स्थिति, परिस्थिति, परिवेश, आवश्यकता और स्वभाव किसी भी भाव के औचित्य का निर्धारण करते हैं। देश की सीमा पर संघर्ष करने वाले सैनिकों की गर्जना में सिंह की दहाड़ अपेक्षित है; अन्यथा अरि उसे बिना बताए लीलने को तैयार बैठा है। और यदि ऐसी स्थिति में गर्जना या आक्रमण का अपेक्षित तीव्रता से प्रतिकार नहीं किया जाता तो सामने वाले को साहस का लाभ अनायास ही उपलब्ध हो जाता है, और इसे ऐसी स्वीकृति मानी जाएगी जिसका कुफल भोगना ही पड़ेगा। क्योंकि मौन प्रायः स्वीकारोक्ति ही है। सामने से मेरा अंश छीनने वाले तमाम तिकड़मों से हमें हानि पहुँचाने की कोशिश में हैं और हम उन्हें समझ-बूझकर भी टालने की प्रवृत्ति पाले हुए हैं। समाज में अपराध, अनीति और अत्याचार दिनानुदिन बढ़ रहा है तो इसका एक मात्र कारण यह मौन है — जनसामान्य का, या कहें आम आदमी का।
चूँकि यह युवा कवि केवल समस्याएँ गिनाकर समाज को रिझाना और वाहवाही नहीं लूटना चाहता; इसके विचार दक्षिण-वाम के व्यूह नहीं रचते, बल्कि आम होकर आमजन की पीड़ा देखकर समाधान तलाशने का विश्वास रखते हैं। अतः कहा जा सकता है कि समाधान की परिकल्पना, विकल्प की तलाश और कोशिशों के गीतों का संकलन है — “मौन भी अपराध है”। हाँ, अपराध और भी हैं।
राहुल जी मँजे हुए, उम्र से बड़े, सुलझे और सिद्धान्तों से अधिक सामाजिकता के गीतकार हैं। इनकी नज़र समाज में रोज-रोज हो रही घटनाओं का सूक्ष्म निरीक्षण करती है, इनका कोमल मन परिस्थिति में प्रवेश करता है, बुद्धि उसका तार्किक विश्लेषण करती है और फिर प्रौढ़ विवेक समाधान तलाशता है जिसे इनका गीतकार निष्कर्ष रूप में प्रकट करता है। इसीलिए इन्हें “सर्वमान्य निष्कर्ष का गीतकार” कहना मुझे अधिक सटीक लगता रहा है।
जैसा कि होता है — मन में पीड़ा का बीज अंकुआकर गीत का पौधा विकसित करता है। यह पीड़ा आदमी स्वयं के क्रियाकलापों, परिस्थितियों, घटनाओं और परिघटनाओं से पाता है, या भावुक मन पर-मन प्रवेश कर कभी-कभी अर्जित भी करता है। हाँ, दिल में जितनी तीव्र अनुभूति होगी अनुभव उतना वेगवान होगा। जरूरी नहीं कि सांसारिक आकर्षण के खण्डित नेह में ही ऐसा हो, फिर भी उसका योगदान तो है ही। इस गीत-संकलन से गुजरते हुए भाँति-भाँति के अनुभवों से गुजरना हुआ।
लेकिन कवि की चिंता यहीं तक नहीं है। प्रतीकों के सहारे वे स्पष्ट कर देते हैं कि चाहे सिंहासन हो या शिक्षा, नीति-नियंता हों या प्रशासक — हर कोई अपने आप को ठग रहा है, स्वयं को समय पर छोड़ कर दर्शक बना हुआ है। सच भी यही है कि भीष्म, द्रोण, कृप — चुप बैठे हैं। आखिर कुछ भला हो भी तो कैसे हो भला! अपना जीवन व्यक्ति को स्वयं जीना होता है, साँसें खुद की होती हैं। यह मूल है। लेकिन हमारा मन सुविधाओं की चाह में पराश्रयी बना हुआ है। “जो बौरा डूबन डरा” कहते-कहते पूर्वज चले गए और हम किनारे बैठे-बैठे माणिक्य लोभ में दिवास्वप्न देख रहे हैं। स्वप्न से निकलकर संघर्ष में स्वयं को झोंकना ही होगा। सामाजिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों तो भी हम चाहें तो संघर्ष से अनुकूल बना सकते हैं — और यह बात हर दैनंदिनी, हर मोर्चे पर लागू होती है।
