शनिवार, 15 सितंबर 2018

समय की पगडंडियों पर - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

गीत का फलक विस्तृत है। साहित्य की सबसे  प्राचीन विधा होने के साथ- साथ आज भी गीत मानवीय हृदय के सबसे नजदीक है। गीत विधा की परंपरा को विस्तार देता एक गीत संग्रह "समय की पगडंडियों पर" चलते हुए अनेक इंद्रधनुषी अनुभव समेट कर साहित्य अनुरागियों के लिए उत्कृष्ट गीतों का गुलदस्ता लेकर आया है।

प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी द्वारा रचित गीत संग्रह "समय की पगडंडियों पर" पढ़ने का सुंदर सुयोग बना। इस संग्रह के   गीतों एवं नवगीतों में समाहित  माधुर्य, गाम्भीर्य, अभिनव कल्पना, सहज, सरल भाषाशैली, गेयता की अविरल धार, हृदयतल  को अपनी  मनोरम सुगन्ध से भर गई।  बाल साहित्य, कुण्डलिया छंद व अनेक काव्य विधाओं में अपनी लेखनी का लोहा मनवाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार श्री ठकुरेला जी  ने बड़ी संजीदगी से अपनी गहन अनुभूतियों  को गीतों में उतारा है। 

इन गीतों में कभी शृंगार की झलक दिखाई देती है तो कभी जीवन दर्शन। कभी देश प्रेम का रंग हिलोर लेता है तो कभी सामाजिक विसंगतियाँ। बड़ी खूबसूरती से गीतों में छंद परम्परा का निर्वाह किया गया है। प्रबल भाव, सधा शिल्प सौष्ठव। हर दृष्टिकोण से इस संग्रह के गीत भाव एवं कला पक्ष की कसौटी पर कसे हुए हैं।  "करघा व्यर्थ हुआ कबीर"   इस गीत में कवि ने बदलते परिवेश एवं आधुनिक जीवन शैली की और इशारा करके प्रतीतात्मक शैली का प्रयोग किया है। नवगीतों में अदभुत प्रयोग देखते ही बनता है।

करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने
बुनना छोड़ दिया

काशी में नंगों का बहुमत
अब चादर की किसे जरूरत
सिर धुन रहे कबीर 
रुई का 
धुनना छोड़ दिया

बेरोजगार शिल्पकारों और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य का  सजीवचित्रण करते हुए कवि अपनी वेदना व्यक्त करता है। गुजरे जमाने का स्मरण करते हुए  कवि  पाषाण बनती जा रही मानवीय संवेदना देख  व्याकुल है। कवि मन कहता है कि अब सामाजिक मूल्यों का कोई मोल नहीं क्योंकि लोग काँच को ही मोती समझ रहे हैं। एक अन्य गीत गीत "बिटिया" के माध्यम से कवि ने मन के अहसास  को शब्द देकर नारी शोषण पर करारा प्रहार किया है।

बिटिया।
जरा संभल कर जाना
लोग छिपाए रहते खंज़र
गाँव, शहर
अब नहीं सुरक्षित
दोनों आग उगलते
कहीं कहीं तेजाब बरसता

कवि का कोमल मन समय का दर्पण देख गीत के माध्यम से बिटिया की पीड़ा को शब्द देकर कह रहा है कि अब वह कहीं भी सुरक्षित नहीं। तेजाब कांड के प्रति रोष जताते हुए कवि ने पथभ्रष्ट युवाओं  को काँटे दार वृक्ष की संज्ञा दी है। ठूठ होते संस्कारों से सावधान करता हुआ कवि हृदय बेटियों के साथ होती दुखद घटनाओं से आतंकित हैं।

आखिर कब तक
चुप बैठेंगे
चलों वर्जनाओं को तोड़ें
जाति, धर्म, भाषा में
उलझे
सबके चेहरे बंटे हुए हैं
व्यर्थ फँसे हुए हैं
चर्चाओं में
मूल बात से कटे हुए हैं
आओ बिखरे संवादों की
कड़ियाँ कड़ियाँ फिर से जोड़ें।

