शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

परस्मैपद- देवेन्द्र शर्मा इंद्र

"परस्मैपद",नवगीत विधा के वरिष्ठतम पुरोधाओं में अग्रगण्य श्री देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'जी का चौदहवाँ नवगीत संग्रह है। इस नव्यतम संग्रह में 'इन्द्र' जी ने अपने २००९ से २०१२ तक के ५८ नवगीतों को स्थान दिया है। 

संग्रह के प्रारम्भ में विस्तृत भूमिका के द्वारा अपनी रचना शीलता और अपने पूर्ववर्ती वरिष्ठ,समकालीन एवं परवर्ती नए रचनाकारों के माध्यम से नवगीत के इतिहास का संक्षिप्त विवेचन किया है साथ-ही-साथ छान्दसिक और छंदमुक्त काव्य-धाराओं का वर्णन करते हुए कविता की लयात्मकता और छंदोबद्धता के नष्ट होने के कतिपय कवियों, संपादकों, समीक्षकों तथा विश्वविद्यालयी अकादमिकों के षड्यंत्रपूर्ण प्रयासों का भी उल्लेख किया है। "परस्मैपद" में संग्रहीत सभी गीत अपने आपमें स्वतंत्र इकाई हैं अतः प्रत्येक गीत स्वतंत्र रूप से विवेचन योग्य है। मैंने अपनी सुविधा से इन्हें भाषा और शिल्प, वर्ण्य-विषय, सम्प्रेषणीयता तथा सम्बोधनीय पाठक और रचनाकार की अभीप्सा जैसे कुछ वर्गों में बाँट कर प्रतिक्रिया की है।

भाषा के बारे में 'इन्द्र' जी ने स्वयं कहा है, "मैंने अपने गीतों की अभिव्यक्ति के लिए कोई साँचा नहीं निश्चित किया और न ही किसी विशिष्ट भाषा-शैली का अविष्कार किया। हाँ, मैं विषयानुरूप भाषा-शैली और रचना-प्रकल्पों का मुखापेक्षी अवश्य रहा। यह तथ्य "परस्मैपद" के गीतों में भी लक्षित किया जा सकता है।"

संग्रह के गीतों में 'मैं', 'हम', 'वह', 'वे', 'तुम' या 'आप' जैसे सर्वनामों का प्रयोग अनायास नहीं हुआ है बल्कि विषय की आवश्यकता के अनुरूप है। जहाँ मैं और हम का प्रयोग स्वयं को परिभाषित करते हुए आत्मनेपद की सात्विकता को उदघाटित करते हैं वहीं स्वप्नजीवी गीत परस्मैपद हो जाते हैं। और दूसरों का भार ढोते हुए असमर्थ के सबल कन्धे बन जाते हैं।
''दूसरों का भार हम ढोते रहे
'शब्द' होकर भी रहे बस 'अर्थ' के
हर सफ़र में आदि से अवसान तक
हम सबल कन्धे बने असमर्थ के" ('परस्मैपद' नवगीत से )

आत्म-नियंत्रण की अभिव्यक्ति में 'चुप रहेंगे' गीत की पंक्तियाँ-
"जिस सदन में
बोलते सब
हम वहाँ पर चुप रहेंगे तुमुल-कोलाहल-कलह में
हम न कुछ
मुँह से कहेंगे"।

'इन्द्र' जी ने अनेक गीतों में आपने समकालीन रचनाकारोँ से अलग स्वयं को परिभाषित करते हुए इंगित किया है तथा किसी दैन्य को नहीं बल्कि सात्त्विक अहम को जीते हुए व्यक्त किया है। उनके गीत ,'नाचरे! मयूरा', 'कल्पतरु हूँ', 'जलहंसिनी हूँ मैं', 'अधूरी सूचियाँ', 'यक्षगान', 'दिग्दिगन्त हूँ', 'खण्डितजलयान-सा', 'अवसान मेरा', 'अपरिभाष्य मैं', 'गोपन कथा अधूरी', 'चन्द्रापीड हूँ मैं', 'मैं सागर हूँ', 'गीत मेरे' आदि गीतों में अपने विनम्र स्वत्त्व को उकेरा है। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

"आतप के दिन बीतें
छलके ये दिन रीतें मैं मुरझी पंखों पर
मोती बिखराऊँ।" ( 'नाचरे! मयूरा')

"जानकर भी
क्यों बने अनजान इतने
भीड़ का मैं
गुमशुदा चेहरा नहीं हूँ।" ('कल्पतरु हूँ')

