व्यवस्था के प्रति सजग चेतना और संवेदना की धार, जो उनके सृजन के सरोकारों में आरंभ से ही उपस्थित थी, समय और जीवनानुभवों के साथ और भी प्रखर और मुखर होकर हमारे सामने आती है। अपनी इसी प्रखर और मुखर सृजनात्मकता के चलते जय चक्रवर्ती आज हिन्दी के कविता प्रेमी पाठकों के विशाल वर्ग के चहेते कवि बन गए हैं। एक नवगीतकार के रूप में, एक दोहाकार के रूप में और समकालीन हिन्दी गजलकार के रूप में वे एक तरह-से पूरे देश में रायबरेली का प्रतिनिधित्व करते हैं। छांदस कविता की विविध विधाओं में उनके अब तक दो नवगीत संग्रह (थोड़ा लिखा समझना ज़्यादा तथा ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ), दो दोहा संग्रह (संदर्भों की आग तथा ज़िंदा हैं आँखें अभी), एक गजल संग्रह (आख़िर कब तक चुप बैठूँ) और एक मुक्तक संग्रह (हमारे शब्द बोलेंगे) प्रकाशित हो चुके हैं, जो पाठकों के मध्य भरपूर चर्चित हुए हैं। इसके अलावा एक नवगीत, एक दोहा और एक गजल संग्रह प्रकाशनाधीन हैं।
फिलहाल, उनके हाल ही में प्रकाशित नवगीत संग्रह ‘ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ’ से गुज़र रहा हूँ । इस कृति में कवि के ५७ नवगीत संग्रहीत हैं, जिन्हें पढ़ते हुए कोई भी सजग–संवेदनशील पाठक जय चक्रवर्ती के सृजनात्मक– सरोकारों को बखूबी समझ सकता है। इन नवगीतों का फ़लक बहुत व्यापक है और यह भी कि कवि की अभिव्यक्ति का निर्भीक, निडर, बेलौस अंदाज़ न न सिर्फ ध्यान आकर्षित करता है, अपितु अपने रचनाकर्म के प्रति ईमानदार रचनाकार से भी परिचय कराता है। उनकी वैचारिक पक्षधरता की बात करें तो, जितना मैं समझ पाया हूँ, कह सकता हूँ कि वे जनसरोकारों के स्वाभाविक, स्वाभिमानी, अपनी शर्तों जीने और खुद की बनाई राह पर चलने वाले कवि हैं। शायद इसीलिए प्रतिष्ठित नवगीतकार यश मालवीय उन्हें ‘कबीर की लुकाठी हाथ में लेकर चलने वाला गीतकार’ (संग्रह की भूमिका, पृ.९) बताते हैं। अपने लेखकीय सरोकारों के बारे में वे स्वयं कहते हैं-
नहीं/ तुम्हारी शर्तों पर/ मैं गा न सकूँगा।
मैं पंछी हूँ / बादशाह हूँ अपने मन का।
डर न किसी का / और न भूखा हूँ कंचन का।
मैं दर्पन हूँ/ सच को/ मैं झुठला न सकूँगा (गा न सकूँगा)
अपनी शर्तों के साथ चलने वाले इस कवि के मन में कहीं कोई भटकाव या भ्रम नहीं है। उसकी दिशा और लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट है। कहाँ और किस ओर जाना है, यह उसे बहुत अच्छे से मालूम है। तभी वह कहता है : पथ मेरा रोको मत भाई/ मुझको बहुत दूर जाना है। एक अन्य गीत की ये ध्रुव पंक्तियाँ कवि के रास्ते के एक एक पड़ाव की पहचान करा देतीं हैं-:
तुम दरबारों के गीत लिखो / मैं जन की पीड़ा गाऊँगा
तुम सोने-मढ़ा अतीत गुनों/ मैं अपना समय सुनाऊँगा
तुम सुख-सुविधा को मीत चुनो/ मैं दुख का जश्न मनाऊँगा
तुम किरन किरन को कैद रखो/ मैं सूरज नया उगाऊँगा (मैं दुख का जश्न मनाऊँगा)
जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ कि जय चक्रवर्ती अपनी साफ़गोई और हक़बयानी के चलते भीड़ में रहते हुए भी भीड़ से अलग दिखाई देते हैं। वे जो कुछ देखते और सोचते हैं , उसे बिना लाग लपेट के कहना बखूबी जानते हैं। ‘अन्दर कुछ–बाहर कुछ’ वाला स्वभाव उन्हें कभी रास नहीं आया। ‘हम तो सीधी बात लिखेंगे’-शीर्षक गीत में वे कहते हैं :
हम क्या जाने मंदिर-मस्जिद / वेद-पुराण, कथा, व्रत-पूजन
श्रम की चादर बुनते हैं हम/ ओढ़े भूख-प्यास की कतरन
घूँघट, बिंदिया, पायल लिखकर/ तुम चाहे जैसे कवि बनना
जन-संघर्षों की भट्टी में / शब्द-शब्द हम सदा सिंकेंगे (हम तो सीधी बात लिखेँगे)
