श्री हरिवल्लभ शर्मा हरि जी को गज़ल में सिद्धहस्त माना जाता रहा है। लेकिन "मुखर चितेरे" में साहित्यिक हिंदी की कविताओं को हम पाते हैं तो आत्म विभोर हो जाते हैं। कथ्य, शिल्प, व्याकरण, प्रवाह की परिपूर्णता तो है ही, कविता के विषय भी हम हमारे हृदय में विराजित आत्मतत्व से सटे हुए पाते हैं। नवगीत और पारंपरिक गीत विधा में रची ५६ कविताओं का यह संग्रह केवल नाम से ही नहीं चरित्र से भी "मुखर चितेरे" की तरह है। इसमें शब्दों के चित्र मुखर होकर बोलते हैं-
वन विकास का जिम्मा जिन पर, डाकू वे जंगल के।
भू राजस्व नजूल महकमे, बने माफिया थल के।
सड़क चरोखर नालों तक के
पट्टे स्वयं धरे।
मुखरता का यह दृश्य पढ़ कर आप चौंक जाएंगे कि अरे! यह तो हमारे साथ ही हो रहा है-
उनके घर में दिखे अंधेरा, जिनके घर में मीटर
सीधी लाईन वालों के घर, टीवी एसी हीटर
जला रहे हैं वे ठप्पे से
हम महसूल भरें।
आप जैसे-जैसे इस संग्रह की कविताएँ पढ़ते जाएँगे उनमें डूबते हुए स्नान करेंगे। कविताएँ आपके रोम-रोम को सिक्त करेंगी।
धेनु लेकर फिरा सघनवन से,
झूमता गीत गा रहा ग्वाला।
गूंजती बांसुरी मधुर स्वर में,
छेड़ता राग कौन मतवाला।
यह राग निश्चित ही पाठक के मन की धेनु के साथ आते भावों के ग्वालों के लिए हरिवल्लभ शर्मा हरि ही छेड़ रहे हैं।
कर्तव्य और संघर्ष को गीता के शब्द देते हुए मुखर चितेरे में वे कहते हैं-
कुरुक्षेत्र में पार्थ खड़ा है, किंकर्तव्यविमूढ़।
विजय कहाँ है बिना युद्ध के, कृष्ण ज्ञान दें गूढ़।
उठो समर हित शस्त्र सम्हालो,
तोड़ो मतिभ्रम जाल।
वे मन की गति और उसके पथ को चित्रित करते हुए कहते हैं-
एकाकी ये दूर क्षितिज पर, बिम्बित करता तुमको।
दृश्यमान इन परिदृश्यों में, कल्पित करता तुमको।
नीरवता में आहट
पग की सुनता रहता है।
संग्रह की पूरी कविताएँ पढ़ने के बाद मैं आपसे भी यही कहूँगा कि यदि आप हिंदी की उत्कृष्ट और मन की गलियों में गश्त देती कविताओं से परिचित होना चाहते हैं तो मुखर चितेरे जरूर पढियेगा।
नवगीत संग्रह- मुखर चितेरे, नवगीतकार- हरिवल्लभ शर्मा, परिचय- चौधरी मदनमोहन समर, प्रकाशक- प्रेरणा पब्लिकेशन भोपाल कवर- हार्ड बाउंड, पृष्ठ- १४०, मूल्य- रु. -,
ISBN: 978-93-87463-72-1

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