गुरुवार, 1 जनवरी 2026

जहाँ नहीं उजियार - योगेन्द्र प्रताप मौर्य

नयी पीढ़ी के इन्हीं युवा रचनाकारों में एक नाम अपने लेखन की गुणवत्ता को प्रकट करता हुआ सामने आया है वह है योगेंद्र प्रताप मौर्य। योगेंद्र प्रताप मौर्य अपने तीसरे नवगीत संग्रह 'जहाँ नहीं उजियार' के साथ पुनः प्रस्तुत हुए हैं। 

शहर से गाँव लौटने के भावुक अनुभव हों या नामीबिया का अकाल, माँ-पिता से सम्बंधित भावनाओं का प्रकटीकरण हो या नववर्ष पर उद्गार योगेन्द्र सभी को कथ्य का विषय बनाते हुए सकारात्मक सोच को प्रकट करते हैं। आइये संग्रह के गीतों का आनन्द लेते हुए समय, समाज, राजनीति आदि पर लेखकीय प्रतिक्रिया से रूबरू होते हैं। गीतांशों के उद्धरण देने में सबसे पहले शीर्षक की पंक्तियाँ ही ध्यान आकर्षित कर रही हैं :
‘देख रहा हूँ उस बस्ती को जहाँ नहीं उजियार
भूखे-नंगे बच्चे सारे घर भी हैं बीमार

जुटा नहीं है कभी पास में इतना-सा धन भी
हिस्से में यों आते इनके सुविधा-साधन भी
लोग गुजरते,कहते जाते
जाहिल और गँवार।
***
उम्मीदों की किरणें भी तो यहाँ न आती हैं
कहने को फूलों-पत्तों को ये चमकाती हैं
इस स्थिति के लिए किसे हम
माने जिम्मेदार?’ (‘जहाँ नहीं उजियार’)

गीति काव्य में यों तो सभी रचनाएँ स्वयं में स्वतन्त्र होती हैं और उनका आशय और कथ्य भी अलग होता है। किसी अलग संवेदनात्मक तत्व की व्याख्या या किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति होती है फिर भी रचनाकार की मान्यताएँ, स्थापनाएँ और विशवास के आधार पर कोई एक ऐसा बिंदु होता है जो केन्द्रीय तत्व के रूप में प्रकट होता है। 'जहाँ नहीं उजियार' के नवगीतों में भी योगेन्द्र मौर्य की विवेक दृष्टि और पक्षधरता व्यक्त हो रही है। संग्रह का शीर्षक गीत इन्हीं मान्यताओं और प्रतिबद्धता को नवगीतों की केन्द्रीयता में व्यक्त करता प्राण तत्व है। यह गीत वस्तुस्थिति की भयावहता को बताते हुए सवाल करता है कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ?  मेहनतकश वर्ग के प्रति प्रतिबद्धता संग्रह के नवगीतों में जगह-जगह दिखाई देती है। एक गीत की पंक्तिया देखें-
'हमने काटे हैं पहाड़ तो तोड़ी है चट्टान,
देख रहे हैं आँखों से सब हम कर्मठ इंसान। 
***
गर्म हवाओं से लड़ना ही
है अपनी पहचान।' (हम कर्मठ इंसान)

'जहाँ नहीं उजियार' नवगीत संग्रह में योगेन्द्र अपने 60 नवगीतों में रचनाकार का पैना विवेक, अपने समय का गहन अवलोकन, विश्लेषण, और प्रस्तुति सचेतन रूप में विद्यमान है। योगेन्द्र अपने आस-पास से घटनाओं, स्थितियों, पात्रों के व्यवहार से संवेदनात्मक बिंदुओं का चयन करके नवगीत में प्रस्तुत करते हैं। कथ्य के अनुसार रचना का विस्तार देते हुए योगेन्द्र अक्सर दो अंतरों के नवगीत लिखते हैं और अनावश्यक रूप से आगे नहीं बढ़ाते। संग्रह के गीत समसामयिक युगबोध के सभी बिंदुओं को नवगीतों में ढालकर प्रस्तुत करते हैं। एक अन्य गीत में बहुजन के संघर्ष को दर्शाती पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं :
हम 'बहुजन' हैं हमीं ‌प्रताड़ित होते आये हैं,
वर्षों से हम इस दुनिया में रोते आये हैं।' (' हम 'बहुजन' हैं)

अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करते हुए वंचित वर्ग के अधिकारों का उल्लेख करते हुए योगेंद्र कहते हैं :
'शोषित,वंचित और उपेक्षित की हो भागीदारी,
इस संसद के नये भवन की यह भी जिम्मेदारी।' ( 'ऊँची चारदीवारी')

