गुरुवार, 23 जुलाई 2026

लौट आओ फिर परिंदों- डॉ. अशोक अज्ञानी

समकालीन हिंदी कविता में नवगीत ने अपनी रागात्मकता, लोकधर्मी संवेदना और सामाजिक यथार्थ के कारण विशिष्ट पहचान बनाई है। इस विधा ने बदलते समय के अनुभवों को गीतात्मक भाषा में अभिव्यक्त करते हुए मनुष्य और समाज के बीच गहरे संबंधों को स्वर दिया है। डॉ. अशोक 'अज्ञानी' का नवगीत-संग्रह ‘लौट आओ फिर परिन्दों’ इसी परंपरा का महत्त्वपूर्ण विस्तार है। ६० नवगीतों का यह संग्रह केवल भावुक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने समय की विडंबनाओं, मानवीय मूल्यों और लोकजीवन की बदलती तस्वीर का संवेदनशील दस्तावेज़ है। कवि ने श्रमिक, किसान, वंचित वर्ग, गाँव, परिवार और प्रकृति जैसे विषयों को केंद्र में रखकर ऐसी काव्य-दृष्टि विकसित की है, जिसमें यथार्थ की कठोरता के साथ आशा का उजास भी विद्यमान है।

संग्रह का शीर्षक ‘लौट आओ फिर परिन्दों’ अपने भीतर गहरा सांकेतिक अर्थ समेटे हुए है। यहाँ ‘परिन्दे’ केवल पक्षियों के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य की स्मृतियों, संस्कारों, आत्मीय संबंधों और उन मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक जीवन की आपाधापी में कहीं पीछे छूट गए हैं। कवि का यह आह्वान किसी भौगोलिक वापसी का आग्रह नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की ओर लौटने का संदेश है। जब कवि कहता है कि माँ अब भी अपने बच्चों को दाना चुगाने के लिए प्रतीक्षारत है, तब यह प्रतीक्षा केवल एक माँ की नहीं, बल्कि उस समूची लोक-संस्कृति की प्रतीक्षा बन जाती है, जो आज भी अपने बिछुड़े लोगों का स्वागत करने को तत्पर है।

"लौट आओ फिर परिन्दों घर बनाओ 
नींव अपनो को जगाना चाहती है।
माँ तुम्हें दाना चुगाना चाहती है।"

संग्रह का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसकी लोक-सरोकारिता है। डॉ. अज्ञानी उन लोगों के कवि हैं जो विकास की चमक से दूर जीवन के कठिन संघर्षों में निरंतर जूझ रहे हैं। उनके गीतों में मजदूर, किसान, फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले लोग, बाल श्रमिक और उपेक्षित वर्ग केवल सहानुभूति के पात्र नहीं बनते, बल्कि वे कविता के केंद्र में प्रतिष्ठित होते हैं। ‘सब्जी बेच रही है मुन्नी’ जैसे गीत बाल-श्रम और सामाजिक असमानता की उस पीड़ा को उजागर करते हैं जिसे सामान्यतः समाज अनदेखा कर देता है। 

कवि व्यवस्था से प्रश्न करता है, किंतु उसका स्वर आक्रोश से अधिक मानवीय करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वर है। यही कारण है कि उसके गीत केवल भावुकता या कोरे सामाजिक हस्तक्षेप का प्रभाव नहीं उत्पन्न करते बल्कि श्रम के फल का मह्तव भी बताते हैं उदाहरण के लिये-

सब्जी बेच रही है मुन्नी
धरे किताबें पास में
वर्तमान संघर्ष कर रहा 
कल के फल की आस में

ग्रामीण जीवन का बदलता परिदृश्य इस संग्रह का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। ‘डायरी में गाँव’ जैसे नवगीतों में कवि ने विकास और आधुनिकता के नाम पर बदलते गाँवों की त्रासदी को अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। खेतों की जगह दीवारों का खड़ा होना, चारपाई के स्थान पर सोफ़ों का आ जाना और कर्ज़ में डूबे लोगों के बीच प्रदर्शन की बढ़ती प्रवृत्ति—ये सभी बिंब उस सामाजिक विडंबना को उद्घाटित करते हैं, जहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं, किंतु आत्मीयता, संवाद और सामुदायिक जीवन का क्षरण हुआ है। कवि किसी रोमानी ग्राम्य-बोध का निर्माण नहीं करता, बल्कि बदलते गाँवों के यथार्थ को ईमानदारी से सामने रखता है। यही उसकी रचनात्मक शक्ति है।

