बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कुछ मन के कुछ मौसम के- मधु शुक्ला

कुछ मन के कुछ मौसम के'कुछ मन के कुछ मौसम के' शीर्षक से मधु शुक्ला के दूसरे नवगीत संग्रह में उनके ६५ गीतों को पढ़ना सुखद अनुभव है। मधु के प्रथम गीत-संग्रह 'आहटें बदले समय की' (२०१५) के गीतों और उनकी बाँहों में बाँहें डालकर चलने वाली गज़लों में हिंदी भाषा की अभिव्यंजना शक्ति और अपनी बात अपने शब्दों में कहने की ज़िद ने मधु को राष्ट्रीय स्तर पर चमका दिया। अपने समय को इन्होंने कितने कम शब्दों में बाँध लिया है, ज़रा देखिएगा—
देखे इन आँखों ने कितने
तीखे-मीठे-खारे दिन
सोच रहे हैं गुमसुम बैठे
देहरी और दुवारे दिन।

यह देहरी और दुवारे की बात वही कर सकता है जो ग्रामीण परिवेश में रचा-बसा हो। इसी प्रकार, इस एक गीत की दो पंक्तियाँ ही कई खंडकाव्यों पर भारी हैं—
मन ने आकाश छू लिया
हम ललित निबंध हो गए।
कविता का प्रयोजन भी यही है। वह मन को उड़ाकर आकाश में पहुँचा देती है और पूरे व्यक्तित्व में लालित्य भर देती है।

मधु का अंतर्मुखी स्वभाव होने के बावजूद उनका पहला संग्रह काफी चर्चित हुआ। उसके बल पर उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान मिले। उसके पूरे दस साल बाद यह संग्रह 'कुछ मन के कुछ मौसम के' आ रहा है। निश्चय ही, इन दस वर्षों में कवयित्री का मन भी बदला है और कविता का मौसम भी। मधु के गीतों में पहले की अपेक्षा परिपक्वता बढ़ गई है। पहला ही गीत एक ग्रामीण परंपरा के नष्ट होने का संकेत देता है।

आधी सदी पहले, गाँवों में हर घर की माँ-चाची शाम को चूल्हा जलाने के लिए दूसरे घर से आग माँग लाती थीं और इसी बहाने गाँव-जवार के समाचारों का आदान-प्रदान कर लेती थीं। यह संवाद आग माँगकर चूल्हा जलाने की विवशता से अधिक अपने 'नेटवर्क' को पुष्ट रखने में बड़ी भूमिका निभाता था। मधु का यह गीत उसी टूटे हुए पुल की ओर संकेत करता है—
बन गए हिस्से सभी किस्से-कहानी के
अब कहाँ रिश्ते बचे, वे आग-पानी के।

यह आखिरी ग्रामीण परिदृश्य था, जिसे मधु की पीढ़ी ने देखा था। दूसरी ओर मधु ने काव्य की भारतीय परंपराओं को भी बड़ी निष्ठा से संजोया है—
"लिख गया युग के अधूरे
प्रेम की दारुण कथा
यक्षिणी की पीर, शापित यक्ष
के मन की व्यथा
फिर कथानक में नई
बातें पुरानी लिख गया।
एक बादल फिर नदी की
ज़िंदगानी लिख गया।"
यह 'शापित यक्ष' की कथा हमें महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से जोड़ देती है, जिसकी गीतात्मकता किसी भी गीतकार के लिए अभीष्ट है।

मधु के गीतों की बड़ी विशेषता यह है कि वह परिवेश के अनुरूप भाषा चुनती हैं। एक मध्यवर्गीय परिवार के सुख-दुख को इससे अच्छा शब्द देना असंभव है—
रिश्तों के बीच बना इक ताना-बाना है
संग बैठ तुमसे बस हँसना-बतियाना है
चाय तो बहाना है।

जब मध्यवर्ग की बात चली, तब उसके जीवन की आपाधापी को कौन अनदेखा कर सकता है? मधु के इस गीतांश में आधुनिक जीवनशैली और उसकी त्रासदी को बहुत ही सटीक शब्दों में व्यक्त किया गया है—
समय-सारिणी के कोल्हू में जुता हुआ हर दिन
बोझ तले पिस रहीं थकन की आशाएँ अनगिन
पंख नोचते हैं पिंजरे में सपनों के पंछी
रहा समय उँगली पे मुझको बस दिन-रात नचा।
घर और दफ्तर के बीच कोल्हू के बैल-सा जुतना, थकन के बोझ तले आशाओं का पिसना, पिंजरे में कैद सपनों के पंछी का उकताकर अपने पंख नोचना और समय की उँगली पर नाचना... यही तो मध्यवर्गीय परिवारों की त्रासदी है!

