मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

समर करते हुए- दिनेश सिंह

दिनेश सिंह का गीत संग्रह समर करते हुए!कलम के प्रयोग एवं बुद्धि कौशल के बल पर अदम्य साहस एवं अटूट विश्वास से परिपूर्ण होकर, उन सभी विडंबनापूर्ण स्थितियों एवं असंगत तत्वों से जो कि समय के साँचे में अपना आकार लेकर मानवीय पीड़ा का सबब बनी हुई हैं, युद्धरत दिखाई पड़ता है। लगता है कि ये रचनाएँ अपनी जगह से हटतीं-टूटतीं चीजों और मानवीय चेतना एवं स्वभाव पर भारी पड़ते समय के तेज झटकों को चिह्नित कर उनका प्रतिरोध करने तथा इससे उपजे कोलाहल एवं क्रंदन के स्वरों को अधिकाधिक कम करने हेतु नये विकल्पों को तलाशने के लिए महासमर में जूझ रही हैं।

इस प्रकार से वैश्विक फलक पर तेजी से बदलती मानवीय प्रवृत्तियों एवं आस्थाओं और सामाजिक सरोकारों के नवीन खाँचों के बीच सामंजस्य बैठाने की अवश्यकता का अनुभव करती इन कविताओं में जहाँ एक ओर नए सिरे से नए बोध के साथ जीवन-जगत के विविध आयामों को रेखांकित करने की लालसा कुलबुलाती है तो वहीं आहत मानवता को राहत पहुचाने और उसके कल्याण हेतु सार्थक प्रयास करने की मंषा भी उजागर होती हैं। और उद्घाटित होता है कवि का वह संकल्प भी जिसमें समय की संस्कृति में उपजे विशांकुरों के प्रत्यक्ष खतरों का संकेत भी है और इन प्रतिकूल प्रविश्टियों के प्रति घृणा एवं तिरस्कार की भावना को जगाने की छटपटाहट भी। साथ ही प्रकट होता है कवि का यह सुखद संदेश रण में बसर करते हुएकॉमरेडके लिए ताकि वह बेहतर जीवन जीने हेतु भविष्य के व्यावहारिक सपने सँजो सके-
व्यूह से तो निकलना ही है
समर करते हुए
रण में बसर करते हुए।
हाथ की तलवार में
बाँधे कलम/ लोहित सियाही
सियासत की चाल चलते
बुद्धि कौशल के सिपाही
जहर सा चढ़ते गढ़े जजबे
असर करते हुए
रण में बसर करते हुए।
बदल कर पाले/घिनाते सब
उधर के प्यार पर
अकीदे की आँख टिकती
जब नए सरदार पर
कसर रखकर निभाते
आबाद घर करते हुए
रण में बसर करते हुए।
धार अपनी माँजकर
बारीक करना/तार सा
निकल जाना है
सुई की नोक के उस पार सा
जिंदगी जी जाएगी
इतना सफर करते हुए
रण में बसर करते हुए।

भूमंडलीकरण के इस दौर में तकनीक के विकसित होने से जहाँ भौगोलिक दूरियाँ घटी हैं और एक मिली-जुली संस्कृति का उदय हुआ है वहीं अर्थलिप्सा, ऐन्द्रिय सुख एवं आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना में भी बड़ा उछाल आया है। इन्ही उछालों की अनियंत्रित बाढ़ से जो चैंपी बाहर आयी उससे आपसी संबंधों में टूटन-पपड़ी पड़ी जिसमें आंतरिक कुठा एवं हूक के आँसू भी हैं और बाह्य संघर्ष एवं अलगाव के बिंब भी। हालाँकि इसी में उठने वाली मानवता की लहरों ने भी दूर-दूर तक अपना सीमित प्रसार किया है जिसमें कुछ आशाएँ-प्रत्याशाएँ अब भी शेष हैं। इन्हीं के सहारे कवि कूद पड़ा है इस समर में अपने अनुभवों एवं सजग संवेदनाओं से लैस होकर प्रेम के गीत गाता हुआ-
 वैश्विक फलक पर/गीत की संवेदना है अनमनी
तुम लौट जाओ/प्यार के संसार से/मायाधनी।
 यह प्रेम वह व्यवहार है/जो जीत माने हार को
तलवार की भी धार पर/चलना सिखा दे यार को
हो जाए पूरी चेतना/इस पंथ की अनुगामिनी।

