रियाणा की ज़रखेज़ माटी, पानी की सुगंध में रचे-बसे हमारे समय के बहुप्रशंसित रचनाकार हैं राजपाल सिंह गुलिया जी। गीत, ग़ज़ल, दोहे—लगभग सभी छांदस रचनाओं का सृजन कर खूब यश बटोरा है। प्रस्तुत संकलन ‘चंदन वन’ इनके ९० नवगीतों का समुच्चय है। संग्रह के सभी गीत अपने समय के युग-बोध और मूल्य-बोध के साथ हमें अपनी स्तरीयता की गंध से चमत्कृत करते हैं। गुलिया साहब के भीतर एक निर्दोष कवि-आत्मा बसती है। अब तक का मेरा अनुभव कहता है कि कठिन होना जितना सरल है, उतना ही सरल होना कठिन। यही कारण है कि इनके गीतों में कठिन बिंब और अपरिचित नए शब्दों की कौंध नहीं मिलती। बिना लाग-लपेट के सब कुछ देते हैं और अपनी सादगी से हमें सराबोर कर देते हैं।
थोड़ा-सा अख़बार पढ़ा, फिर बैठ गया तह करके
जो भी मुँह में आया, मुखिया चला गया कह करके
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दर्शन दुर्लभ हुए मीत के जब से दिया उधार
कल तक थे जो गाय सरीखे, हुए शेर ख़ूंखार
कवि की चेतना उर्वर है। यही उर्वरता नवगीत का उदात्त रूप प्रस्तुत करती है। आज जब मानवीय मूल्यों का निरंतर क्षरण हो रहा है, झूठ और पाखंड का बोलबाला लगातार बढ़ता जा रहा है; ऐसे में कोई ईमानदार कवि कैसे चुप रह सकता है? यही कारण है कि देश-समाज की हर चोट करती घटना कवि को संवेदना में डुबो जाती है, द्रवित करती है और कवि उसे अपनी आत्मा की भाषा में ढाल लेता है। इसमें कहीं कुछ काव्य-कौशल नहीं, और न कोई उक्ति-वैचित्र्य की कलाकारी है। सब कुछ जीवनानुभव की सुगंध और सादगी के मोहक रंगों से लबरेज़ है।
अलसाए से मंदिर-मस्जिद, जाग रही है मधुशाला
नई सुबह की राह देखती, खाँस-खाँस करके खाला
गुमसुम नभ से चाँद नदी में
अपना अक्स निहारे
इसी तरह इस संकलन के अधिकांश गीत समय के अधुनातन सन्दर्भ से भरे-पूरे हैं, जो कई ज्वलंत प्रश्न खड़ा करते हैं जिनके समाधान आवश्यक हैं। समय गतिमान है। गुलिया साहब ने इस मिथक को भी तोड़ा है कि गीत-नवगीत कठिन बिंब तथा उक्ति-वैचित्र्य के बल पर ही रचे जा सकते हैं। गुलिया जी के गीतों में समय-यथार्थ की कोमल अनुभूतियाँ भी हैं और छंद की लयात्मकता भी। हम कह सकते हैं कि इनके गीतों में श्रेष्ठ गीतों की तरह ग्राम्य-बोध तथा जीवन-जगत से जुड़े कई अन्य प्रश्न हैं जो अपने हल खोजने के लिए उन्मुख हैं।
भारतीय सैन्य-सेवा व अध्यापक से अवकाश ग्रहण कर कवि अपने गाँव-घर आकर अब पूर्णतः कृषि-कर्म पर निर्भर हैं। लेकिन यह तो अब जीविकोपार्जन का भरोसेमंद कार्य नहीं रहा। कवि द्वारा एक उक्ति देखिए—
अधम चाकरी होती थी, था उत्तम काम किसानी
लगती अब ये वर्तमान में कितनी गलत बयानी
हाकिम खाए रोज़ मिठाई
हलधर सत्तू घोले
कवि के व्यक्तित्व में चंदन की महक है। इनके गीतों में जो गीतमीय पारदर्शिता है वह ‘चंदन वन’ नाम को सार्थक करती है। जीवन-यथार्थ की कटुताओं, विसंगतियों और चाँदनी संस्कृति की सुआस से महकते ये अप्रतिम गीत सीधे पाठकों के मन में उतरकर अपना अमिट प्रभाव छोड़ते हैं। ‘चंदन वन’ शीर्षक की यही उपादेयता है, जो सर्वथा समीचीन एवं सार्थक है। यही कारण है कि कवि का मूल भाव सकारात्मकता से भरा पूरा है। सारे यथार्थ के बाद कवि आशान्वित है कि सपने मरे नहीं हैं। सब कुछ बदलेगा और अच्छे दिन फलीभूत होंगे—
