई 2022

बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा- सुभाष वसिष्ठ

 'बना रह ज़ख्म तू ताज़ा' वरिष्ठ कवि सुभाष वसिष्ठ का २०१२ में प्रकाशित नवगीत संग्रह है, जो उनके द्वारा १९७० से १९९० तक रचित गीतों में से चयनित ४६ गीत है। गाँव सिकंदरपुर काकोड़ी, जिला हापुड़, उ.प्र. में ४ नवम्बर १९४६ को जन्मे सुभाष वसिष्ठ आठवें दशक के महत्वपूर्ण नवगीतकारों में से एक हैं। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। रंगकर्म के क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ट गतिविधियों के चलते भी वे खासे चर्चित रहे हैं। उन्होंने फीचर फिल्म व टीवी धारावाहिक में अभिनय भी किया है। 

सुभाष वसिष्ठ हमारे समय के महत्वपूर्ण गीतकार हैं। वे महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गीत की अनवरत साधना में हैं। जब "गीत मर चुके हैं" का साहित्यिक फतवा दिया गया था, तब भी सुभाष वसिष्ठ गीत के साथ थे और आज जब दबी ज़बान से पश्चाताप के स्वर में फतवा जारी करने वाले पुनः गीत की सत्ता स्वीकार करने लगे हैं, तब भी सुभाष वसिष्ठ गीत के साथ हैं। ध्यातव्य यह है कि सुभाष वसिष्ठ सरीखे लोगों ने मात्र गीत ही नहीं रचे हैं, उन्होंने गीत के प्रति पैदा किये गए नकारात्मक वातावरण को भी अपनी सतत रचनात्मक ऊर्जा से पुनः गीत के पक्ष में किया है।

उनकी काव्यप्रवृत्ति की पड़ताल की जाय तो उसके मुख्य तत्व हैं -- आज़ादी, बराबरी, न्याय, दुःख, प्रतिरोध व जीवन-समीक्षा। वे खुद इसकी उद्घोषणा करते हैं --

 "लाएँ क्या गीतों में ढूँढ कर नया?
 ज़हरीला पूरा परिवेश हो गया!"

सुभाष वसिष्ठ गीतों में नवता या नवोन्मेष के नाम पर छद्म प्रगतिशीलता के स्थापत्य को अस्वीकार करने से पहले अपने विषाक्त हो चले परिवेश के प्रति अमर्ष व्यक्त करते हैं। उनके यहाँ अपनी विरासत को लेकर पूर्णतः अस्वीकार नहीं, वरन अपनी विरासत को लेकर प्रगतिशील दृष्टि से समीक्षा है। सुभाष वसिष्ठ सभ्यता व संस्कृति का निरन्तर सचेत दृष्टि से आकलन-परिकलन करने वाले कवि हैं --

"फँस गया मन सभ्यता के जंगलीपन बीच!
पर्त ऊपर पर्त की/आवाज़ का चढ़ना/ स्वयं दिपने को/ 
लचीला व्याकरण गढ़ना/ बाँध लेना रूढ़ितोड़क ज़ंगमय ताबीज!"

आज की आधारहीन, अप्रामाणिक नव सभ्यता के चलते पसर रहे अवसाद, एकाकीपन, कुंठा, हताशा, संवेदनहीनता के जंगल के बीच आम आदमी किस कदर फँस कर विवश हुआ है, ये पंक्तियाँ औसत मध्यवर्गीय गार्हस्थ जीवन के कर्त्ता व सर्वहारा वर्ग के समकालीन जीवन संघर्षों, चुनौतियों, विवशताओं का भाष्य तो करती ही हैं, साथ ही, "स्वयं दिपने को" जैसी आत्मश्लाघा की प्रवृत्तियों को प्रश्नांकित भी करती हैं। एक ओर प्रगतिशीलता व ऊर्ध्वगामी चिंतन की अभिवृद्धि के उद्देश्य हैं। साथ ही दूसरी ओर ऐसे छद्म चरित्र हैं, जो स्वयं को चमकाने व उत्प्रेक्षित करने के लिए नियमों को अपने अनुसार इस्तेमाल में लाते हैं और प्राचीन रूढ़ियों को तोड़ने के लिए "ज़ंगमय ताबीज़" को भी बाँध लेने से नहीं चूकते। ढोंगी व्यक्तित्व व तज्जन्य स्थितियों में फँसे सामान्य आदमी की स्थिति का सटीक काव्यांकन हैं ये पंक्तियाँ।

नव सभ्यता की चकाचौंध में आम आदमी की हालत का बयान दर्ज करती ये पंक्तियाँ भी महत्वपूर्ण हैं --

"चुँधियाती/स्याही की लगातार रोशनी/ मृत्यु साथ/ 
जीवन की बाज़ी कैसी ठनी/ धुआँ- धुआँ दृश्य निपट/ भौंचक- से हम!"

