रविवार, 1 दिसंबर 2024

मौन भी अपराध है- राहुल शिवाय


 दिनकर जी ने कहा — “जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उसका भी अपराध।” शिवाय का मौन भी इसी तटस्थता जनित मौन का वह उबाऊ और सर्वस्वीकार्य रूप है जो पौरुष के सामने अभेद्य दीवार खड़ी कर देता है, जिसकी छाया में पनपा-पला पुरुषार्थ क्लीव हो जाता है। स्वत्व के अपहरण पर आक्रोश का उत्सर्ग करने वाला अस्वीकार्य है — अपराध है।

स्थिति, परिस्थिति, परिवेश, आवश्यकता और स्वभाव किसी भी भाव के औचित्य का निर्धारण करते हैं। देश की सीमा पर संघर्ष करने वाले सैनिकों की गर्जना में सिंह की दहाड़ अपेक्षित है; अन्यथा अरि उसे बिना बताए लीलने को तैयार बैठा है। और यदि ऐसी स्थिति में गर्जना या आक्रमण का अपेक्षित तीव्रता से प्रतिकार नहीं किया जाता तो सामने वाले को साहस का लाभ अनायास ही उपलब्ध हो जाता है, और इसे ऐसी स्वीकृति मानी जाएगी जिसका कुफल भोगना ही पड़ेगा। क्योंकि मौन प्रायः स्वीकारोक्ति ही है। सामने से मेरा अंश छीनने वाले तमाम तिकड़मों से हमें हानि पहुँचाने की कोशिश में हैं और हम उन्हें समझ-बूझकर भी टालने की प्रवृत्ति पाले हुए हैं। समाज में अपराध, अनीति और अत्याचार दिनानुदिन बढ़ रहा है तो इसका एक मात्र कारण यह मौन है — जनसामान्य का, या कहें आम आदमी का।

चूँकि यह युवा कवि केवल समस्याएँ गिनाकर समाज को रिझाना और वाहवाही नहीं लूटना चाहता; इसके विचार दक्षिण-वाम के व्यूह नहीं रचते, बल्कि आम होकर आमजन की पीड़ा देखकर समाधान तलाशने का विश्वास रखते हैं। अतः कहा जा सकता है कि समाधान की परिकल्पना, विकल्प की तलाश और कोशिशों के गीतों का संकलन है — “मौन भी अपराध है”। हाँ, अपराध और भी हैं।

राहुल जी मँजे हुए, उम्र से बड़े, सुलझे और सिद्धान्तों से अधिक सामाजिकता के गीतकार हैं। इनकी नज़र समाज में रोज-रोज हो रही घटनाओं का सूक्ष्म निरीक्षण करती है, इनका कोमल मन परिस्थिति में प्रवेश करता है, बुद्धि उसका तार्किक विश्लेषण करती है और फिर प्रौढ़ विवेक समाधान तलाशता है जिसे इनका गीतकार निष्कर्ष रूप में प्रकट करता है। इसीलिए इन्हें “सर्वमान्य निष्कर्ष का गीतकार” कहना मुझे अधिक सटीक लगता रहा है।

जैसा कि होता है — मन में पीड़ा का बीज अंकुआकर गीत का पौधा विकसित करता है। यह पीड़ा आदमी स्वयं के क्रियाकलापों, परिस्थितियों, घटनाओं और परिघटनाओं से पाता है, या भावुक मन पर-मन प्रवेश कर कभी-कभी अर्जित भी करता है। हाँ, दिल में जितनी तीव्र अनुभूति होगी अनुभव उतना वेगवान होगा। जरूरी नहीं कि सांसारिक आकर्षण के खण्डित नेह में ही ऐसा हो, फिर भी उसका योगदान तो है ही। इस गीत-संकलन से गुजरते हुए भाँति-भाँति के अनुभवों से गुजरना हुआ।

संकलन का पहला गीत — गीत का परिचय है। स्वर की धरती पर बीज उगाने वाली जिजीविषा या अन्तर्मन कहकर भले ही इसके वैयक्तिक होने का गुण दर्शाया गया है; वर्षों से अज्ञातवास की चर्चा कर भले ही गीत की उपेक्षा जन्य पीड़ा हो, लेकिन हर विपरीत परिस्थिति में खुद को संयत रखने वाले गीतकार जानते हैं कि “वे हर परिस्थिति को झेलकर आगे अभय बढ़ते रहे हैं, क्योंकि वसंत है यह — नील गगन का विस्तार है इनमें।”
ठीक दूसरा ही गीत शीर्षक गीत है “मौन भी अपराध है।”

