रविवार, 1 मार्च 2026

बार बार उग ही आएँगे- गरिमा सक्सेना

बार बार उग ही आएँगे गरिमा सक्सेना के पचास गीतों का तीसरा संग्रह है।अतीत की स्वस्थ परम्परा का संबल लेकर वर्तमान को साहस के साथ स्वीकारते एक काँटों भरी राह पर चलकर गरिमा सक्सेना की चाहत उस उज्जवल भविष्य को मुट्ठी में कसने की है जिसके लिए प्रगतिशीलता, अपराजेय आस्था और सृजन का संकल्प अपरिहार्य है। उनकी सर्जना में शिकायती स्वर तो दिखते हैं किंतु पराजयबोध नहीं। अपने कथन की पुष्टि हेतु ‘बार-बार उग ही आएँगे’ रचना का अंश प्रस्तुत है-
“चाहे धूप कड़ी हो तन पर
या भीषण वर्षा का हो डर
हमने हर मौसम स्वीकारा
जीवित रक्खा साँसों का स्वर
अपनी जड़ पर हमें भरोसा
हाथ नहीं हम फैलाएँगे
हम पीपल हैं/वनतुलसी है
बार-बार उग ही आएँगे।”

इस प्रकार जीवन के प्रति कवयित्री की यह अखंड आशा तथा आस्था अंतत: सम्पूर्ण मानव-भविष्य के प्रति उनके आस्थावादी-जीवन का पर्याय बनकर उपस्थित हुई है जो उसकी सर्जना का एक उज्जवल पक्ष है।

वस्तुत: किसी भी उत्तम काव्य का सृजन तब तक नहीं हो सकता जब तक उसके रचयिता की दृष्टि इतनी व्यापक न हो कि वह तात्कालिक वात्याचक्र में ही धुँधली न होकर एक ही प्रयास में समूचे राष्ट्रीय जीवन की अनंत प्रेरणाओं को अपने में समाहित कर उसके प्रकाश में अतीत, वर्तमान तथा भविष्य तीनों को देख सकने की क्षमता रख सके। इस प्रकार की व्यापक अंतर्दृष्टि से समन्वित रचनाकार के रूप में श्रीमती गरिमा सक्सेना का नाम लिया जा सकता है जो एक दिन दूसरी महादेवी अथवा शांति सुमन बनकर अग्रधन्वा नवगीतकार का व्यक्तित्व ग्रहण कर सकती हैं। उनका यथार्थ चित्रण इन्हीं अर्थों में प्रेरित करता है। मानवता को जीवित रखने के लिए जब वे लिखती हैं- “दूर-दूर तक छाँव नहीं है/तपती सड़कों पर/इमारतों ने छीन लिए हैं/टेसू, गुलमोहर/बीत रहे हैं कड़ी धूप में/आफत वाले दिन।”

इसी क्रम में वे दूसरे नवगीत में लिखती हैं-“मजबूरी की सड़कों पर हम/गड़े मील के पत्थर जैसे/हर मौसम में हमको रहना/उसी ठिये पर जैसे-तैसे/तपकर ही तो निखरे हैं हम/क्या कर लेगा जेठ महीना।”

यह जिजीविषा का भरपूर प्रयास मानव अस्मिता के साथ प्रत्येक चुनौती को स्वीकार कर उसे ललकारने का एक उपक्रम है। चुनौतियों के सम्मुख गरिमा जी रिरियाती नहीं बल्कि उनका साहस के साथ सामना करने का संदेश देती हैं और स्वयं भी एक दिन चुनौती को भूमिसात कर देती हैं तब लिखती हैं- “इक अरसे से/धूल भरे थे चित्र सभी/दिखे नहीं थे/बहुत दिनों से मित्र सभी/... शीतलता के/जागे छन्द हवाओं में/नयी ताज़गी/लौटी पुन: शिराओं में/मैले वसन उतारे/मन की थकन मिटी।”

