शुक्रवार, 9 जून 2017

दहलीज के भीतर-बाहर - गीता पंडित

समय के साथ-साथ चलते हुए और अपनी यथोचित छान्दसिक पद्य में प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए गीत-नवगीत के सृजन में निरंतर रचनारत सुश्री गीता पंडित अपने नए गीत संग्रह  ''दहलीज के भीतर-बाहर'' के साथ पुनः उपस्थित हुई हैं। यह संग्रह उनकी प्रकाशित कृतियों में छठा है जिसमें पचास गीतात्मक रचनाएँ संकलित हैं।

अपने गीत-नवगीत सृजन में जहाँ उन्होंने समसामयिक यथार्थ को निरूपित किया है वहीँ अनेक रचनाओं में होली के उल्लासमय उत्सव के माध्यम से सामाजिकता और सम्बन्धों की तरलता-सरलता को भी बड़ी रोचकता से चित्रित किया है। कुछ रचनाएँ नव वर्ष के माध्यम से वर्तमान और भविष्य की मंगलमय सद्भावना से सजी हुई हैं। प्रत्येक गीत-नवगीत स्वयं में स्वतन्त्र रचना होते हुए भी रचनाकार के मन्तव्य और पक्षधरता को अनेक रूपों में विभिन्न रचनाओं में व्यक्त करता है। गीता पंडित ने भी अपने गीतों में स्वयं को अभिव्यक्त किया है जिनमें उनकी सरल-सहज और सम्प्रेषणीय भाषा में सुग्राह्य शिल्प का प्रयोग करते हुए युगबोध के विभिन्न आयाम चित्रित हुए हैं।

गीता पंडित की मान्यता उनके प्राक्कथन 'मेरी बात'  में व्यक्त हुई है जिसमें उनकी सर्जना के केन्द्रीय तत्व को परिभाषित करते हुए और मनुष्यता को बचाते हुए एक नयी धरती का निर्माण करने की सदिच्छा के साथ प्रस्तुत है-
'जहाँ हम
हमारे होने का अर्थ भोग सकें
और कह सकें गर्व से कि हम मनुष्य हैं'।
इसी के साथ कविता की गेयता और गीतात्मकता की आश्वस्ति के साथ फिर से लौटने की उद्घोषणा कर रही हैं-

'अरे!!! आज ये न समझ लेना कि मैं चली गयी... मैं गीतात्मकता के साथ फिर से लौटुंगी क्योकि मैं कविता हूँ संवेदनाओं से जन्मी... जब तक संवेदनाएँ हैं,  मैं जीवित रहुँगी। गूँजती रहुँगी, कविता जीवित थी जीवित रहेगी। जब तक जीवन है तब तक संवेदनाएँ हैं और जब तक संवेदनाएँ हैं तब तक कविता है, रूप, वेश बदलने के बाद भी कविता जीवित रहेगी।'

गीता जी की प्राथमिकता में समसामयिक यथार्थ और सामाजिक विद्रूपता को मुख्य स्थान प्राप्त है। सामान्य जन तक विकास का अभी तक न पहुँचना तथा राजनेताओं की असहिष्णुता के कारण झोंपड़ी तक प्रगति के सूरज की किरण तक न पहुँचना उनकी चिन्ता का विषय है जिसे संग्रह के गीतों में स्थान मिला है। 'कहाँ बैठा है सूरज' संग्रह का प्रथम गीत ही उनकी चिंतनधारा की ओर संकेत कर रहा है।
'जमी बर्फ
नेताओं पर भी
लकवे ने जैसे मारा
आम आदमी बिन कम्बल भी
अब तक ना
कैसे हारा
हरेक झोपड़ी
को चलकर के
धूप तनिक तो दिखलाएँ' 

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर हो रहे आक्रमण से व्यथित गीता कह रही हैं-
'निष्ठा पर
है वार
कहाँ अब लोकतंत्र है
लिप्सा में हो लिप्त
यही बस भोगमन्त्र है
बहरे पल की
कड़वाहट में रस तो घोलो
** ** ** **
सुनो लेखनी!
व्यथित ह्रदय में अब तो डोलो
मूक हुई तुम
कैसे लो अब कुछ तो बोलो' 

मनुष्यता और मानव-मूल्यों की स्थापना गीता जी का ध्येय है जिसे व्यक्त करते हुए 'आईना फिर से समय को'  गीत में उल्लेखित किया है-
'आईना फिर से
समय को
अब दिखाओ
ओ समय! तुम हमसे मिलने
फिर से आओ
** ** ** ** **
है जहाँ
इंसान पकड़ो फिर से लाओ
नेह करुणा उससे सीखो
और सिखाओ'