हिंस्र पशु का स्वभाव है — हिंसा। सामाजिक पशुओं के स्वभाविक प्रवृत्ति-हिंसा का यथोचित उपचार आवश्यक है। इतिहास साक्षी है कि तन का संग्राम तन से ही तनकर लड़ा जा सकता है — झुककर नहीं। सारी सूक्तियाँ, नीतियाँ धरी की धरी रह जाती हैं जब सामने कोई हिंसक जीव आ जाता है। इसीलिए समय की माँग है कि गलत का प्रतिकार किया जाए। अन्याय करने वाला तो अपराधी है ही, उससे कम अपराधी वह भी नहीं जो इसे सहता है, स्वीकार करता है, मौन रहता है। इसी की तार्किक स्थापना है —
मौन होकर जब सहा है
बल बढ़ा है शोषकों का
कर रहे हो स्वयं पोषण
यातना के पोषकों का।
और ऐसा करते हुए हम स्वभावत: “हार को स्वीकार करती यातनाएँ” भोगते हैं। इसीलिए “मौन भी अपराध है” — यह मानना पड़ता है।

कहना उचित होगा कि कवि जागरण-कर्म कर रहा है। वह हमें, आपको, समाज को — सबको आवाज लगा रहा है। क्योंकि जिस परिवर्तन की कामना से हम प्रश्न करते हैं उसी कामना की माँग है कि हम हल भी तलाशें। लेकिन आजकल ऐसा होता नहीं है। सामाजिक तानेबाने में स्वघोषित वैचारिक नेतृत्व के बुद्धजीवियों के पास कोई सम्पूर्ण विचारधारा या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है; जिसे छिपाकर खुद को दिखाने के क्रम में नकारात्मक प्रयासों पर सकारात्मक ऊर्जा का क्षय अनवरत किया जा रहा है। इससे कवि परिचित है और मानता है —
छल ही छल है, हल की चिंता पर संघर्षों से कतराते
सुई चुभाए बिन सिल जाए — मन में बैठे ख्वाब सजाते।

लेकिन कवि की चिंता यहीं तक नहीं है। प्रतीकों के सहारे वे स्पष्ट कर देते हैं कि चाहे सिंहासन हो या शिक्षा, नीति-नियंता हों या प्रशासक — हर कोई अपने आप को ठग रहा है, स्वयं को समय पर छोड़ कर दर्शक बना हुआ है। सच भी यही है कि भीष्म, द्रोण, कृप — चुप बैठे हैं। आखिर कुछ भला हो भी तो कैसे हो भला! अपना जीवन व्यक्ति को स्वयं जीना होता है, साँसें खुद की होती हैं। यह मूल है। लेकिन हमारा मन सुविधाओं की चाह में पराश्रयी बना हुआ है। “जो बौरा डूबन डरा” कहते-कहते पूर्वज चले गए और हम किनारे बैठे-बैठे माणिक्य लोभ में दिवास्वप्न देख रहे हैं। स्वप्न से निकलकर संघर्ष में स्वयं को झोंकना ही होगा। सामाजिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों तो भी हम चाहें तो संघर्ष से अनुकूल बना सकते हैं — और यह बात हर दैनंदिनी, हर मोर्चे पर लागू होती है।

यदि गौर करें तो समाज में नारी की स्थिति और उस पर हो रहे अपराधों के लिए भी सूक्ष्म रूप से हम ही दोषी हैं। हमने अपराध और अपराधी को — उसके शक्तिशाली होने के आधार पर — मौन समर्थन दिया है, विश्वास दिया है।

गीतकार राहुल शिवाय जब नारी-विमर्श करते हैं तो वहाँ भयावहता भर नहीं देखते, बल्कि उस भयावह परिस्थिति से भिड़ने-लड़ने की जुगत भी बताते हैं। ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए ही तो कहते हैं —

