मंगलवार, 1 सितंबर 2020

संवेदन के मृगशावक- बाबूराम शुक्ल

संवेदन के मृगशावक हमारे सामने बाबू राम शुक्ल के नवगीत कार रूप को लेकर आया है। परंपरा और आधुनिकता का जो समन्वय उनके समूचे काव्य की विशेषता है, वह इस संग्रह का भी गुण है इसलिए एक स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया के रूप में मैं इस संग्रह की रचनाओं को सुवर्णमयी परंपरा के गीत कहूँगा उनकी एक कविता का आदि और अंत इस प्रकार है- 

उसने जो विष दिया उसे मैं अमृत कर लूँगा 
अंधकार-सागर को ज्योति किरण बन तर लूँगा
किसी निकष पर कोई मुझको जाँच परख देखे
मैं सुवर्णमय परंपरा हूँ खरा उतर लूँगा 

वस्तुत यह गीत स्वयं में कवि धर्म का व्याख्यान है। रचनाकार की परीक्षा तो विषम परिवेश में ही होती है। शुक्ल जी ने साहित्यकार की आस्था को इस दग्ध परिवेश को उत्तीर्ण करते हुए दिखलाया है। यह सही है कि वर्तमान बहुत आशा भरा नहीं है परंतु उसे बदलने की चिंता तो कवि की है यद्यपि यह गुरुतर कार्य है तथापि कवि संग्रह की पहली ही रचना से एक बेहतर दुनिया बनाने के सवाल से रूबरू है। उसकी चिंता है-

बंद ठिठुरती हिम घाटी में कैसे धूप भरें? 
गहराती कुहरिल छायाएँ लुप्त हुई शुभ्रा आभाएँ 
काँप रही तूलिका शून्य में कैसे रूप भरे 
विस्मृत हुई असीम सिंधुता पाश बनी संकीर्ण बिंदुता 
यह मन के मंडूक किस तरह अंधा कूप तरें

समसामयिक हिंदी आलोचना की एक विडंबना यह भी रही है कि उसका अधिकांश सामान्य वक्तव्य को प्रस्तुत करता है और पाठ सापेक्ष विशिष्टता से वह कन्नी काटती रही है। यह सामान्यीकरण आलोचकों को उन सुविधाओं से लैस करता है, जिनसे वे कवि विशेष के सही मूल्यांकन से जुड़े खतरों से बच जाते हैं। और कथ्य की प्रस्तुति प्रायः एक अनपढ़ समीक्षक के रूप में होती है यह अनपढ़ यह शब्द यहाँ कुछ ज्यादा पढ़े लिखे आलोचकों के लिए ही आया है। 

उदाहरण के लिये हिंदी के प्रबुद्ध कहे जाने वाले आलोचकों ने जब भी कभी नवगीत के बारे में कुछ कहा है वह बिना नवगीत को पढ़े ही कहा है। ऐसे पढ़े लिखे अनपढ़ समीक्षकों का मानना है कि नवगीत अपने में कैद समाज निरपेक्ष सिर्फ चीख पुकार है और उस आत्मकेंद्रित कविता में जनसंवेदना नहीं है।  इस धारणा को आधारहीन सिद्ध करने वाले अन्य गीतों की रचना अनेक समकालीन नवगीतकारों के साथ-साथ बाबूराम शुक्ल ने भी की है। 

हमने क्या सपने में भी 
सोचा था यह दिन आएँगे 
रसवंती झीलों मे रेतीले टीले भर जाएँगे 

मंचों पर नारे बोएँगे 
भूख उगेगी खेतों में 
खाली पेट किसानों की
जय जय से आग बुझाएँगे