वहीं 'अधूरी सूचियाँ' गीत में कहा है-
"तुम मुझे पहचान देने पर तुले हो
और मैं खुद को मिटाना चाहता हूँ।"

सात्त्विकता के साथ स्वत्व को व्यक्त करते हुए 'यक्षगान' में कहा- "हाँ, मैं हर संशय का
समाधान हूँ
उच्छलजल-प्लावन में महायान हूँ।"

और इसी के साथ आगे-
"चिर अतृप्त मरुथल में
निर्झर हूँ मैं
तुहिनावृत-मंत्रित
वैश्वानर हूँ मैं
मैं ही अपना अमेय
कीर्तिमान हूँ
कटे हुए पंखों वाली
उड़ान हूँ।"

'फिर 'दिग्दिगंत हूँ' में अहम तत्व कहता है-
"अपने एकांत पीठ का मैं महंत हूँ।"

और आगे-
"मैं रचता
तोड़ता रहा
देशकाल की सीमाएँ
लयवन्ती
मुझसे होतीं सर्जन की गीताभाऐं
मैं अनादि संवेदन हूँ
मैं अनन्त हूँ।"

'खण्डित जलयान-सा' में अपने अहम को तिरोहित करते हुए-

"शंखपूजा, दीप से विरहित
भग्न प्रतिमाहीन
मंदिर हूँ।"

अपने जीवन के आठ दशक के बाद स्वयं का आकलन किसी हताशा या दैन्य से दूर निरन्तर सक्रियता संघर्ष पूर्ण अहं शून्यता का प्रकटीकरण है-

"मुझे लेकर समर मे तुम न जाओ
प्रत्यञ्चाहीन
टूटा इन्द्रधनु हूँ।" ('अवसान मेरा')

"मैं संज्ञावाचक शब्द
कभी था अर्थवान
अबशेष रह गया हूँ
केवल उपसर्गों में।" (अपरिभाष्य मैं)

'गोपनकथा अधूरी' तक आते-आते बचपन की यादों में अहम् शून्य होता चलता है-
"आठ दशक पहले
जब मैंने
अपनी ये आँखें खोली थीं बाल-विहंगम की
उड़ने को
दो नन्हीं पाँखें डोली थीं" तथा
"अब तक यादें
दुहराती वह
मन की गोपन कथा अधूरी।"

फिर 'मैं सागर हूँ' में स्वयं को परिभाषित किया है-
'मैं सागर हूँ अतलांत सिन्धु
मुझमें डूबो, संधान करो।' और आगे-

''यों निरुद्देश्य ही
तुम कबसे
मुझपर हो पत्थर फेंक रहे
उत्कम्प शिशिर के
मौसम में
धूप में स्वयं को सेंक रहे
मैं तुमकोसुधा-कलश दूँगा
तुम एक बूँद विष-पान करो।''

'गीत मेरे' तक आते-आते अपने अग्नि-धर्मा, अमृत सिंचित गीतों को सौंपते हुए कह रहे हैं-

''हैं समर्पित गीत मेरे
झील, सरिता, सागरों को
उपवनों को खादरों को''

और अपने गीतों के बारे मे आत्मकथ्य-
"सत्य से संवाद करते
ये सनातन हैं, न मरते
ये सिमटते,ये बिखरते भूमि से नभ तक विचरते।''

जब स्वयं का सत्य समान धर्मा सहगामियों से मिलता है, तब 'मैं', 'हम' में विलीन होकर संयुक्त प्रतिरोध के लिए सन्नद्ध हो जाता है और यही सत्य गीतों में उतारा है 'इन्द्र' जी ने इस संग्रह के 'हम' द्वारा सम्बोधित गीतों में। 'चुप रहेंगे', 'हाथ में पहने हुए हम', 'परस्मैपद', 'जुगल बंदी', 'वापस लौट चलें', 'हिरण्य-गर्भ', 'इस पार : उस पार', 'उठने लगे मेले', 'कोई न आयेगा', 'बिम्ब जो हमने बुने हैं', 'हम महायान हैं', 'तिलक कुंकुम का', 'उड़ गये तुम' शीर्षक के गीतों में रचनाकार का 'मैँ' का 'हम' में विलय हो जाता है और एक जैसी मान्यताओं में विश्वास रखने वाले समानधर्मियों की ओर से सामूहिक संवाद करता है।जैसे कि 'हाथ में पहने हुए हम' गीत में-

''घुप अँधेरी रात में
हम ही जलाते
ज्योति की रंगीन फुलझड़ियाँ।''
और 'जुगलबंदी' में,-
''हाँ, हमने
ताउम्र निभायी ख़ूब जुगलबंदी
माना हममें रहे आँकड़े
तीन और छह के।''