भौतिकता एवं पाशविकता के संयुक्त संक्रमण से व्यापक स्तर पर संवेदनहीनता की जो महामारी फैली है उसकी रोकथाम एवं उपचार करने के लिए प्रेम की जिस संजीवनी का प्रयोग करने की बात यह कवि करता है उससे इस कठिन समय में न केवल अन्य मानवीय सरोकारों से जुड़ाव होने की पूरी उम्मीद जागती है वरन इस समर में बसर करते हुए जय-विजय की आस भी बँधती है। साथ ही इन्हीं के सहारे समय की विशाग्नि से निःसृत नए दुःखों से पार भी पाया जा सकता है। निम्नांकित पंक्तियों में कवि की चिंता स्पष्ट झलकती है-
 सिर पर/सुख के बादल छाएँ
दुःख नए तरीके से आए।
 सुविधाओं की अँगनाई में
मन कितने ऊबे-ऊबे हैं
 तरुणाई के ज्वालामुख,
लावे बीच हलक तक डूबे हैं

यह समय/आग का दरिया है
हम उसके माँझी कहलाए
दुःख नए तरीके से आए।
आज की पीढ़ी की मानसिकता में आए जबरदस्त बदलाव का आलम यह है कि साधन-संपन्नता के बावजूद भी उसके मन में असंतोष की गाँठें उभरती रहती हैं। जिसके चलते वह जमाने की चमक-दमक से आकर्षित होकर नित नयी महत्वाकांक्षाएँ पालने-पेासने में लगा रहता है और जब इनको पूरा करने में वह सफल नहीं हो पाता तब उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय हो जाती है। इतना ही नहीं, उसकी स्थिति बदतर होती जा रही है उसकी हल्की पड़ती सोच-समझ से भी। इस हल्केपन के कारण ही न तो उसके रिष्ते-संबंध, कार्य-व्यापार, चाल-ढाल, भाव भंगिमाओं आदि में टिकाऊपन देखने को मिलता है और न ही उसका हृदय अब वैसा रहा जिस से वह औरों से जुड़ सके और उनके सुख-दुख में हाथ बँटा सके-
 कई रंग के फूल बने/काँटे खिल के/
 नयी नस्ल के नए नमूने/बेदिल के।
फूले नए/नए मिजाज में
एक अकेले के समाज में
मेले में/अरघान मचाए हैं/पिलके।
आड़ी-तिरछी/टेढ़ी चालें
पहने नयी-नयी सब खालें
परत-दर-परत हैं/पंखुरियों के छिलके।
व्यर्थ लगें अब/फूल पुराने
हल्की खुशबू के दीवाने
मन में लहका करते थे/हर महफिल के।
इस नयी प्रजाति के पंछियों को तो सिर्फ रंगीनियों से प्यारहै, अपनी माटी, अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी बगिया के पुराने फूलों में अब उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रही। उनके विचार, उनके सपने मौसम के बदलते मिजाज के अनुसार ही बदल रहे हैं जिसकी व्यवहारिकता एवं उपादेयता पर कवि बड़े ही तल्ख तरीके से प्रश्नचिह्न लगाता दिखाई पड़ता है-
 इस किनारे/पंख अपने धो लिये
नए सपनों/उड़ानों में बो लिये
नए पहने/फटे वस्त्र उतारकर।
 नाम बस्ती के/खुला मैदान है
जंगलों का एक नखलिस्तान है
 नाचते सब/अंग-अंग उघार कर।

 कवि मन बहुत साँसत में है इन नए तरीकों-सलीकों को देखकर-
    1) ये तरीके/जिंदगी के/बहुत फीके।
     भर रही दुर्गंध/जो वातावरण में
असलियत है छिपी जाती/आवरण में
गुम गए/इंसान में/उसके सलीके।
    2) बस्तियों में हैं दहाड़ें/शेर की
गाँव में चर्चा चली/अँधेर की
 बाद मरने के/हुआ प्रारंभ जीना।
 ओंठ पर धर ओंठ कहते प्यार है
देह में उत्तप्त तेज बुखार है
 किनारे ही डूब जाता है/सफीना।