जब काल की दीवार पर रक्त के छींटे लगे हों तथा इतिहास जिन्दगी के रतजगे बाँचता होगा और आस्थाओं के मंदिरों में नाश की व्यथा फैली हो तब गीता का कवि- मन लेखनी से नयनों के पानी की कहानी लिखने का आग्रह कर रहा है-
'इस समय की
नोक पर
मन मेरे लिखना कहानी
लेखनी लिखना नयन में
है भरा जो आज पानी
** ** ** **
लो प्रलय में
बह गयीं
सब वो कथाएँ थीं रूहानी'

यथास्थिति को तोड़ने का आह्वान करता गीत 'बंद द्वारे हैं तो क्या'  समय के बंद द्वारे पर साँकल बजाने के लिए प्रेरित कर रहा है। तारीखें बदल रही हैं, साल बदल रहे हैं लेकिन जन-मानस का हाल नहीं बदल रहा तथा आस्था के भाल पर कैसी व्यथा लिखी हुई है कि आज बचपन सिसक रहा है तथा वृद्ध का कन्धा झुका हुआ है। संग्रह के गीत 'झाँक रही खिड़कियों से' में करुणामय पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा है-
'झाँक रहीं
खिड़कियाँ कब से
कोई दिक्खा नहीं दूर तक
** ** ** ** **
भूख तड़प
पीड़ा बेचैनी
किन अर्थों में जीवन है ये
साँसों का यह चक्र बोझ है
धड़कन के फिर
क्या माने हैं
लिक्खी गयीं
किताबें कितनी
जीवन लिक्खा नहीं दूर तक'

राजनीति के गलियारे में विचरण करने वाले सत्ता प्राप्त करते ही सब बदल जाते हैं। केवल नाम अलग हैं किन्तु चरित्र में सभी दल और राजनेता एक ही तरह हैं।
'हाथ जोड़कर
खड़े द्वार पर
वाणी मिश्री की डलिया
पाँच वर्ष तक
फिर ना दीखें
पिसता जन जैसे दलिया
सिंहासन पर आते ही सब
हो जाती हैं
अस्त वफ़ाएँ'

धार्मिक पाखण्ड पर गीता जी दो टूक प्रहार कर रही हैं, 'बाँच रहा पाखण्ड धर्म को'  गीत की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
'बाँच रहा
पाखण्ड धर्म को
बौराये मंदिर मस्जिद
** ** ** ** **
धर्म के
ठेकेदार आज तो
नोच रहे हैं बनकर गिद्ध'

'नग्मे कहीं से ना फूटे अभी तक'  गीत अपनी उत्कृष्ता के साथ स्वयं को गुनगुनाने के लिए आकर्षित करता है। एक पद्यांश देखिये-
'सुबह साँझ की
हर नमी को भगाएँ
चलो साथ मेरे सभी को जगाएँ
वो नग्मे कहीं से ना
फूटे अभी तक
जिसने कि जनमन की पीड़ा को गाया
न शब्दों में आयी
अभी वो रवानी
कि जिसने
श्रमिक को
कभी गुनगुनाया
चलो साथ मेरे उन्हें गुनगुनाएँ
सुबह साँझ की
हर नमी को भगाएँ'
जब धुएँ के छल्ले में जवानी खो रही है तब देश धर्म की बातें तो पुरानी हो गयी हैं तथा अब जब सारा देश सुलग रहा है तब यह कैसी आज़ादी है।

'ये कैसी आज़ादी है जो
सुलग रहा
अब सारा देश
बच्चे तक अब नहीं सुरक्षित
दुःख देता आतंकी वेश'

लिंग-भेद, भाषा के झगड़ों से निकल कर नववर्ष का अभिनन्दन करते हैं तो मुखौटा बदलते समय में मौन की पगडंडियों को देखकर जीवन जल रहा है लेकिन
कोई लिख नहीं पा रहा है।
'मौन की
पगडंडियों पर
शब्द की अर्थी पड़ी है
कोई लिख पाता नहीं है'

