बुधवार, 1 नवंबर 2023

समय निरुत्तर- डॉ. मंजु लता श्रीवास्तव

 

समय निरुत्तर वरिष्ठ नवगीत कार और दोहाकार मंजु श्रीवास्तव जी का दूसरा नवगीत संग्रह है। ५१ नवगीतों के इस संग्रह में समय की आधुनिक और जटिल संचेतना शीर्षक से ही उद्भभाषित हो रही है, मंजु जी की अनुभूतियों में पर्याप्त ताजग़ी है, संवेदनात्मकता है, बहुश्रुत प्रतीकों के माध्यम से कथ्य का निर्वहरण है, शैल्पिक सौष्ठव हैं, प्रयोग धर्मिता है, मौलिकता है, और है गहरे उच्छवास से अंतरतम की पीड़ा से अधिक विश्व पीड़ा को रोकने का उपक्रम, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है।

उनकी बेतरह करुणा का हक़दार है- हर वह व्यक्ति जो हाशिये पर है। प्रकृति भी मंजु जी का  प्रिय विषय है, मंजु जी के गीतों में व्यवस्था के प्रति विद्रोह के भी स्वर हैं, विसंगतियों के उच्छ्वास हैं और है शिल्प भाव का मणिकांचन संयोग, उनके बहुत से गीत गेयता की शर्तें पूरी करते हैं, उनमें भाव और रस निष्पत्ति का मध्यांतर भी है, करोना का काल और उससे उपजी मानव जाति का त्रासद वर्णन एक गीत में— ‘मन में पीड़ा के संवेदन /दया भाव के हो स्पंदन / विषम समय की धारा में पतवारों संग कर्म समर्पण /जीवन पर संकट गहराया / तन मन बोझिल दुख का साया / घूम रहा चहुँ और जगत में /जन जन को निज ग्रास बनाया/‘

इस जगत में लगभग सभी के जीवन में दुःख की छाया अवश्य आई है,वह निर्मम समय हमारी चेतना को स्तब्ध कर देता है, मनुष्य अधिक दुःख में निष्प्रभ और हताश हो उठता है, हर बीतता लम्हा सदियों की यात्रा हो जाता है— ‘पाषाणों को दर्द हुआ तो/बन सरिता आँसू उतरे हैं / विकल क्षणों के कण रेती बन कर बिखरे हैं /ताप हृदय का पाकर भी हम कब बिसरे हैं/ हरियाली रूठी रहती है पेड़ों से दुश्मनी निभाई /नहीं जंगली पशु पक्षी ने नीड़ आशियाँ माँद बनाई /जीवन ढूँढ हुए जड़वत हम कभी कभी बदले ठहरे हैं’।

जीवन में बहुत सी समस्याएँ हमारी स्वयं की बनाई हुई है, इतनी इच्छाओं का जख़ीरा हम ढो रहें है, अपने कंधों पर, कि एक जीवन में उनको पूर्ण करना, असंभव है। मोह, शोक, भोग, लालसा और स्वार्थ के नये नये शिगूफे, बाकी जीवन की सुख शांति को समाप्त करने के लिए काफी हैं— ‘एक अनजाने सफर में रोज भागे जा रहें हैं / और कितने बाँध हमको तोड़ने होंगे /साथ अपनों के सहज ही छोड़ने होंगे /कुंडली मारे अंधेरी रात है बैठी / विष भी फन और कितने तोड़ने होंगे / हैं खुली आँखें मगर अंधे कुएँ में जा रहें हैं /कामनाएँ उम्र भर जीने नहीं देती /धार नये नित रूप हमको ये रिझाती हैं /और जब पूरी न होती रूठ जाती हैं / ये विवशता लाद काँधे व्यर्थ ढोये जा रहे हैं/

