राहुल शिवाय के इन गीतों को पढ़ते हुए पाठक भी यह अनुभव करेंगे कि ये गीत लिखने के पहले भोगे गये हैं। यथार्थ का कल्पना से यह सुघड़ मेल बिना अथक अध्ययन, सघन अनुभूति, अकथ साधना के संभव नहीं। नैसर्गिक प्रतिभा सम्पन्न इस गीतकार की सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि और विश्लेषण की अकूत क्षमता ने इन गीतों को जीवंत, प्राणवान किया है।
राहुल शिवाय में गीत बसता है। ये गीतों के बुनकर नहीं गायक हैं तभी तो विषय परिवर्तन के हर पड़ाव पर ठहरकर अभंग गेयता के साथ विवेकपूर्ण मोड़ (smart cut) लेकर आगे बढ़ते हैं, फेटम-फेट नहीं है। सब साफ़-साफ़ है। प्रकृति का आनंददायी निरीक्षण करते गीत, गीतों में प्रेम, शासन, कुशासन, सत्ता की बेरहमी का प्रतिरोध, श्लथ श्रमिकों की दीनता, रोज़ी-रोटी की जुगाड़ में पलायन करती भीड़, परिवर्तन को संकल्पित मज़दूरनी, असुविधाजनक दाम्पत्य में उमड़ते अनुराग का इन्द्रधनुषी रंग; सब दीखता है, लुभाता है, जगाता है, बुलाता है। समन्वय साधकर लिखे इन गीतों का पढ़ना रोचक आनंद और संतोष देता है।
संग्रह के गीत पीड़ा की रागात्मक अभिव्यक्ति से ऊपर उठे गीत हैं जहाँ वैज्ञानिक तर्क हैं, साम्य भाव है, सुन्दर-सहज स्थापना है और “अँजुरियों में अक्षत लेकर/ हम प्रेमिल संसार लिखें” का आह्वान भी है। सामाजिक चेतना से गहरे जुड़े गीतकार राहुल प्रतिबद्ध नवगीतकार से पहले समर्पित गीतकार हैं जिन्होंने ‘मरा से राम’ होने की प्रक्रिया का प्रश्न उठाया तो ‘स्वर्ण हिरण की सच्चाई’ का सवाल भी खड़ा किया है। “मन की सच्चाई/बतलाते/माँ शबरी के बेर थके” कहते-कहते दलित विमर्श पर ध्यानाकर्षित किया तो सत्ता संपोषित भ्रष्टाचार को “नल-नीलों की फौज खड़ी/पुल लेकिन हर बार गिरे” कहकर अनावृत भी कर दिया। स्थूल व्यक्ति, सूक्ष्म भाव और बहरे प्रशासन के साथ-साथ आध्यात्मिकता को एक ही गीत में सफलतापूर्वक पिरो लेना कैसी साधना माँगता है? इसे तटस्थता से समझने की आवश्यकता है।
यह भावुक गीतकार खिले फूल को देखकर स्वाभाविक रूप से तोड़ने को, हाथ में लेने को, सूंघने, ख़ुश होने को अकुलाता नहीं है। उसके इस लावण्य सौन्दर्य के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया को सुलझाकर जब उसके भय को “जैसे डरती हैं/लड़कों से आम लड़कियाँ” कहता है तो अपने स्त्री-विमर्श के सूत्र को भी थमाता हुआ कहता है-
इसकी/सुन्दरता पर/क्यों अधिकार जताऊँ
कैसे इसके/ सुन्दर मन को/ मैं ढहने दूँ
महिला सशक्तिकरण, ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे उछलते नारों, मंचीय घोषणाओं और उन्मादी आक्रोश दिखाती स्वतंत्रता से परे ये- “काश! युग की द्रोपदी का/सच कभी तो देखते” कहकर गंभीरतापूर्वक अपना पक्ष रख देते हैं।
गीतकार बिहार से हैं, जिसका जितना गौरवशाली इतिहास है उतना ही विवर्ण वर्तमान। सामाजिक रूप से बिखरे बँटे, राजनैतिक रूप से अराजक बिहार का प्रतिभासंपन्न युवा पलायन की त्रासदी झेलने को मजबूर है। समाज क्या चाहता है, परिवार क्या चाहता है, व्यक्ति क्या चाहता है जैसे प्रश्नों से बहुत ऊपर है परिस्थिति क्या चाहती है, ज़रूरतें क्या माँगती हैं? और इन्हीं ज़रूरी ज़रूरतों को पूरा करने के परिश्रम में प्रशिक्षित ‘लड़के’ “गाँव से जो भी/निकलकर आ गये/चाहकर भी /गाँव वे लौटे नहीं” जहाँ गये अपने सपने पीठ पर ढोते गये तो, लेकिन मजबूर मन ने वहाँ भी यही कहा “लेकिन कहाँ /पता था हमको/सूरज में भी नहीं उजाला”।