सुभाष वसिष्ठ मनुष्य के विरुद्ध हो रहे विराट षड्यंत्र के शिकार के रूप में ही नहीं लिखते, बल्कि वे उस षड्यंत्र में अपनी हिस्सेदारी की भी खोज करते और उसे बेझिझक ज़ाहिर करते हैं। इसीलिये उनके गीत निरा तटस्थ बखान नहीं, बल्कि निजी प्रमाणिकता और 'इन्वॉलमेंट' के गीत हैं। उनकी आवाज़ दोस्ताना है और उनके शब्द मित्रता से भीगे करुणा भरे शब्द हैं। भयंकर तनावों और अमानवीकरण की शक्तियों से यह समझ भरी सम्वेदना गीतों में जबर्दस्त मुठभेड़ करती है। सुभाष वसिष्ठ के गीत वक्तव्य नहीं रह जाते और न ही उनमें अपने अनुभवों का निरा एकायामी बखान होता है, वे उनके अनुभव और दृष्टि को विस्मयकारी चित्रमयता और सहज बातचीत के लहजे के संयोजन से चरितार्थ करते हैं। सुभाष वसिष्ठ में गहरा समुदायबोध भी है, वह निरा ऐतिहासिक या समाजशास्त्रीय नहीं है, बल्कि वह उनकी दैनंदिन की निरन्तर समाजोन्मुखी चिंताओं का प्रदेय है।
"हम विभाजित ज़िंदगी को जी रहे ऐसे/ 
जुड़ेपन की प्यास टूटा मन सहे जैसे"

याकि

"कब तक यों जिएँ लिए खालीपन?
और, दूर, माथे से रहे शिकन!

दिशाहीन चौराहे, चौराहे, चौराहे
ज़र्द हुए चेहरों पर
एक चमक मुस्काए
सच, कैसे मुस्काए
मिलती जब बर्फ़ीली अग्नि-छुअन"

खंडित जीवन सम्वेदनाएँ, प्यास, टूटा मन, जिएँ लिए खालीपन, ज़र्द चेहरे, बर्फ़ीली अग्नि-छुअन, के इन समकालीन जीवन संत्रासों के प्रत्यय आज की जिजीविषा के सन्दर्भ में जो रूपक बनाते हैं वह सुभाष वसिष्ठ के गहन जीवन बोध का स्वतः परिचय देते हैं।  इन सबके बीच "कब तक यों जिएँ लिये खालीपन" का सवाल खड़ा करती ये पंक्तियाँ कविता के मूल उत्तरदायित्व का निर्वहन करती प्रतीत होती हैं। जिस समाज में असली सवालों की पहचान ही धुँधला गई हो वहाँ कविता का एक आपद्धर्म शायद यह भी है कि वह यथासम्भव इस स्थिति को तो अंकित करे ही, भरसक सवाल पूछने की जुर्रत भी करे। यह आकस्मिकता नहीं है, बल्कि सुभाष वसिष्ठ के अनेक गीतों में प्रश्नवाचिकता है।

वसिष्ठ यद्यपि अक्सर ऐसे अनुभव क्षेत्र से सरोकार रखते हैं, जो मुबहम है, जहाँ धुँधलका है,लेकिन स्वयं उनमें पारदर्शिता है और किसी तरह के उलझाव से मुक्त मितव्ययता भी। एक सूक्तिपरकता लिये गहरा आत्मसंयम है। वे अतिकथन से बचते हैं। उनकी बिम्ब और प्रतीक व्यवस्था हमेशा सार्थक व सुगठित है। सुभाष वसिष्ठ का काव्य संसार बिम्बकेन्द्रित और ऐन्द्रिक व्यवस्था है। भाषा में निजी भूमि की तलाश है। उनकी भाषा के स्वप्न जगत और उसमें रची-बसी सजीव यादों की ओर ले जाती है। सुभाष वसिष्ठ के बिंबों में इसीलिए शुद्ध संवेदनात्मक आघात है। वसिष्ठ के लिए भाषा की जड़ों तक पहुँचना अनुभव की जड़ों तक पहुँचना है। यहाँ पहुँच कर भाषा ऐसी रहस्य-मुद्राएँ और चित्रमयता दे देती है कि भाषा सपने के बहुत नजदीक आ जाती है,बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि उनके काव्यसंसार में भाषा सपना देखती है। शाम का यह चित्रांकन इन बातों को प्रमाणित करता हुआ प्रतीत होता है-- "दिवस ढला/उठ चल दीं/ थकी थकी संज्ञायें/सरका कर एक ओर काम/टूटे/लो/ दिन के आयाम"