कवयित्री श्रीमती गरिमा की यह विराट तथा गहन दृष्टि ही उनमें ऐसी सांस्कृतिक चेतना फूँक सकी है जिसमें नये-नये पथों पर प्रवाहमान होने के बावज़ूद कवयित्री का रचना संसार किसी भारतीय साहित्यिक तथा  सांस्कृतिक परम्परा के एक अंग के रूप में प्रतिष्ठित है। उसकी सांस्कृतिक परम्परा की पीठिका यदि इतनी पुष्ट न होती, परम्परा के स्वस्थ तत्वों का अनिवार्य सम्पर्क यदि गरिमा जी को न प्राप्त होता तो कदाचित् उनके सृजन का महत्व इस ऊँचाई तक न पहुँच पाता जैसा कि वह वर्तमान में है।

अपनी अब तक की काव्य-सर्जना में उन्होंने जितने भी नये प्रयोग किये हैं उनके मूल में उसी सृष्टा तथा क्रांतदर्शी रचनाकार की छाप दिखायी पड़ती है। और इसी संदर्भ में वे लिखती हैं- “आज अहिंसा के पथ पर क्यों/इतने-इतने युद्ध खड़े हैं/ठहर गया बुद्धत्व, पूछता/आख़िर हम कब तक ठहरेंगे/पहन उँगलियों की मालाएँ/शरण बताओ किसकी लेंगे/ अंगुलिमालों की बस्ती में/मौन तथागत बुद्ध खड़े हैं।”

हिंसा के आँगन में अहिंसा का संदेश देते-देते तथागत भी थककर मौन हो गये हैं। विस्तारवादी, मानवताविरोधी विचारधारा जो केवल स्वयं जीना चाहती है किन्तु अन्य को जीने का अधिकार नहीं देना चाहती क्या यही प्रगति है।

परम्परा कोई मरी हुई चीज़ या मृत वस्तु अथवा अतीत की वस्तु न होकर एक ऐसा बोध है जो समय खंडों का अतिक्रमण करता हुआ हमारे वर्तमान में निजी संस्कारों में घुलमिलकर परोक्ष रूप से हमारे विचारों को संचालित करता है। निर्मल वर्मा के अनुसार परम्परा कोई मृत वस्तु नहीं है, उसमें जड़त्व नहीं है, वे स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं- “परम्परा एक जड़ित समय की धरोहर नहीं बल्कि वह समय है जो अतीत से बहता हुआ हमारे वर्तमान की धमनियों में प्रवाहित होता है।” डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी परम्परा को रूढ़ि का पर्याय नहीं माना है- “परम्परा अतीत का समानार्थी नहीं है, परम्परा में समूचा अतीत हमें प्राप्त नहीं होता, उसका कटा-छँटा निखरा रूप प्राप्त होता है और इस प्रकार परम्परा और आधुनिकता में सहज सम्बन्ध है। उसका सहज अर्थ है एक का दूसरे को, दूसरे का तीसरे को दिया जाने वाला क्रम।" वे द्रष्टांत देते हैं- मनुष्य दोनों पैरों से चलता है, एक पैर धरती पर रोपता है, दूसरा पैर आगे बढ़ाता है। खड़ा पैर परम्परा है और आगे बढ़ने वाला पैर आधुनिकता है। परम्परा इस प्रकार आधुनिकता को आधार देती है। अज्ञेय ने भी वर्तमान के साथ अतीत की सम्बद्धता और तारतम्यता को परम्परा स्वीकार किया है। श्रीमती गरिमा सक्सेना के नवगीत भी अतीतबोध के साथ वर्तमान में प्रवेश करते हैं तथा इन तथ्यों की पुष्टि ही करते व्यक्त होते हैं। यथा- “जो कुछ परदे में रहना था, सब है परदे पर/घोल रहा जो नित्य रगों में मीठा एक ज़हर/नयी सदी की ख़ातिर ये कैसी सौगातें हैं/जिसमें सबका हित था, ग़ायब वह साहित्य हुआ/बाज़ारों ने इसे बनाया बिगड़ा हुआ सुआ/नैतिकता को बेच दिया है बंद लिफ़ाफ़ों में/अटका हुआ ध्यान बस सबका बड़े मुनाफ़ों में/बढ़ता देख ट्रेंड कौओं का आज मीडिया पर/कोयल ने भी सीख लिया है काँव-काँव का स्वर/सूर्य बुझा, बल्बों से रौशन दिन औ’ रातें हैं।”