"कड़ियाँ फिर से जोड़ें" आशा से भरा यह नवगीत इस बात का परिचायक है कि कवि आज भी लहरों में भटकी कश्तियों के किनारे पर आने की आशा रखता है। आज कवि आवाज दे रहा है कि जात-पात, धर्म, भाषा से ऊपर उठकर हम नए भारत का निर्माण करें। इसके अलावा हरसिंगार रखो, अर्थ वृक्ष, मन उपवन, मिट्टी के दीप, बदलते मौसम, सुनों व्याघ्र  आदि गीतों एवं नवगीतों का काव्य सौन्दर्य सराहनीय है।

आँखें फाड़े
खड़े हुए हैं
राजमहल के आगे
शायद राजा जागे।
इस नवगीत के मुखड़े से ही इसकी सारी खूबसूरती प्रकट हो जाती है। राजनीतिक तानशाही के प्रति विद्रोह के तीव्र स्वर जब विस्फुटित होते है तब मन मे दबा आक्रोश जगजाहिर हो जाता है। शासक कुम्भकरणी निद्रा के वशीभूत है। राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। कवि के मन मे सुलगती चिंगारी अब गीत का रूप लेकर प्रज्वलित हुई है।
जब मन उद्वेलित होता है तब  प्रेम की सरस, मधुर बूँदे हृदय को शीतलता प्रदान करती हैं। 
शृंगार रस के गीतों में कवि का प्रियतम के प्रति समर्पण भाव का परिचय मिलता है।  

मैं अपना मन मन्दिर कर लूँ
उस मंदिर में तुम्हें बिठाऊँ।
वंदन करता रहूँ रात-दिन
नित गुणगान तुम्हारा गाऊँ।

गीतों में कहीं प्रेम की पराकाष्ठा है तो कभी विरह की कठिन घड़ियाँ। 
कवि "दिन बहुरंगे",  गीत के द्वारा स्वार्थ की नींव पर टिके रिश्तों की  तस्वीर दिखलाता है, तो कभी पिता के विशाल चरित्र को शब्दों में ढालने का सफल प्रयास करता है। यह संग्रह में ८२ गीतों की माला है माला के हर मोती की आभा अनोखी है। जड़ों से जुड़ी भावनाओं से रचे गए गीत मन के तार छूने में सक्षम हैं।

"समय की पगडण्डियों पर" गीत संग्रह का प्रकाशन "राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर" के आर्थिक सहयोग से होना सुखद है।  यह पुस्तक पढ़ना अत्यंत सुखद रहा। श्री ठकुरेला जी पेशे से इंजीनियर हैं।   अनेक पुस्तकों का सम्पादन कर चुके हैं। उनके तीन एकल संग्रह प्रकाशित हैं। मुझे विश्वास है यह गीत संग्रह पाठक  वर्ग में अपना उच्च स्थान बनाएगा। आशा करती हूँ कि शीघ्र ही उनकी अन्य कृतियों से हमें रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
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गीत नवगीत संग्रह- समय की पगडंडियों पर, रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रकाशक- राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान), प्रथम संस्करण संस्करण, मूल्य- रु. २००, पृष्ठ- ११२, समीक्षा- सुनीता काम्बोज, आईएसबीएन क्रमांक- 

शनिवार, 1 सितंबर 2018

फिर उठेगा शोर एक दिन - शुभम श्रीवास्तव ओम


कविता के उस हल्के में जहाँ देश का आम जन निवास करता है, कविता का गीतात्मक रुप सदैव उपस्थित रहा है और लगभग आधी सदी की निरन्तर दबंगई व षड़यंत्र को झेलने के बावजूद कविता की वास्तविक मुख्यधारा में नवगीत कविता ही है। नवगीत ने लगातार अपने समय को वाणी दी है और लगातार विकराल होते जा रहे समय में भी वह दृढ़ता व पूरे अपनत्व के साथ मनुष्य एवं मनुष्यता के पक्ष में खड़ा है।
मनुष्यता के पक्ष में खड़े नवगीत - कवियों की नई पीढ़ी में कवि शुभम श्रीवास्तव ओम का नाम काफी तेजी से उभरा है। शुभम श्रीवास्तव के प्रथम नवगीत संग्रह "फिर उठेगा शोर एक दिन" की नवगीत कविताओं को पढ़ते हुए कवि की जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता को बहुत गहराई से समझा जा सकता है। यह नवगीत संग्रह अपने वैविध्यपूर्ण शिल्प के साथ विषय, कथ्य व भाषा को लेकर भी चौंकाने की हद तक पाठक को खुद से जोड़ता है।