याकि

"टूटे सन्दर्भों को/थकते भी जोड़ते रहे/ सिर्फ एक पूर्ण बिंदु/हरदम हम खोजते रहे"

वसिष्ठ वस्तुतः एक पूर्ण जीवन की खोज के पथिक हैं। कविता को पूरा जीवन चाहिए होता है। उससे कम में उसका काम चलता भी नहीं है। वसिष्ठ के गीत समूचे जीवन मूल्यों को विवक्षित भी करते हैं व संकट में उनका सत्यापन भी करते हैं। गीतों में जो नए प्रतिमान, जटिलता, तनाव और सूक्ष्मता के रूप में पिछली सदी में विकसित हुए हैं,उन्हें वसिष्ठ के गीत अवमूल्यित नहीं करते, बल्कि नई प्रतिष्ठा और नई सार्थकता देते हैं। 

काव्य की मूल चेतना में नैतिक आक्रोश की उपस्थिति उसकी सार्थकता को प्रमाणित करती है। जिस कवि में नैतिक आक्रोश की जितनी पर्याप्तता होती है वह स्थापित मान्यताओं व जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि से उतना ही टकराता है। वसिष्ठ में नैतिक आक्रोश का यह ताप उनकी "ओ पिता" कविता में स्पष्ट परिलक्षित होता है। पिता की रूढ़ छवि, पालक, छायादार वृक्ष, आश्रयदाता व परम आत्मीय शुभेक्षु की है। लेकिन पिता से वसिष्ठ की यह संवादधर्मिता प्रचलित व स्थापित मान्यताओं का अतिक्रमण करने का जोखिम उठाती है--

 "यह सही है/पुत्र नामक ख़ून का कतरा/तुम्हारे, हम/ पर, कहाँ यह सिद्ध होता/खिड़कियों को बंद कर/जीते रहें सम्भ्रम?"

वसिष्ठ के गीतों में, महानगरीय जीवन की विषमताओं, चुनौतियों व जीवन संघर्षों की तस्वीर साफ-साफ देखी जा सकती है व स्पष्ट सुनी जा सकती है उनकी आवाज़ --

"आज मिलेगा तीजा वेतन/गत दो का पता नहीं/सिर्फ़ भरेगा पेट रसोई/सब कर्ज़ा छोड़ वहीं/ ×××××× 
स्याही ने/हर सीढ़ी/ऐसा रौब जमाया अपना/सहमा छिपता-सा फिरता है/सूर्य उदय का सपना"

याकि

'गहमा गहम शहर' शीर्षक के गीत की ये पंक्तियाँ---
"गहमा गहम शहर और चुप कलम/साथ साथ रोज़ सफ़र, बे-ताला-सम।"

कविता के सन्दर्भ में मैथ्यू आर्नल्ड ने कहा है कि कविता जीवन की समीक्षा है एवम् मार्क्स ने कहा है कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है। वसिष्ठ की काव्यप्रवृत्ति के केंद्र में ही जीवन की समीक्षा है।वे विविध आयामों से अपने गीतों में जीवन की समीक्षा करते हैं। साथ ही वे अपने गीतों में गहन व तरल सम्वेदना जनित आत्मीय वातावरण बनाये रखते हैं। अतः यह कहना अधिक औचित्यपूर्ण होगा कि वसिष्ठ के गीत मनुष्यता की मातृभाषा में जीवन की समीक्षा करते हैं।

चूँकि 'बना रह ज़ख्म तू ताज़ा',सुभाष वसिष्ठ के १९७० से १९९० के मध्य रचित नवगीतों का संकलन है। अतः उन दो दशकों की गीतप्रवृत्ति पर भी कुछ चर्चा समीचीन होगी। १९५८ में लिखित रूप से 'गीतांगीनि' संकलन की भूमिका में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के रूप में संकलित गीतों को चिह्नित किया। १९६१ से १९७१ तक के दशक में नवगीत में आधुनिक बोध के लक्षण पर्याप्त मिलने लगते हैं। अब नवगीत पूर्णतः यथार्थ जीवन जीवन की त्रासदी व उत्पीड़न को अभिव्यक्त करने वाला आधुनिकतावादी गीत बन गया। १९६४ में ओम प्रभाकर द्वारा सम्पादित 'कविता-६४ ' के नवगीत विशेषांक में नवगीत सम्बन्धी आलोचना निबंध एवम् नवगीत प्रकाशित हुए। चंद्रदेव सिंह का 'पाँच जोड़ बाँसुरी' १९६९ में प्रकाशित हुआ।