कवि द्रवित हो उठता है जब चिंतन मनन करता है इन विशय स्थितियों पर-दोहरा व्यक्तित्व, दिशाहीनता, अंतर्द्वंद्व, स्वार्थपरता, वैचारिक घात-प्रतिघात, नकारात्मक भाव-बोध, अनुश्सनहीनता, कथनी-करनी में भिन्नता, खून-खराबा, रिश्वतखोरी, अवसरपरस्ती, धोखाधड़ी, कपटपूर्ण व्यवहार एवं चरित्रहीनता जो-कि आज के मानव-जीवन को अभिशप्त कर रही हैं। कवि के हृदय से ये उद्गार छलक पड़ते है-
नहीं आ रही दुनिया/मुट्ठी खुली, पकड़ में
 घिसता जाता जीवन/जिद की रगड़-झगड़ में।

जहर पिलातीं नदियाँ/बौराई है प्यास
 लगी भूख की आग/जले घोड़े की घास
 बेआवाज हुई टापें/रण की भगदड़ में।
 फुलवारी के रंग/चटक कर रहे लिबास
 सूतराग छेड़ता/बिनौला और कपास
 गमलों की सीमाएँ/कसी हुई हैं जड़ में।
 तन-मन की नूराकुष्ती की/हेरा-फेरी
 दाँव-पेंच की नकल भर रही/प्रीति घनेरी
 सिर पर सावन लदा/जेहन जागा है धड़ में।
 ऐसी ऋतु में/हम-सब यों आए हैं साथ
 साधे-साधे शक पर ही/पूरा विश्वास
 नकाब लगाकर पहुँचे/नए वक्त के गढ़ में।
नए समीकरणों के बीच वर्तमान जीवन के गर्म को निरखने-परखने वाली उनकी गीतधर्मिता में जिन तत्वों का समावेश हुआ है वे तर्क के सीमेंट एवं यथार्थ के मौरंग से बड़ी वस्तुनिष्ठता एवं स्वाभाविक भावबोध के साथ खुद के गढ़े गए प्रतीकों-बिंबों के माध्यम से रूपायित होते हैं। इन रचनाओं में समय के सच की जितनी सहज अभिव्यक्तियाँ हैं, गहराई में उतरने पर बौद्धिक आयामों के कपाट भी उतने ही स्पष्ट रूप से खुलते चले जाते हैं-
१. अपने-अपने हैं कानून/मुक्त है प्रजा
  सड़ी गली लाठी को/ भैंस ही सजा
    न्यायालय सूनी कुर्सी/क्या चढ़ी विराजे!
२. दर्द दिल में/हर समय धड़का करे
  हमें कुछ ऊपर उठाकर।
   ओंठ सच के बहुत मुखरित हो रहे
  मुँह लगाए हुए/बाकी टाकियाँ
  वार्ताओं मशविरों की आड़ में
  झूठ का मुँह कुचलती/चालाकियाँ
  वैभवों के पाप/बदले पुण्य में
  विभव का सागर नहाकर।
३ राज नगर की/बड़ी डगर की
 चिंताएँ जैसे/अजगर की
 मुँह फैलाकर लील रही हैं/
 मन के मन से रिश्ते नाते।
 जीवन कुछ है/जीना कुछ है
 श्रम कुछ और/पसीना कुछ है
 आस्थाओं के इस संकट में
 हम मर मरकर भी जी जाते।

उक्त प्रकार के वतावरण परिवेश बनने बनाने में हम ही जिम्मेदार ठहरते हैं क्योंकि चाँद-तारे-सूरज सब कुछ तो वैसा का वैसा/केवल हम हैं बदल-बदलेऔर हम तो वैसे नहीं रहे/महुआ आमों वाले साथी। सो अपने आप को जान-समझ कर अपेक्षित सुधार करने की प्रक्रिया से जुड़ने की पहल हमें ही करनी होगी, अन्य व्यवस्थाएँ बाद में। तभी हम सच्चे अर्थों में विष्वग्राम के जिम्मेदार नागरिक बन पायेंगे-
 हम क्या हैं/यह हम भूल गए/अरसे ना सोचा-जाना
 हम वही मानते आए हैं/जो कुछ तुमने/हमको माना
 किसने जाना सागर के पास/बेचने को बादल होंगे
 किसने जाना/बाजारों की गुत्थी में/उनके हल होंगे
 किसने जाना/ऐसी गाँठों का/कैसा है ताना-बाना।
 किसने जाना/है सारी दुनिया गाँव बनी/जिसमें हम हैं
 किसने जाना/अब सीढ़ी से/ऊँचाई के रिष्ते कम हैं
किसने जाना ऊँचाई की लंबाई में/चलते जाना।

किसने जाना/हम में बम में/फासला एक-दो बीते के
 बम को तो केवल फटना है/है सारा काम पलीते का
 किसने जाना/क्या षेश बचा/परवाना या आबोदाना।

