मंगलवार, 1 मार्च 2022

धूप भर कर मुट्ठियों में- मनोज जैन


सद्य प्रकाशित '"धूप भरकर मुट्ठियों में" मनोज जैन के ८० नवगीतों का सुन्दर संग्रह है। किसी साहित्यिक कृति की सार्थकता केवल कथ्य, शिल्प से नहीं वरन उसकी सामाजिक उपादेयता से भी जाँची जानी चाहिये। बगैर पूर्वाग्रह रचा साहित्य समाज के लिए तात्कालीन समय का दस्तावेज होता है। संदर्भित पुस्तक में संग्रहित नवगीतों ने समय से सच्चा साक्षात्कार किया है। जो संवेदनशील हृदय को स्पर्श कर उसकी चेतना को स्पंदित करते हैं। सभी नवगीत समरस समाज के निर्माण पर अधिक ज़ोर देते प्रतीत होते हैं।

कविमन सामाजिक अंतर्विरोधों, राजनीतिक दुरभिसंधियों, युगीन त्रासदियों, स्वार्थपरता, अवसरवादिता और पारिवारिक विघटन के कटु यथार्थ को अपने आस-पास घटित होते देख रहा है। यही कारण है कि संग्रह के नवगीत संवेदना, सघन अनुभूति के साथ वर्तमान की सामाजिक समस्याओं से प्रत्यक्ष साक्षात्कार करा रहे हैं तथा तमाम युगीन विसंगतियों पर शालीन विरोध भी दर्ज करा रहे हैं। संग्रह का आदि कुत्सित आत्मवृत्तियों से मुक्ति की प्रार्थना और समष्टि की शुभेच्छा के साथ हुआ है। वहीं सांस्कृतिक एवम् आध्यात्मिक चेतना के गीतों में व्यक्ति से समष्टि तक की बेहतरी हेतु की गयी कामनाओं में जुड़ी हथेलियाँ हैं। जब किसी को किसी से कोई सरोकार नहीं रह गया ऐसे में कवि की यह कोमल कामना हृदय को स्पर्श करती है -
कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर, प्यार के दो बोल बोलें
हर घड़ी शुभ है चलो, मिल नफरतों की गाँठ खोलें
 शब्द को वश में करें, आखरों की शरण हो लें ( पृष्ठ - ३५ )

पुस्तक की भूमिका लिखते हुए श्रेष्ठ साहित्यकार पंकज परिमल ने जैसे नवगीतों की परिभाषा ही लिख डाली है। वहीँ प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज द्वारा इन गीतों को आध्यात्मिक चेतना के गीत बताया है। यथार्थ की अनुभूतियाँ संग्रह के गीतों में पंक्ति -दर -पंक्ति उपस्थित हैं। कवि ने छद्म उजालों का अनावश्यक स्तुतिगान न करके समाज, साहित्य, राजनीति के स्याह पक्षों को अनावृत किया है।
 लाज को घूँघट  दिखाया
 पेट को थाली 
आप तो भरते रहे घर, हम हुये खाली/ (पृष्ठ-  ३८)

वरिष्ठ नवगीतकार राजेन्द्र गौतम संग्रह के गीतों को ‘जन-पक्षधर कवि के गीत ’ बताने में कोई संकोच नहीं करते हैं। जबकि कैलाश चन्द्र पन्त, संचालक, राष्ट्र-भाषा प्रचार प्रसार समिति, भोपाल, इन गीतों को एक सचेत स्वर मानते हैं तो कुमार रवीन्द्र नवगीतकार को नवगीत के अधुनातन संस्करण का एक श्रेष्ठ कवि मानते हैं। स्वाभिमानी एवम् आत्मविश्वासी होना किसी भी व्यक्ति की नैसर्गिक चाह होती है। कवि को अपनी नैसर्गिकता बेहद प्रिय है जो इन पंक्तियों में तटस्थ होकर उभरती है-
हम सुआ नहीं हैं पिंजरे के, जो बोलोगे रट जायेंगे //
 हम भी दो रोटी खाते हैं / तुम भी दो रोटी खाते हो। ( पृष्ठ- ३९)