जिन दो दशकों के ये गीत संकलित हैं, वह १९७१ से १९९० तक का काल, नवगीत के उत्कर्ष का काल रहा है। छठें दशक में आंचलिकता की जो प्रवृत्ति कथा साहित्य के समानांतर नवगीत में आई वह लोकसंपृक्ति में बदल गई। इस प्रकार नवें दशक के मध्य तक ज्यों ज्यों नई कविता में बिखराव और विघटन बढ़ता गया,त्यों- त्यों नवगीत समूह हिंदी प्रदेश में व्याप्त व लोकप्रिय होता गया। इस बीच नवगीत दशक १,२,३ क्रमशः ८२, ८३, ८४ में प्रकाशित हुए।१९८६ में नवगीत अर्धशती प्रकाशित हुआ। रमेश रंजक का 'किरन के पाँव' (१९७०,रचनाकाल:१९६३-६५),शान्ति सुमन का 'ओ प्रतीक्षित'(१९७०), ओम प्रभाकर का 'पुष्पचरित' (१९७३), नचिकेता का 'आदमकद खबरें' (१९७३), उमाकांत मालवीय का 'सुबह रक्त पलाश की'(१९७६), शंभूनाथ सिंह का 'दर्द जहाँ नीला है' (१९७७), नवें दशक के पूर्वार्ध में माहेश्वर तिवारी का 'हरसिंगार कोई तो हो' (१९८१), श्रीकृष्ण तिवारी का 'सन्नाटे की झील'(१९८१) में प्रकाशित हुए।

नवगीत के इसी उत्कर्ष काल के सुभाष वसिष्ठ के संकलित नवगीत हैं,जिनमें उस समय की मूल मूलप्रवृत्तियों के स्वर विद्यमान हैं -- लोकचेतना, लोकसंपृक्ति, शोषण, संत्रास, मानवीय सरोकारों से जोड़ कर -- नवीन कथ्य, शिल्प, छंद विधान -- उस समय के नवगीत की मूल प्रवृत्तियाँ रही हैं व सुभाष वसिष्ठ के इन गीतों में इन समस्त प्रवृत्तियों का समावेश है।

वसिष्ठ के गीत कुछ मायने में उस समय के गीतों से अपनी इतर पहचान बनाते हैं। छायावाद का जो दूसरा अर्थ प्रतीक या चित्रभाषा शैली से है। नवगीत यात्रा का चरित्र इस पैमाने से नापा जाना चाहिए। छायावाद की जिस बिंबधर्मिता, प्रतीक विधान, चित्र भाषा शैली तथा अंतर्वस्तु के चलते छायावाद का तिरस्कार कर, प्रयोगधर्मी गीतकारों ने शोषण, संत्रास, मानवीय सरोकारों से जोड़ कर नव शिल्प विधान के प्रयोग किये,वे छायावाद की चित्रभाषा शैली को पूर्णतः नहीं त्याग सके। अतः नवगीत पर उस चित्रभाषा शैली व दुरूह बिम्ब विधान की छाया निरन्तर बनी रही।सुभाष वसिष्ठ इसलिए भी महत्वपूर्ण नवगीतकार हैं कि उनके नवगीतों में नवीन कथ्य,नव शिल्प विधान व मानवीय सरोकार तो मिलते हैं,लेकिन/साथ ही उन्होंने छायावाद की चित्रभाषा शैली व उसके रहस्यमयी दुरूह बिम्बविधान से अपने गीतों को मुक्त रखा है। उनके यहाँ यह नवोन्मेष विषय,वस्तु व भाषिक स्तर पर समान रूप से है।

सुभाष वसिष्ठ के गीतों में जीवन के प्रति गहरा अनुराग भाव है।विपरीत परिस्थितियों में यह अनुराग कब उम्मीद में बदल जाता है पता ही नहीं चलता --

"ओ मेरे मन/ होता क्यों इस कदर अधीर/ आकाशी पंखों को/ कभी तो किरन होगी/ कभी तो मिटेगी यह स्याहिया लकीर!"