“ओ चिड़िया, आँखों में रखना तू अंगारा…”
जब ऐसी परिस्थिति हो कि “धूप से ज्यादा आँखें गोरे तन को स्याह बनाती हों,” “धक्का-मुक्की ताक चाहती बातें मन की माप बताती हों” — आखेट का अवसर तलाशती, सताती हों — तो आँखों में अंगारा कहना आवश्यक हो जाता है। परिस्थितियों से ससम्मान उबरने का समाधान यही है।

एक और गीत समाधान की कोशिश करता है। जब प्रचलन के हिसाब से बेटी जन्म से ही पराई मान ली जाती है और उसके हिस्से — “क्या बोलेगा दुल्हा” — के तर्क के साथ चूल्हा थमा दिया जाता है और बेटे को भविष्य की उम्मीद में सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, तब स्नेह और वात्सल्य के असंतुलन को देखकर पल-कर बेटे का व्यवहार भी असंतुलित हो जाता है। इसी असंतुलित पालन-पोषण का कुफल है — घरेलू हिंसा। कहना उपयुक्त होगा कि इसका पहला शिकार घर के लोग ही होते हैं और इस पीड़ा से उबारने वाली फिर बेटी ही बनती है — चाहे दवाई मलकर, चाहे आँसू पोंछकर। फलित कुफल को भोगकर ही परम्परा की प्रतीक दादी समाधान स्वरूप कहती हैं —“बेटी, तू अब पढ़ना।”

अपने संग्रह में राहुल जी ने समय की नब्ज परखकर — परीक्षण कर — दवा तजबीज की है। यदि विचार करें तो साहित्य का युग-बोध जो कवि-साहित्यकार की परख के अनुसार पाठकों के सामने आता है, उसमें इन गीतों की अनुभूति तीव्र है। नई कविता की तरह प्रश्न तो आज के उठे हैं लेकिन आज की नकारात्मकता नहीं है। नवगीत की सकारात्मकता और सहजता — जिसकी पहली शर्त है — संग्रह के गीतों ने उसका पालन किया है। विम्ब और प्रतीक कहीं अबूझ और जटिल नहीं हुए हैं। कवि में अनुभव की प्रौढ़ता है। अपने कथन को स्पष्ट करने के लिए प्रचलित मुहावरों को भी गीतात्मक बाना पहनाकर प्रस्तुत किया गया है।

मिट्टी के शेर शीर्षक गीत का यह प्रश्न — “हमने सत्ताएँ बदलीं, हम कब बदले?” — हमें आत्मावलोकन को प्रेरित करता है। सारी बुराइयों के लिए दूसरों को दोष देकर स्वयं को दोषमुक्त घोषित करने वालों की भीड़ में ऐसा प्रश्न कवि-कर्म की ईमानदारी का प्रमाण है। यह इस बात का संकेत भी है कि हम संघर्ष से पलायन के इतने आदी हो चुके हैं कि सब कुछ सामने देख-पाकर भी मौन रहने में ही खुद को सुरक्षित मानते हैं। मौन को अपराध मानने वाले कवि हमें उलाहना दे ही डालते हैं —
हम मिट्टी के शेर
सिर्फ मिट्टी ही निकले।

कहना जरूरी है कि बिगड़ी वास्तविकता को स्वीकार कर उसको उपयोगी बनाने की राह तलाशते राहुल जी के गीतों में आँसू की कसक है तो आशा की मुस्कान भी है। अन्दर की उबलती-खौलती भावना पर समाधान की पतीली चढ़ाकर — उठती भाप का संघनन कर गीत का तानाबाना बुनने वाले गीतकार ने प्रांजल प्रवाह में अपनी बातें कही हैं। शब्दों का अर्थों से होते संघर्ष से उपजी धीमी आवाज से गीत का जो धुन और सुर मिला है — वही इसे उत्कृष्ट नवगीत की पंक्ति में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। आशा नहीं — विश्वास है मुझे कि राहुल जी के गीतों का साहित्य-समाज में पुरजोर स्वागत होगा, प्यार मिलेगा और पाठकों को इनके गीत पढ़कर आत्मिक संतोष प्राप्त होगा।

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नवगीत संग्रह- मौन भी अपराध है, नवगीतकार- राहुल शिवाय, समीक्षक- अनिल प्रकाश झा, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा, कवर- पेपर बैक, पृष्ठ- १४४, मूल्य- रु. १६०, ISBN- 978-93-90135-16-5

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