कुल मिलाकर इस समसामयिक संकट से लोहा लेने हेतु इन गीतों मे जो जीवटता, जीवन की संश्लिष्टता तथा उसकी अडिग आस्था का निरूपण हुआ है, उससे कवि की साहित्यिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता स्पष्ट झलकती है। इनमें मानव जीवन की प्रचलित भाषा-लय को पकड़कर बखूबी गाया गया है और अपनी रागवेशित अंतर्वस्तु के माध्यम से स्वीकार्य एवं अस्वीकार्य जीवन के तानों-बानों के पारस्परिक संबंधों को कभी सीधे सहज रूप में तो कभी वक्रता के साथ व्यंजित किया गया है। इसके साथ ही प्रदर्शित होती है मानवीय अस्मिता एवं जिजीविषा को बनाए रखने की जद्दोजहद इन्हीं अनूठी रचनाओं में अपनी संपूर्ण ताजगी एवं प्रासंगिकता के साथ। कवि के इस सार्थक सृजन से उम्मीद है कि गूँजता रहेगा उनका यह प्रेरक संदेश दसों दिशाओं में-
 हम हों कि न हों
इस धरती पर
यों झुका रहेगा महाकाश
 बीतते रहेंगे दिवस-मास।
 जाड़े की सुबहें चेहरों पर
आँखों में सूरज की भाषा
गीतों में फूलों के मुखड़े
जीवन में पथ की परिभाषा
पाँवों में
बँधे-बँधे मरुस्थल
यात्रा में उखड़ी साँस-साँस
बीतते रहेंगे दिवस मास।

इन कविताओं की आंतरिक अन्विति को तथा अपनी असल जिंदगी में एवं उसके उकेरने उभारने हेतु अद्भुत दृष्य संयोजनों में कवि की आंतरिक हूक संवेदना को किसी भी रणभूमि में साथी योद्धा आसानी से महसूस कर सकता है । इतना ही नहीं, वर्तमान मानव कालक्रम में जीवन जगत् की विसंगतियों/विद्रूपताओं से हो रहे संग्रामों के बीच इस नायक के युद्ध विषयक संकल्प को दुहराने, उसमें अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने तथा इस व्यूह से निकलने के लिए सार्थक प्रयास करने हेतु कोई भी संवेदनशील व्यक्ति आसानी से तत्पर हो जाएगा, ऐसा विश्वास बनता है।
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कृति : समर करते हुए! कवि : दिनेश सिंह प्रकाशन वर्ष- प्रथम संस्करण-२००३ पृष्ठ- ११४ मूल्य : सजिल्द- रुo १००/- प्रकाशक : मकसद प्रकाशन, गौर रूपई, लालूमऊ रायबरेली, उ.प्र., समीक्षक- अवनीश सिंह चौहान

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

लिख सकूँ तो- नईम

"लिख सकूँ तो-
प्यार लिखना चाहता हूँ
ठीक आदम जात सा
बेख़ौफ़ दिखना चाहता हूँ
थे कभी जो सत्य, अब केवल कहानी
नर्मदा की धार सी निर्मल रवानी
पारदर्शी नेह की क्या बात करिये
किस कदर बेलौस ये दादा भवानी
प्यार के हाथों
घटी दर पर बाज़ारों,
आज बिकना चाहता हूँ।"

वरिष्ठ कवि नईम की ये पंक्तियाँ मेरे सामने हैं। कवि का काव्य संसार वही संसार होता है, जहाँ जीवन का यथार्थ संवर्धित होता है। कवि जिसे परिवर्तित करता है वह समाज का नियामक औजार होता है। अत: कवि का सृजन मूलत: सृष्टि का सृजन है। इस सूत्र वाक्य का बीज कवि नईम को पढ़ते हुए अंकुरित होता है-

"किस कदर होकर निहत्थे
आ गये हम इस सदी में
फर्क ही जाता रहा है
आज तो नेकी-बदी में।"

आज कविता में इतने सारे विभाजन उपस्थित हैं कि अगर सबको ठीक से समझने की कोशिश की जाए तो कविता के नैसर्गिक रूप तक पहुँचते-पहुँचते हमारी ऊर्जा चुक जाएगी। दूसरी तरफ विघटन और वर्गीकरण का सामन्तवादी खेल भी समाज में पूरे चरम पर है। ऐसे समय में हमेशा ही मनुष्यता के महल में पूंजी ने सेंध मारी है। सेंध हमारे साहित्य में भी लग चुकी है और खोखलापन एक झीनी चादर के पीछे खड़ा अट्ठाहास कर रहा है।

