श्री राहुल शिवाय के कुछ नवगीतों का मंथन करते हुए कहना चाहूँगा- भाषा में ऐसी व्यंजना-संवेदना उतारी जाए, चिंतन ऐसा जन्में कि चित्त उसी में थोड़ी देर ठहर जाए। मन कुछ सोचने पर विवश हो जाए। आपके कुछ नवगीतों में प्रयुक्त दृश्य-बिम्ब और उनकी संस्पर्शित भंगिमाएँ विचारणीय हैं-
उसी भाव से टाँके तुमने टूटे बटन कमीज के
जैसे मेरी उम्र माँगने करती हो व्रत तीज के।
या
बीतता है दिन कि जैसे
चारपाई पर पड़ा बीमार कोई।
या फिर
जीवन सारा कटु अनुभव है
मधु-मिसरी है माँ।
संग्रह का पहला ही गीत केवल मिट्टी का गुणगान भर नहीं है। भारत और उसका सांस्कृतिक बोध आँखें खोल देता है। गाँवों की धूल में और कंकरीट में खेलकर बड़ा होने में काफ़ी अंतर है। “इस देश की मिट्टी सोना है,” यह कोई रटने वाला जुमला नहीं है। अनुभूति का प्रश्न है। भारत में औद्योगिक विकास की नींव में अभी भी खेती-किसानी और गाँव ही हैं। इस तथ्य को हमारा समय भूलता जा रहा है-
काश! नहीं कटते/मिट्टी से रहते जुड़कर
मिट्टी जैसा चढ़ जाते/हम अगर चाक पर।
भारत का आध्यात्मिक ज्ञान जिसका तात्विक आकर्षण पूरे विश्व को चकित करता है, उस गौरव-गरिमा को पोषित करने वाली सांस्कृतिक चेतना यदि सो गई तो हमारे ज्ञान-गर्व का मिथ्याचरण कितनी देर टिकेगा?
भारत के सामाजिक ढाँचे (किनारे) को समझने में यह नवगीत मदद कर सकता है-वास्तुकर्मी, कुम्भकार, माल्यकार, नाऊ, डोम और काश्तकार आदि ये वो किनारे थे जिनसे प्रगतिशीलता का एक अर्थ था, किन्तु कालान्तर में सामंतशाही (जिसको भारतीय राजनीति समाप्त नहीं कर पायी) द्वारा ये सभी समुदाय पददलित होते गए यही धारणा ब्रिटिश हुकूमत में और भी मज़बूत होती गई। फिर भूमंडलीकरण आया जिसके अर्थ-बाज़ार से समाज के छोटे-बड़े वर्गों में फ़ासले और तीव्रता से बढ़ते गए। आज आदमी-आदमी के बीच अजनबीपन बढ़ता जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में रचनाकार का क्षुब्ध मन अपने सांस्कृतिक अंगों को कटा हुआ महसूस करता है। सबका विकास तभी संभव है जब छोटे कारोबार के प्रोत्साहन को प्राथमिकता दी जाए। पूरा नवगीत मार्मिकता से ओतप्रोत है-
मनिहारिन, नाइन के रिश्ते घर में ऐसे टूट रहे
जैसे एक्सप्रेस ट्रेनों से छोटे ‘टेशन’ छूट रहे
धार नहीं बदली पर
मिट्टी हर दिन कटी किनारों की।
संग्रह के अन्य नवगीतों में ऐसे ही मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट झलकते हैं-’किताबें’, ‘बचपन नहीं खोए’ ‘टूटे बटन कमीज के’, ‘पथ बिहार का’, ‘छठ’, ‘पतझर का उपहार’, ‘विमर्शों की कथा’, ‘हम केवल मजदूर रहे’, ‘विचारों की लड़ाई’, ‘देश-वृक्ष की जड़’, ‘आड़ी-तिरछी रेखाएँ’, ‘जंगल जल रहा है’, ‘ताल का मन’, ‘मैंने गीत लिखा है’ और ‘बाढ़’ आदि नवगीतों में ऐसा कुछ है जो विवेचनीय है। इन नवगीतों के मानवीकरण से या इनकी सोद्देश्यता से पाठकगण चकित हो सकते हैं और तृप्त भी।
ऐसे नवगीत विवेचनीय इसलिए हैं, क्योंकि ये समस्या मूलक हैं और तथ्यमूलक भी। स्त्री में उसके सबल पक्ष की पक्षधरता द्वारा स्त्री-विमर्श को सार्थक करते हैं-
अबला आज सबल हाथों से काट रही है धान
जैसे काट रही हो पल में परधानी का मान
झलक रही है देह-दशा से
श्रम की पैदावार।
या वे नवगीत जो भाईचारा, जाति-पाँति से ऊपर उठ कर वैचारिक एकता को महत्व देते हैं-
तुम अछूत हो, मैं पण्डित हूँ, कहो बीच कब आया था
इफ़्तकार की कैंटीन में कल भी हमने खाया था।
दरअसल रचनाकार सोद्देश्य लेखन के प्रति प्रतिबद्ध है। उसकी सोद्देश्यता यों ही नहीं है मुझे लगता है जैसे वह किसी कार्यशाला का कारीगर है। भारत के समक्ष बिहार प्रांत की दशा-दुर्दशा की अभिव्यक्ति में चेतना का नया पाठ रच देना, जैसे रचनाकार की कोई जवाबदेही है, अद्भुत है। बिहार अब मगध, वैशाली, नालंदा और बुद्ध वाले बिहार को भूल चुका है, जैसे उसे पक्षघात मार गया हो और अब वह भारत के अन्य महानगरों पर आश्रित हो उधार का जीवन जी रहा है। बिहार आज भी अहिल्या बना हुआ है। आज भी राम-चरण खोज रहा है। बिहार से राहुल जी प्रश्न करते हैं-”क्या इस जुगाड़ी (जुगाड़ से जीवनयापन करने वाला) के माथे पर यही भविष्य लिखा है? इस प्रश्न के उपरांत वे एक संकेत देते हैं जिसका अर्थ-भाव बेचैन कर देता है-कोशी नदी में जब बाढ़ आती है तब बिहार तबाह हो जाता है लेकिन राहुल जी इस त्रासदी से भी भयंकर त्रासदी की बात उठाते हैं। बिहार में कारोबार नहीं है। बिहारी शक्ति की चौथाई जनता तो बाहर (अन्य महानगरों से) से कमा कर लाती है-
कोशी से भी बड़ा शोक है घर में कारोबार नहीं
चौथाई बिहार बाहर है फिर भी दिखती हार नहीं
इस जुगाड़ से लिखा मिटेगा,
इस लिलार का ?