कहा जाता है कि दिल्ली अभी दूर है (हनूज़ दिल्ली दूर अस्त) का प्रयोग पहली बार चिश्ती सम्प्रदाय के सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने दूर के ख़तरे से उदासीनता के भाव में किया जिसे आगे मुगल शासक शाह जफ़र द्वारा भी ईस्ट इंडिया कम्पनी के साम्राज्यवादी प्रयास को झुठलाने के लिए उदासीनता के भाव में ही इस मुहावरे का प्रयोग हुआ। यूँ तो सामाजिक जीवन में बोलचाल की भाषा में भी यह एक लोकप्रिय मुहावरा है लेकिन इसे साहित्य से अधिक राजनैतिक नारे की तरह प्रयुक्त करने का प्रचलन है। साहित्यिक गीतों में राहुल शिवाय ने ‘दिल्ली दूर है’ कहकर कई-कई भावनाएँ इससे जोड़ दी हैं। आज दिल्ली दूर है उन प्रवासी कामगारों के लिए जो सुनहरे भविष्य की खोज में आये तो इन्हीं असुविधाओं के होकर रह गये और एक मिथ्या अहम् ओढ़कर मान लिया कि- “लेकिन दिल्ली/ में रहना भी/देता एक ग़ुरूर”, वहीं मन सीलन भरे कमरे का सच झुठलाने की स्थिति में नहीं है। यह दिल्ली जिसे अपना मौसम तक न मिला उसे भी गर्व है कि दिल्ली दिलवालों की है। इतना ही नहीं सुख, ऐश्वर्य, विलासिता और सत्ता का प्रतीक दिल्ली का दोहरापन तो देखिए-
“स्वागत गेहूँ, स्वागत मक्का
स्वागत तेरा धान
मगर न दिल्ली तक आना है
सुन लो सभी किसान”
लेकिन समाधान की तलाश में लिखे गये भाव का गीत प्रश्न पूछ लेता है “सुनेंगे कब तक यह फ़रमान”। मतलब हम मानने के मूड में नहीं हैं। नवगीतकारों में समाधान खोजते इस युवा नवगीतकार की इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए ‘समकालीन गीतकोश’ के सम्पादक नचिकेता ने पुस्तक की भूमिका में राहुल शिवाय के लिए लिखा कि “समकालीन गीतकारों की नयी पीढ़ी केवल सामाजिक समस्याओं से साक्षात्कार करके ही संतुष्ट नहीं हो जाती, वरन् उसकी तह तक पहुँचने का प्रयास करती है, समस्याओं के मूलभूत कारणों की तलाश करती है और समाधान खोजने की चेष्टा भी। यह पीढ़ी जानती है कि सिर्फ़ यथास्थिति का शोकगीत गाने से समस्याओं का समाधान नहीं हो जाएगा, इसके लिए दीर्घकालीन संघर्ष चलाना होगा, अगर कपड़े सिलने हैं तो ‘सूई चुभोनी ही होगी’।
गीत अपनी गेयता और भावान्विति के साथ जितनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ करता है उतना ही अपने बिम्बों, प्रतीकों से प्रभावशाली भी होता है। संग्रह के गीत दिल्ली को चारों ओर से घेरती परिधि का सत्याख्यान हैं तो इसके व्यास पर नित नये ढंग से होते नये अजूबे राजनैतिक हलचलों की भी ख़बर रखते हैं। इसके केन्द्र में यदि राजनैतिक वैभव, सुविधाओं के संजाल का आकर्षण और शक्ति और उसके प्रदर्शन का मायाजाल है तो परिधि को छूती त्रिज्या पर प्रेम, घृणा, द्वेष, डाह, विवशता, दीनता की विविधवर्णी सच्चाई भी है। गीतों में यथार्थ है तो कुछ अस्वीकृत गोपनीयताएँ भी हैं। प्रजातंत्र का केन्द्रीय सच है तो “दिनुआ दीनानाथ हो गया/, कोरे नारे से” का पारम्परिक सच भी। कवि जब “प्रजातंत्र में रोज़ नीतियाँ/करतीं हाहाकार” कहता है तो उसके सामने पारिभाषिक प्रजातंत्र नहीं व्यावहारिक व्यवस्था रहती है जहाँ का परिवेश कुछ यूँ है-
“रोज़ मदारी/नचा रहे हैं/नये जमूरों को
छाया का /अधिकार मिला है/ताड़-खजूरों को
चाणक्यों ने भर-भर झोली/भेंट किया स्वीकार”
और ऐसी स्थितियाँ जब आम हो जाती हैं तो संस्थाएँ निर्जीव और अनुपयोगी होने लगती हैं। रुक, ठहरकर देखें तो शिक्षा के व्यवसायीकरण की चिंता किसे है? प्रजातंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जागरूक जनता का होना ज़रूरी है। नीर-क्षीर विवेक के बिना मताधिकार का समुचित प्रयोग नहीं हो सकता और शिक्षा अगर सबको उपलब्ध हो गयी तो उभरते-बनते क्षत्रपों को अतिरिक्त चुनौतियाँ झेलनी पड़ेंगी इसलिए उस नर्सरी को ही नष्ट करो जो स्वस्थ पौध तैयार करे, स्वार्थ के चल रहे छद्म षड्यंत्रों के तहत ही आज “नालंदा फिर से/खंडहर होने को तैयार” है।