आज का राजनीतिक परिदृश्य हो या तीस साल, चालीस साल पहले की स्थितियाँ, बहुत अधिक जनपक्षधरता कभी नहीं थीं, अमीर सदा और अमीर होता रहा ग़रीब आज भी ग़रीब ही है, बस वोटों के लिए कुछ भी वायदा करके, हाशिये के सबसे आख़िरी आदमी तक को भरमाया जाता रहा है— ‘कागज की कश्ती से कैसे नदिया पार करें / जलते बुझते दीपों से हम क्या मनुहार करें /सबसे उजला उसका चेहरा कीच सने हैं, जिसके पाँव /वही इमारत सबसे ऊँची जिसने लूटा पूरा गाँव / भुला जगत सम्भाले सत्ता जग उद्धार करें / भूख बिकी वोटों की ख़ातिर /प्यास बादलों ने छीनी / चार निवाले मिले मगर राहत की चादर है झीनी / जन्म मृत्यु के बीच बेबसी किस किस से दरकार करें/

विसंगतियाँ और प्रतिकूलताएँ जिंदगी का हिस्सा हैं, शायद ही कोई मनुष्य होगा जो, इन तकलीफों से न गुजरा हो, कवि का हृदय इतना भावुक होता है, कि चुभती बैचैनियों को शब्द दे ही देता है, अन्तर की उठती हूक कभी चैन से नहीं बैठने देती मन को, मंजु जी ने इन स्थितियों को बहुत गहराई से अपनी पुष्ट भाषा में बाँधा है — ‘खिन्न होकर चुप्पियों ने भींच ली जब मुट्ठियाँ / तब का दरिया निरंतर देह के भीतर बहा है / क्षीण आँचल विवशता का अश्रुजल कैसे समेटे /मृत्यु शैय्या पर पड़ी संवेदना देखे मुखौटे / एक दावानल सदा हृदय के भीतर दहा है / सत्य जो बीता उसे इतिहास में रचते रहें हैं /पर समय की बेड़ियों को मूक बन सहते रहें हैं / बघनखों का भय निरंतर गेह के भीतर सहा है /‘

नवगीत का शिल्प विधान, विविध और बहु आयामी है अत:नवगीत के माध्यम से मन की विभिन्न स्थितियाँ और असमंजस को, वर्जनाओं को, दैन्य और करुणा को, बहुत विशेष और प्रभावी ढंग से इस विधा में रखा जा सकता है, मंजु जी एक कुशल कोमल और भावुक गीतकार हैं अत:उनके नवगीतों में यह शिल्प वैभिन्य भी है— ‘हाथी, घोड़ा, ऊँट, चाल से हम सब शह -मातें खाते हैं / जिसकी जितनी बुद्धि प्रखर हो वो उतने ऊँचे जाते है / दंद फंद के साथ चलें जो, उनकी सब मुश्किल छोटी है /ऊँचे सिंहासन पर बैठे बादशाह सीना तानें हैं /पैदल के पैरों में छाले कब सिर पर छप्पर छाने है / संघर्षों से जूझ रहे जो मान रहें किस्मत खोटीं है ‘

बिंबों में मन की बात और मन की पीड़ा को व्यक्त करना बहुत आसान है, किसी प्रखर लेखनी के लिए, प्रकृति का मानवीकरण करते हुए अपनी व्यथा को प्रकृति के विधानों और उपकरणों द्वारा प्रस्तुत करना मंजु जी का विशेष कौशल है— ‘साँझ होते ही सुनहरी वो नदी / स्याह वल्कल ओढ़ कर, थम सी गई है /नाव घबरा कर किनारा ढूँढती है /जल समाधि ले रही है किरण रूठी /सृष्टि भी मुँह मोड़ कर थम सी गई है’
करोना काल की मर्मान्तक पीड़ा अभी अभी पूरे विश्व ने झेली है। 

