शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

टोटी वाला नल - शिवानंद सिंह सहयोगी


श्री शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' का वर्ष २०२२ में प्रकाशित नवीनतम नवगीत संग्रह है। यों तो सहयोगी जी हमारे समय के वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं, किन्तु वे नवगीत के सिद्ध साधक हैं। जैसे कोई कुशल संगीतज्ञ अपनी साधना में राग रागनियों का नित्य रियाज़ अथवा अभ्यास करता है, उन्हें ओढ़ता-बिछाता है, सहयोगी जी नवगीतों को नये-नये अर्थपूर्ण बिंबों और प्रतीकों के साथ अलंकृत कर शब्दबद्ध करते हैं। दुष्यंत कुमार कहा करते थे - "मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ। तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।"

आज नवगीत हिन्दी साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जो समकालीन जीवन के परिदृश्यों और स्पंदनों को भावपूर्ण ढंग से पकड़ने और व्यक्त करने का एक सशक्त लयात्मक माध्यम है। वस्तुत: मेरे हिसाब से नवगीत नयी अतुकांत कविता और परंपरागत छंदबद्ध गीतों के मध्य एक सेतु का कार्य करने का आधुनिक कवियों का स्तुत्य प्रयास है। परंतु नवगीत अपनी रचना प्रक्रिया में किसी नट के जटिल करतब से कम नहीं। इन्हें साधना हर किसी के वश की बात नहीं। दोहा, चौपायी, सवैया, गीत, ग़ज़ल आदि तो एक निश्चित व्याकरण और मात्रात्मक संविधान की मर्यादा में होने के कारण कविहृदय व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत सहज होते हैं, किन्तु नवगीत में अभिव्यक्ति हर किसी रचनाकार के वश की बात नहीं। क्योंकि इसका कोई निश्चित विधान नहीं। यहाँ कवि को अपना विधान और अनुसंधान स्वयं बुनना-करना पड़ता है। शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' जी के नवगीत उनकी मौलिक उद्भावनाओं के परिचायक ही नहीं, उन्हें नवगीत के एक अनूठे हस्ताक्षर भी सिद्ध करते हैं।


सहयोगी जी के नवगीतों के समुद्र से गुज़रना हमारे समय-जीवन की तरंगों के बीच से गुज़रने के समान है। वे अतीत और वर्तमान के मध्य दोलन करते हुए लिखते हैं --
"भूली बिसरी यादों की छत ईंट सुहानी है,
शब्दों के संवादों की लघु नई कहानी है,
हर सामाजिक घटनाक्रम की
छाया संप्रति है।"

कवि के शब्दों में जाड़े के एक दृश्यमान दिन का चित्रात्मक वर्णन --
"सूरज कुहरे की चादर में दुबका अब भी दोपहरी तक,
गाँव अलावों का डेरा है हीटर पर है हर शहरी तक,
हिलती डाली छिप नीड़ों में खग सोए हैं,
तुलसी झुलसी
पत्ते पड़े हुए पीले हैं।"
प्रस्तुत नवगीत संग्रह के सभी गीत सहयोगी जी ने विगत वर्ष २०२१ में लिखे हैं। एक तरह से इसे कवि के मनोभावों की डायरी भी कहा जा सकता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के नीचे रचना की तिथि भी अंकित की है। उदाहरण के लिए चिल्ले जाड़े का उपरोक्त नवगीतांश १२ जनवरी २०२१ का लिखा हुआ है।

कवि बदलते हुए समय के प्रति सजग और खुश भी है, किंतु साथ ही चिंतित भी। संपर्क के परंपरागत माध्यमों का स्थान अब इंटरनेट, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप आदि ने ले लिया है। कवि अपने 'विकसित नया निबंध' शीर्षक नवगीत में लिखता है --
"लगता है सब पास खड़े हैं परिचित, पर्वत, गाँव,
पड़े हुए हैं ठीक सामने हर परिजन के पाँव,
डाकघरों का पोस्टकार्ड तू सगुन, हथौटी और तार तू,
प्रतन-प्रथा ने मोड़ दिया है
आचारिक प्रतिबंध।"

कवि भविष्य की चिंता करता है। करनी भी चाहिए। सहयोगी जी इस नवगीत संग्रह के शीर्षक-नवगीत 'टोंटी वाला नल' में पर्यावरण की चिंता में लिखते हैं --
" सूरज की नज़रों से अब वर्षा का जल रोकें,
छोटा वर्षा-काल हुआ है, ऋतुओं को टोकें,
हुआ, जो हुआ, अब तो लेकिन
करें सुरक्षित कल।"

छोटे छोटे वाक्यों में क्लिष्टता से बचते हुए लयात्मक शब्दावली में सहज अभिव्यक्ति सहयोगी जी के नवगीतों का गुण भी है और उनकी शैलीगत मौलिकता भी। इतना ही नहीं, जहाँ कहीं भी देशज अथवा तत्सम शब्द स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हो आए हैं, उन्होंने उनका अर्थ भी रचना के अंत में स्पष्ट कर दिया है।

वर्ष २०२०-२१ में सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी के संकट से बुरी तरह जूझा है। प्रवासी कामगार लोग बीमारी, बेकारी, भुखमरी के आसन्न संकट में २०२० में शहर छोड़कर गांवों की ओर भागे, सैंकड़ों मील बिना किसी साधन सवारी के पदयात्रा कर अपने गाँव पहुँचे। २०२१ में चारों ओर मृत्यु का और भी भयावह तांडव। अनेकानेक मुसीबतें। ऐसे में कवि हृदय की चीत्कार भी भला कविता-कथाओं में क्यों न ढलती? शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' के कई नवगीत कोरोना-काल पर भी आधारित हैं। एक बानगी --
"परम पुरुष की किस आज्ञा की यहाँ रसाई है,
सांसों के जंगल में कैसी आग लगाई है,
व्यस्त हुए वैज्ञानिक, माध्यम,
खबरें आतीं दुनियाभर से।"

कोरोना लाखों आम और ख़ास आदमियों को लील गया। हर व्यक्ति ने किसी न किसी अपने को खोया। सहयोगी जी कोरोना में कालकवलित हुए सुप्रसिद्ध हिन्दी ग़ज़लकार कुंवर बेचैन जी को अपने एक नवगीत में भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए लिखते हैं - "उतर गए हैं साँस-मार्ग से प्राणवायु के वैन,
चले गए हैं 'कुँअर बहादुर सक्सेना',
'कुँअर बेचैन'।"
यह पूरा गीत अत्यंत मार्मिक है।
भाई सहयोगी जी को इस श्रेष्ठ सामयिक काव्यकृति के प्रणयन के लिए बधाई एवं साधुवाद।
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नवगीत संग्रह- टोटी वाला नल, नवगीतकार-शिवानंद सिंह सहयोगी, परिचय- सुधाकर अदीब, प्रकाशक- रचनाकार प्रकाशन, बहलना, जनपद-मुजफ्फरनगर-251003, उ.प्र., कवर- हार्ड बाउंड, पृष्ठ- १३२, मूल्य- रु. ३००, 
ISBN-978-93-85564-20-8·

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