सुभाष वसिष्ठ के गीतों के बिंबविधान व रूपकों में विराट अर्थ वैभव है।छठी शती के मध्यकाल में भामह "शब्दार्थो सहितौ काव्यं गद्यम पद्यम च तत द्विधा" कहते हैं। लेकिन आगे चलकर कुंतक वक्रोक्ति को काव्य का जीवन मानते हुए कहते हैं-- "वक्रोक्ति काव्यजीवितम"। सुभाष वसिष्ठ के यहाँ शब्द की शक्ति से अभिधा और लक्षणा की सीमा के बाहर पड़ने वाले अर्थ का बोध होता है। उनकी इसी व्यंजना शक्ति की उनके गीतों में वक्रोक्ति के रूप में अचूक उपस्थिति है, जिससे उनके गीतों में अर्थ व अर्थात् के अनेक विकल्पों की संभावना बनी रहती है व अविवक्षित वाच्य ध्वनि का भी अनुरणन विद्यमान रहता है। 

संग्रह का शीर्षक गीत उल्लेखनीय है --
"बना रह ज़ख्म /तू/ ताज़ा/ हवा के सही/ जीने का हुआ कब ठोस अंदाज़ा!"
आज ऐसी ही सम्वेदना की दुनिया को जरूरत है जो जीने की तकलीफ से जूझती-उलझती है और उनसे पल्ला नहीं छुड़ाती, बल्कि उन तकलीफों से घिरे रहकर एक यातनापूर्ण विवेक विकसित करती हुई जीने की इच्छा को अटूट रखती है। ज़ख्म को ताज़ा बनाये रखने व हवा के चरित्र के सम्बंध में ठोस अंदाजा न होने के प्रत्यय समकालीन यातनापूर्ण जीवन के विरुद्ध मनुष्य की दुर्धर्ष जिजीविषा के संकल्प-पत्र सरीखे हैं। यह गीत वस्तुतः अव्यक्त पर प्रहार है, जिसकी बात टी एस इलियट करता है। वह कहता है "महान रचनाकार निर्वैयक्तिक होता है। कविता भाव की उन्मुक्त अभिव्यक्ति नहीं है,वह भाव से मुक्ति है, वह व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व से मुक्ति है।" वसिष्ठ के गीत उनके व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व से मुक्तिकामी चेष्टा की उज्ज्वल अनुभूतियाँ हैं। सोद्देश्य कलात्मकता व कलात्मक संयम के प्रतिमान के रूप में भी इन गीतों को अलग से रेखांकित करना समीचीन होगा।

संग्रह के सूरजमुखी सहते रहे, कर्ज़ माँगना, फँस गया मन, दिवस ढला, जड़धर्मा लोगों के बीच,एक खुशबू, गीत नहीं टूटेंगे,ओ पिता,जिंदगी पर्यंत,वटवृक्षी मान आदि गीत बहुत महत्वपूर्ण हैं।

सुभाष वसिष्ठ असीमित मानवीय प्रतिबद्धता के गीतकार हैं। इनके गीत, हिंदी में अंतर्निहित शक्ति का अहसास कराते हैं और हमारे समय में गीत कविता की संभावना को आगे बढ़ाते हैं। शब्द बहुलता, अतिरेक और दुरूहताओं का अतिक्रमण कर ये गीत एक ऐसा शिल्प व मुहावरा अर्जित करते हैं, जो मनुष्य की हालत के बारे में अत्यंत सघन और मार्मिक बयान दर्ज करने में समर्थ हैं। ये गीत भले पिछली सदी में रचे गए हैं लेकिन इनका गहन जीवन बोध हमारे समकाल में सार्थक हस्तक्षेप करता हुआ,समय का अतिक्रमण करता है। तमाम ऐसी रचनाएँ हैं जो सदियों पुराने समय मे रची गयी हैं लेकिन उनकी सर्वकालिकता उन्हें सदैव प्रासंगिक बनाये रहती है। वसिष्ठ के ये गीत काल का अतिक्रमण करते हुए, अतीत से पुल बनाते हैं व हमारे आने वाले समय के लिए कई सार्थक प्रस्ताव करते हैं। इस प्रकार, ये गीत एक साथ तीनों कालों में हस्तक्षेप करते हुए, वसिष्ठ को निरन्तर वर्तमान - कवि के रूप में स्थापित करते हैं। आशा है यह नवगीत संग्रह सुधी पाठकों का पर्याप्त लोकरंजन करेगा व हिंदी समाज में पर्याप्त समादर प्राप्त करेगा।

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गीत- नवगीत संग्रह - बना रह ज़ख़्म तू ताजा, रचनाकार- सुभाष वसिष्ठ, शब्दालोक प्रकाशन, सी-३/५९ नागार्जुन नगर, सादतपुर विस्तार, दिल्ली- ११००९४। प्रथम संस्करण- २०१२, मूल्य सजिल्द- रूपये १२०/- ,  पृष्ठ- ६४, आलेख - श्रीधर मिश्र