समय और स्थितियाँ सदैव अपने साथ रोशनी और अँधेरा एक साथ लेकर ही गतिमान हैं। यह अवश्य है कि एक समय में एक स्थान में प्रकाश और अंधकार दोनों में से एक की ही उपस्थिति दिखाई पड़ती है। जब घनघोर अँधेरा छाया हुआ हो तब भी शुभम एक दर्पण उगाने की बात करते हैं।
अँधेरे वक्त में दर्पण उगाने की यह कल्पना उम्मीद के बचे रहने और बचाये रखने के संकल्प का ही प्रमाण है। वे लिखते हैं -
"है अँधेरा वक्त जब तक
आइए दर्पण उगायें
पेड़ परजीवी, नुकीले फूल
नरभक्षी हवायें
एक नन्ही-सी बया का
मुँह दबाती सभ्यतायें
प्रश्न करतीं अस्मितायें
मौन आदिम भूमिकायें
नहीं मरने दे रहीं पर
शिलालेखी आस्थायें। "

मुक्तिबोध जिस जटिल और अबूझ संवेदना की फैंटेसी रचते हुए उसे विकरालता की हद तक अबूझ बनाते हैं, वैसी ही विकट स्थितियों को शुभम श्रीवास्तव ओम अपने नवगीतों में बहुत सरलता से हमारे ज्ञानात्मक संवेदन से जोड़ते हुए संवेदनात्मक ज्ञान तक ले आते हैं। वे लिखते हैं -
"हाथ - पाँव अँधियारा नाथे,
रस्ता सही अबूझ
साजिश लादे हँसी उतरती
हँस लेने से सिर भन्नाता
गीले ठण्डे हाथों में ज्यों
कोई नंगा तार थमाता
आदिम प्रतिमाओं की चुप्पी
बौने बोते लूझ
क्रूर कहकहे लिए प्रश्न फिर
रात वही काली अनुबंधित
चुप रहना भी सख्त मना है
उत्तर देना भी प्रतिबंधित
कंधों पर बैताल चढ़े हैं
कहते उत्तर बूझ। "

कविता मनुष्य को अपने भीतर उम्मीद को बचाये रखने की सीख देती आई है, किन्तु शुभम श्रीवास्तव कोरी उम्मीद बँधाने वाले कवि नहीं हैं। वे कर्म के बल पर उम्मीदों को पूरा करने की बात करते हैं। कहते हैं -
"कब तक उम्मीदों के दम पर
दुनिया का संचालन होगा
घिसी-पिटी इस रूढ़वादिता
का कब तक अनुपालन होगा
आओ थाह लगाकर आयें
कहाँ छुपी है भोर
पर्वत तक झुक जायेगा
यदि हो प्रयास पुरजोर। "

शुभम श्रीवास्तव समय के छद्म को न केवल पहचानते हैं, बल्कि उसे अनावृत करने से भी नहीं चूकते। उनके नवगीत 'बेचैन उत्तरकाल' को देखें -
" चाहतें अश्लील, नंगा नाच
फाड़े आँख मन बदलाव
काटना जबरन अँगूठा
रोप मन में एकलव्यी भाव
लोग बौने सिर्फ ऊँची तख्तियों के दिन।"

अपने समकाल को अपनी कविता में अंकित करते हुए शुभम भाषा के भी जीवन्त प्रयोग करते हैं। इसी गीत में देखें -
भावनाएँ असहिष्णु, देह सहमी
काँपता कंकाल
बुलबीयर-सेंसेक्स,
उथली रात, उबली नींद, आँखें लाल
ड्राप कालें और बढ़ती दूरियों के दिन।।

'फिर उठेगा शोर एक दिन' की नवगीत कविताओं को पढ़ना, इनसे होकर गुजरना एक व्यापक दुनिया से होकर गुजरने जैसा अनुभव है। इन नवगीत कविताओं का पटल बहुत व्यापक है। इनमें हमारे अपनों का छद्म, विसंगति के विविध - विकराल और अनन्त रूप, व्याप्त भ्रष्टाचार, उम्मीदों का असमय मरण, बदलते हुए गाँव - शहर, सब कुछ जीवंत होता दिखता है। शुभम श्रीवास्तव घोषित रूप से नवगीत कवि हैं, इसलिए इनकी नवगीत कविताओं की पड़ताल करते हुए इनकी गीतात्मकता पर दृष्टि जाना स्वाभाविक है ;यद्यपि अपने कथ्य की प्रासंगिकता और दिन प्रतिदिन की ज़िन्दगी से जुड़े सवालों से भरे ये नवगीत पाठक की जिंदगी से जुड़े हुए हैं, तब भी गीतात्मकता का अपना महत्व तो है ही और यही वह तत्व है जो कविता के कथ्य को पाठक के भीतर तक पहुँचाता है एवं उसके प्रभाव को स्थायी बनाता है। इस संग्रह के अधिकांश गीतों की गीतात्मकता अपने श्रेष्ठ स्तर तक पहुँची हुई है, किन्तु कहीं - कहीं अनुपयुक्त शब्दों के चयन से लय व प्रवाह बाधित भी हुआ है, यद्यपि कुछ स्थलों पर कथ्य का दबाव भी इसका कारण हो सकता है।