इस बदले हुए परिवेश में वह क्या है जो छीज गया है और उसकी अनुपस्थिति हमें ऐसी नैतिकता, मानवता, आस्थाविहीन क्षरित दशा का बोध करा रही है। संभवत: वह परम्परा ही है जो समाज को नियंत्रित व संयमित रखती है। अतीत की छाया में प्रस्तुत ‘हौसला मत हार’ शीर्षक नवगीत में भी हमें उक्त विचार के दर्शन होते हैं- “है समय का ग्राफ माना/कुछ ढलानों पर/ये मगर फिर से नया/उत्थान चुन लेगा/है नहीं ऋजु रेख जीवन/मार्ग सुन ले तू/क्षीण करता यदि समय/तो शक्ति भी देगा/यह समय उल्लास के/फिर गीत गायेगा।”

श्रीमती गरिमा जी के नवगीतों के संदर्भ अतीत में छिपे हैं और उन्हें समझे बिना अर्थ अधूरे रह जाते हैं। प्रत्येक नवगीत का एक इतिहास है जो प्रक्षिप्त है। सहज-सरल शब्दों में वे बेहद गूढ़ बात कह जाती हैं। जिनकी व्याख्या शब्दार्थ से नहीं की जा सकती है। अपने समय को सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करने में वे बेजोड़ हैं। ‘प्रायोजित गलफाँसें’ शीर्षक नवगीत में वर्तमान का विरूपित चेहरा दिखाती हुई वे लिखती हैं- “सुविधाओं के पैरों में/फट गयी बिवाई है/रोशनदानों जैसी/खिड़की की सच्चाई है/.../कई हज़ारों में मिलती हैं/घंटे भर की साँसें/राहत के हिस्से में आयीं/प्रायोजित गलफाँसें।”

प्रायोजित गलफाँसें पूरी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करती है। व्यवस्था के जितने क्षेत्र हैं, सबमें क्षरण सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है जिसकी जकड़न में साँसें ऊभचूभ हो रही हैं।

भारत का साहित्य लोकमूलक है और यहाँ की परम्पराओं और अपनी संस्कृति से ही ऊर्जस्वित होता है। ब्रज, अवधी, भोजपुरी, खड़ी बोली, मैथिली, बघेली, बुन्देली आदि लोकभाषाओं से हिन्दी का वर्तमान स्वरूप निर्मित हुआ है। इसीलिए साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। विश्व भाषाओं में एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करने का इतिहास है जिसका नाम भाषा विज्ञान है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है जो नवगीत में भी देखा जा सकता है। नवगीत में लिपटी संस्कृति कथ्य और शिल्प दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है जिसके अभाव में नवगीत, नवगीत नहीं रह जाता। नवगीत की वैचारिकता का विश्लेषण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि लोकजागरण, लोकमंगल ही नवगीत का उद्देश्य रहा है। गरिमा सक्सेना की भी विचारधारा इससे इतर प्रतीत नहीं होती है। वे कथ्य की व्यंजना से समाज में व्याप्त विद्रूपताओं को व्यक्त करने में सर्वथा सफल हुई हैं- “अब शहर वाली सियासत/जंगलों तक आ गयी/हर तरफ़ मृगछाल का/आया चलन/.../शावकों को/आग में झौंका गया/हो रहा है/हर तरफ़ कैसा हवन/हरे वृक्षों के अचानक/पात पीले हो गये/भेड़, बकरी, मेमनों के/नख नुकीले हो गये/इस तरह नफ़रत/हवाओं में घुली/भेड़िये जैसा हुआ/खरगोश-मन।”

