शनिवार, 4 जुलाई 2015

अँजुरी भर प्रीति- रजनी मोरवाल

कविता एक आस्तिक भाव है। वह उस अवचेतन की कृति है, जो मनुष्य की समूची अस्मिता का प्रारूप होती है। इसी आस्तिक अस्मिता का सबसे मोहक रूप है प्रीति । इस प्रीति से ही मनुष्य मनुष्य के बीच एक अटूट अनूठा राग-भाव उपजता है, जो देवों को भी दुर्लभ है। युवा कवयित्री सुश्री रजनी मोरवाल के तीसरे काव्य-संग्रह का शीर्षक है 'अँजुरी भर प्रीति', जिसमें काफ़ी संख्या में ऐसी गीत-कविताएँ हैं, जो इसी प्रीति भाव के संज्ञान का उत्सव रचती हैं।

 आज के आपाधापी वाले युग में यह प्रीति का उत्सवभाव विरल ही होता जा रहा है। ऐसे में इस संग्रह के इन गीतों से रूबरू होना, सच में, हमारी आस्तिकता को एक नई ऊर्जा दे जाता है। मेरी राय में, यह इस संग्रह का सबसे बड़ा अवदान है। संग्रह का शुभारम्भ पारम्परिक रूप में माँ शारदा की वन्दना से हुआ है, किन्तु इन गीतों का रचना-संसार समग्र रूप में पारम्परिक नहीं है। 

नई बिम्ब-छवियों से इस युवा कवयित्री ने अपनी इन गीत-कविताओं में आज के गीत के कहन-शिल्प की बखूबी बानगी दी है। मसलन, रजनी की इन कविताओं में 'प्रीति...जूही की छैया' है, 'अभिलाषा मुँहजोर सखी' है और देह 'सिहरन की लहरों पर...बलखाती नैया' है। ये शृंगार की एकदम नूतन बिम्बाकृतियाँ हैं। रजनी मोरवाल की वैयक्तिक रचनाओं में भी उक्ति का नयापन इन्हें आम निजी अभिव्यक्तियों से अलगाता है। 'छत की अलगनियों पर बैरन/ ख़ामोशी है लूमी' या बाँहें फैलाकर सूनापन/लेता है अँगड़ाई' अथवा 'यादों की परछाईं' शीर्षक गीत का यह अछूती उद्भावना वाला पद - 'पिछले कमरे में कुछ सपने / एकाकी हो रूठे इस सावन परखूँगी उनको / सच्चे हैं या झूठे पलकों की गलियों में कब से / गूँज रही शहनाई' समस्त विश्व साहित्य में ही महिला कविताई की एक विडम्बना रही है - वह अधिकांशतः स्व की पीड़ा या अनुभूति से प्रेरित रही है, फिर चाहे वह अंग्रेजी की एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग या एमिली डिकिन्सन हों या हिन्दी की महादेवी। 

सुखद रहा इस संग्रह की कविताओं को इस सीमा को तोड़ते हुए देखकर। रजनी आज के समय की एक जागरूक नारी हैं और उनके इस संग्रह में फ़िलवक्त के तमाम प्रसंग और उनसे उपजे अहसास भी बड़ी शिद्दत के साथ प्रस्तुत हुए हैं। संग्रह की एक कविता 'लेह' में कई वर्ष पूर्व बादल फटने की त्रासदी पर कवयित्री ने जो सार्थक बिम्ब उकेरे हैं, वे आज केदारधाम और समग्र उत्तराखंड के परिवेश में व्यापी त्रासदी के सन्दर्भ में उतने ही मौजूँ हैं । 

देखें उसका एक मर्मस्पर्शी अंश - ‘पानी की नरभक्षी धारा / लील गई बस्ती गाँव गली घर आँगन बिखरे / जान हुई सस्ती सिसक रही होगी अब भी / मलबे में कोई देह माथे की सिंदूरी बिन्दी / ले डूबा बादल माताओं की कोखें उजड़ीं / सूख गया आँचल राखी के दिन बिन भैया / कैसे बरसेगा नेह’ समसामयिक सन्दर्भ आज की कविता के एक प्रमुख सरोकार रहे हैं - रजनी के गीतों में भी फ़िलवक्त की असंगत स्थितियों का भरपूर अवलोकन हुआ है। 

पूरे विश्व में पदार्थवादी संस्कृति के विस्तार से शहरों की जो आपाधापी भरी जीवन-शैली विकसित हुई है, उसमें 'शहर की रफ्तार से मारे हुए' और 'रात-दिन की दौड़ से हारे' हुए 'सीखचों में साँस लेते' और 'बेबसी में मौन को धारे' ‘मूक दर्शक से यहाँ / सारे हुए हैं लोग’ की आख्या रजनी की कवयित्री ने अपने इन गीतों में बखूबी कही है। 