यदि गौर करें तो समाज में नारी की स्थिति और उस पर हो रहे अपराधों के लिए भी सूक्ष्म रूप से हम ही दोषी हैं। हमने अपराध और अपराधी को — उसके शक्तिशाली होने के आधार पर — मौन समर्थन दिया है, विश्वास दिया है।
गीतकार राहुल शिवाय जब नारी-विमर्श करते हैं तो वहाँ भयावहता भर नहीं देखते, बल्कि उस भयावह परिस्थिति से भिड़ने-लड़ने की जुगत भी बताते हैं। ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए ही तो कहते हैं —
एक और गीत समाधान की कोशिश करता है। जब प्रचलन के हिसाब से बेटी जन्म से ही पराई मान ली जाती है और उसके हिस्से — “क्या बोलेगा दुल्हा” — के तर्क के साथ चूल्हा थमा दिया जाता है और बेटे को भविष्य की उम्मीद में सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, तब स्नेह और वात्सल्य के असंतुलन को देखकर पल-कर बेटे का व्यवहार भी असंतुलित हो जाता है। इसी असंतुलित पालन-पोषण का कुफल है — घरेलू हिंसा। कहना उपयुक्त होगा कि इसका पहला शिकार घर के लोग ही होते हैं और इस पीड़ा से उबारने वाली फिर बेटी ही बनती है — चाहे दवाई मलकर, चाहे आँसू पोंछकर। फलित कुफल को भोगकर ही परम्परा की प्रतीक दादी समाधान स्वरूप कहती हैं —“बेटी, तू अब पढ़ना।”
अपने संग्रह में राहुल जी ने समय की नब्ज परखकर — परीक्षण कर — दवा तजबीज की है। यदि विचार करें तो साहित्य का युग-बोध जो कवि-साहित्यकार की परख के अनुसार पाठकों के सामने आता है, उसमें इन गीतों की अनुभूति तीव्र है। नई कविता की तरह प्रश्न तो आज के उठे हैं लेकिन आज की नकारात्मकता नहीं है। नवगीत की सकारात्मकता और सहजता — जिसकी पहली शर्त है — संग्रह के गीतों ने उसका पालन किया है। विम्ब और प्रतीक कहीं अबूझ और जटिल नहीं हुए हैं। कवि में अनुभव की प्रौढ़ता है। अपने कथन को स्पष्ट करने के लिए प्रचलित मुहावरों को भी गीतात्मक बाना पहनाकर प्रस्तुत किया गया है।
कहना जरूरी है कि बिगड़ी वास्तविकता को स्वीकार कर उसको उपयोगी बनाने की राह तलाशते राहुल जी के गीतों में आँसू की कसक है तो आशा की मुस्कान भी है। अन्दर की उबलती-खौलती भावना पर समाधान की पतीली चढ़ाकर — उठती भाप का संघनन कर गीत का तानाबाना बुनने वाले गीतकार ने प्रांजल प्रवाह में अपनी बातें कही हैं। शब्दों का अर्थों से होते संघर्ष से उपजी धीमी आवाज से गीत का जो धुन और सुर मिला है — वही इसे उत्कृष्ट नवगीत की पंक्ति में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। आशा नहीं — विश्वास है मुझे कि राहुल जी के गीतों का साहित्य-समाज में पुरजोर स्वागत होगा, प्यार मिलेगा और पाठकों को इनके गीत पढ़कर आत्मिक संतोष प्राप्त होगा।
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नवगीत संग्रह- मौन भी अपराध है, नवगीतकार- राहुल शिवाय, समीक्षक- अनिल प्रकाश झा, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा, कवर- पेपर बैक, पृष्ठ- १४४, मूल्य- रु. १६०, ISBN- 978-93-90135-16-5

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