यों तो संवेदन के मृगशावक संग्रह की रचनाओं में संवेदना की विविधता है परंतु इन गीतों का एक स्वर विशेष रूप से पाठक का ध्यान खींचता है। वह स्वर है स्वाभिमान और तेज का। अनेक रचनाओं में तन कर खड़े होने, किसी की दया दृष्टि की उपेक्षा करने, निरंतर संघर्ष करने और परिस्थितियों से जूझने का चित्रण है। यह संघर्ष ‘’नर हो न निराश करो मन को’’ जैसा सपाट भी नहीं है। अपितु आज के जीवन की विषम और जटिल स्थितियाँ ही इसका आधार हैं। उनका पूरा खाका इस संघर्ष में मौजूद है। संग्रह के पूर्वांश में आस्था और आशा का चटक रंग है परंतु यह भी सही है उत्तरांश तक पहुंचते जीवन के करुणतर एवं कटुतम संदर्भ भी उभरे हैं। उत्फुल्लता के ऐसे स्वर आधुनिक कविता से गायब ही होते जा रहे हैं।

कुहरे के आँगन में ज्योति भरी थाली 
बरस रहे किरणों से कुमकुम खुशहाली 

टहनी को होंठों पर ठिठुरे स्वर चहके
पंखुरी के रंग भरे भाव खुले महके
देख झील में चेहरा खिली उषा लाली

लहक उठे टेसू ज्यों कोयला अँगीठी में
सेंदुर घुल चला धुला नदी जल में धीमे
धूप गुनगुनाती पीती काँपती कंगाली

उपर्युक्त गीत में जीवन का सर्जनात्मक विश्वास प्रकृति के माध्यम से व्यक्त हुआ है। विशेष यह है कि शुक्ल जी ने आशा निराशा जूझने टूटने सहने कहने के सभी पक्षों को प्रकृति के माध्यम से ही व्यक्त किया है। तब एक सवाल उठाया जा सकता है कि आज न तो महानगर के आकाश में चाँद सितारे दिखाई देते हैं और ना ही कूलर लीटर वाले कंडीशन्ड काल में हम मौसम से सही रूप से टकराते हैं। तब कविता में प्रकृति क्यों और कैसे? वस्तुतः यह एक नितांत वैज्ञानिक सत्य है कि हमारा संवेदन संसार केवल वर्तमान से नियंत्रित नहीं है। बल्कि वह तो निरंतरित भी है। पूरा जेनेटिक्स भी यह व्याख्यायित करता है कि मनुष्य स्वयं में एक परंपरा है। आदिम राग हमारे भीतर संचित है। प्रकृति संदर्भ हमारे संवेगों को इसीलिये सर्वाधिक उद्दीप्त करते हैं। श्री बाबूराम शुक्ल ने इस तथ्य को गहरे से पहचाना है। इसलिए संवेदनाओं के आदिम रूप पर ही उनकी आस्था है। और इसीलिये प्रकृति उनके काव्य का स्थायी भाव है। जीवन का विभीत्सतम रूप देखकर यदि वे उसे शब्दबद्ध करते हैं तो प्रकृति का कोमल और आह्लादक रूप ही उनके सामने नहीं होता बल्कि उस स्थिति में एक अमूर्तन एक नया ऐब्सट्रैक्शन उनकी कविता में उभरता है।

प्रश्नचिह्न बहुत मुखर
उत्तर सब मौन

नफरत की चोटों से फूटा जो बाँध तोड़
रोके यह खूनी सैलाब कौन?
बाजों के पंजों में जख्मी चिड़िया जैसा
जिला सकेगा भाईचारे का ख्वाब कौन

बाबूराम कृत्रिम आधुनिकता के कवि नहीं हैं। संवेदनों की व्यापकता तो उनके काव्य में है पर अनुभव का आयतन नहीं है, है तो लोक की यातना! मिट्टी से जुड़ा यह कवि लोक मन में तो गहरी पैठ रखता ही है बादल की उस निष्ठुरता से भी आहत हो जाता है जो कभी तो सूखते आँसुओं की भी सुध-बुध नहीं लेता और कभी जीवन के सभी सहारों को ही बहा ले जाता है।  तब कवि मौसम से- मौसम के इन उपकरणों से भी शिकायत करता है, पर सावनी हवा से यह आग्रह तो सचमुच प्रकृति मनुष्य के रिश्ते का एक नया अध्याय खोल देता है 