आगे 'हिरण्य-गर्भ' में हम को परिभाषित करते हैं,-
''हम ही आदि
हिरण्य-गर्भ हैं
हम संस्कृति के ऊर्णनाभ हैं
गरल बिन्दु हैं
अमृत-सिंधु हैं
सत्य सनातन हानि-लाभ हैं''

तथा 'उठने लगे मेले' गीत में,-
''अस्तमित होते
समय के सूर्य हैं हम
जिसे जितनी चाहिए
वह रौशनी ले ले''

'तिलक कुंकुम का' गीत में 'हम' संवाद करता है-
''बहुत कुछ
हमसे कहा तुमने
अब जरा अपनी सुनाओ तो।''

और रचनाकार फिर 'उड़ गये तुम' में सवाल करता है-
''गीत हम कब तक
बुनें यों
इस अकेलेपन उदासी ऊब की गहराइयों के
खण्डहर में
शंखवर्णी टूटती
परछाइयों के''

रचनाकार का 'मैं', 'हम' में रूपांतरित होकर 'तुम' या 'आप' से सवाल करता है। असहमति को व्यक्त करते हुए प्रतिरोध और प्रहार की भाषा मुखर हो जाती है। इस तरह का कथ्य जिन गीतों में व्यक्त हुआ है उनमें मुख्य हैं- 'कल्पतरु हूँ' में कहा है-
''आँख से पट्टी उतारो
मुझे देखो
मैं अभी तक चल रहा
ठहरा नहीं हूँ।''

'जुगलबंदी' में प्रहार करते हुए-

“आप उड़े पुष्पक-विमान से
नाप लिया अम्बर
हमने अलख जगाया
पैदल ही घर-घर जाकर'' और

''बड़बोले थे आप
हमें स्वर-संयम का भ्रम था
अभिधा और व्यंजना का यह
अद्भुत संगम था
हम लय बुनते रहे
आपने
छंद तोड़ डाला"
'उग चुका है उग्र तारा' गीत अपनी भाषा एवम शिल्प के साथ-साथ अपनी घनीभूत ऊर्जा से तथा कथित स्वयंभू आलोचकों, विवेचकों और मूल्यांकन कर्ताओं पर प्रहार करता है। यह गीत अपने कथ्य के साथ शिल्प के नये प्रयोग की भी उत्कृष्ट रचना है। मुक्त-छंद की लम्बी रचना में से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करने से स्वाद नहीं आएगा। अतः पाठक स्वयं पढ़कर आत्मिक आनन्द प्रप्त करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
'तिलक कुंकुम का' गीत भी अपनी पूरी क्षमता से प्रहार करता है-
''बहुत कुछ
हमसे कहा तुमने
अब जरा अपनी सुनाओ तो।'' और-
''युद्धमें
कितने किले जीतें
अब जरा यह भी बताओ तो।'

इसी तरह 'अप्रासंगिक' में साफ़ तौर से कहा-
''सच तो यह है
बन्धु!
आप प्रासंगिक नहीं रहे''

उपर्युक्त उद्धृत गीतों के अलावा अन्य-पुरुष को सम्बोधित या समय गत यथार्थ को व्यक्त करते हुए गीत, कवि के सरोकार और मान्यताओं, सहमति और असहमति, संवेदना और अनुभूति का शब्दांकन हैं। गीतों की भाषा और शैली का कथ्य के अनुरूप प्रयोग किया गया है। इन गीतों में ,'पुष्करिणी', 'गाँवोंमें', 'रमजानी', 'नीलकण्ठ बोला कब', 'उद्गीथ', 'दिवस आश्विन के', 'आलमगीरी', 'वापस लौट चलें', 'निर्वाण यात्रा', 'बदली का घिरना', 'जो नहीं करना था', 'सोनामाटी', 'गाथा थके कन्धों की' ,'बियावान जंगल है', 'नदी बहती है', 'फूल चुनकर लौट आये', 'गीत करते हैं इशारे', 'सब कुछ श्रीहीन हुआ', 'दो दृग वे', 'डूब गयी वह हंस-किंकिणी' 'राजहंस उड़ गए कहीं', 'मत हो उदास', 'नदिया कहाँ गयी', 'छवि तेरी', 'साँझ हुई', 'कैसे दिन आये', 'सपने की आग' तथा 'अरुण ज्योति पर्व' हैं जिनमें 'इन्द्र' जी ने जीवन के विभिन्न पक्षों को छुआ है और जीविका की तलाश में पलायन करके अपनों से दूर गए अपनी ही संतति के बदलते मनोविज्ञान से संवेदित मानस का निरूपण किया है और विषय के अनुरूप अभिधात्मक, लाक्षणिक अथवा व्यंजना का प्रयोग करते हुए प्रतीकों और बिम्बों को चुना है।
संग्रह के गीतों में 'इन्द्र' जी की गीत-नवगीत को प्रतिष्ठित करने की पीड़ा नहीं बल्कि नवगीत के माध्यम से छन्द के विरोधियों को ललकार है जिसे शैलीगत विविधता के द्वारा छंद और मुक्तछंद के अनेक प्रयोगों में व्यक्त किया है। विशाल अनुभूतियों की विविधता ने नवगीत लिखाये हैं 'इन्द्र' जी से, जिन्हें केवल स्वान्तःसुखाय नहीं कहा जा सकता बल्कि सम-अनुभूति के संवेदन की सफल अभिव्यक्ति है। 'गाँवों में' शीर्षक नवगीत में व्यक्त संवेदन की पंक्तियाँ-
''आते जब विवाद के अवसर
घर, घूरा, खेती बिक जाते किसी-किसी के कभी उम्र भर
हाथ नहीं पीले हो पाते
सुनते हैं यों, हर बेटी के
अपने-अपने वर होते हैं''

