भाव के अनुरूप जब कुछ शब्द गुनगुनाहट में शामिल होते हैं तो गीत बन जाते हैं। भावोदय के क्षणों में सांगीतिक लय, ताल और गति के साथ शब्दों का साकार अवतरण ही गीत के जन्म की घटना है। इसे ही परिभाषित करते हुए ऋषि ने कहा— 'गीयते इति गीतम्' यानी जो गाया जा सके वह गीत है। वरिष्ठ कवि डॉ. राम वल्लभ आचार्य का १०१ गीतों से सजा नवीनतम नवगीत संग्रह 'हल्दीघाटी हुई जिंदगी' इस अवधारणा का अनूठा उदाहरण है।
डॉ. राम वल्लभ आचार्य लंबे समय से गीत की साधना कर रहे हैं। वैविध्यपूर्ण सृजन आचार्य जी की विशेषता है और पहचान भी। 'राष्ट्र आराधन' से लेकर 'हल्दीघाटी हुई जिंदगी' तक कुल प्रकाशित ग्यारह पुस्तकों में देशभक्ति, भजन, अध्यात्म, शृंगार, सामाजिक सरोकार और बाल मन के भावों की गहरी अभिव्यक्ति है। अनुभूतियों को चाक्षुष बिंबों में रूपांतरित करने की कला में आचार्य जी सिद्धहस्त हैं। प्रस्तुत गीतांश में मनुष्य की भावदशा को भौगोलिक पहचान के साथ लाक्षणिक कलात्मकता से तराशकर शब्दरूप गढ़ने की दक्षता देखी जा सकती है—
मन में इतनी उलझन
जितने सघन सतपुड़ा वाले वन,
हल्दीघाटी हुई जिंदगी
चेरापूँजी हुए नयन।
× × ×
दिल्ली जैसा दिल बेचारा
जीवन प्रश्नों से जूझे,
उत्तर किंतु अबूझमाड़ से
रहे अभी तक अनबूझे।
पीड़ाएँ नित रास रचातीं
समझ हृदय को वृंदावन। (पृ. ८१)
इस गीत में मन की उलझन सतपुड़ा के विख्यात सघन वन, संघर्षपूर्ण जीवन, ऐतिहासिक युद्धभूमि हल्दीघाटी, दुख के आवेग से बरसते हुए नयन, अधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूँजी, देश की राजधानी दिल्ली जैसा शासक और निर्णायक की भूमिका में निरंतर कठिन प्रश्नों से जूझता दिल और विकास के दावों को धता बताता अपने पिछड़ेपन की अबूझ पहेली के साथ विकास पुरुषों के सामने चुनौती की तरह डटे बस्तर के अबूझमाड़ की तरह अन्वेषण के मार्ग से गुजरते जीवन के उत्तर हैं। इस पूरे परिदृश्य में पीड़ाएँ अपनी संपूर्ण भंगिमाओं के साथ हृदय के वृंदावन में लीला पुरुषोत्तम दुख के साथ रास रचाती हैं। यह प्रयोग ही सर्जक की संवेदना के नए आयाम हैं। ऐसे ही अनूठे गीतों का संग्रह है 'हल्दीघाटी हुई जिंदगी'।
आचार्य जी आध्यात्मिक भावभूमि पर खड़े होकर पीड़ित मनुष्य के दुख की बात करते हैं। वे कहते हैं—
'जो श्रमसीकर की स्याही से
लिखते रहे प्रगति की गाथा,
लेकिन शोषण की छुरियों से
कटवाते सपनों का माथा।' (पृ. ४९)
श्रमिक की हमेशा यही नियति रही है— कल भी और आज भी। मजदूर के मन की बात तो यही है कि— 'कर उपयोग फेंक देते सब/पत्तल-दोने हम।' और इस तरह श्रमजीवी का द्वंद्व कभी विराम नहीं लेता। संग्रह में मजदूरों के बहुत गीत हैं, जैसे— 'कड़ी धूप में जब दिन भर/हम देह जलाते हैं/तब जाकर इन हाथों में/दो पैसे आते हैं।' आम आदमी की दुर्दशा का एक चित्रण—
'हम प्यासे हैं और तुम्हारे घट में पानी है,
बंधु! तुम्हारी यही सरासर बेईमानी है।
× × ×
हमने खोदा कुआँ
और जल तुमने खींचा है।
× × ×
हमने फोड़े पत्थर
राज पथों पर तुम चलते।
× × ×
भरते तुम गोदाम,
हमारा चुरा-चुरा हिस्सा।' (पृ. ५९)
देश में इस असमान स्थिति का कारण कवि सत्ता को मानते हैं। उनके अनुसार—
'सत्ता की चूनर काली है,
बेहद बदनीयत माली है,
भ्रष्ट व्यवस्था की कीचड़ में
सबके हाथ सने।'
इसी तरह 'शपथ ले रहे संविधान की' और 'निर्माण हो रहा' शीर्षक गीतों में भी शासन-प्रशासन में बैठे लोगों की चालाकियों, चालबाजियों और उनके भ्रष्ट चरित्र की खबर ली गई है। संग्रह में अनेक जनगीत हैं—
'काम कराना हो तो बंदे
अंटी ढीली कर।
× × ×
सरकारी दफ्तर है यह
तेरी जागीर नहीं,
सीधी उँगली घी निकले
तेरी तकदीर नहीं।
मुद्दे पर आ, बात नहीं
तू खाली पीली कर।' (पृ. १०४)
ऐसी अभिव्यक्ति के लिए यदि कवि पर तोहमत की तरह कोई विशेष ठप्पा लगा दिया जाए तो इसमें उसका क्या दोष? उसने तो अपनी भूमिका पहले ही चुन ली है कि जहाँ दुख, पीड़ा, शोषण और संघर्ष होगा, उसे उस भावदशा का स्वर बनकर मुखरित होना है। व्यवस्था जो भी हो, सत्याग्रही कवि तो प्रतिपक्ष में ही रहेगा। अपनी भूमिका पर कवि ने पूरी ईमानदारी से कहा है—
'आलोचक ही रहे
नहीं हम चारण भाट हुए।'
अथवा—
'हमने तो बस दुनिया को
दर्पण दिखलाया है।' (पृ. १४५)
सच्चे सर्जक और सच्चे बुद्धिजीवियों की वास्तविक भूमिका और नैतिक दायित्व को लगभग परिभाषित करते हुए आचार्य जी कहते हैं—
'सत्ता में जो भी हो लेकिन
हम विपक्ष में रहते हैं।
व्यथा कथा जनगण की हमने
जो देखी सो कहते हैं।' (पृ. ८७)
तथाकथित बुद्धिजीवियों की मनःस्थिति का सही चित्रण है इन पंक्तियों में—
'उलझनों के जाल में
मछली फँसी मन की।' (पृ. ४३)
ऐसे ही प्रबुद्धजन के लिए—
'हमारी सोच तो मित्रो!