सांप्रदायिक घृणा के विरुद्ध सामाजिक सौहार्द हमारे युग की ज्वलंत मांग है। संग्रह के अनेक गीतों में रचनाकार अपने पक्ष को प्रकट करता रहता है।
'फैला एक तनाव।
एक तरफ आँसू के गोले एक तरफ है पत्थर
थम जाती है साँस देखकर आज वक़्त का मंजर
ले जाएगा हमें कहाँ अब
भीतर का दुर्भाव?
.
ठीक नहीं है दुनिया में जो पनप रही कट्टरता
जाति-धर्म में बँटकर-कटकर मानव है नित मरता
ऐसे में मुश्किल है जगना अपनेपन का भाव।' ('दूर-दूर तक दहशत फैला')

योगेन्द्र प्रताप मौर्य भावुक मन के सहज कवि हैं। उनके व्यक्तित्व की यह सहजता बालपन की मोहक चितवन एवं निश्छल प्रेम की अनुभूति कराती है। वे भलीभाँति जानते हैं कि इस जड़ संसार में प्रेम ही चेतन, चिरंतन और चिदानंद है। शायद इसीलिये वह वर्तमान जीवन स्थितियों से उपजी पीड़ा और अवसाद का शमन करने और चुप्पियों को तोड़ने के लिए प्रेमपूरित हृदय से मधुर राग छेड़ते हैं और संवेदना एवं सृजन के बीज बोते हैं— "हम नहीं हैं मूक मानव/ चुप्पियों को तोड़ते हैं।/ वेदना मन में जगी है/ किन्तु कब ये नैन रोते/ हम धधकती भट्ठियों में/ हैं सृजन के बीज बोते।" कहने का आशय यह भी कि भाषा के संस्कारों से परिचित योगेन्द्र जी के नवगीतों में समकालीनता का पुट स्पष्ट दिखाई पड़ता है। युवा कवि शुभम श्रीवास्तव 'ओम' का भी यही मानना है— "योगेन्द्र प्रताप का लोक वास्तव में ग्रामीण अधिक है, किन्तु वह साम्प्रतिक विषयों पर भी चुप्पी तोड़ते दिखाई देते हैं। वैश्विक परिदृश्यों पर मुखरता भी है। वर्तमान परिवेश की महत्वपूर्ण चिंताओं पर उनकी पैनी दृष्टि है।" एक अन्य गीत की पंक्तियाँ देखें-

'तुम नफरत के लिए भला क्यों जीते-मरते हो?
जाति-वर्ग-मजहब की खाई चौड़ी करते हो।
***
जीवन हरते हो?
अपने भीतर इतनी आग कहाँ से लाते हो,
आखिर क्यों गंगा-जमुनी तहजीब मिटाते हो,
बहकावे में आकर जाने कहाँ विचरते हो?' ( 'तुम बदलोगे कब')

कहीं दलित वंचितों पर तो कहीं सीवर की मौतों का उल्लेख किया है तो कहीं बाल श्रमिक की मजबूर स्थिति पर संवेदना व्यक्त की है। अनायास ही पंक्तियाँ ध्यान खींचती हैं :
'नचा रही मजबूरी यहाँ अँगुलियों पर,
ध्यान किसी का जाता नहीं सिसकियों पर।
इतनी कच्ची वय में कितने काम कराती है,
दुनिया जालिम हाथों में औजार थमाती है,
खिल पाएँगे कैसे फूल टहनियों पर? ' ('बचपन बीत रहा है')

सामाजिक यथार्थ, सांप्रदायिक सौहार्द, छद्म राष्ट्रवाद, युद्ध और पाखंड का विरोध, पर्यावरण, मेहनतकश के श्रम, सीवर में मौत, वंचितों और बहुजन की पीड़ा की अभिव्यक्ति, बालश्रम,के साथ-साथ मणिपुर की हिंसा हो या महाकुम्भ की त्रासदी आदि अनेक विषयों पर उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता को नवगीतों के द्वारा व्यक्त किया है। राजनीति हर व्यक्ति क्र जीवन को प्रभावित करती है। कोई भी सजग रचनाकार स्वयं को देश, समाज, राजनीति, धर्म, अन्धविश्वास और आम आदमी की पीड़ा संघर्षों से निरपेक्ष नहीं रह सकता। योगेन्द्र मौर्य ने भी अपने लेख्मीय दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वाह करते हुए अपनी गीतात्मक प्रतिक्रिया अनेक गीतों में व्यक्त की है। गीतांश प्रस्तुत हैं :
'राजनीति ने सिक्का अजब उछाला है,
जिंदगियों में खलल आज फिर डाला है।
जंगल की आँखों से आँसू बहता है,
क्रूर समय का पिंजरा फिर भी हँसता है,
छीना जबरन मुँह से कौन, निवाला है?' ('क्रूर समय का पिंजरा') राजनीति पर एक व्यंजना चित्र पूरी व्यवस्था की बानगी का रूप है जो नियोजित ढंग फैलाये जा रहे झूठ को बेनकाब करता है । गीतांश प्रस्तुत है :

'कई कलाओं में माहिर ये बंदा है।
धीरे-धीरे अपना जाल बिछाता है,
बातों के ही दाने फेंक फँसाता है,
जादूगर भी
देख इसे शर्मिंदा है।