बाँटो और राज करो वाली विदेशी सियासत अब भारत में भी आ गयी है। और पक्ष तथा विपक्ष एक-दूसरे से घमासान कर रहे हैं। विपक्ष अलगाववादियों के हाथों में खेल रहा है। परस्पर सामंजस्य का समाज में लोप हो गया है। अविश्वास और असुरक्षा के इस वातावरण में खरगोश मन भेड़िये-सा आचरण करने लगा है। कवयित्री पूरे समाज, सियासत को संदेश दे रही है कि माबलिंचिंग, महिलाओं के साथ दुराचरण और समाज में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को रोका जाये अन्यथा विकास और विनाश में अंतर ही क्या? नवगीत प्रवाचक या उपदेशक की भूमिका से पृथक है। संदेश कथ्य में छिपा रहता है क्योंकि नवगीत अभिधात्मक न होकर व्यंजनात्मक होता है। इसीलिए गरिमा जी को कहना पड़ा- “बूँदों की ताज़गी नहीं है/मेघों में हैं सिर्फ़ छलावे/सिर्फ़ गरजने वाले बादल/बाँच रहे केवल बहकावे/साँकल खुली अगर जो मन की/आँधी पा जाएगी अवसर/बदल गये जीवन के अक्षर/आँधी बहुत तेज़ है बाहर।”

गरिमा जी की वेदना पूरे समाज की वेदना है। जो सम्वेदी अंतरमन का प्रतिफल है। रचनाकार के नेत्र कैमरे के लेंस की भाँति होते हैं जो संज्ञान में घटित प्रत्येक घटना-दुर्घटना के चित्र अवचेतन में भेजते रहते हैं। इसमें से कुछ चित्र तो अचेतन में चले जाते हैं और कभी लौटकर नहीं आते किन्तु जो अवचेतन में एकत्र रहते हैं उनमें कभी-कभी अनजाने उच्छलन होता है जो एक पंक्ति के रूप में उतरता है जिसके आधार पर रचनाकार गीत का सृजन अपनी प्रवृत्ति-प्रकृति के अनुसार कर लेता है। जिस पर राजनीति, धर्म, संस्कृति, परम्परा एवं देशकाल का भी प्रभाव पड़ता है। कैमरे का लेंस जितना तीव्र, स्पष्ट और दोषरहित होता है, उतना उत्तम कथ्य, शिल्प, संवेदना का रचाव होता है। नवगीत लयाश्रित होता है क्योंकि कोई भी कवि-कवयित्री छन्द को आधार बनाकर गीत नहीं लिख सकता। लय की शुद्धता होने पर छन्द स्वत: रचना में आ जाता है।

गरिमा जी के नवगीत छंद की कसौटियों पर खरे उतरते हैं। ‘बरी हो गये गिद्ध’ शीर्षक नवगीत का एक अंश यहाँ उल्लेखनीय है-“फिर सलीब पर/ टँगी हुई है लाश/उम्मीदें पर/किसकी करें तलाश/.../सूखे मन की/रोज़ परीक्षा/लेता है आकाश/सत्याग्रह के गर्म तवे पर/हुईं रोटियाँ सिद्ध/फिर लाशों पर दोष डालकर/बरी हो गये गिद्ध/पता नहीं/कबतक सपनों को/जीना है अवकाश।” इस प्रकार गरिमा जी नवगीत की सिद्ध कवयित्री हैं कहना अतिरेक नहीं होगा।