एक एक घर में कई कई मौतों ने इंसान को सदमे से, पत्थर सा कर दिया था, सरकारें कर्फ्यू लगाने को बाध्य थीं, मानवता पर ऐसा गंभीर संकट जिससे त्राण का कोई उपाय न सूझ रहा हो, शायद पहली बार आया। स्तब्ध मनुष्यता विवश थीं, और काल अपना विकराल तांडव लगातार दो वर्षों तक करता रहा — ‘एक डर बस्ती में देता /गश्त है अब रात दिन शहर में कर्फ्यू लगा है दृष्टियाँ बाधित हुईं है /अर्थ खोये शब्द में इच्छाएँ अनुशासित हुईं हैं / चूक गये संवाद मानव पस्त है दिन रात’

भीड़ अब हमारी आबादी का हिस्सा है, लेकिन इसके दुष्परिणामों से सभी अच्छी तरह परिचित हैं, भीड़ का वास्तव में कोई धर्म नहीं होता जैसा कि मंजु जी की लेखनी ने भी चित्रित किया- ‘भीड़ का कब धर्म कोई और कब पहचान है / रैलियाँ, हथियार, चीखें, शोर का हिस्सा बनीं /जिधर की आँधी चली उस ओर ही बढ़ती चलीं / बिन बिचारे बुद्धि हीना, खो चुकी सब शान है ‘

जीवन क्रूर समय के हाथों में आज तड़प रहा है, रक्त डूबी सारी कथाएँ है, सभी देश लगभग एक दूसरे की जमीन हड़पने, उनकीं धरती पर अपने कचरे को निस्तारित करने, और दूसरे की जमीन पर अवैध कब्जे करने की कूटनीति में व्यस्त हैं, प्रकृति का दोहन इस तरह विकसित देशों ने किया, कि धरती का भौगोलिक समीकरण, दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण की आज धज्जियाँ उड़ रहीं है, विकास नहीं विनाश है ये, हम सबका समस्त मानव जाति और समस्त जीव सम्पदा का ! 

आज धरती से जल का इतना दोहन हुआ है, हमारी धरती अस्सी सेंटीमीटर तक एक ओर झुक गई है— ‘समय के प्रस्तर पटल पर छप रहा अभिलेख कैसा /रक्त की स्याही में डूबे कथ्य न्यारे खो गये /प्रश्नों के हल औ तथ्य सारे /चीख क्रंदन की भयानक पंक्तियाँ है /मूक सब संवेदनाएँ पथ्य हारे / काल का विकराल पन्ना लिख रहा आलेख ऐसा’

कभी-कभी उल्लास मन को किसी बच्चे की तरह आंदोलित कर देता है, ऐसा लगता है कि ख़ुशियाँ फिर से लौट आईं हैं घर अपने — ‘बंजारा मन फिर लौटा है उत्सव वाले नदी किनारे / बाइस्कोप अभी जिंदा है, अंतर आँखें चमक उठी हैं / एक अठ्ठनी चार चवन्नी मन के भीतर लहर उठी है /

आज के समाज की सबसे कड़वी सच्चाई यही है, कि लगभग पचास या साठ प्रतिशत, मध्यम वर्गीय या उच्च मध्यम वर्गीय घरों से, बच्चे पढ़ लिख कर विदेश जा चुके हैं, बहुत दर्द होता है, अपनी संतान को अच्छे भविष्य के लिए विदेश भेजते समय, सभी माँ बाप को ! पर क्या करें, उन्हें जिस तरह की नौकरियाँ और कार्यशैली बाहर के देशों में मिलती है भारत में अभी लगभग उसका अभाव ही है, कुछ मजबूरी में, कुछ शौक से बच्चे विदेश जा रहें है ! ममता हाथ मलती रह जाती हैं, उसकी आँखों में पानी जैसे सदा के लिए ठहर गया है ! इसी सत्य को मार्मिक गीत के माध्यम से मंजु जी ने उकेरा है—  बूढ़ी चिड़िया बाँट जोहती, परदेशी बच्चे कब आते / बीता समय घोंसला छूटा है सूने कोटर के द्वारे /भेज उन्हें बैठी अंतर में स्मृतियों को रोज सँवारे /बहा नीर संतोष हृदय में / देहरी बीच दीप संझवारें ‘