भाषणबाजी और मंच से नाता है,
पहले रोता इसके बाद रुलाता है,
मामूली है नहीं, 
गले का फंदा है।

इसकी तानाशाही इतनी चलती है,
यहाँ गरीबों की ही बस्ती जलती है,
लोग कह रहे
जनता का कारिंदा है।' ( 'जनता का कारिंदा है')

संग्रह में पर्यावरण सुरक्षा पर भी कई गीतों में व्यक्त किया गया है। 'एक धुँधलका छाया है',' निर्मम बुलडोजर',' यह माँग हमारी है' जैसे गीत इसी भय कोअभिव्यक्त कर रहे हैं। एक गीतांश में कहा है :
'आज हवा में हमने जहर मिलाया है,
छोड़ पटाखे गहन धुआँ फैलाया है। ' (एक धुँधलका छाया है)

संग्रह के गीत योगेन्द्र मौर्य के बहुआयामी सोच की अभिव्यक्ति तो है ही इसी के साथ उनकी जनसामान्य के प्रति सहानुभूति और अपने सरोकारों को भी स्पष्ट रूप से कहने में पीछे नहीं रहते। मणिपुर की हिंसक त्रासदी हो या महाकुम्भ की मौतें रचनाकार भावपूर्ण संवेदन को व्यक्त कर रहा है।
'आज करुणा नींद गहरी सो रही है।
मर गई माँ
आँख फिर से नम हुई,
फिर व्यवस्था कुंभ की बेदम हुई,
इस तरह विश्वास सत्ता खो रही है।
***
भीड़-भगदड़ का भयावह सीन है,
और संगम भी बहुत गमगीन है,
दूर तक फिर रेत,चुप्पी बो रही है।' ('सियासत हो रही है')

मानवीय संवेदनाएँ सार्वभौमिक होती हैं। करुणा भौगोलिक सीमाओं को लांघकर दूर तक पहुंचकर भावुक मन को छू लेती है। नामीबिया की त्रासदी पर एक भावपूर्ण इसी सत्य को व्यक्त कर रही हैं :

'नामीबिया की तस्वीरें देख के अम्मा रोयी
सो न सकी वह रात न जाने क्यों उनमें ही खोयी?
ये तस्वीरें जाने क्यों डर पैदा करती हैं
कितनी ही झोपड़ियाँ भूखी-प्यासी मरती हैं
चढ़ी नहीं है कई रोज से चूल्हे पर बटलोई।' ('नामीबिया की तस्वीरें')

संग्रह की रचनाओं से इसी प्रकार के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जो योगेंद्र प्रताप मौर्य के परिपक्व सोच और पुष्ट लेखन को सिद्ध करते हैं। त्रासदियों को व्यक्त करते हुए योगेंद्र निराश नहीं हैं और सकारात्मक सोच को व्यक्त करते हुए आश्वस्त करते हैं।

'खेत,मेड़,खलिहान,फसल के साथ रहे उल्लास,
बचा रहेगा इस धरती पर थोड़ा-सा मधुमास।
पेड़-पेड़ से बातें करते सुख-दुख कहते हैं,
धीरे-धीरे पत्ते झड़ते नव-नव गहते हैं,
बची रहेगी ऐसे इनमें फिर जीने की आस।' ('साथ रहे उल्लास')

एक अन्य गीत की पंक्तियाँ :
'हमें न रहना अंधकार में,
किसी वहम में।
***
आज हवाओं को गुलाल कुछ बाँट रहा,
गलतफहमियाँ- गहरी खाई पाट रहा,
उम्मीदों के गीत लिखें हम हर मौसम में।' ('उम्मीदों के गीत')

संग्रह के नवगीत बहुत कुछ कहने की मांग करते हैं। एक पाठकीय जिज्ञासा निरंतर चलती रहती है। संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त है कि ये गीत मानवीय संवेदना की सफल अभिव्यक्ति के सम्पुष्ट नवगीत हैं जो सुधि पाठकों, अध्येताओं, शोधार्थियों और विमर्शकारों को निश्चित ही आकर्षित करेंगे और सराहना प्राप्त करेंगे। योगेन्द्र प्रताप मौर्य को संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ !
--------

नवगीत संग्रह- जहाँ नहीं उजियार, नवगीतकार-योगेन्द्र प्रताप मौर्य, परिचय- जगदीश पंकज- कलमकार पब्लिशर्स प्रा. लि. 493-भारत अपार्टमेंट, स.१६-बी, द्वारका,दिल्ली-११००७८ कवर- हार्ड बाउंड, पृष्ठ- १२८, मूल्य- रु. ३५०,
ISBN : 9789349963603

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

क्या आपने यह पुस्तक पढ़ी है? यदि हाँ तो उसके विषय में यहाँ टिप्पणी करें। उपरोक्त समीक्षा पर भी आपके विचारों का स्वागत है।