जन-संघर्षों की भट्टी में अपना शब्द-शब्द सेंकने वाला यह गीतकार जब सिस्टम की सड़ान्ध को देखता-महसूसता है तो भीतर तक काँप जाता है । सत्ता और सियासत की ऊँची-ऊँची कुर्सियों बैठे लोगों का विद्रूप चरित्र उसे झकझोरता है। उन्हें लगता है कि कपट से, छल से, मक्कारी से येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना ही आज के राजनेताओं का चरित्र रह गया है । टोपियाँ और झंडे भले ही अलग हों , पर सोच और कर्म सबके एक जैसे ही हैं। ‘ये सियासत के दुपट्टे’ शीर्षक नवगीत मेँ वे कहते हैं-
‘हों ये गाँधी छाप या फिर / रामनामी हों
संघ, परिषद, फ्रंट, दल / या मध्यगामी हों
भेष-भाषा भिन्न हों या / हों अलग झंडे
फाँसने को जाल में हों अलग / हथकंडे
एक थैली के / मगर हैं सभी चट्टे और बट्टे’
शहर हों या गाँव , हमारी सामाजिकता अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और संप्रदाय हम पर हावी हो रहा है । पाखंड, नफरत और अंधविश्वास का ज़हर पूरे समाज पर इस कदर हावी है कि इंसान और इंसानियत का पक्ष लेने वाला व्यक्ति अब ‘देशद्रोही और गद्दार’ घोषित किया जाने लगा है । इस विषाक्त वातावारण में गीतकार कबीर को याद करता है :
आओ पुनः कबीर! पुनः आओ इस जग में
धूर्त, छली , कपटी / बतलाते / खुद को ईश्वर
बिना किए कुछ/ बैठे हैं / श्रम की छाती पर
बचा नहीं है अंतर / अब साधू में-ठग में (आओ पुनः कबीर)
जय चक्रवर्ती अपने हिस्से के समय का सम्पूर्ण लेखा-जोखा अपने नवगीतों में समाहित कर लेना चाहते हैं। ऐसा करते हुए जीवंत प्रश्नों पर प्रबुद्ध वर्ग की उदासीनता से वे दुखी भी होते हैं और भीतर से आंदोलित भी होते हैं। समझौतावादी मूल्यों और समझौतावादी लोगों के साथ वे कभी सामंजस्य नहीं बैठा पाते। एक ईमानदार लेखक की यही प्रतिबद्धता है कि वह अपनी लेखकीय जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटता, परिणाम जो भी हो। कविता को वे ‘कला’ की सीमाओं से बाहर निकालकर ‘भोगे हुए यथार्थ’ तक ले जाते हैं :
‘तुम्हें तुम्हारा सुख है कविता / शब्द तुम्हारे लिए कला है
हम क्या जानें कविता-अविता / जो भोगा है वह निकला है
घूँघट,बिंदिया, पायल लिखकर/ तुम चाहे जैसे कवि बनना
जन संघर्षों की भट्टी में / शब्द-शब्द हम सदा सिंकेंगे’ (हम तो सीधी बात लिखेंगे )
समय की तमाम विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद कवि ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। मौसम बदलेगा और आशाओं का सवेरा उषा की नव किरणों के साथ एक दिन धरती पर दस्तक ज़रूर देगा। रात चाहे जितनी भी लंबी हो, सुबह का आगमन कोई रोक नहीं सकता :
‘बदलेगा साथी ! ये मौसम भी / बदलेगा
फिर लौटेंगी मुस्कानें/ रूखे-चिटके / उदास चेहरों पर
फिर धरती से आसमान तक / गूँजेंगे संवेदन के स्वर’ (ये मौसम भी बदलेगा )
‘ज़िंदा हैं अभी संभावनाएँ’ के माध्यम से जय भाई यही संदेश देना चाहते हैं। जय चक्रवर्ती के नवगीत गेय भी हैं और पेय भी हैं- यहाँ पेय का आशय सारगर्भित होने से है। गीत सरल हैं, प्रवाहपूर्ण हैं , साथ ही दूरंदेशी भी हैं। गति, लय, छंद के निकष पर एक-एक शब्द अपनी जगह स्थाई रूप से प्रतिष्ठित है। किसी शब्द को इधर से उधर स्थानांतरित करने गुंजाइश इन गीतों में न के बराबर दिखाई देती है। संग्रह के तमाम नवगीत अलग से विशद व्याख्या और टिप्पणियों की माँग करते हैं। यही इस संग्रह और संग्रह के रचनाकार का वैशिष्ट्य है। जय भाई को ठीक से पहचानना हो , तो आप इनकी रचनधर्मिता से जुड़कर देखें। यकीन मानिए वर्तमान के नवगीत-कवियों की बेशुमार भीड़ में यह नवगीतकार आपको दूर से पहचान में आ जाएगा।
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नवगीत संग्रह- जिंदा हैं अभी संभावनाएँ, रचनाकार- जय चक्रवर्ती, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, २३२ बी-१, लोकनायक पुरम, बक्करवाला, नयी दिल्ली-११००४१, प्रथम संस्करण-२०२२, मूल्य- रु, १९९ सजिल्द, पृष्ठ-१३५ , परिचय- रविशंकर शुक्ल, ISBN-978-93-92617-81-2

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