मंजु जी ने जीवन के विविध आयामों को, अपने नवगीतों में संजोने की भरसक कोशिश की है, वास्तव में पीड़ा और दर्द वह स्याही है, जिससे श्रेष्ठतम काव्य का निर्माण होता है, रसात्मकता भी काव्य की एक अनिवार्य शर्त है, ये रसात्मकता भी मंजु जी के नवगीतों में सहज उपलब्ध है— ‘हमने पीड़ा बोध जिया है /उम्मीदों के हवामहल थे काली आँधी वाले साये /मन की पकी फसल के ऊपर उमड़ घुमड़ बादल मँडरायें / छप्पर छानी बहुत लगाई कब किस्मत ने साथ दिया है /स्वाभिमान को कुचल कुचल कर दूजे का अभियान सहा है / संघर्षों के पर्वत लाँघे अश्रु नदी डूबे उतराये /महल बनाते रहे रेत के /पल भर भी विश्राम न पाए / जीवन को निस्तारा इतना जगह जगह पैबन्द सिया है’

राज भवन या संसद की दीवारों में कठोर संविधान की इबारतें होती है, करुणा नहीं होती है।, उन्हें जन जीवन की परवाह तो है, पर वोट के लिए वे जन समूह को संबोधित तो करते हैं, पर चुनाव के समय, उन्हें देश हित में भी जो कानून बनाने हैं, वह भी जनता से पूछ कर नहीं, कौन सा कानून है उनके पक्ष में है या नहीं, ये देखना उनका काम अधिक नहीं है, वरना जी एस टी आदि व्यापारियों पर जिस भाँति थोपे गए, उसने व्यापारियों को बैकफुट पर ला दिया, जब तब मनमाने तरीके से बिजली का बिल बढ़ाना, ब्याज दर, महँगाई आदि संसद में जनसेवक के रूप में बैठे, नेताओं की ग़लत नीतियों का ही परिणाम हैं—  ‘चलो आज हम राजभवन की ईंटों से पूछे / कितने अश्रु स्वेद कणिकायें कितनी पीड़ाएँ / अंतर बीच छिपाए बैठी /करुणा से अभिभूत खड़ी फिर भी ये दीवारें/ बनी मूक दर्शक साक्ष्यों की ठहरी सीमाएँ / नींव दबी यातना छिपी उन चीख़ों से पूछे /

स्त्री जीवन नाना विपदाओं में सृष्टि के प्रारंभ से ही घिरा रहा, आज कल (?) स्त्री मात्र देह है, वैसे सदा ही ऐसी स्थिति रही पर, पर आज स्त्री जितनी प्रगति कर रही है, उतना ही या उससे कहीं अधिक वह दैहिक क्रूरता की शिकार भी है, आज उसका जीवन दुरूह भी है, और उसकी देह ख़तरे में भी, पहले स्त्रियाँ घरों में कैद रहती थीं, अब उनका कार्यक्षेत्र घर और बाहर दोनों है, और दरिंदे हर मोड़ पर उन्हें और उनके जिस्म को नोचने बैठे हैं, इसी भय का संकेत करते हुए मंजु जी व्यंजना से कहती है- ‘मैना तुम मत शोर मचाना /चारों ओर शिकारी बैठे / गाँव शहर बस्ती बस्ती में /चापलूस ही चाप लूस हैं/बाहर से दिखते बलशाली / भीतर ख़ाली कारतूस हैं / अर्जी दे निश्चिंत न होना / घूसखोर अधिकारी बैठे /दिल से निकली पीर तुम्हारी उनके लिए मनोरंजन है / गिद्ध निगाहों से बच रहना पग पग काम पुजारी बैठे’