अतः गीता पंडित का कवि समय से मुठभेड़ करने के लिए अपने गीत 'समय की आँखों में झाँको'  में उद्बोधन करता है-
'समय की
आँख में झाँको
भरे लो हौसले हैं अब'
इसी के साथ एक दूसरे गीत में-
भीड़ बहुत हो
या एकाकी
चलना एकाकी होता है
मन की फुनगी बैठा सूआ
फिर भी बेबाकी
होता है'  (झरे पात सूखे सपनों के )

संग्रह में नए साल तथा गए साल से सम्बन्धित कई गीत संकलित हैं जिनमे नव वर्ष के माध्यम से अपने समय, समाज और राजनीति आदि पर प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी है। 'नया साल आया है तो फिर'  शीर्षक से गीत एक उत्कृष्ट रचना और मार्मिक अभिव्यक्ति है जिसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य की चाहतें हैं, कल्पनाएँ हैं, इच्छाएँ और सपने हैं जिनके नए साल में पूरा होने के लिए आशाएँ जगी हुई हैं। सबकी आशाएँ अपने लिए आने वाली सौगातों पर केंद्रित हैं।
'नया साल आया है तो फिर
कुछ सौगातें लाया होगा

चमक उठीं सुगना की आँखें
दाल-भात तो आज पकेगा
फटी चुनरिया देख सोचती
नया दुपट्टा आज मिलेगा
खाँस रही माँ दोहरी होकर
आज दवाई संग में होगी
देख ठिठुरती देह पिता की
अरे रजाई अंग में होगी
मेंहदी चूड़ी घाघर चोली
की भी साधें लाया होगा' 

गीता पंडित के गीतों/नवगीतों का कथ्य उनकी आमजन द्वारा भोगे जा रहे सत्य पर सटीक टिप्पणी है। समय के माध्यम से अपनी चिंताओं को विभिन्न कोणों से व्यक्त करते हुए इस स्थिति के बदलाव की सदिच्छा के साथ आम-जन को प्रेरित करने की प्रतिबद्धता को इस प्रकार व्यक्त किया है कि इंसान के भीतर बैठी इंसानियत ज़िंदा रहे और एक ऐसे मनुष्य का निर्माण हो जो आपसी प्रेम सौहार्द की स्थापना कर सके। अपने गीत 'विष पिया था जिस समय ने'  में इस विष वमन को शब्दांकित किया है-
'विष पिया था
जिस समय ने
विष वमन
कर चल पड़ा अब
है झूठ
मक्कारी खराबी गन्दगी
का बोलबाला
भ्रष्टता
के नाम पर इंसानियत
को खोल डाला
आज देने
को सबक वह
आम बनकर
चल पड़ा अब' 
इसी के साथ एक अन्य गीत का अंश देखिये-
'परिवर्तन है
नियम जगत का
है बदलाव जरूरी भी
कल जो
हुआ भूल उसको कल
होगी उससे दूरी भी ' (अभी मिटी ना सरगम पल से)'

और 'कैसे हैं ये देश के वाहक'  गीत का अंश-
'बदल रहा हूँ आज
समय मैं!
कह डंके
की चोट चला
कभी लड़ी थी
एक लड़ाई
सत्य
अहिंसा के कन्धों पर
आज वही फिर एक लड़ाई
आम आदमी
के बन्दों पर
भ्रष्ट हुआ जो हर
उस पल को
लुगदी सा
मैं घोट चला'

होली के माध्यम से स्वाभाविक संवेदनाओं और भावुक भाव-बोध को व्यक्त करते संग्रह में कई गीत हैं जिनमें मुख्य हैं, 'लट माथे पर पड़ी हुई' , लाज के सारे पहरे देखो' , 'मन टेसू के रंगों में' , 'बस रंगों की बस्ती है ये' , 'भीगे -भीगे जाने कितने', 'सच कहूँ तो'  आदि। इन गीतों में केवल होली की मस्ती ही नहीं बल्कि समय और समाज को भी शब्द प्रदान किये हैं। 'सच कहूँ तो'  गीत में होली के पर्व को एक दूसरे ही कोण से प्रस्तुत किया है।
'सच कहूँ तो
मन कहीं लगता नहीं अब
क्या न जाने
मन के अन्दर चल रहा है
खो गयी हैं
गीत गाती बोलियाँ
हैं कहाँ पर रंगों की वो टोलियाँ
नयन पाखी ढूँढ़ते जाने किसे
मन के अन्दर
जल रही हैं होलियाँ
क्यों ना जाने
मन को सब ये खल रहा है
सच कहूँ तो
मन कहीं लगता नहीं अब'