संग्रह के 'फूलों का आँगन बदला' शीर्षक गीत की ये पंक्तियाँ इस दृष्टि से बड़ी ही सटीक और सार्थक बन पड़ी हैं - ‘मूक हुए संवाद हमारे / शहरों की इन गलियों में पत्थर-ईंटों की दीवारें / क्या जानेंगी प्रीति भला गमलों में काँटे पलते हैं / फूलों का आँगन बदला खुशबू ढूँढ़ रहे हैं सारे / अब कागज़ की कलियों में चौराहे के बीच अकेली / लाश पड़ी है खून सनी अखबारी काले हर्फ़ों में / जी भर उछली तनातनी पानी जैसा खून बह रहा है / लोगों की नलियों में’ 

इसी से जुडी है महानगरों में जीवन बिताने को विवश बचपन की यह मार्मिक छवि - ‘ट्राफ़िक सिग्नल पर देखा है / उसको कितनी बार काँधे पर गमछा डाले वह / वाहन धोता है फुटपाथों पर अकसर ही वह / भूखा सोता है रातों को ठेला करता है / उसको थानेदार .... फूल, खिलौने, डमरू, झंडे / अखबारी किस्से बेचा करता है सपने जो / थे उसके हिस्से हसरत से देखा करता है / आती-जाती कार’ 

‘बदलती संस्कृति’, ‘बोझ उठाए अगली पीढ़ी’ और ‘नई सदी के कडुएपन में’ जैसी गीत-रचनाओं में रजनी ने आज के समय में बदलते जीवन-मूल्यों के तहत राजनैतिक. आर्थिक एवं सामाजिक संरचना में जो बदलाव आया है, उसका बड़ा ही सशक्त आकलन किया है। बतौर बानगी देखें ये गीत-अंश - ‘मूँछ तानकर सीना ठोंकें / बगुले भगत सयाने हैं श्वेत वस्त्र धारण करके भी / लगते चोर पुराने हैं नेताओं की सौदेबाजी / वोट कहाँ ले पाई है बाजारू सम्मान हुए हैं / पुरस्कार मानो चंदा मोलभाव हो जाता पहले / मकड़जाल-सा है फंदा रुपयों के गोरखधंधे में / रिश्तों की भरपाई है’ 
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‘हुए खोखले मन के बंधन / तन के रिश्ते अंधकुआँ जिस्मों की सौदेबाजी में / खेल रहे सब आज जुआँ गिरते मूल्यों की संस्कृति क्या / इस युग का अभिप्राय हुई’ 
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‘मोह विदेशी गलियों का हो / या परदेशी रौनक खींचे बूढ़े वृक्षों की छायाएँ / नई पोध को कैसे सींचें संस्कारों की माप नापते / अब वस्त्रों के ओछेपन में तार सरीखे रिश्ते उलझे / स्वार्थ स्नेह से आगे भागे काट रही इच्छा को कैंची / संबंधों की भीगे धागे तन-मन सब कंकाल हो गए / 

नई सदी के कडुएपन में’ इन गीतांशों में फ़िलवक्त के लगभग सभी सरोकार बड़े ही सहज रूप में और पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत हुए हैं। समग्रतः यह संकलन आज की युवा पीढ़ी के सोच और उसके माध्यम से कविता में सार्थक अभिव्यक्ति एवं सहज सटीक कहन का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। मेरी राय में, रजनी की कविताई की प्रमुख विशेषता उसकी आमज की बोली-बानी में सहज कहन है। यही आज के गीत की विशिष्टता है। इस दृष्टि से रजनी मोरवाल समसामयिक कविता की एक विशिष्ट प्रतिनिधि रचनाकार हैं। 

मेरा हार्दिक अभिनंदन है इस युवा कवयित्री को इन सशक्त गीतों के लिए। संग्रह से रजनी मोरवाल की एक कवि के रूप में जो झलक मिलती है, वह निश्चय ही भविष्य की सम्भावनाओं एवं उपलब्धियों का संकेत देती है। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ कि इस कवयित्री की सर्जना को नित नये आयाम मिलें और उनकी सृजनधर्मिता से हिन्दी कविता का परिवेश निरंतर समृद्ध होता रहे। 
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संग्रह- अँजुरी भर प्रीति, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर, रचनाकार- रजनी मोरवाल, प्रथम संस्करण-२०१४, मूल्य- १७५ रूपये , पृष्ठ- १३६, परिचय- कुमार रवीन्द्र। 

1 टिप्पणी:

  1. रजनी पोरवाल की कृति अंजुरी भर प्रीति पर श्रेष्ठ ज्येष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र जी की सारगर्भित-सार्थक समीक्षा पढ़कर आनंद मिला। दोनों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ.

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