''रमजानी'' नामक रचना में अपने कथ्य में मर्मस्पर्शी छुअन के साथ परदेश गए बेटों के बदलते मनोविज्ञान से रमजानी की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
''दो बेटे जब हुए सयाने
चले गए परदेश कमाने
पहले थी कुछ ख़तो-किताबत
बदल दिए अब ठिये-ठिकाने
रमजानी अब निपट अकेले
बस्ती भर में हैं लासानी
काट रहे तन्हा जिनगानी।''

'दिवस आश्विन के' नवगीत में समय चक्र के साथ बदलते परिवेश का चित्रण-
''मृत्यु के सम्मुख
बहुत निरुपाय है जीवन
झूमते हैं कदलियों में
तीक्ष्ण बदरी-वन
अब अमृत घट से
छलकता
कूट हलाहल मलयगिरि पर आब से हैं
वंश नागिन के।''

और फिर 'आलमगीरी' में बदलते परिवेश की ऐतिहासिकता से वर्तमान का चित्रण-
''लोग
सुरंगें बिछा रहे हैं
धरती के भीतर
बीच बहस गुमसुम बैठे हैं सब बटेर-तीतर
जो कुछ अब हो रहा
वही तो पहले होता था
रही टिटहरी एक चीखती
सारी रात जगी।''

रचनाकार परिवर्तन को जरूरी मानते हैं लेकिन इतना नहीं कि अपनी परम्परा को छोड़कर पहचान ही समाप्त हो जाये। अतः 'वापस लौट चलें' में कहते हैं-
''यह सच है
हर नयी चीज में
होता आकर्षण
टूट न पाता किन्तु पुरातन का भी
सम्मोहन
ज्यों विदेश में सुधि आये
बचपन का गँवई घर
खुद को भी
पहचान न पाये
क्यों इतना बदलें।''

जीवन के आठ दशक, वयोवृद्धता के अहसास से भविष्य के आसन्न सच को अनायास व्यक्त कर रहे हैं अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में। 'निर्वाण यात्रा' में कह दिया-
''शून्य को हो जायँ अर्पित
साँस फिर आये-न-आये।''

और 'जो नहीं करना था' में अंतिम समय के उलाहने को व्यक्त करते हुए-
''होंठ पर अंतिम समय
उसके उलहना था
क्यों वही फिर-फिर कहा जो नहीं कहना था'' और आगे-

''नित्य ही
बाँधे रहे
मिथ्या जगत के नेह-नाते
हो गया
निःशेष जीवन
कल्पना के गीत गाते''

'गीत करते हैं इशारे' में अपने गीतों का परिचय दे रहे हैं-
''मुखबिरी करते नहीं
ये गीत करते हैं इशारे'' और आगे-
''अग्नि-पथ पर

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गीत- नवगीत संग्रह - परस्मैपद, रचनाकार- देवेन्द्र शर्मा इंद्र, प्रकाशक- ज्योतिपर्वप्रकाशन, ९९-ज्ञानखंड -३, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद -२०१०१२, प्रथम संस्करण- २०१४, मूल्य- रूपये २४९/-, पृष्ठ- १३६, समीक्षा लेखक- जगदीश पंकज

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