देह हुई निस्तेज मगर ये सपने मरे नहीं
सूख गए हैं पात डाल पर लेकिन झरे नहीं
मज़दूरी न मिलने पर कामगार की व्यथा मन को संवेदना से आपूरित कर देती है—
“लेबर चौक बैठकर देवा मन में करें विचार
काम मिला ना आते मुझको हुए आज दिन चार।” (पृष्ठ-१०४)
इसी प्रकार लिंगभेद की संवेदना मन को द्रवीभूत कर देती है—
“खबर सुता की सुनकर उस दिन जार-जार थी रोई अम्मा
सारी रात कटी चिंता में
नहीं तनिक भी सोई अम्मा।” (पृष्ठ-३७)
स्वार्थपरता और मानवीय व्यवहार में आए परिवर्तन पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष अवलोकनीय है—
“दुर्लभ दर्शन हुए मीत के जब से दिया उधार,
कल तक थे जो गाय सरीखे हुए शेर ख़ूंखार।” (पृष्ठ-५९)
भाषा की सरलता, सहजता एवं लाक्षणिकता अर्थ-सम्प्रेषणीयता में अत्यंत सहायक बन पड़ी है। जीवन-संगिनी के परमधाम चले जाने पर परिवार में वृद्ध की स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है। द्रष्टव्य है एक झलक—
“परमधाम जब गई जनानी, सूना लागा जग सारा
सहमा-सा रहता घर में, ज्यों वीर पड़ा रिपु की कारा
रोज़ निगलता अपमानों के सूखे अश्रु संग निवाले
...
गरम चाय की एक याचना, ख़ून बहू का खौल रही
आँगन बीच उछलती पगड़ी, धीर जरठ का तौल रही...” (पृष्ठ-३३)
दोहा, कुंडलियाँ, गीत, नवगीत, ग़ज़ल, मुक्तक, बाल-साहित्य आदि में अनवरत सृजनरत साहित्यकार श्री राजपाल सिंह गुलिया द्वारा रचित इस संग्रह में सामयिक भावबोध के ९० गीत-नवगीत संगृहीत हैं, जो जीवन की यथार्थवादी अनुभूतियों, प्रतीकों, भावबिंबों और प्रौढ़ शिल्प से आप्लावित हैं। इनमें सकारात्मक सोच, आशावादी चिंतन और सामाजिक सरोकारों के बहुआयामी स्वर शिद्दत से मुखरित हुए हैं तथा वृद्ध जनों की वेदना, कृषक एवं श्रमजीवियों की त्रासदी, बेरोज़गारी का दंश, जीवन मूल्यों का क्षरण, प्रदूषण, कदाचार, आभासी दुनिया का वैचित्र्य, सम्बन्धों में स्वार्थपरता, कटुता, लिंगभेद, ग्रामत्व-बोध, प्रकृति का नैसर्गिक चित्रण, मानवीकरण, आलंकारिक व्यंजनामूलक संवेदना की पारदर्शी अभिव्यक्ति दर्शनीय है।
युवा बिटिया के समय पर कॉलेज से न लौट आने पर माँ की चिंता को गुलिया जी ने बड़े मार्मिक शब्दों में चित्रित किया है। यथा—
“आज इकाई से माँ का दुख बनकर हुआ दहाई
पारुल बिटिया आज अभी तक कॉलेज से नहीं आई
झुंझलाती अम्मा अब फिर-फिर मंझले को हड़काए
कोशिश करके देख फोन, ये शायद अब मिल जाए
तुझको खबर नहीं बेटा, ये कैसा वक़्त कसाई
अनहोनी आशंका मारे विश्वासों को कोड़े
दूर क्षितिज पर घिरे तमस में रवि के सातों घोड़े
माँ की पीर छुपी ऐसे, ज्यों जूते बीच बिवाई।” (पृष्ठ-२८)