गीत के पठन, पाठन श्रवण का अलग-अलग आनंद है। पठन अगर आन्तरिक संतोष और ऊर्जा देता है तो पाठन अर्थ का द्वार खोलता है वहीं श्रवण एक अतिरिक्त समझ की ज़मीन सुझाता है। श्रवण गीतकार द्वारा पतित गीतों के सुनने का, स्वरों के आरोह, अवरोह, तान, अनुतान, स्वाराघात, लोप अलग अर्थ और ध्वनि की सृष्टि करता है। यह मेरा अतिरिक्त सौभाग्य है कि मुझे संग्रह के प्रायः गीतों का प्रथम श्रोता होने का गौरव प्राप्त है। उस अनुभव और बिम्बों को मूर्त करते वाचन की प्रतिक्रिया के आधार पर मैं निर्भ्रांत रूप से कह सकता हूँ कि राहुल शिवाय अपने शब्द और अर्थ-लय के बूते प्रभाव का नया क्षितिज निर्मित करने की योग्यता रखते हैं।
शब्द-लय, अर्थ-लय, पीड़ा-लय का समवेत प्रभाव पाठक को जिस तरह गीतों के साथ एकाकार कर लेता है वह अप्रतिम है, अनिवर्च! सभी गीत अपनी पूरी ध्वनि के साथ पाठकों के दिल में उतरते जाने की क्षमता रखते हैं चाहे विसंगत समाज की इच्छा और क्रिया का सच “चाँदनी से गंध चाही/रोशनी कचनार से” हो या हमें मरकट की तरह नचाते बाज़ार में “फटी जींस से/बिल्कुल अलग कहानी झाँक रही” को झुठलाता सच, भले “रोज़ मदारी /नचा रहे हैं/नये जमूरों को” भले उछलते नारों के बीच हम “सत्य अहिंसा, सद्भावों के/वैष्णव बनकर रहे किनारे” की स्थिति में हों मगर पग पूजन के विरोध में खड़े “जो नहीं चाकर हुए/कुचले गये” का वर्णन करते राहुल जी रुके, ठहरे नहीं। इसीलिए गणेश गंभीर ने कहा “उनके गीतों में जागतिक विडम्बनाओं, जनाक्रोश, यथास्थितिवाद और शहर के संक्रमण, गाँव आदि विषयों से सामग्री प्राप्त करते हैं। राहुल शिवाय का नवगीतकार तब ज़्यादा मुखर होता है जब रूढ़ि और पाखंड पर बात कर रहे हों।”
राहुल जी ने साहित्य और व्यवहार के संसार को अलग-अलग नहीं देखा। एक-सी नज़र और परख रखी है। गलाकाट प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थियाँ एक अन्तर्मुखी व्यक्ति के हिस्से का यश कैसे ढक देता है, हाशिये पर ढकेल देता है उसे भी सहजता से रेखांकित करते हुए ये कहते हैं-
“मेरे पास सीप-मोती थे/मैं उनको पर दिखा न पाया
अपने-अपने घोंघे लेकर/सभी प्रशंसित थे जिस तट पर”
राहुल शिवाय आधुनिक प्रौद्योगिकीय के व्यक्ति हैं जो मानवीय मूल्यबोध वश साहित्य के आँगन में हैं, मन और शिक्षा ने स्वभाव को प्रगतिवादी किया है। स्वाभाविक ही अपनी बात करते हुए ख़ुद को भाव, भाषा स्तर पर स्वतंत्र रखते सृजन करते हैं। कथ्य और स्वाभाविकता का निर्वाह करते हुए भाषाई प्रयोग इनकी विशेष विशेषता है इसीलिए बिना अटके, खटके इनके गीतों में लोकेशन, टॉवर, वालपेपर, सॉल्व, टास्क, सर्च इंजन, टेक्नोलॉजी जैसे शब्दों का सरल-तरल प्रयोग हुआ है।
मुझे यह मान लेने में कोई संकोच नहीं है कि राहुल शिवाय के गीत/नवगीत के मापदंडों में खरे उतरते हैं। भाषा की सहजता संतोषदायी है तो कथ्य प्रेरक हैं। कल्पना बस गठन की सीमा तक ही वैज्ञानिक दृष्टि को प्रभावित करती है। अपनी सहजता, कोमलता, यथार्थपरकता, गेयता, ग्राह्यता से ये गीत पाठकों, सुधी आलोचकों का ध्यानाकर्षण का उत्स सिद्ध हों, यही कामना है।
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नवगीत संग्रह- दिल्ली कितनी दूर, नवगीतकार-राहुल शिवाय, परिचय- अनिल कुमार झा, प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा, कवर- पेपर बैक, पृष्ठ- १२०, मूल्य- रु. २४९, ISBN : 978-81-977075-4-4,

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