संयुक्त परिवार समाज का उदाहरण रहे हैं, किन्तु भौतिकतावादी युग ने इनकी मूल पर मठ्ठा डालने का कार्य किया है। भौतिकता, स्वार्थपरता, आधुनिकता ने हमारी संवेदनाओं और शऊर को गटक लिया है, आज की पीढ़ी परस्पर स्वस्थ संवाद स्थापित करने में असमर्थ है। जिसके कष्टकारी दृश्यों को कवि ने गीत के लिबास में हू-ब-हू पेश किया है -
बात -बात में बात काटता / बेटा अपने बाप की
 कौन भला समझेगा पीड़ा / युग के इस संताप की। ( पृष्ठ- ९७)

कैसा है भाई! बैठ गया आंगन में /कुंडलिया मार
गिरगिट से ले आया/ रंग सब उधार
हक माँगो / दिखलाता/ कुआँ कभी खाई
चूस रहा रिश्तों को, बनकर तू जोंक
जब चाहे बन जाता/चाकू की नोंक
घूरता हमें/ जैसे अज को कसाई। (पृष्ठ - ४३)

पुस्तक के नवगीतों पर पढ़कर आवरण पर शस्ति में माहेश्वर तिवारी लिखते हैं ‘यह ऐसे कवि के गीत हैं जो गीत मात्र लिखते ही नहीं, गीतात्मक क्षणों को जीते भी हैं’। आत्मबोध और आध्यात्मिक दृष्टि कोण कविमन में समानांतर उपस्थित रहा है। इसी के फलस्वरूप उच्चतम मानवीय बोध से संपृक्त समष्टि शुभता के गीत इस संग्रह में पढ़ने को मिलते हैं -

काश! हम होते / नदी के तीर वाले तट /
हम निरन्तर भूमिका / मिलने -मिलाने की रचाते /
पाखियों के दल उतरकर/ नीड़ डालों में सजाते /
चहचाहट सुन / छलक जाता हृदय घट (पृष्ठ - ४४)

बीते समय की बात हुई जब जनप्रतिनिधियों की छवि सम्मान योग्य होती थी, वर्तमान में ' नेता ' सुनते ही मन मस्तिष्क में जो छवि उभरती है वो इस गीतांश से इतर नहीं होती ...
 'चित ' पर नजर रखता पैनी
पट में भी रखता है आशा
पल-भर में हो जाता तोला
क्षण- भर में हो जाता माशा
जो अंडे सोने के देता केवल उसी को है सेता  ( पृष्ठ- ७८)

सत्ताओं और उनके सुशासन का हाल किसी से छिपा नहीं है। कवि ने इसे रेखांकित करने में किसी तरह की कोताही नहीं बरती है।
 कुछ प्रश्नों को // एक सिरे से / हँसकर टालकर गया 
 मन को साल गया //
 शकुनि सरीखी नया सुशासन
चलकर चाल गया …( पृष्ठ -६१) 

मैं पूछूँ तू खड़ा निरुत्तर बोल कबीरा बोल
 चिंदी चोर विधायक के घर प्रतिभा भरती पानी।
 राजाश्रय ने वंचक को दी संज्ञा औघडदानी।
 खाल मढ़ी है बाहर -बाहर है भीतर तक पोल। (पृष्ठ -७५)

राजनीति की उठापटक औ धींगामुश्ती में केवल जनता ही है जिसको चूना लगता है। (पृष्ठ -७६)
 चारो तरफ अराजकता है कैसा यह परिवेश है, कैसा यह देश। (पृष्ठ -७७)

एक गीतकार के लिये गीत ही आत्मबल का केन्द्र होता है, उसके लिये गीत ही विषम परिस्थितियों में वह प्रकाश स्तम्भ है जिसके जरिये अंधकार की सरणियों में उम्मीद की लौ जलाई रखी जा सकती है। ऐसे में कवि स्वयं तो विसंगतियों को उजागर करने हेतु प्रतिबद्ध है ही, वो कविकुल से भी इसी मुखरता की प्रत्याशा रखता है।
दिखा आइना जो सत्ता का / पारा नीचे कर दे /
जो जन गण के / पावन मन को समरसता से भर दे/
 शोषक, शोषण का विरोध जो करे निरंतर हटकर .. ( पृष्ठ -११३)