शास्त्रकारों ने काव्य की तीन कोटियाँ बताई हैं। ये तीन कोटियाँ हैं - उत्तम, मध्यम और निम्न। उनके अनुसार व्यञ्जनागर्भी काव्य को उत्तम, लक्षणाधर्मी काव्य को मध्यम और अमिधामूलक काव्य को निम्न कोटि का काव्य माना जाता है। इस दृष्टि से भी शुभम श्रीवास्तव की कविताओं को श्रेष्ठ कोटि की कवितायें माना जा सकता है। दरअसल अर्थविस्तार की संभावनायें व्यञ्जना ही पैदा करती है और शुभम के नवगीतों में अनायास व्यञ्जना की पर्याप्तता मिलती है।
कुछ नवगीतों के अंश देखते हैं -
"देखते हैं कब छँटेगा ये धुँआ अब ?
आसमाँ बंजर, बनी बंधक उड़ानें
पर कुतरने के लिए सौ-सौ बहाने
धुंध आदमखोर छाई हर दिशा में
रंग गेहुँवन का हुआ है गेहुँवा अब।"
"नये दौर का नया ढंग है -
गुडमार्निंग से शुरू हुआ सब
गुडनाइट पर खत्म हुआ। "
" बंद कमरा, एक दर्पण, और तुम तितली /
आँख फाड़े देखती है ट्यूबलाइट
देह का ऐसे उघड़तापन
आँख पीती जा रही संकोच की बदली। "

नवगीत कविता वास्तव में लोक की ही सम्पत्ति है, क्योंकि इस कविता के तत्व लोक से ही आए हैं। इसीलिए नवगीत में लोकभाषा, लोकमान्यतायें, लोकसंस्कृति और लोकव्यवहार से लेकर लोक में मनाये जाने वाले सभी तीज - त्यौहार पूरे उल्लास और अर्थगाम्भीर्य के साथ उपस्थित हैं। ऐसा ही एक गीत है 'दबे पाँव फागुन' ; फागुन और बसंत का रिश्ता शाश्वत है। बसंत मन में फूटते या फूट चुके प्रणयगंधी अनुराग के पलने-पनपने का मौसम है। ऐसे में यह नवगीत एक सुन्दर और मोहक कथ्य के साथ उतरता है -
"भौजी की गाली खुश करती,
गाल लाल होते झिड़की पर
दिनभर में एकाध मर्तबा
तुम भी आ जातीं खिड़की पर
अपनी होली तभै मनेगी
अपने रंग रँगूँ जब तुमका।"

इस नवगीत संग्रह में फागुन और बसंत ही नहीं सावन की बारिस, जेठ की गर्मी, पूस की कड़कड़ाती ठण्ड एवं इस सबके बीच मनाये जाने वाले उत्सवों के अपनेपन के मध्य कहीं बढ़ते अजनबीपन को भी पढ़ा जा सकता है।

समकालीन गद्य कविता जिस आधुनिक भावबोध की बात करती है, वह सम्पूर्ण आधुनिक भावबोध, नई- टटकी- समकालीन भाषा, जटिलतम होता कथ्य शुभम श्रीवास्तव के नवगीतों में पूरी ऊर्जा के साथ उपस्थित है। मात्र २५ वर्ष की आयु का यह कवि नवगीत कविता में जिस भाव-बोध और भाषा बोध को लेकर आया है, वह अद्भुत और चौकाने वाला है। इनकी नवगीत कविताओं की भाषा में एक बिल्कुल नयी ही आहट सुनाई देती है। यद्यपि इनके उपयोग से कई जगह काव्यात्मकता में गतिरोध - सा भी आया है, किन्तु ये शब्द, इनकी उपस्थिति अपने समय की उपस्थिति को प्रामाणिक बनाते हैं।