दरअसल संग्रहीत नवगीतों की सोद्देश्यता बहुआयामी है। क्योंकि नवगीतकार को समस्याएँ दिखती हैं। समस्याओं का दिखना आवश्यक है-
कुछ लोगों को सिर्फ़ समस्या दिखती हैं
कुछ लोगों को ही दिखते-
इन सब के कारण।
किताबों को डर है, कहीं उन्हें रद्दी के साथ बेच न दिया जाए। जंगल जल रहा है; सभ्यता के दमकल कहाँ हैं? विकास कार्य एक धन्धा है-निर्माण (जो हो चुके) तोड़े जा रहे हैं। बाढ़ एक जल-समाधि है। कहने का आशय ये कि काशी से मगहर तक रोग ही रोग फैले हुए हैं। इन नवगीतों का अध्ययन करते हुए मैं चकित होता हूँ क्योंकि कुछ रोगों के लक्षण ऐसे हैं जिन्हें हिगराया नहीं जा सकता। यह विचारणीय है जब रचनाकार स्वयं कहे- आज हमारा भारत-गर्व भी उधार का है-वही गाँधी-सुभाष, बुद्ध और ताजमहल वाला गर्व है। अभी भी भारत निर्माण की शक्ति की तरफ़ हमारा ध्यान नहीं है। न तो हम तुलसी-कबीर बन पाए और न ही रावण जैसी बुराई को मिटाने के लिए नई शक्ति-साधना कर पाए-
रावण नहीं मरा करता है
राम नाम की महिमा गाकर।
सारांश रूप में कहना चाहूँगा जो महत्वपूर्ण है- नवगीतकार राहुल शिवाय के अनुभव-संसार में भारत-बोध की गहरी पैठ है। भारत-भविष्य के लिए उसके चिंतन में कुछ नई भाव-चेतना है जिसके शक्ति-श्रम पर उसे अटूट विश्वास है। नवगीतों में इस प्रकार की अंतर्वस्तुओं का होना क्या आलोचना का विषय नहीं है? यह दूसरा प्रश्न उठता है। यह प्रश्न उस समय उठ रहा है जब हिन्दी गीत-कविता की आलोचना, संकट से गुज़र रही है। वैसे यह विचारणीय है-यह संकट क्यों है? संग्रह के कुछ नवगीत जैसे ‘गंगा पर लकीर, ‘विमर्शों की कथा’ और देशवृक्ष की जड़’ आदि की मीमांसा या उन पर विमर्श....मूल्यांकन किस आलोचना-धारा के अंतर्गत करना उचित होगा?
हमें देखना होगा कल की आँखों का सपना बच जाए
ठूंठ हो रही शाखाओं में नयी चेतना फिर हरियाये
नयी शिराओं के भीतर ही
देश-वृक्ष की फैली जड़ है।
निष्कर्ष रूप में इस संग्रह में समकालीन चेतना के नए स्वर के नवगीत हैं अर्थात् परम्परित भाषा-’टोन’ से कुछ अलग हट कर ‘चरैवेति’ चरितार्थ हुआ है। पाठकगण एक नए जागरण-भाव की आश्वस्ति के साथ-साथ भाषा के नये विकल्पों के अग्रगण्य हो सकते हैं। कहना चाहूँगा-विचार धाराओं और वादों-विवादों से मुक्त होकर चलना, कठिन डगर पर चलना है। सही दिशा-विवेक तक पहुँचने में रास्ते भी भ्रमित करते हैं।
आलोचना की अभिव्यक्ति दोष मुक्त तभी होती है जब आलोचक का हृदय विमल हो। इस तथ्य की कसौटी पर ‘मिट्टी कटी किनारों की’ के अवगाहन में जो दिखा और जो पकड़ पाया वह प्रस्तुत है। कृति के रचनाकार श्री राहुल शिवाय को और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मैं अपनी शुभाकांक्षाएँ अर्पित करता हूँ।
नवगीत संग्रह- मिट्टी कटी किनारों की, नवगीतकार-राहुल शिवाय, परिचय- वीरेन्द्र आस्तिक- प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा, कवर- पेपर बाक, पृष्ठ- १३६, मूल्य- रु. २४९,
ISBN : 978-81-983152-0-5

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