कृतिकार सामाजिक विसंगतियों के झंझावात से जूझने में प्रेम को दफ्न होने नहीं देता। हालाँकि अजब विरोधाभास है कि प्रेम सदियों से समाज की आँखों की किरकिरी रहा अब भी है किन्तु प्रेम की महत्ता और अस्तित्व सृष्टि के उद्भव से है और चिरकाल तक रहेगा। शायद ही इस जगत में कोई ऐसा हो जिसे प्रेम न हुआ हो या प्रेम को किसी भी स्वरूप में महसूस न किया हो। कृतिकार प्रेम और उसकी नाजुकी की अभिव्यक्ति वर्ज्य नहीं समझता, संग्रह के कई गीत अपनी सम्पूर्ण भव्यता के साथ प्रेम की सत्ता के अधीन हैं।
चाह थोड़ी इधर, चाह थोड़ी उधर
बंद आँखों से देखे गुलाबी अधर
सब्र के बाँध टूटे, सभी रात को।
(याद रखना हमारी मुलाकात को ) ( पृष्ठ- ५४)

कहा जाता है जब मन प्रेम के अधीन हो तो व्यक्ति विवेक ( संयम ) खो देता है। ऐसे ही नाजुक पल का दृश्य इन पंक्तियों में उपस्थित होता है....
हो गई है आज हमसे एक मीठी भूल
धर दिये हमने अधर पर चुंबनों के फूल ...
लाजवंती छवि नयन में फिर गई है झूल  ( पृष्ठ -५५)

 इन्द्रधनु-सा खींचता है कौन अपना ध्यान।
द्वंद्व में जा फँसा गहरे बुद्धि का विज्ञान।
 हारने को सहज अपना मन हुआ तैयार। (पृष्ठ- ६४ )

प्रेम सम सरल एक गीत की पंक्तियाँ अपनी सरलता से सम्मोहित करती हैं, जिनमें गीतकार गीत का गुरुत्व बढ़ाने हेतु भारी भरकम आयातित शब्दावली का प्रयोग न करके बाल कविता जैसे शब्दों का प्रयोग करता है और यही सहज शब्दावली इस गीत को वजनी बना देती है.... मन का हिरन कुँलाचें भरता मन का मोर मगन हो झूमे मन का खरहा यूँ शरमाये मन की तितली उड़-उड़ जाए मन का पाँखी पंख पसारे। ( पृष्ठ -९१)

भाषा स्तर पर कवि स्पष्ट एवं सहज संप्रेषणीय भाषा के पक्षधर हैं। संग्रह के गीतों की भाषा पाठक से मानसिक कसरत नहीं कराती अपितु गहन व्यञ्जनात्मक अभिव्यक्ति से संपृक्त नवगीतों की भाषा बेहद सरल और सहज है। जो पाठक को तत्काल स्वयं से जोड़ती है। संग्रह के विविधवर्णी गीतों को पढ़कर एक बिन्दु पर ध्यान बार - बार अटकता है कि कवि का चिंतन सामयिक व तर्कसम्मत है, फिर भी कुछ गीतों की घनीभूत आस्था, चिंतन एवं तर्क की तरफ पीठ फेरे बैठी है। बहुत सँभव है बचपन के संस्कार या ऐसा परिवेश जहाँ एक सजग कवि और आस्था का परस्पर सानिध्य हो। जिसका प्रभाव कुछ गीतों में उभर आया है। कवि के चिंतन ने सँग्रह में प्रकृति पर्यावरण और परिवेश को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इस खुरदुरे समय में जब, बच्चे आक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहे हैं, शमशान की राख ठण्डी नहीं हो रही है, सत्ता आत्ममुग्धता के सारे पैमाने तोड़ निरंकुश हो लोक हितों के विपरीत नीतियाँ बनाकर अट्टहास कर रही है, तब "धूप भरकर मुट्ठियों" के नवगीत समाज, परिवार में प्रेम एवं समरसता के गुरुतर मूल्यों का प्रसार करते हैं।
---------------------------------------------------------
गीत- नवगीत संग्रह - धूप भरकर मुट्ठियों में, रचनाकार- मनोज जैन मधुर, प्रकाशक- निहितार्थ प्रकाशन,  साहिबाबाद,  गाजियाबाद। प्रथम संस्करण- २०२१, मूल्य सजिल्द- रूपये २५०/- ,  पृष्ठ- ११९, आलेख - अनामिका सिंह

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

क्या आपने यह पुस्तक पढ़ी है? यदि हाँ तो उसके विषय में यहाँ टिप्पणी करें। उपरोक्त समीक्षा पर भी आपके विचारों का स्वागत है।