प्रकृति-चित्रण में गीतकार ने उसका मानवीकरण भी बहुत खूबसूरत शब्दों में व्यंजित किया है। नवगीत की इन पंक्तियों में भाव-सौंदर्य के साथ आलंकारिक सौष्ठव का वैभव व चित्रात्मकता दर्शनीय है। द्रष्टव्य है—
“थका हुआ दिन धूल फाँकता पहुँचा संध्या द्वारे
देख हवा के रुख को अब तो पत्ता तक न हिलता
दूर क्षितिज पर सूरज बाबा गोधूलि संग मिलता
सुलग रही ये धरती मैया बैठी मन को मारे....।” (पृष्ठ-५८)
काव्य-पंक्तियों में प्रतीकात्मकता, बिंबात्मकता व चित्रात्मकता अत्यंत श्लाघनीय बन पड़ी है।
इन नवगीतों में संक्षिप्ता, लयात्मकता, तुक, संगीतात्मकता, लालित्य, मार्दव और मधुरता स्पष्टतः परिलक्षित है। ये नवगीत गुलिया जी की रचनात्मक ऊर्जा एवं सृजनात्मक क्षमता का सफल प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें पढ़कर पाठक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता। खेती करना किसी समय उत्तम समझा जाता था, परंतु आज स्थिति उल्टी है। गुलिया जी का कहना है—
“अधम हुई अब उत्तम खेती, करें वणज की बात
उगे खेत में भवन हवेली, कनक हुआ अब रेत
मरले और कनाल छोड़कर बिके गजों में खेत
हल से देखो मिली बैल को
बरसों बाद निजात......।” (पृष्ठ-४७)
समस्त नवगीतों की भाषा सहज, सरल, सुबोध एवं प्रवाहमयी है। इनमें तत्सम शब्दों के साथ तद्भव, देशज, आंचलिक एवं अंग्रेज़ी व उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी अवसरानुकूल प्रयोग हुआ है। सूक्तियों, प्रतीकों, मुहावरों, अलंकारों और वक्रोक्तियों ने कृति की अर्थवत्ता एवं मौलिकता में चार चाँद लगा दिए हैं। “दाल न गलना, कान में तेल डालना, आसमान सिर पर उठाना, धूल फाँकना” जैसे मुहावरे सम्प्रेषणीयता में अभिवृद्धि करते हैं। विविध विषयों पर उन्होंने कलम चलाई है और हिंसा व प्रदूषण को गीतकार ने बख़ूबी रेखांकित किया है—
“लोथों की तादाद देखकर शर्मसार हैं नहरें
बेबस जन अब बैठ गली में गिनें न रोग की लहरें
गर्वित लगती धार नदी की, सहमे से हैं तीरे।” (पृष्ठ-७७)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि श्री राजपाल सिंह गुलिया प्रणीत ‘चंदन वन’ गीत-नवगीत संग्रह कृति भाव, भाषा, शिल्प, शीर्षक, सन्देश, उद्देश्य, काव्य-अभिप्रेत व प्रयोजन की दृष्टि से बड़ी प्रभविष्णु एवं उपादेय कृति है। गीत-नवगीत में निरंतर प्रयोग हो रहे हैं और साहित्य तो वही है जिसमें निरंतर नूतनता हो। कवि का यह ‘चंदन वन’ अपनी नूतनता की महक लिए लगभग अभिनव प्रयोग-सा ही है। विश्वास है कि साहित्य में इस संकलन का हुलस कर स्वागत होगा।
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नवगीत संग्रह- चंदन वन, नवगीतकार- राजपाल सिंह गुलिया, परिचय- उदय शंकर सिंह उदय- प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, २१२-ए, एक्सप्रैस व्यू अपार्टमेंट, सेक्टर ९३, नोएडा - २०१३०४, कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- १२०, मूल्य- रु. २९९,
ISBN : 978-93-49136-14-4

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