व्यवस्था और परिवेश में आ रहे बदलाव को व्यक्त करने से कविता कभी चूकती नहीं। जहाँ राजनीति में स्त्रियों की बढ़ती भागीदारी ने उन्हें घर से निकाला है, वहीं लोकतंत्र में व्यवस्था के विरोध का एक अराजक माहौल भी पैदा हुआ है। यद्यपि यह विरोध कहाँ, कितना जरूरी है, यह प्रश्न अलग किन्तु महत्वपूर्ण है। तब भी शुभम लिखते हैं -
" पर्चे बाँटो /बसें जलाओ
काले झण्डे से दहलाओ
लोकतंत्र के हर पहलू को। "

किसी कविता को पढ़ते हुए कवि की दृष्टि को पढ़ना भी अनायास ही होता है, तो हम पाते हैं कि नवगीत कवि शुभम की दृष्टि और पीड़ा शिक्षा से वंचित पत्थर के दो टुकड़ों को बजाते - गाते बच्चे, पिटारी में साँप लेकर भीख मांगते बच्चे और भूख, गरीबी, गाली, अपमान, सब कुछ सहजता से सह - पी जाने वाले इन बच्चों की पीड़ा को भी अपनी कविता में ले आती है।
'बाल सपेरे भूख कमाते कोरस गाकर
भूख-गरीबी, गाली-झिड़की, सब स्वाभाविक
भीख माँगते तब आँखों में आँसू लाकर। "

कवि दृष्टि से कवि-ज्ञान और कवि-संवेदना मिलकर व्यञ्जना का वह वितान बनाने की दिशा में शुभम के कवि की यात्रा इस तरह अग्रसर होती देखी जा सकती है कि, जिससे कविता का केनवास व्यापक और बड़ा हो सके। ऐसा ही एक नवगीत 'अनुबंधों की खेती 'में वे लिखते हैं -
" बहुत देर डूबा-उतराया
मन में कोई मन का कोना।
सोख रही चिमनी सोंधापन
फीके कप बासी गर्माहट
डाइनिंग टेबल रोज देखता
है यह आपस की टकराहट
हर रिश्ते को डीठ लगी है
सपनों पर मुँहबंदी टोना।
बाँह थामती इक टहनी को
झूठे वादों से फुसलाकर
दिन की अपनी दिनचर्या है
घर से दफ्तर, दफ्तर से घर
बूढ़े बादल की लाचारी
कितना मुश्किल बादल होना। "

शुभम अपने गीतों में कभी-कभी एक फैंटेसी - सी रचने की कोशिश करते हैं। जहाँ वे ऐसा करते हैं, वहाँ कविता अपने कई-कई संदर्भ रचती प्रतीत होती है। ऐसा ही एक नवगीत कविता है - 'भारी माहौल'
" लावा जैसे बहे-ढहे स्तूप पिघलकर
एक तिलस्मी धूप हँस रही बीच सड़क पर
......................................................
यह ठण्डाई चोट आग रह-रह भड़काती
दे अनिष्ट आगाह आँख खुलते फड़काती
खंजर जैसी शक्ल पा रहे हैं लोह बेडौल।"
एवं
"मेज पर कुछ पड़े चेहरे,
अपशकुन - सी गर्म जोशी
चंद मिनटों के लिए,
वह औपचारिक ताजपोशी
जो निठल्ले लोग थे,
ठण्डी पहाड़ी माँग बैठे।"

