रविवार, 1 जुलाई 2018

सहमा हुआ घर - मयंक श्रीवास्तव

वरिष्ठ गीतकार श्री मयंक श्रीवास्तव के  प्रतिनिधि गीत संग्रह "सहमा हुआ घर" का तृतीय संस्करण मेरे सामने है। आज जब साहित्य की सारी विधायें पाठकों और किताबों की बिक्री के मामले में संकट से गुजर रही हैं, किसी गीत संग्रह का तीसरा संस्करण प्रकाशित होना, गीतकार की क्षमता और उसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। यह गीत के लिये भी शुभ है।

श्री श्रीवास्तव मात्र अठारह वर्ष की उम्र में जीविकोपार्जन हेतु गाँव छोड़कर शहर आ गये। वे शहर आये तो अपने साथ अपना गाँव भी ले आये। गाँव उनके हृदय में बसता है। इसीलिये उनके गीतों में गाँव पूरी शिद्दत से है। अनुभूत। भाव में या अभाव में। शहर के कटु अनुभव उनके गाँव को और गहरा हरा कर देते हैं।  यद्यपि समय के साथ गाँवों में भी परिवर्तन आया है। शहर से नजदीकी गाँवों में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है परन्तु दूर दराज के गाँवों की भौतिक स्थिति में आज भी कोई खास परिवर्तन दिखाई नहीं देता। फिर भले ही शहर ने गाँव के भोले मानस में घुसपैठ कर ली हो। गाँव में लगातार होते परिवर्तन की ध्वनियां इन गीतों में है। तमाम परिवर्तनों और भौतिक अभावों के बावजूद उन्हें अपनी मीठी स्मृतियों से भरा गाँव बहुत प्रिय है। वे शहर में रहते हुये उसे बहुत शिद्दत से याद करते हैं- 

"क्या पता है
 कब मिलेंगे
गाँव की चौपाल वाले दिन
नीम पीपल
नहर पनघट
झील पोखर ताल वाले दिन
ढूंढता हूँ रोज होली
और कजली गायकों के स्वर
साफ माटी के बने घर
घास लकड़ी फूँस के छप्पर
एक रोटी
चैन वाली
और रुखी दाल वाले दिन।"
उन्हें याद आते हैं लहलहाते खेत, खलिहान, नदी, नाव, पसीना बहाते मजदूर- किसान, घर, गुड़ की चाय, गाय- बछड़ा, बकरी। गाँव की सुबह, दोपहर, शाम। 

जैसे मन गाँव में ही छूट गया। लेकिन वे नॉस्टैल्जिक नहीं हैं। शुभ और सुंदर का खोना किसे नहीं सालता। गाँव के नकारात्मक बदलाव और अपसंस्कृति की घुसपैठ से उनका सरल- तरल मन बहुत दुखित है। सुविधा- सम्पन्नता की अंधी आकांक्षाओं ने जहाँ लगभग हर मन में अर्थ- लोभ पैदा किया है, वहीं रिश्तों और संस्कारों का ह्वास भी किया है। रिश्तों के आँगन में दरारें पैदा की हैं-
"कुआ पुराना
मीठा पानी
रस्सी टूटी।
जानबूझकर
ओढ़ लिया
अंधापन ड्योढ़ी ने
मेरी ओर
नहीं देखा
भैया की मौड़ी ने
रिश्तों के 
बंटवारे का दुख 
झेल रही खूंटी।"

लेकिन पानी अभी मीठा है और यही मानस में पैठा गाँव अभी भी गीतकार के मन में संभावनाएं जगाये हुये है।


दूसरी तरफ महानगर अपने ईर्द-गिर्द के गाँवों को लीलते जा रहे हैं। ऊँची- ऊँची अट्टालिकाओं और धुआं उगलती चिमनियों ने उन्हें बेदखल कर दिया है। दूरदराज के गाँवों से भी रोजी- रोटी के लिये पलायन जारी है। मौसम की मार, मंहगाई और कृषि क्षेत्र की सतत् उपेक्षा से किसान घोर आर्थिक संकट में हैं। रोजगार की समस्या विकराल रुप धारण कर चुकी है। पूँजीवादियों से गठजोड़ के चलते सत्ता- व्यवस्था ने  तो जैसे आमजन की तरफ से मुंह फेर लिया है। योजनाएं बहुत छनकर पहुंचती हैं। ऐसे में आने वाली पीढ़ी के भविष्य की चिंता स्वाभाविक है। वह कैसी होगी? 
"कोंपलें
 तालीम लेकर जब बड़ी होंगीं
पीढ़ीयों की पीढ़ीयाँ ठंडी पड़ी होंगी
वर्णमाला का दुखी
हर एक अक्षर है"
या
"लोग जो भी
इस जमाने
के बड़े होंगे
जी हुजूरी
की नुमाइश में
खड़े होंगे"
ऐसी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकट की घड़ी में छोटे- बड़े लाभ- लोभ के लिये जिम्मेदार लोगों का कर्तव्यच्युत होना निराशाजनक है-
"शब्द की सामर्थ्य बौनी हो गई है
अर्थ खुद ही
कुर्सियों से जोड़ते रिश्ते
क्या करे यह पेट की अनिवार्यता है
लोग नंगी पीठ वाले
बिक रहे सस्ते"