मंच से उसी कविता को आना चाहिए जो पत्रिकाओं और पुस्तकों से भी आ रही हो। गीत, नवगीत, कविता तथा अकविता के बन्ध को तोड़कर सिर्फ कविता ही पाठकों के सामने आए और वह छंद में या गैऱ छंद में, सामने आने के लिये पूरी तरह से स्वतन्त्र हो। जिसमें पाठक बजाए विधाओं की भूल-भुलैया में फँसने के सिऱ्फ कविता का आस्वाद ही ग्रहण करे। अन्यथा नईम की ये पंक्तियाँ बेकार जाएंगी-

"हो न सके हम पूत ठीक से
पिता न हो पाए करीब से
रिश्ते भी क्या रिश्ते होते
महँगाई में इस गरीब के
मोल नहीं जाने वचनों के
अपने बोझ न हम ढो पाये ।"

मैं सीधे-सीधे कहूँ तो ऊपर की बातों के पीछे सिर्फ एक सवाल है। आज कविता के आकाश में गीत के बादलों की उपेक्षा क्यों है? अगर अपने समय का एक बड़ा आलोचक किसी विधा की उपेक्षा कर दे तो क्या सारे लोगों को भी मिलजुल कर उस विधा को धकिया कर हाशिये पर रख देना चाहिये? हिन्दी काव्य में आज गीत के साथ ऐसा ही हुआ है। अन्यथा आज केदारनाथ सिंह, त्रिलोचन, चन्द्रकान्त देवताले, मंगलेश डबराल, अरूण कमल तथा राजेश जोशी कविता की ज़मीन पर जिस महत्व के साथ खड़े हैं, उसी महत्व के साथ नईम, कुंअर बेचैन, कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी, नचिकेता तथा यश मालवीय भी खड़े होते। अगर यह सब साथ-साथ होते तो पूँजी की क्या मज़ाल थी, कि वह कविता पाठ के मंच को खरीद लेती या फिर साहित्य के लिखे को अपने पक्ष में कर पाती। मैं उदाहरणों के साथ बात करना चाहता हूँ। पिछले दिनों साम्प्रदायिकता हिन्दी कविता के केन्द्र में रही। लेकिन गीत का एक भी उदाहरण किसी भी साम्प्रदायिकता विरोधी संग्रह, संकलन और आयोजन में उतनी महत्ता के साथ नहीं रखा गया। जबकि उन दिनों में नईम लिख रहे थे-

यज्ञों से बेहतर, युद्धों के द्वार सजे हैं
इनके छोटे राजन हैं तो उनके भी छोटे शकील हैं
भले राम का एक न हो पर रावण के सौ-सौ वकील हैं।"

यही नहीं नईम की लोकप्रिय पंक्तियाँ भी याद आ रही हैं-

"चिठ्ठी-पत्री, ख़तो किताबत के मौसम फिर कब आयेंगे
रब्बा जाने सही इबादत के मौसम फिर कब आयेंगे?"

या नईम की ही ये पंक्तियाँ-

"सिर पर ग्रन्थ जेब में गीता
हाथों में कुरआन
लिये हो सके न अब तक
हम बेहतर इन्सान
अब भी पशुओं सा आदम को
हम तुम नाथ रहे।"

फिर नईम की पंक्तियों को देखें-

"प्यार से मिलते हुऐ दिल ईद के उत्सव कभी
आज बल्लम बर्छियों से भेंटते मुझको सभी।"

"बातों ही बातों में" १९९५ में छपी थी और "लिख सकूँ तो" जो २००३ में ही छपकर आई है। नईम अपनी भाषा के प्रति उतने ही सचेत होते जा रहे हैं, जितने कि कविता के दूसरे प्रतिनिधि कर्मी। विज्ञापन के इस युग में कविता की भाषा को सुरक्षित बचा ले जाना आज के कवियों के लिये सबसे बड़ी चुनौती है।