साहित्य तब तक ही ग्राह्य है जब तक समाज के लिए उपयोगी है। साहित्य की उपादेयता में ही उसकी प्रासंगिकता है। साहित्यकार युगदृष्टि सम्पन्न होता है। जिसके अंतस में युगचेतना स्वत: स्फुरित होती है और यही युगचेतना उत्तम नवगीत का आधार बनती है जो व्यक्ति और समाज को संस्कारित करती है और युगचेतना का विस्तार भी होता है। नवगीतकार के समाजोन्मुखी होने के कारण ही उसकी व्यक्तिगत वेदना भी पूरे समाज की वेदना के रूप में प्रकट होती है। और यही है कवि की संवेदना का सामाजीकरण। साहित्य, संगीत, कला की हज़ारों वर्ष प्राचीन विरासत को सहेजने तथा समृद्धशाली बनाने में नवगीतकारों का योगदान अविस्मरणीय है जिसमें निम्नवत् तत्वों का योगदान है- (1) संस्कृति से जुड़ाव, (2) समाज की चिन्ता, (3) वर्तमान को सुंदर बनाने के लिए संदेश, (4) देशप्रेम,

(5) स्वाभिमान, (6) भाषा की उद्दात्तता। गरिमा जी के नवगीतों में इन तत्वों का अभाव नहीं दिखायी पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है- कीरति भमति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।

श्रीमती गरिमा सक्सेना का कथन है कि- नवता और उक्त गुणों से सम्पन्न नवगीतों का रचाव इतना भी सरल नहीं है जितना कह देना। इसकी यात्रा में अनेक कठिनाइयों के साथ आत्मबलि भी आवश्यक है तभी गंतव्य तक पहुँचा जा सकता है। ‘बादल होना’ शीर्षक नवगीत से उनकी इस उक्ति को सहज ही समझा जा सकता है- “इतना भी आसान नहीं है/बादल होना/आसमान को छोड़/धरा में ख़ुद को खोना/ऊँच-नीच को भूल/सभी को गले लगाना/ऊसर, पेड़, नदी, पर्वत/सबका हो जाना/क्या है जीवन-अर्थ/हमें समझाने आये/बादल आये/तपता मन हर्षाने आये।”

नवगीतकार साहित्य और समाज के लिए जब बादल बन जाता तब उसका स्व समाप्त हो जाता है, यही है उसकी सिद्धि और गंतव्य। गरिमा जी में हम ऐसे ही नवगीतकार का दर्शन करते हैं।

वर्षा सम्पूर्ण संसृति को हर्षित कर देती है और बादल से उत्तम प्रतीक कोई अन्य नहीं है। वर्षा प्रकृति ही नहीं प्रत्येक जीवन के लिए अनिवार्य है जिसके अभाव में जीवन ही संभव नहीं है। इसीलिए गरिमा जी बार-बार बादल की प्रशंसा कर उसकी करुणा का वर्णन करती हैं। यथा- “ज्यों प्यासे के पास कुआँ/चलकर आया है /जैसे कोई स्नेह-छत्र/बनकर छाया है/तपते मन पर/ज्यों ख़ुशियों के/पल बरसे हैं/मुझे पता है/किन प्रश्नों के/हल बरसे हैं।”

मनुष्य की सत्ता में अनुभूति लोक ही वह रहस्य लोक है जहाँ बाहर के रूप जगत का संपूर्ण वेग अंतर का आवेग बन जाता है। और यह अंतर का आवेग बाहर रूप ग्रहण करने को उत्सुक हो जाता है इसलिए काव्य का होना आवश्यक होता है। वह अपने अर्थ से तो बाहरी घटनाओं को व्यक्त करता है किन्तु गति के द्वारा आंतरिक वेग को भी प्रकाशित करता है जो किसी भी रचना का मूल अर्थ होता है। ‘मौन रहना बेहतर है’ शीर्षक नवगीत की कुछ पंक्तियाँ उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं- “जब शब्दों के अर्थ/बदलकर रूप खड़े हों/वहाँ मौन रहना बेहतर है/प्रश्नों के बदले मिलती हैं प्रश्नावलियाँ/उत्तर केवल गिना रहे/कमियाँ ही कमियाँ/जहाँ गड़े मुरदे/संवादों में उखड़े हों/वहाँ मौन रहना बेहतर है।”