चारपाई की जगह सोफे रखे हैं/ थे जहाँ पर खेत, दीवारें खड़ी हैं
कर्ज में डूबे हुए हैं लोग, लेकिन/ बैलगाड़ी की जगह कारें खड़ी हैं
गैस से खाना पकाया जा रहा है/ कहीं मिट्टी के नहीं चूल्हे जले हैं  

यहीं तक इस संग्रह का कथ्य स्पष्ट हो जाता है कि डॉ. अशोक 'अज्ञानी' के लिए कविता केवल सौंदर्य-बोध का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक प्रतिबद्धता का सृजनात्मक विधान है। वे विसंगतियों को केवल दर्ज नहीं करते, बल्कि पाठक को आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करते हैं। इसी कारण यह संग्रह समकालीन नवगीत की परंपरा में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में सफल दिखाई देता है।

डॉ. अशोक 'अज्ञानी' के नवगीतों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उनकी रिश्तों के प्रति गहरी आस्था है। आज के व्यक्तिवादी परिवेश में, जहाँ पारिवारिक संबंध निरंतर शिथिल हो रहे हैं, कवि उन्हें जीवन की सबसे बड़ी शक्ति मानता है। संग्रह में 'माँ' पर केंद्रित रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कवि माँ को केवल जन्मदात्री नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, करुणा और जीवन-मूल्यों की आधारशिला के रूप में देखता है। "प्रेम की राजधानी", "पूज्य गंगा का पानी" और "धूप में चाँदनी" जैसे बिंब केवल भावुक उपमान नहीं हैं, बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति की उस आत्मा को व्यक्त करते हैं, जिसके बिना मनुष्य का भाव-जगत अधूरा रह जाता है। इन गीतों में माँ किसी आदर्श प्रतिमा की तरह नहीं, बल्कि संघर्ष और ममता से भरे जीवंत व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित होती है।

माँ है बस्ते में मानो तनी की तरह
घर में सबके लिये अलगनी की तरह
"ताप, संताप सारा छिपाते हुए 
धूप में माँ लगी, चाँदनी की तरह।"

इसी प्रकार कवि बेटियों, पिता और परिवार के अन्य संबंधों को भी सम्मानजनक स्थान देता है। 'एक बेटी काफी है' जैसी रचनाएँ केवल सामाजिक संदेश नहीं देतीं, बल्कि स्त्री के प्रति संवेदनशील दृष्टि विकसित करने का प्रयास करती हैं। इन गीतों में पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा किसी उपदेश की तरह नहीं आती, बल्कि सहज जीवनानुभव के रूप में पाठक के भीतर उतरती है। यही कारण है कि संग्रह का भावलोक कृत्रिम नहीं लगता, बल्कि आत्मीय और विश्वसनीय बन जाता है।

संग्रह का एक अन्य उल्लेखनीय पक्ष इसकी भाषा और शिल्प है। डॉ. अज्ञानी ने भाषा को अनावश्यक अलंकरणों और दुरूहता से मुक्त रखा है। उनकी अभिव्यक्ति सहज, संप्रेषणीय और लयात्मक है। खड़ी बोली के साथ अवधी के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग गीतों को लोक-माटी की गंध से भर देता है। यह भाषिक सहजता उनके नवगीतों को सामान्य पाठक के अधिक निकट ले आती है। कहीं भी शब्दाडंबर या बौद्धिक प्रदर्शन का आग्रह दिखाई नहीं देता। यही सादगी उनकी सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है।

बिंब-योजना की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। कवि अपने आसपास के जीवन से ही प्रतीक और उपमान ग्रहण करता है। खेत, बरगद, पनघट, चूल्हा, बैलगाड़ी, दीवार, माँ, परिन्दे और मिट्टी जैसे बिंब केवल दृश्य नहीं रचते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थवत्ता भी निर्मित करते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से कवि आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को बिना किसी कृत्रिम जटिलता के प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। गीतों की गेयता भी उल्लेखनीय है। छंद और लय का अनुशासित निर्वाह उन्हें मंचीय प्रभाव से आगे बढ़ाकर साहित्यिक गरिमा प्रदान करता है।

खेत खुरपा घास हँसिया
खड़ी खटिया गिरी टटिया
पेट की खातिर कहीं पर
धरी गिरवी मौन पगिया
ये हमारी मौन पांडुलिपियाँ हैं,
इन्हें मत भूलना तुम