गीता पंडित के गीतों का केंद्रीय तत्व देश और समाज में फैली असामान्य स्थिति है जिसे व्यक्त करने की छटपटाहट में रचनाएँ प्रस्फुटित हुई हैं। उनकी चिंताओं का मुख्य विषय देश है जिसमे कई दशक में भी असमान विकास के कारण आज़ादी का सूर्य झोपड़ी तक नहीं पहुँचा।
'सुबह ने
गाया अलख जगाया
जाने क्यों किरणों ने जाकर
चौबारे ध्वज
जा फहराया
उजियारी हो गयीं दिशाएँ
जगह जगह पर लगी सभाएँ
पर महलों के तले झोपड़ी
से अँधियारा
कहाँ भगाएँ
** ** ** **
विश्व विजयी
बनने से पहले
अपने घर की नींव संभालें
जाति-धर्म भाषा के झगड़े 
भूल प्रेम के बिरवे पालें'  (लग गए कई दशक लेकिन )

गीता पंडित ने अपने संग्रह में गीतों के क्रम का चयन जिस प्रकार किया है उसमें बदली हुई परिस्थिति में अभिव्यक्ति पर मंडराते हुए संकट (सुनो लेखनी! व्यथित हृदय में) से आरम्भ करके अन्त भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर होते प्रहार की चिन्ता से किया है। संग्रह के अंतिम गीत 'अभिव्यक्ति के द्वार लगे हैं अब तो पहरे'  में पूरी प्रखरता से मुखर होकर कहा है-
'चाहे कुछ भी हुआ लेखनी
लिखती आई
पीर हरेक की शब्द-शब्द में
दिखती आई
लेकिन यह क्या
जंजीरों में आज कलम है
कपटी को कपटी
कह पाये किसमें दम है
** ** ** **
क्षमा करेगा नहीं समय
जो मौन हो गए
मन से मन के किस्से
अब तो
कौन हो गये
** ** ** **
उठो तुम्हारी बारी सब
कहने की आई
कहीं तुम्हारी
बारी भी
ढहने की आई'

प्रस्तुत संग्रह पर समग्रता से विचार करने पर जो तथ्य प्रकट होता है वह यह कि गीता पंडित ने विद्रूपताओं को व्यक्त करने तथा स्थितियों को बदलने के लिए अपनी गीतात्मक रचनाओं में जिस भाषा-शैली तथा शिल्प और शब्दांकन का प्रयोग किया है वह उन्हें अपनी छटपटाहट को अभिव्यक्ति प्रदान करना मुख्य रहा है।

इस प्रयास में गीता जी के नवगीतों में कहीं-कहीं भाषा में अनगढ़ शब्द जैसे कि 'ना','वो', 'क्यों' आदि का प्रयोग तथा आशय-सम्प्रेषण को मुख्य ध्येय मानते हुए शिल्पगत ऐसे नये प्रयोग किये हैं जिसके कारण लगता है कि कहीं-कहीं गेयता बाधित हो रही है लेकिन रचनाएँ कथ्य को सम्पुष्ट करते हुए कवि के मंतव्य और पक्षधरता को प्रस्तुत करने में पूर्ण सक्षम हैं।

आजकल गीत /नवगीत पर विभिन्न दिशाओं से प्रहार हो रहे हैं तथा नवगीत को मुख्य रूप से लक्ष्य बनाया जा रहा है फिर भी नवगीतकार अपनी रचनाधर्मिता के साथ चुनौती स्वीकार करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। गीता पंडित की इन रचनाओं को गीत-नवगीत या गीतात्मक काव्य कुछ भी कहें ये अपनी सम्प्रेषणीयता को बनाये हुए हैं जो किसी भी अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक तत्व है तथा पाठक को सही परिप्रेक्ष्य में आशय को समझाने में सफल है। संग्रह की रचनाएँ अपनी समग्रता में समय की विद्रूपताओं को व्यक्त करने में व्यथित मन की छटपटाहट का सफल समुच्चय हैं तथा समसामयिक विमर्श के लिए ज्वलंत बिंदुओं को प्रस्तुत करने में समर्थ है।
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गीत नवगीत संग्रह- दहलीज के भीतर बाहर, रचनाकार- गीता पंडित, प्रकाशक-शलभ प्रकाशन, दिल्ली। प्रथम संस्करण- २०१६ मूल्य-२२५ रुपये, पृष्ठ-११२, समीक्षा- जगदीश प्रसाद जेंद