वाक्य जब सीधा खड़ा रहता है तब केवल अर्थ को प्रकट करता है। परन्तु जब वह तिरछी भंगिमा खड़ा होकर, गतिशील होकर साधारण अर्थ के अतिरिक्त और भी अनेक तथ्य प्रकाशित करता है वह अतिरिक्त वस्तु क्या है यह कहना कठिन है क्योंकि वह वचन के अतीत है और इसीलिए अनिर्वचनीय है। हम जो कुछ देखते हैं, सुनते हैं, जानते हैं उसके साथ जब अनिर्वचनीय का योग होता है उसे ‘रस’ कहा जाता है। अर्थात् वह वस्तु जिसे हम अनुभव करते हैं पर उसकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं होती है। यह गूँगे का गुड़ है जिसकी मिठास का आनंद प्राप्त करने पर भी गूँगा व्यक्त नहीं कर सकता। ‘रस’ ही पठनीयता में अभिवृद्धि करता है। गरिमा जी के गीतों की रसाद्रता अथवा सरसता उस आनंद की सृष्टि करती है जिसे ‘रस:वै स:’ के रूप में कहा गया है जिससे ‘अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः’ की संज्ञा दी गयी है। उदाहरणस्वरूप निम्नांकित पंक्तियाँ ‘मतभेद’ शीर्षक से प्रस्तुत हैं- “तेल और बाती/दोनों ही अलग खड़े हैं/अँधियारे ने यह कैसा/मतभेद भर दिया/अलग हो गयी जीवन से/उन्नति की भाषा/‘जैसा है चलने दो’ में/खोई अभिलाषा/मुट्ठी भर ही रहे केन्द्र में/केवल शामिल/बाक़ी के हिस्से में आया/सिर्फ़ हाशिया।”

वस्तुत: गरिमा सक्सेना जी अंतर्जगत की दृष्टा हैं और बहिर्जगत को भी वह सीधा नहीं देखतीं, अंतर्जगत में उतार कर अपनी अनुभूति के माध्यम से देखती हैं। बाहरी संसार यदि सबको उजला दिखता है तो दिखता रहे किंतु गरिमा जी जब इस उजलेपन को अंतर्जगत में उतार कर देखती हैं तो उजाले में छिपी वह कालिमा भी दिख जाती है जो बाहर-बाहर देखने वालों के लिए अदृश्य है। इस अंतर्दृष्टि के कारण ही गरिमा जी मन के भावों और भाव-संवेदनाओं का चित्रण करती हैं। उक्त संदर्भ में निम्नांकित पंक्तियाँ दर्शनीय हैं- “मंदिरों में, घाट पर/पूजाघरों में/प्रार्थनाओं से अधिक/अब सेल्फियाँ हैं/हो गये हैं तीर्थ/शापिंग मॉल जैसे/पिकनिकों का /एक अड्डा हो गये हैं/भाव के भूखे रहे/भगवान लेकिन/ है दिखावा/भाव ही ज्यों खो गये हैं/अब नहीं/श्रद्धा कहीं देती दिखायी/रील्स इंस्टा पर बना लो/मूर्तियाँ हैं।”

गरिमा सक्सेना जी के नवगीत काल और समाज का यथार्थ चित्रण करके सकारात्मकता का पथ प्रशस्त करते हैं तथा समाज को समुचित प्रगतिशीलता का मर्म समझाने का प्रयास करते हुए मानव-उत्थान का संदेश देते हैं। गरिमा जी सहज-सरस-सरल भाषा के प्रवाह को शिल्प में नियंत्रित कर नवगीत में नये आयाम जोड़ती हैं, जो जन-जन को ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय’ की ओर प्रवृत्त कर संवेदना का विस्तार कर रही हैं। प्रसाद गुण सम्पन्न उत्तम नवगीत-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई देते हुए मुझे विश्वास है कि नवगीत जगत में इसका भव्य स्वागत होगा।

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नवगीत संग्रह- बार बार उग ही आएँगे, नवगीतकार-गरिमा सक्सेना, परिचय- अवनीश त्रिपाठी- प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा,  कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- १२०, मूल्य- रु. २४९,
 ISBN : 978-81-983152-7-4

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