बारिश किसानों के लिए विशेष रूप से अमृत है, अन्न के लिए जल कितना आवश्यक है, यह किसान से अधिक कौन समझ सकता है? बादल जीवन है, धरती का, अकुलाये पशु, पक्षी, पेड़, पौधे जन जीवन सभी की प्यासा बुझाता, जब बादल आता तो मन भी भीग जाता है—
‘घिर घिर काले मेघा आये /आस बंधी हल बैल चल दिये, कजरी गीत मल्हार संग लिए /खिलने लगे कृषक के चेहरे /प्यासी चिड़िया प्यासे हिरना /खेत पियासे सूखे झरना ‘

माँ अपने उम्र के आख़िरी पड़ाव पर कितनी उलझ जाती है, अपने विश्वासों से, जीवन भर की तपस्या भी किसी काम नहीं आती, सभी अपने पराये हो जाते है, एक दिन यही कड़वा सच है बुढ़ापे का ! कौन समय देता है, अपने घर के बूढ़े व्यक्ति को, किसके पास समय है, और है भी तो कार्यक्षेत्र, भोग और मनोरंजन के लिए, अपनी संतानों के लिए, बूढ़ी माँ को तो जैसे अकेले पन में रहने की आदत ही हो गई है— ‘कितना भी आग्रह कर लो / पर रोज निवाले गिन कर खाती / जीवन के धुधंले पन्नों को बिन ऐनक ही पढ़ती है / घर के लोग व्यस्त सब किस्से अपने मन की बात कहे /एक किताब सहेजे बैठी / जीवन भर की उसकी थाती’

गीत, नवगीत अभिधा नहीं है, या कहिए कोई भी काव्य विधा अभिधा नहीं है, मंजु जी का यह नवगीत शीर्षक गीत है, और मेरी दृष्टि में शायद सबसे उत्कृष्ट गीत भी है, इस संग्रह का, समय स्तब्ध है, आज कितना कठिन और नृशंस है, आज का सच ! कितनी पीड़ाएँ हैं, इस समय के चेतन और अचेतन मन में, फिर भी चुप है, कोई उत्तर नहीं दे पाता — ‘समय निरुत्तर / व्यक्ति निरुत्तर / उत्तर नहीं किसी के पास / जीवन की अनबूझ पहेली डिगा रही मन का विश्वास / कटे पंख फिर उड़ना कैसा बँधे पाँव कैसा चलना /मन के घोड़े हार मन कर देखें / सूरज का ढलना /पीड़ाओं की पृष्ठभूमि पर लिखा जा रहा है आकाश /तपा हृदय अब धूल उड़ाता छोड़ रहा / केवल उच्छ्वास’

इस संग्रह में विविध विषयों के नवगीत हैं, करोना काल पर कई नवगीत हैं, जो एक तरह का विषय का दोहराव ही है। बहुत से गीत साधारण भी लगे मुझे, पर जीवन के गहरे गंभीर रंगों के प्रति मंजु जी की आश्वस्ति संतोषपूर्ण है, वे रचती रहें, आगे भी, नवगीत के उनके और भी संग्रह आयेंगे, ऐसी हम लोगों को अपेक्षा भी है, उनके पास सुंदर बिम्बो को रचने का कौशल है, कल्पना की सघन उचाइयाँ हैं, वे अपनो समृद्ध कलम से गीत नवगीत और काव्य की अन्य विधाओं को पूर्ण मनोज्ञयता से रचती रहें, उनकी काव्यात्मक प्रतिभा उत्तरोत्तर समृद्धि की संजीवनी से अभिसिंचित रहे, इसी शुभकामना के साथ मैं उन्हें इस नवगीत संग्रह हेतु हार्दिक बधाई देती हूँ !

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नवगीत संग्रह-समय निरुत्तर, रचनाकार- डॉ. मंजु लता श्रीवास्तव, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य- १९९ रु. , पृष्ठ-१२८  , परिचय- डॉ. रंजना गुप्ता

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