बहिना री सावनी हवा,
बिटिया बेटवा पर अब 
तरस खा बुआ

बुला सखी बदरी को 
अब तो गूँजे कजरी
लहरा लहरा फसलों की 
हरियर चुनरी को 
रौंदे घरौंदे ये 
भूखे आँगन छप्पर 
दे जा बेचारों को कुछ 
रोटी दाल की दुआ। 

अच्छी कविता है यदि उलटबासियों का गोरखधंधा नहीं होती तो सपाट रेतीला मैदान भी उसकी नियति नहीं। हृदयस्पर्शी लाक्षणिकता कविता का सही रूप रचने में सहायक होती है। शुक्ल जी के गीत प्रतीक धर्मी ही नहीं, वे अर्थों के व्यापक आयाम भी उद्घाटित करते हैं। आज एक असांस्कृतिक अंधड़ जीवन के बगीचे को किस प्रकार नष्ट कर रहा है उसको कवि ने ऐसी प्रतीक गर्भित भाषा में चित्रित किया है-

इन दिनों अमराइयों पर 
अंधड़ों के दौर हैं 
बने जैसे भी बचा लें 
कोपलों की गोद में 
फुनगियों पर अभी बाकी 
महकते कुछ बौर हैं

बाबूराम शुक्ल के गीतों की एक यह विशेषता भी ध्यानाकर्षक है कि न तो ये परिपाटी में जकड़े हुए हैं, न ही इनमें छंद एवं भाषा के स्खलन की विडंबनाएँ घटित हुई हैं। स्थाई और अंतरा के रूढ़ि आबद्ध रूप से मुक्त ये गीत संवेदना के अनुरूप ही फैलते सिकुड़ते हैं। भाशा बहुत चमत्कार सर्जने की सर्कसी कोशिश नहीं करती, पर व्यंग्य की एक सहज तुर्शी इसमें जरूर विद्यमान है। इन गीतों का शिल्प एकांत साधना का परिणाम कहा जा सकता है। पूरे संकलन में एक सहज उदात्तता विद्यमान है। 

हमारा दृढ़ विश्वास है कि इतिहास की मृत्यु की तथाकथित घोषणाओं के बावजूद विचार के अंत के उत्तराधुनिक पाठ विखंडन के पाखंड के बावजूद और मनुष्यता विरोधी उदारीकरण और बाजारीकरण के इस दौर में भी साहित्य जनता का आख्यान है मनुष्यता की जय यात्रा का महान अभियान है। इस विराट आंदोलन में सभी साहित्य रूपों का तो योगदान है ही छोटे बड़े सभी रचनाकारों का संचित श्रम ही इसे सफलता और सार्थकता के शीर्ष बिंदु तक ले जाएगा। एक हार्दिक तोष रचनाकार की उपलब्धि हो सकती है, एक भवानंद पाठक की प्राप्ति हो सकती है पर समूह ग्रुप में जन को तो साहित्य से मुक्ति का ही उपहार मिलता है। यह प्रसन्नता का विषय है कि अनंत अटूट क्रम में लंबे समय से सहयोग देने वाले रचनाकार श्री बाबूराम शुक्ल अपनी कृति के साथ प्रस्तुत है अवश्य इस व्यवहार को समाज में संपदा एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

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गीत- नवगीत संग्रह - संवेदन के मृगशावक, रचनाकार- बाबूराम शुक्ल, प्रकाशक- अव्यय प्रकाशन, दिल्ली। प्रथम संस्करण- २००३, मूल्य सजिल्द- रूपये १००/- ,  पृष्ठ- ९६, आलेख - डॉ. राजेन्द्र गौतम (भूमिका से)