जीवन के इस सर्पदंश में ज़हर को बुझाने का काम एकमात्र प्रेम करता है। वही ऐसी जड़ी है, जो विषमता का सारा विष हर लेती है—
चलो छुएँ हम छोर क्षितिज के
बनकर प्रेम-पतंग
विश्वासों की डोर थाम कर
इक-दूजे के संग।

इस प्यार में भी संतुलन और विवेक होना बहुत ज़रूरी है, वरना जीवन और यौवन नरक भी हो सकता है—
टूट न जाए डोर प्यार की
आपस में टकराकर
साथ-साथ उड़ना, पर रखना
दूरी तनिक बनाकर।
यह इसलिए कि 'सूख न जाए कहीं विहँसते खुशियों के ये रंग'; किसी भी प्रसंग का अंतिम छोर पर चला जाना निराश करता है।

आंचलिकता को नवगीत का प्रस्थान-बिंदु माना गया है। मधु जाड़ा आते ही मकर संक्रांति के नदी स्नान और तिल-गुड़ के वितरण को भूलती नहीं हैं। वह शीत ऋतु की तिला संक्रांति को बहुत ममत्व के साथ याद करती हैं—
फिर तटों पर जुड़ गए मेले
उत्सवी ये रंग अलबेले
बाँट कर तिल-गुड़ चलो हम सब
शीत के ये दिन कठिन झेलें।

इसी संग्रह में जाड़े का एक अद्भुत दृश्य उपस्थित है, जिसकी जीवंतता जाड़े के दिन के मानवीकरण से विलक्षण हो गई है—
धूप की सहमी हुई चिड़िया
पंख अपने तोलती पल-छिन
सो रहे दुबके रजाई में
देर तक घुटने समेटे दिन।

मधु भारतीय इतिहास के उन आदर्शों को भी याद करती हैं, जिनकी छाप से पूरे विश्व की मानवता सहस्राब्दियों से संचालित हुई है। वह आदिकवि वाल्मीकि से नए मर्यादा पुरुषोत्तम राम का इतिहास पुनः रचने की प्रार्थना करती हैं—
विश्व हित में फिर रचो, आदर्श नूतन
हर हृदय में प्रेम की गंगा बहा दो
फिर नए जयघोष से गूँजें दिशाएँ
स्वर नए संकल्प के उर में जगा दो
दिव्यतामय दृष्टि से फिर अवतरित हो
इस धरा पर राम जैसा महानायक।

इस संग्रह में अनेक गीत ऐसे हैं, जिनकी पंक्तियाँ आपको आगे बढ़ने से रोक देंगी। उनमें से ही एक मुखड़े की चार पंक्तियाँ मैं उद्धृत किए बिना अपनी बात पूरी नहीं कर सकूँगा—
अनगिनत सपने
उम्मीदों के सजाता है
जब कभी बादल
नदी के गीत गाता है।

इस गीत-संग्रह में एक से एक ऐसे गीत हैं, जो जीवन और जगत के हर पहलू को बेहतर ढंग से समझने का नज़रिया देते हैं। इन गीतों में से अनेक गीत संगीतबद्ध होकर समाज में नया जन-मानस तैयार कर सकते हैं।

दुर्भाग्य हिन्दी भाषी समाज का है कि इस क्षेत्र के गायक या तो भजनों में लीन रहते हैं या गजल पर आकरअटक जाते हैं।जबकि साहित्यिक गीतों की ये पगडंडियाँ उन्हें करोड़ों काव्य प्रेमियों के गाँव तक ले जाएँगी। वह समय भी आएगा ही। अभी तो अपनी लाड़ली कवयित्री डॉ मधु शुक्ला को बधाई और शुभकामनाएँ देने का समय है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह संग्रह पाठकों का मनरंजन करेगा और उनका अजस्र प्रेम पाएगा।

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नवगीत संग्रह- कुछ मन के कुछ मौसम के, नवगीतकार-मधु शुक्ला, परिचय- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र- प्रकाशक- लिटिल बर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली-- ११०००२,  कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- १४८, मूल्य- रु. २९५,
 ISBN : 978-93- 6306- 439- 3



 

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