संग्रह की वैचारिक भूमि भी पर्याप्त सुदृढ़ है। कवि व्यवस्था की विसंगतियों, सामाजिक असमानता, नैतिक मूल्यों के क्षरण और बढ़ते दिखावे पर तीखी दृष्टि रखता है। वह यह स्वीकार करता है कि वर्तमान समय अनेक विरोधाभासों से भरा है, किंतु उसका उद्देश्य केवल निराशा का चित्र खींचना नहीं है। वह मनुष्य की जिजीविषा, संघर्षशीलता और नैतिक पुनर्जागरण में विश्वास करता है। इसलिए उसके गीतों में प्रतिरोध के साथ आशा भी बराबर उपस्थित रहती है। यही संतुलन इस संग्रह को केवल यथार्थवादी दस्तावेज़ न बनाकर रचनात्मक हस्तक्षेप का रूप देता है।

डॉ. अशोक 'अज्ञानी' का रचनात्मक व्यक्तित्व लोकजीवन, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदना से निर्मित हुआ है। यही कारण है कि उनके नवगीत कृत्रिम बौद्धिकता या शब्द-कौशल के प्रदर्शन में नहीं उलझते, बल्कि सीधे जीवन के अनुभवों से संवाद करते हैं। ‘लौट आओ फिर परिन्दों’ इस दृष्टि से एक ऐसा संग्रह है जो समकालीन नवगीत की मूल चेतना—लोक, श्रम, परिवार, प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंध—को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है। संग्रह का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें संवेदना और विचार के बीच संतुलन बना रहता है। कवि सामाजिक यथार्थ को सामने रखते हुए भी गीत की रागात्मकता और सौंदर्य को अक्षुण्ण रखता है।

संग्रह का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि इसमें निराशा का अंधकार नहीं, बल्कि संघर्ष के भीतर से जन्म लेती आशा की किरण दिखाई देती है। विस्थापन, सामाजिक विषमता, ग्रामीण संस्कृति का क्षरण, रिश्तों की टूटन और नैतिक मूल्यों का ह्रास—इन सभी प्रश्नों को उठाने के बाद भी कवि मनुष्य की संभावनाओं पर विश्वास बनाए रखता है। यही आशावादी दृष्टि संग्रह को जीवन-सापेक्ष बनाती है। पाठक को केवल समस्या का बोध ही नहीं होता, बल्कि वह अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा भी अनुभव करता है। यह विशेषता किसी भी गंभीर साहित्यिक कृति की पहचान मानी जाती है।

आँधियों से लड़े और बढ़ते गए
किंतु कुछ खास आँखों में गड़ते गए
गाँव की छाँव छूटी जहाँ पर वहाँ
धूप की ठाठ के पाठ पढ़ते गए
फूल है शूल है साथ में धूल है
आग है और पानी भी है
यार अपनी कहानी भी है

शिल्पगत दृष्टि से संग्रह की भाषा उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में है। सहज, प्रवाहपूर्ण और लोकधर्मी भाषा पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है। खड़ी बोली के साथ आंचलिक शब्दों का संतुलित प्रयोग गीतों को कृत्रिम होने से बचाता है। बिंब और प्रतीक जीवनानुभव से उपजे हैं; इसलिए उनमें स्वाभाविकता और विश्वसनीयता है। छंद, लय और गेयता का निर्वाह भी इस संग्रह को नवगीत की परंपरा से सशक्त रूप में जोड़ता है। स्पष्ट है कि डॉ. अशोक 'अज्ञानी' गीत को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक चेतना के संवाहक के रूप में देखते हैं।

यह संग्रह मनुष्य को उसकी जड़ों, लोक-संस्कृति और मानवीय मूल्यों की ओर लौटने का आत्मीय आमंत्रण देता है। डॉ. अशोक 'अज्ञानी' ने सिद्ध किया है कि नवगीत आज भी समाज की नब्ज़ पहचानने और सामान्य जन की पीड़ा को कलात्मक ऊँचाई प्रदान करने में पूरी तरह समर्थ है। यह कृति नवगीत के गंभीर पाठकों, शोधार्थियों और हिंदी कविता के अध्येताओं के लिए महत्त्वपूर्ण एवं पठनीय संग्रह सिद्ध होगी।

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नवगीत संग्रह- लौट आओ फिर परिंदों, नवगीतकार- डॉ अशोक अज्ञानी, परिचय- पूर्णिमा वर्मन, प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्श एंड डिस्ट्रिब्यूटर्स, आगरा, २८२००७, कवर- पेपरबैक, पृष्ठ- ११२, मूल्य- रु. २००,  
ISBN--
978-93-7026-949-1

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