सदा से इंकलाबी है।
मगर हम क्या करें
मजबूरियों के बीच रहते हैं।'
इस गीत में कवि छद्म क्रांतिकारिता की भी पोल खोलते हैं—
'कभी हम सोचते
विद्रोह का परचम उठाएँ हम,
गरीबों के हकों के वास्ते
लड़ने को जाएँ हम,
मगर जब सामने
परिवार के हालात आते हैं,
कहाँ उलझन में पड़ते हो,
यही हम मन से कहते हैं।' (पृ. ६५)
'गिरगिट हैं इंसान नहीं', 'सब हैं अपने' शीर्षक गीतों में भी मनुष्य की इसी अवसरवादी प्रवृत्ति पर गहरी चोट है। इसी संदर्भ में 'स्वाँग रचाएँ' शीर्षक गीत वर्तमान में तथाकथित बाबाओं की सच्चाई और धर्मांधता की आँधी पर भी प्रभावी कटाक्ष है—
'आओ, हम भी स्वाँग रचाएँ।
चंदन तिलक लगा मस्तक पर
धारण कर केसरिया बाना,
फौज खड़ी कर लें भक्तों की
भक्ति भाव की भाँग पिलाएँ।
× × ×
हाथों की कुछ सीख सफाई
हर दिन चमत्कार दिखलाएँ,
अखबारों में विज्ञापन दे
पहुँचे हुए संत कहलाएँ;
दे बयान सुर्खियाँ बटोरें
हर मसले में टाँग अड़ाएँ।'
धर्मांधता का एक और भयावह चित्र—
'धवल लाल से डरा-डरा है,
केसरिया का शत्रु हरा है,
रंगों से ही रंग आजकल
रहते तने-तने,
कहो! होली किस तरह मनी।'
ऐसे गीतों में मानवीय प्रकृतियों, विकृतियों और स्थितियों का सूक्ष्मतम वर्णन है।
कहीं-कहीं तो कवि आचार्य के काव्य प्रयोग चमत्कृत करते हैं। 'अंक गणित के प्रश्नों जैसा' शीर्षक गीत में धन, ऋण, गुणा, भाग, भिन्न आदि गणितीय नियमों के तात्विक प्रयोग और जीवन का सूक्ष्म अनुभव है। यह समग्रता में जीवन दर्शन का अनूठा कलात्मक उदाहरण बन पड़ा है। (पृ. १०२) ऐसा ही एक गीत माँ की वेदना पर केंद्रित है जिसमें आँसू पीती माँ के संघर्ष और दुख का मार्मिक वर्णन है।
कुल मिलाकर इस १६४ पृष्ठीय संग्रह में भाववैविध्यपूर्ण १०१ गीत हैं, जिन्होंने छंदबद्धता के नियमों के साथ आकार ग्रहण किया है। इन्हें नवगीत विशेषण से विभूषित किया गया है। इन गीतों का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कवि अपनी अभिलाषा से कुछ इस तरह अवगत कराते हैं—
'जीवन का नवचित्र बनाएँ
उसमें रंग भरें।
× × ×
एक पहाड़ी हो सपनों की
अंबर के नीचे,
जिस पर सोई हो अभिलाषा
आँखों को मींचे;
और कामना की
रजनीगंधा से सुमन झरें।' (पृ. ४१)
हम डॉ. राम वल्लभ आचार्य की इस अभिलाषा में अपने सपनों का रंग भरने के आकांक्षी हैं।
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नवगीत संग्रह- हल्दीघाटी हुई जिंदगी, नवगीतकार- डॉ रामवल्लभ आचार्य, परिचय- डॉ. लक्ष्मीनारायण पयोधि- प्रकाशक- आईसेक्ट प्रकाशन, ई - ७/२२, एस बी आई अरेरा कालोनी, भोपाल, ४६२०१६, कवर- हार्डबाउंड, पृष्ठ- १६४, मूल्य- रु. ३००, ISBN--978-93-48854-52-0
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