संग्रह के गीतों में भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा का व्यवसायीकरण, सांप्रदायिकता, पूँजीवाद, सत्ता और व्यवस्था का छल, शोषण,  पारस्परिकता का अभाव, अविश्वास, वैमनस्य और छल जैसी समस्याएं और ज्वलंत प्रश्न सशक्त अभिव्यक्ति पाते हैं।


अर्थाभाव से जूझते निम्न- मध्य वर्ग पर, शिक्षा के व्यवसायिकरण के प्रभाव का एक मार्मिक चित्र देखें-
"अक्षर मंहगा हुआ
मगर कंगाल हथेली है
दुर्लभ आना हुआ
हाथ में गुड़ की ढेली है
आँखों के आगे बच्चों का
आगत डोल गया।"
कठिन आर्थिक संघर्ष के बीच जब घर चलाना ही मुश्किल हो, एक अदद अपने घर का स्वप्न देखना भी मुश्किल है। ऐसे में बच्चे का अपने घर की भोली मांग या प्रश्न अंतरमन में कैसा भूचाल खड़ा कर निर्थकताबोध से भर सकता है। निम्न मध्यम वर्ग की पीड़ा का यह मार्मिक चित्र भी देखिये-
"जब से अपना घर पूछा है
मेरे लड़के ने
मुझको आकर घेर लिया है
एक धुँधलके ने।
....................
जाने कितना समय लगेगा
उत्तर पाने में
मुझको अपना भला लगा
गूँगा बन जाने में
बहुत बड़ा तूफान
बुला डाला है तिनके ने।"

तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, जहाँ सहज जीवन असंभव है, गीतकार निराश नहीं बल्कि इन परिस्थितियों के कारकों के प्रति आक्रोशित है। यह आक्रोश किसी बुद्धिजीवी का शगल है, न ही किसी किस्म का रोमान। यह भोक्ता के हृदय से निकली अंतिम आह के बाद की एक बेहद जरूरी और सार्थक प्रतिक्रिया है। जिस तरह किसी धातु की तन्यता की सीमा होती है, कि एक सीमा बिंदु तक ही उसे खींचकर तार बनाया जा सकता है, ठीक उसी तरह सहनशीलता की भी सीमा होती है। एक सीमा के बाद विष्फोटक आक्रोश जन्म लेता है। यह आक्रोश सामूहिक चेतना पाकर परिवर्तनकारी होता है। यहाँ गीत जनगीतात्मक स्वरूप ले लेते हैं-
"हम तुम्हारी चुप्पियों चालाकियों से/ द्वंद्व करने के लिये आगे बढ़े हैं
इसलिए ही तो/ बुर्जुआ आस्थाओं/ के सुनहरे जाल से पहले लड़े हैं/ लड़खड़ाकर गिर पड़ें ऐसा हमारे/ पाँव के नीचे कभी दलदल न होगा/ और प्राणो के लिए घातक, तुम्हारी/ बंद मुठ्ठी में हमारा कल न होगा/ तुम नहीं समझो/ दया का पात्र हमको/ हाथ में युरेनियम लेकर खड़े हैं।"

श्री मयंक श्रीवास्तव के सरल- सहज व्यक्तित्व के अनुरूप ही उनके गीतों की भाषा भी सरल- सहज है। जो जीवन से जन्म लेती है। सरल लिखना जितना कठिन है, उससे भी कहीं कठिन है, सरल भाषा में सम्मोहन पैदा करना। श्री श्रीवास्तव यही करते हैं। वे जटिल बिम्ब नहीं रचते। बिम्ब और प्रतीक जीवन से सहज चले आते हैं। अतः सहज संप्रेषणीय और ग्राह्य हैं। हम संग्रह को पढ़ना शुरू करते हैं और पूरा पढ़कर ही छोड़ते हैं। वे हृदयस्थ हो जाते हैं और मुक्त नहीं होने देते। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि "सहमा हुआ घर" का प्रथम संस्करण सन १९८३ में आया था और आज लगभग अड़तीस वर्षों बाद भी उतना ही टटका और असरदार है।
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गीत नवगीत संग्रह- सहमा हुआ घर, रचनाकार- मयंक श्रीवास्तव, प्रकाशक- पहले पहल प्रकाशन
25- ए, प्रेस कॉम्प्लेक्स, एम. पी. नगर भोपाल (म.प्र.), तृतीय संस्करण संस्करण, मूल्य- रु. १५०, पृष्ठ- १०४, समीक्षा- शशिकांत गीते, आईएसबीएन क्रमांक- 978-93-92212-16-1 

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