इन दिनों विष्णु खरे, चन्द्रकान्त देवताले, हेमन्त कुकरेती एवं मोहन डहेरिया आदि की कविताओं के ताजे संकलनों को पढ़ा और इसके ठीक बाद नईम के गीतों का ताजा संकलन "लिख सकूं तो" हाथ लग गया। अत: कविता के समुद्र में इस नदी के मिलन को, दूसरी नदियों के मिलन से अलग करके देखने का प्रयास किया जैसा कि आज की आलोचना का संस्कार है। मुझे ऐसा कोई तर्क नहीं मिला जो समग्रता में गीत को कविता से अलग कर रहा हो। अलग थी तो सिर्फ पोषाक जो मिलन के समय उतर जाती है। मेरी बात के पक्ष में मैं पुन: नईम की पंक्तियाँ रख रहा हूँ-

"दिल्ली की क्या बात करें
देवास दूर है
दिल दिमाग की खुराफ़ात कोरा फितूर है।"

निष्कर्षत: मै हिन्दी आलोचना को आगाह करना चाहता हूँ कि कविता के समानान्तर गीत के मूल्याँकन का काम जो छठे-सातवें दशक से छूटा हुआ है, उसे पूरी गम्भीरता के साथ यथाशीघ्र पूरा किया जाना चाहिए।

अपने मिज़ाज़, कहन और भावों के स्थायी प्रभाव के स्तर पर नईम एक मात्र ऐसे कवि हैं जो अपनी अलग पहचान अर्जित करते हैं। इनके काव्य संसार में काव्य की संवेदना अत्यन्त सुरक्षित, नाजुक या भावातिरेक में डुबो कर नहीं रखी हुई है। वह समय के यथार्थ की तरह खुरदरी, ठोस, कर्मठ और नैसर्गिक है। छन्द की परम्परा में रहते हुए यह काम अत्यन्त कठिन हो जाता है। नईम के यहाँ कई बार इन ज़रूरी प्रवृत्तियों को संरक्षित करने में छन्दों का अतिक्रमण एवं व्याकरणगत समस्याएं दिखाई देतीं हंै। यहाँ पर वे हिन्दी ग़़जल के दुष्यन्त कुमार की परम्परा में मील के अगले पत्थर की तरह दिखाई देते हैं।

नईम उन कवियों में से हैं जो लिखते हैं तो इतना ठोक बजा कर कि उनके काव्यगत नैतिक अनुशासन में किसी भी गैर मानवीय तत्व को सेंध लगाने का मौका ही न मिले। इसलिये उनके पास में एक दो दर्जन किताबों की सूची नहीं है। कुल जमा तीन प्रकाशित किताबें और चौथी किताब प्रकाशन की प्रक्रिया में है। सिर्फ चार किताबों की पूंजी पर वे एक-एक दर्जन किताबों वाले रचनाकारों पर भारी पड़ते हुऐ दिखाई देते हैं तो सिऱ्फ इसलिये कि उनकी दृष्टि सम्पन्नता, राजनीतिक समझ और समाज की नब्ज़ का आकलन अपने समकालीन गीतकारों में अत्यन्त श्रेष्ठ है। यही कारण है कि उनके गीतों का श्रवण एवं पाठन, दोनो ही समान रूप से सम्प्रेषणीय है। यहाँ पर बादल जैसे प्राकृतिक प्रतीक को लेकर उनकी पंक्तियाँ रखी जा सकती हैं-

"नदी तलैया ताल के
ये बदरा बंगाल के
योद्धा सन्यासी से निर्मल
बिना खड्ग औ ढाल के
कद काठी से यूँ तो भारी भरकम हैं
धरती की दुखती छाती के मरहम हैं
गर्जन तर्जन में ये छैला अलबेले
रखने की मंशा हो तो फिर
रखना इन्हें सम्भाल के।"

इस संग्रह में नईम के कुल ८५ गीत संग्रहीत हैं जिनमें से लगभग सत्तर गीत पढ़कर आप गीत के साथ निकल पड़ते हैं। यह रचनाकार का सामर्थ्य है। इस संग्रह की ख़ासियत यह है कि बीच में नईम ने काष्ठ शिल्प पर भी अच्छा काम किया था। उनके द्वारा निर्मित काष्ठ शिल्प की प्रदर्शनी भी दिल्ली में आयोजित हुई थी। चर्चित काष्ठ कृतियों का छायाँकन इस संग्रह में कविताओं के साथ छपा है जो कविताओं के कैनवास को और विस्तृत करता है।कुल मिला कर एक संग्रहणीय पुस्तक के लिये नईम को अभिनन्दन।

-प्रदीप मिश्र
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भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित, आईएसबीएन : 81-263-0911-3, प्रकाशन वर्ष- २००३