शुभम किसी - किसी गीत को बिना मुखड़े का ही रहने देते हैं। यह उनकी शैल्पिक प्रयोगशीलता भी हो सकती है, किन्तु गीत कविता की दृष्टि से इसे ठीक नहीं कहा जा सकता। किसी भी गीत का मुखड़ा अर्थ ही नहीं लय की दृष्टि से भी कविता के ' मूल ' की भाँति होता है। कोई भी कविता जब तक आवर्त नहीं रचती, वह अपने कविता होने की शर्त को पूरी तरह पूरा नहीं करती। गीत कविता में लय का भी एक आवर्त होता है, जिसे कोई भी कविता बार-बार पूरा करती है और यह आवर्त मुखड़े को मध्य में रखकर ही पूरा होता है। ऐसा ही बिना मुखड़े वाला नवगीत है 'आदिम गंधी बेला'। यद्यपि यह नवगीत अपने अपने कथ्य, प्रवाह और प्रभाव की दृष्टि से अच्छा नवगीत है, तब भी नवगीत कविता में शिल्प की दृष्टि से भी विचार किया ही जाना चाहिए ; क्योंकि यह शिल्प वह महत्वपूर्ण कारण है, जो कविता को जन तक ले जाने और इसे आम पाठक, श्रोता, भावुक के निकट बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस संग्रह के रचनाकार की समय-दृष्टि प्रखर है। वह अपने नवगीतों में समय को इस तरह वर्तता है कि कविता अपने समय का दस्तावेजी पृष्ठ बन जाती है। जब वह -
"चुभते हैं कोलाज पुराने
सहमी हुई सदी की आँखें
दो तरफा संवेग पनपता
सारे आशय बगलें झाँकें
संकेतों ने अर्थ दिये
हालात बड़े संगीन।" कहता है तो इस सदी की स्थितियों और संभावनाओं के साथ पिछली सदी के अनुभवों को भी समेट लेता है।

शुभम श्रीवास्तव के इस नवगीत संग्रह "फिर उठेगा शोर एक दिन" के सभी नवगीतों को पढ़कर जो बात चौंकाती है, वह है एक नई शब्दावली की प्रबल आहट। वे डिजिटल होती दुनिया में प्रचलन में आ रहे शब्दों का बहुतायत में प्रयोग करते हैं। यथा - मैसेज, अनफ्रेंड, ब्लाक, पोक, बुल-बीयर, सेंसेक्स, ड्राप कालें, स्क्रीन, रोबोट - मन, डस्टबिन, हेडफोन, रिमिक्स, ब्रेड, कर्टसी, टावर, डी जे, गुडमाॅर्निंग, गुड नाइट, डिबेट, राईट, फाईट, बिट-बाइट, साईज, टैग, कोलाज, लोडिंग, असेम्बलिंग, इन्सेन्टिव, ओवरटाइम, नेटवर्क, रिट, स्टे आदि। यद्यपि जिस परिमाण में शुभम के नवगीतों में लोक और लोक के शब्द हैं, उनकी तुलना में अत्यल्प ही हैं, किन्तु आने वाले समय में भाषा में होने वाले घालमेल की आहट तो हैं ही। ऐसे शब्द कई जगह गीतात्मकता में अवरोध भी पैदा करते हैं। जैसा इनका वास्तविक उच्चारण होता है, गीत में प्रयुक्त होने पर ठीक वैसा उच्चारण नहीं रह जाता। गीतकार को यह सब भी देखना होगा। साहित्यकार को प्रवृत्तियों का पिछलग्गू होने से बचना चाहिए। उसका दायित्व अपनी भाषा, लोक, लय सबके संरक्षण का भी है। इसलिए अनियन्त्रित ढंग से हावी होती अनपेक्षित प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण की निरन्तर कोशिश करना भी उसका दायित्व होना चाहिए।

कविता में कथ्य बहुत महत्वपूर्ण चीज है, किन्तु बात जब नवगीत कविता की आती है, तो कथ्य को लय व प्रवाह में ढालकर कविता बना देना कवि की जवाबदारी है। कथ्य व विषय से समझौता किये बिना गीत में कहना ही तो उसकी चुनौती है, अन्यथा तो यहाँ गद्य भी कविता की श्रेणी में आ रहा है। इस दृष्टि से होने वाली चूकों से बचने की जरूरत है।

इस संग्रह के नवगीतों को पढ़ते हुए पाठक जिस राग बोध को जियेगा, वह राग बोध उसे गीतों को अपना ही राग बनाने का का काम करेगा। इसे पढ़कर जिन्दगी और समस्याओं को देखने की दृष्टि में कुछ नया भी जुड़ेगा, इसलिए भी यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। इस संग्रह के कवि शुभम श्रीवास्तव को हार्दिक शुभकामनायें।
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गीत नवगीत संग्रह- फिर उठेगा शोर एक दिन, रचनाकार- शुभम श्रीवास्तव ओम, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, १/२०,महरौली,नई दिल्ली - ११००३०, प्रथम संस्करण संस्करण, मूल्य- रु. २४०, पृष्ठ- ११२, समीक्षा- राजा अवस्थी, आईएसबीएन क्रमांक- ९७८८१७४०८७००३